एलिज़ाबेथ डेनली मूलभूत जीवन मूल्यों पर लौटने की बात कर रही हैं और इस प्रक्रिया में पृथ्वी पर सभी के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए कुछ सरल तरीके बता रही हैं।

 

स जनवरी ‘मूलभूत जीवन मूल्यों पर लौटने’ का विचार मेरे दिमाग में सबसे ज़्यादा आता रहा है। हम आमतौर पर प्रत्येक वर्ष की शुरुआत अपनी आदतों और परिस्थितियों को बदलने की आशा रखते हुए, नए संकल्पों के साथ करते हैं। लेकिन इस साल की शुरुआत अच्छी नहीं रही और इसकी वजह है युद्ध से होने वाला विनाश, दुनिया भर में अनेक विस्थापित लोग, भोजन, आश्रय या रहने के लिए सुरक्षित स्थानों के बिना पीड़ित परिवार और हर महाद्वीप पर सभी समुदायों को खतरे में डालने वाला जलवायु संकट। 

ऐसी अनिश्चितता के रहते आत्मावलोकन के प्रति मान्य दृष्टिकोण और उसके बाद व्यक्तिगत लक्ष्य का चुनाव, संकल्प-निर्धारण और नई आदतें बनाना बहुत सुखकर लगते हैं; जबकि ‘मूलभूत जीवन मूल्यों पर लौटने’ का संबंध उन लोगों से है जिनके लिए अपनी मूलभूत ज़रूरतों को भी पूरा करना मुश्किल है।

हममें से जिन लोगों को भाग्यवश सुरक्षा, पर्याप्त भोजन, स्वच्छ पानी, आश्रय और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त है, हमारे ‘मूलभूत जीवन मूल्यों’ में व्यक्तिगत आकांक्षाओं के साथ-साथ वैश्विक नागरिकता की सामूहिक आकांक्षाओं को कैसे शामिल किया जा सकता है? क्या हम संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों को अपनी वैश्विक आकांक्षाओं के रूप में उपयोग कर सकते हैं ? इसे ज़्यादा निश्चितता के साथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि आठ साल बाद भी हम उन्हें हासिल करने के अधिक करीब नहीं हैं।

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 मुनाफ़ाखोरी अभी भी गरीबी उन्मूलन पर और परस्पर विवाद एकता पर भारी पड़ रहे हैं। हम एकजुट मानवता से कोसों दूर हैं।

इसलिए इस वर्ष मैं एक अलग तरीका अपना रही हूँ। इसमें अभी भी आत्म-सुधार शामिल होगा, क्योंकि हम यहाँ विकसित होने के लिए हैं और क्योंकि सामूहिक परिवर्तन व्यक्तिगत परिवर्तन पर आधारित है। लेकिन इसमें कुछ है जो ज़्यादा महत्वपूर्ण है – हमारी परस्पर निर्भरता और एक-दूसरे के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी।

कई आध्यात्मिक शिक्षकों ने इस दुनिया में दर्द और पीड़ा के बारे में बात की है। एकहार्ट टोल ने मनुष्य के पीड़ा-शरीर (मनुष्य के जीवन भर की पीड़ाओं का संग्रह) का वर्णन किया है, बाबूजी ने अपनी पुस्तक ‘ऋतवाणीमें दर्द और दुखों की विवेचना की है और बुद्ध जीवन को उसकी निरंतर बदलती नश्वरता के कारण पीड़ा के रूप में देखते हैं। जो दर्द और पीड़ा एक व्यक्ति को प्रभावित करती है वही पीड़ा, परिवारों, समुदायों और पूरी आबादी को भी प्रभावित करती है। क्या हम इसे कर्म-भोग कहकर खारिज कर सकते हैं? ऐसा करना निष्ठुरता होगी और हम निष्ठुर नहीं हैं।

 

चुनौतियाँ और आकांक्षाएँ

इसलिए इस वर्ष मेरे संकल्प व्यक्तिगत और सामूहिक चुनौतियों व आकांक्षाओं को संबोधित करेंगे। यह परिवर्तन लाने की आशा में वास्तविक इच्छा-सूची बनाने का एक प्रयास है।

तर्क के लिए, मान लीजिए कि वर्ष 2024 के लिए मेरी सर्वोच्च महत्वाकांक्षाएँ हैं - 

मेरे सहित सभी के लिए -

सरल जीवन,

आध्यात्मिक विकास,

सौहार्दपूर्ण रिश्ते,

कल्याण,

खुशी,

वास्तविकता और

स्वीकरण।

चिंतन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक आकांक्षा के साथ उसकी अपनी वास्तविकताएँ जुड़ी होती हैं और वे हमेशा दूसरों के अनुकूल नहीं होतीं। उदाहरण के लिए, आध्यात्मिक विकास और सांसारिक सुख हमेशा एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते। आध्यात्मिक विकास के कई लाभ हैं लेकिन वे इस लोक के नहीं हैं। तो अधिक महत्वपूर्ण क्या है - आध्यात्मिक विकास या सुख? यह तय करना आवश्यक है कि कौन सा अधिक महत्वपूर्ण है।

सामंजस्य एक महत्वपूर्ण आकांक्षा है लेकिन क्या यह आशा करना वास्तविक है कि हमारे सभी रिश्ते सामंजस्यपूर्ण हों ? या हमारे महत्वपूर्ण रिश्ते हमेशा सौहार्दपूर्ण बने रहें ? हर रिश्ते में समय के साथ प्रायः बदलाव आते रहेंगे जिनमें कभी सामंजस्य तो कभी असामंजस्य रहेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उन परिवर्तनों से गुज़रते हुए कैसे आगे बढ़ते हैं। यह हमें व्यक्तिगत स्तर पर तो प्रभावित करता ही है लेकिन यह इसे भी निर्धारित करता है कि हम वैश्विक स्तर के संघर्षों, जैसे फ़िलिस्तीन और इज़राइल के बीच संघर्ष, सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष, के रहते कैसे आगे बढ़ते हैं।

क्या सौहार्दपूर्ण रिश्ते हमेशा आध्यात्मिक विकास के अनुकूल रहेंगे ? मेरे विचार में नहीं। आध्यात्मिक रूप से विकसित जिन लोगों को मैं जानती हूँ, वे अपने प्रियजनों से बहुत कुछ चाहते हैं और सामंजस्य केवल इसलिए बना रहता है क्योंकि वे प्रियजन इसमें निहित बलिदान देने को तैयार होते हैं।

क्या खुशहाली और प्रसन्नता आध्यात्मिक विकास के साथ तालमेल रखते हैं ? हमेशा नहीं। वास्तव में, एक आध्यात्मिक व्यक्ति के जीवन में शायद समुचित स्वास्थ्य से कुछ कम की आवश्यकता हो। और उसकी व्यक्तिगत खुशी उसके विकास, उससे अपेक्षित परिवर्तन और उसके द्वारा ली जाने वाली ज़िम्मेदारियों से मेल न खाए।

जैसा कि प्रतीत होता है कि इनमें से कोई भी आकांक्षा आध्यात्मिक विकास के अनुकूल नहीं है, इसलिए हम साधारण जीवन जीने लगते हैं जो अन्य सभी आकांक्षाओं के अनुकूल प्रतीत होता है। यह सदैव हर पहलू को विकसित करता है। वास्तविकता और स्वीकार्यता के बारे में भी यही सच है। फिर भी, वास्तविकता हमें हर चीज़ को अंतर्दृष्टि, स्पष्टता और विवेक के साथ देखने की चुनौती देती है। यह एक कठिन कार्य है जिसमें प्रेम और करुणा की आवश्यकता है। यह केवल स्वीकरण से ही संभव है जो सूची में अंकित अंतिम आकांक्षा है। स्वीकरण हमारे जीवन में आने वाली अधिकांश समस्याओं का प्रतिकार हो सकता है। यह हमारी समस्याओं का समाधान तो नहीं करता है लेकिन यह हमें ‘मूलभूत जीवन मूल्यों पर वापस’ ले आता है, एक तटस्थ दृष्टिकोण पर जिसमें कोई पक्षपात या पूर्वाग्रह नहीं होते। यह एक प्रारंभिक बिंदु है जहाँ से हमें आगे बढ़ना है। मुझे लगता है कि यह एक ऐसा कदम है जिससे हम अक्सर चूक जाते हैं। हम अधिकांशतः चीज़ों को अपने नज़रिए से सुलझाने की कोशिश करते हैं।

यह केवल स्वीकरण से ही संभव है जो सूची में अंकित अंतिम आकांक्षा है। स्वीकरण हमारे जीवन में आने वाली अधिकांश समस्याओं का प्रतिकार हो सकता है। यह हमारी समस्याओं का समाधान तो नहीं करता है, लेकिन यह हमें ‘मूलभूत जीवन मूल्यों पर वापस’ ले आता है, एक तटस्थ दृष्टिकोण पर जिसमें कोई पक्षपात या पूर्वाग्रह नहीं होते। यह एक प्रारंभिक बिंदु है जहाँ से हमें आगे बढ़ना है।


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योगदान देने का एक तरीका

हम जिन सामूहिक संकटों का सामना कर रहे हैं उनके समाधान का हिस्सा बनने के लिए क्या कर सकते हैं ? एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए इसका तत्काल उत्तर है संकल्प - मानव विचार की शक्ति। इसका बहुत कम उपयोग किया जाता है। हम अपने विचारों को प्रेम, एकता और सामंजस्य की ओर निर्देशित कर सकते हैं। और यह सरल प्रक्रियाओं के माध्यम से आसानी से किया जाता है, उदाहरण के लिए, शांति के तीन संकल्प -

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1 दुनिया के सभी लोगों में करुणा हो, दयालुता हो, प्रेम हो, शांति हो।

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2 आपके आस-पास की हर चीज़, जैसे आकाश, महासागर, पेड़, लोग, वन्य जीवन, इमारतें, सब शांति में डूबे हुए हैं और हर चीज़ शांति फैला रही है।

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3 हर कोई शांतिपूर्ण बन रहा है तथा सही सोच, सही समझ और उद्देश्य के प्रति ईमानदारी विकसित कर रहा है।

कल्पना करें, अगर दुनिया भर में हर कोई अपने दिल की गहराई से हर दिन इनमें से एक, दो या तीनों सुझावों का अभ्यास करे तो कितना अच्छा हो। सभी युद्ध समाप्त हो सकते हैं, सभी संसाधन साझा किए जा सकते हैं और हम संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों को आसानी से हासिल कर सकते हैं। हमारी मानसिकता बदल जाएगी जिससे एक महत्वपूर्ण वैश्विक बदलाव आएगा क्योंकि हम हर व्यक्ति और हर चीज़ की परवाह करेंगे। संकल्प करने का अभ्यास नि:शुल्क है, करना आसान है, इसमें केवल कुछ मिनट लगते हैं और हर कोई इसमें शामिल हो सकता है।

हम अपने विचारों को प्रेम, एकता और सामंजस्य की ओर निर्देशित कर सकते हैं।


तो, वर्ष 2024 के लिए यही मेरा संकल्प है। मैं आत्म-सुधार, अपने प्रियजनों की देखभाल और अपने स्थानीय समुदाय में गतिविधियों के लिए स्वेच्छा से काम करना जारी रखूँगी लेकिन एक वैश्विक नागरिक के रूप में सामूहिक परिवर्तन में भी मैं योगदान देना चाहती हूँ। यह एक सकारात्मक तरीका है और मैं ऐसा कर सकती हूँ।

कलाकृति - जस्मी मुद्गल


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एलिज़ाबेथ डेनली

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