जे.सी.लिटिल कैनेडा की एक कलाकार हैं जो पहले एक सजीवन चलचित्र निर्माता (animator) थीं। उन्हें उनके पानी के रंगों से बने भावपूर्ण चित्रों और उत्तम कथावाचन के लिए जाना जाता है। पूर्णिमा रामचंद्रन ने उनका यह साक्षात्कार लिया। वे बताती हैं कि कैसे कला ध्यान की तरह कार्य करती है। वे अपनी दो उत्कृष्ट चित्रकलाओं के बारे में भी बात करती हैं - पहली है ‘मोमेंटम’, जो आंतरिक रूपांतरण के बारे में आकाशीय चित्र है तथा दूसरी स्त्रीत्व और समय के बारे में मर्मस्पर्शी ‘डेडलाइन’ है।
पूर्णिमा - क्या आप कला को ध्यान के रूप में मानती हैं? जब भी मैं किसी चित्रकला को देखती हूँ तो मुझे उसमें एक तरह की ध्यानमय स्थिरता नज़र आती है।
मुझे भी ऐसा लगता है। इसे इस तरीके से भी कहा जा सकता है कि जब आप कलाकृति बना रहे होते हैं तब आप पूरी तरह उसमें डूब जाते हैं।
मेरे लिए यह इससे भी पहले शुरू हो जाता है। मैं उन लोगों में से हूँ जिनकी कल्पनाशीलता अत्यधिक सक्रिय है। मेरे मन में बहुत सारे विचार और संकल्पनाएँ सदैव उभरती रहती हैं और मैं उनके बारे में अलग-अलग तरह से सोचती रहती हूँ कि उन्हें कैसे प्रस्तुत किया जाए। क्या यह हास्यकर है? क्या इसमें शब्दों का खेल है? क्या इसमें भावुकता है? मेरे मन में अंदर ही अंदर उन चीज़ों को लेकर मंथन चल रहा होता है जिनकी मैं तस्वीर बनाना चाहती हूँ।
जब आप अंततः तस्वीर बनाना शुरू करते हैं तब कुछ नई बातें भी पता चलती हैं। भले ही हम जो पाना चाहते हैं, उसे यानी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को पूरी तरह प्राप्त न कर पाए हों लेकिन मेरे दिमाग में उसका ज़्यादातर कार्य पहले ही हो चुका होता है। यह सब अत्यंत ध्यानमय बन सकता है। और इससे समस्या भी पैदा हो सकती है क्योंकि हम इसमें खो सकते हैं।
मेरे पास इससे बचने का साधन है मेरा पालतू कुत्ता। वह मुझे देर रात तक लगातार काम करने से रोकता है। आपके सवाल का जवाब यह है कि हाँ, निश्चित ही इसमें ध्यान का पक्ष है। बल्कि कई पक्ष हैं।
पूर्णिमा - आपकी कार्टून बनाने वाली से सुंदर पेंटिंग बनाने वाली कलाकार तक का सफ़र कैसा रहा? क्या आपकी रचनात्मक प्रक्रिया में बदलाव आया है? इस विकास ने एक व्यक्ति के रूप में आपको कितना बदल दिया है?
बचपन से ही मैंने हमेशा दोनों को एक साथ मिलाकर काम किया है। मेरे माता-पिता जानते थे कि मैं चित्र बना सकती हूँ। इसलिए मेरे हर जन्मदिन पर और क्रिसमस पर वे मुझे चित्र बनाने का सामान उपहार में देते थे। जब भी कोई उपहार लेने का अवसर होता, मुझे कला का सामान ही मिलता था। मैंने कला सीखी है और उसमें बहुत सारी शिक्षा प्राप्त की है। बचपन में मैं सिर्फ़ हास्यजनक चित्र बनाना चाहती थी।
जब मैं छोटी थी तब हम कैनेडा के मोंट्रियल शहर में रहते थे। जब मैं ग्यारह वर्ष की हुई तब हम हॉन्गकॉन्ग चले गए। वहाँ दो बातें हुईं। पहली यह कि मेरे माता-पिता ने मुझे तत्काल एक चीनी ब्रश पेंटिंग की कक्षा में भरती करवा दिया। वहाँ मैं पानी में रंगों के फैलाव (dispersion of pigment) से बहुत प्रभावित हुई। यह मेरी वाटर कलर्स यानी पानी वाले रंगों से पहली विधिवत पहचान थी। दूसरी बात यह हुई कि मेरा छोटा भाई अपने पैरों की सर्जरी के लिए अस्पताल में भरती हो गया। वहाँ उसके स्वास्थ्य लाभ के दौरान मुझे उसे खुश करने और हँसाने के लिए हास्यजनक चित्र बनाने का प्रोत्साहन मिला।
जब मैं बड़ी हुई तब विश्वविद्यालय में ग्राफ़िक डिज़ाइन और चित्रण सीखने के लिए गई। वहाँ मैं एक सजीवन चलचित्र निर्माता से मिली और मैं भी सजीवन चलचित्र निर्माता बन गई। दशकों तक मैंने सजीवन चलचित्र बनाने का कार्य किया जो एक अलग तरह की रचनात्मकता है।
इसमें भी आप सारा समय चित्र बनाते रहते हैं लेकिन ललित कला (fine art) पर केंद्रित नहीं होते। मेरे सजीवन चलचित्र के व्यवसाय में ही मेरी ब्लॉगिंग साईट ‘द एनिमेटेड वुमन’ बनी जहाँ अंतत: मैंने अपनी टीवी श्रृंखला बनाई। मैंने तीन या चार वर्षों तक हर हफ़्ते नब्बे घंटे की दर से काम किया। मैं उससे अवकाश लेकर अपनी छोटी सी रचनात्मक कल्पनाओं को अभिव्यक्त करना चाहती थी। डिजिटल रूप से रेखाचित्रों को डालना मेरी अतिसक्रिय कल्पनाशीलता को अभिव्यक्त करने का तीव्रतम माध्यम था। मैंने वैचारिक बातों से संबंधित काम किया जैसे पारिवारिक जीवन पर छोटे-मोटे चुटकुले लिखे और यह मेरा ब्लॉग बन गया।
इन रेखाचित्रों (stick figures) का उपयोग करके मैंने कुछ लघु सजीवन चलचित्र बनाए लेकिन मैंने ऐसे भी बहुत काम किए हैं जिन्हें मैं श्रृंखलाबद्ध कला कहती हूँ - बच्चों के लिए चित्रित पुस्तकें जिन्हें मैंने ही लिखा और प्रकाशित किया। उस कला का बहुत सा हिस्सा मेरे ब्लॉग पर भी था। मेरे ब्लॉग ‘द एनिमेटेड वुमन’ में इसी तरह के चित्र थे।
इसके लिए मुझे किसी भी अवधारणा, अनुभूति या विचार को सरल करके कवितामय ढंग से प्रस्तुत करना पड़ता था। वे हमेशा हास्यकर नहीं होते थे, कभी-कभी वे बहुत संवेदनशील, आनंदमय या दुखद भी होते थे जिन्हें देखकर आँखें भर आती थीं। जब मैंने पुनः पानी वाले रंगों का प्रयोग शुरू किया तब यह मेरे लिए स्वाभाविक प्रगति थी जिसमें मैं इन एक तस्वीर वाली कहानियों को संपूर्ण पेंटिंग का स्वरूप देने लगी।

मेरे सभी संकल्पना चित्रों (concept drawings) की शुरुआत इन सरल रेखाचित्रों से ही होती है। मैं आपको अपनी स्केचबुक दिखाती हूँ। मैंने रंगों पर काफ़ी अध्ययन किया है। आप देख सकती हैं कि मैंने कैसे एक अपरिष्कृत चेहरे से शुरू करके इसे परिष्कृत किया है। स्वर्ण की परत का उपयोग कैसे होगा, मैं किन रंगों का प्रयोग करूँगी या पोशाक कैसी होगी, मैं हर चीज़ स्केच बुक में लिख लेती हूँ। मेरी पेंटिंग, ‘मोमेंटम’ (https://www.jclittleportraits.com/fine-art-shop/
momentum) मेरे लिए खास थी क्योंकि पानी की रंगों के लिहाज़ से यह काफ़ी बड़ी थी।
पूर्णिमा - सचमुच ‘मोमेंटम’ मेरी अब तक की देखी हुई सबसे अद्भुत कलाकृतियों में से एक है।
शुक्रिया! सुनकर अच्छा लगा। यह चित्र इसलिए बहुत खास है क्योंकि जब मुझे इसका विचार आया तब मैं अपनी दोस्त ट्रेसी को मॉडल के रूप में चाहती थी। वह इसके लिए विशिष्ट मुद्रा में बैठने के लिए तैयार हो गई। इसकी शुरुआत सिर्फ़ सोफ़े पर बैठी हुई महिला के रूप में हुई थी। सोफ़े पर बैठी हुई महिला के बहुत सारे चित्र हैं। यह एक प्रचलित विषय है। लेकिन मैं उसे पृथ्वी की कल्पना करते हुए, संसार की कल्पना करते हुए दिखाना चाहती थी। मैं उसे शायद संसार की नए सिरे से कल्पना करना, उसका चिंतन करना और तितली के प्रतीक से रूपांतरकारी, चिंतनशील स्थिति दिखाना चाहती थी।
उसे सृष्टा की तरह दिखाने के लिए या एक तरह का ब्रह्मांडीय वातावरण बनाने के लिए मैंने तय किया कि उसे हर तरह की स्वतंत्रता दी जाए। इसलिए मैंने उसे अंतरिक्ष में स्थित किया। यह चित्र आकार में मेरे पहले बनाए गए सभी चित्रों की तुलना में बिलकुल अलग था लेकिन यह ‘डेडलाइन’ शीर्षक की कलाकृति, जिसमें घड़ी बनी हुई है, के क्रम में था। यह जादुई यथार्थवाद की दिशा में अधिक जा रही थी, जिसमें आप चीज़ों को यथार्थ रूप से दर्शाते हैं लेकिन वास्तव में वे कभी यथार्थ नहीं हो सकतीं। यह संभव नहीं कि कोई महिला अंतरिक्ष में सोफ़े पर बैठकर कल्पना करे।
मैं सजीवन चलचित्र की दुनिया से आई हूँ जहाँ हम कुछ भी कर सकते हैं इसलिए मैं अपने आपको वास्तविकता से सीमित नहीं करना चाहती हूँ। उस चित्र के दायरे और आकार की वजह से उसकी पृष्ठभूमि बनाने के लिए मैं अपने साधारण ब्रश का उपयोग नहीं कर सकती थी। मुझे पृष्ठभूमि के लिए बिलकुल अलग तकनीक का प्रयोग करना पड़ा क्योंकि मैं उसमें ब्रश के निशान नहीं देखना चाहती थी। वास्तव में मैंने उस चित्र को तीन बार बनाया, पूरे चित्र को नहीं सिर्फ़ पृष्ठभूमि को। पहली दो बार में वह वैसा नहीं बना जैसा मैं चाहती थी। मैंने फिर एक तरीका खोज निकाला जिसमें मैं उसे बिना ब्रश के रंग सकती थी। मैंने एक विशेष तकनीक का उपयोग किया जिसमें मैंने कागज़ पर बहुत सा पानी डाला और उसके ऊपर रंग के छींटे डालकर उसे कागज़ पर घुमाया। उससे चित्र में सुंदर ब्रह्मांडीय अनुभूति पैदा हो गई। पृष्ठभूमि का ज़्यादातर काम रंगों की एक ही परत में हो गया।
जलरंगों से इतनी बड़ी तस्वीर बनाना बहुत कठिन है। जब वे छोटी होती हैं तब आप एक खास आकार के ब्रश का प्रयोग कर सकते हैं। ब्रश के बालों की खास मोटाई होती है और जब बड़े ब्रश का प्रयोग करना हो तब यह उसी तरह से काम नहीं करता। यह जलरंगों से काम करने का तकनीकी पक्ष है कि चीज़ें वैसा ही रूप लें जैसा आप चाहते हैं जो वास्तव में, अपने ही तरीके से रूप लेती हैं। आप उन्हें अपने तरीके से काम करने देते हैं।
इससे जादुई यथार्थवाद आसानी से लाया जा सकता है। मुझे इस माध्यम की यह बात बहुत पसंद है। यह एक बहुत सच्चा माध्यम है। इसके साथ झूठ बोलना संभव नहीं है। इससे आप चीज़ों को ढक नहीं सकते। उस चित्र में में सफ़ेद रंग की एक बूंद भी नहीं है। जो सफ़ेदी सितारों में या अन्य चीज़ों में दिखाई देती है, वह कागज़ की है जिससे यह बहुत चमकदार दिखाई देती है। इस चित्र में यही चीज़ मुझे सबसे अच्छी लगती है।
मुझे लगता है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो इसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि यह कई विषयों को प्रस्तुत करती है - स्त्री, हमारे शरीर और समय किस तरह तेज़ी से बीत रहा है।
पूर्णिमा - मुझे आपकी ‘डेडलाइन’ भी पसंद है। जिसमें महिला मिनिट और घंटे के कांटे के मध्य बैठी हुई है। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि वह मैं हूँ और फिर मैंने सोचा कि शायद हर व्यक्ति को ऐसा ही लगता होगा।
मुझे लगता है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो इसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि यह कई विषयों को प्रस्तुत करती है - स्त्री, हमारे शरीर और समय किस तरह तेज़ी से बीत रहा है। समाज हमारे ऊपर युवा और प्रजनन योग्य बने रहने का बहुत दबाव डालता है। हमारी प्रजनन क्षमता की समय सीमा है। आपके शरीर का समय भी खत्म हो जाएगा। काम तो होता ही है और उसे समय पर पूरा करने या कुछ प्राप्त करने के लिए हम अपने ऊपर समय सीमा लगा देते हैं। मुझे लगता है कि सभी लोग इससे आकर्षित होते हैं क्योंकि इससे लोग जुड़ाव महसूस करते हैं।
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