सिद्धार्थ वी. शाह ने अपने संपूर्ण व्यावसायिक जीवन में कला को सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक ज़िम्मेदारी के माध्यम के रूप में बढ़ावा दिया है। हाल ही में उन्होंने मेसाचुसेट्स में ऐमहस्ट कॉलेज के कला संग्रहालय के निदेशक का पद संभाला है। वेनेसा पटेल के साथ हुए वार्तालाप में उन्होंने बताया कि किस तरह से इस नए कॉलेज के वातावरण में वे अपनी परिकल्पना का विस्तार कर रहे हैं।

प्रश्न - नमस्ते सिद्धार्थ, मुझे समय देने के लिए धन्यवाद। हमारी पिछली मुलाकात के बाद आपका स्थानांतरण मीड, ऐमहस्ट में हो गया है। यहाँ के लोग अलग तरह के है न?

एकदम अलग। अभी मैं ऐमहस्ट कॉलेज के परिसर में हूँ और यहाँ के विद्यार्थी बहुत ही प्रतिभासंपन्न व बुद्धिमान हैं। हम यहाँ सच में कुछ शैक्षिक परियोजनाएँ कर सकते हैं। ये लोग कला के बारे में बहुत ही अलग तरह से और बारीकी से सोच पाते हैं। हम थोड़ा जोखिम उठा सकते हैं क्योंकि कॉलेज कुछ नए ढंग से सोचने के लिए ही होता है। 

प्रश्न - इसमें विद्यार्थी, शिक्षक और शायद आसपास के समुदाय के लोग भी सम्मिलित होंगे। पीबॉडी एसेक्स संग्रहालय में आपके पद में मुख्य रूप से जो सामुदायिक सहभागिता होती थी, उसे आप कैसे आगे ले जा रहे हैं?

यह मेरे कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। कला को आम लोगों को आसानी से कैसे उपलब्ध कराना, उन तक किस तरह आसानी से पहुँचाना और संग्रहालयों का किस तरह से प्रजातंत्रीकरण करना, यही सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन संग्रहालय कॉलेज परिसर के बीचों-बीच स्थित है। तो अगर आसपास के लोगों को संग्रहालय आने में बेहद कठिनाई होती है या अगर उन्हें गाड़ी पार्क करने में तकलीफ़ होती है या उन्हें ऐसा महसूस होता है कि जो भी कॉलेज परिसर में है वह उनके काम का नहीं है तो हम थोड़े सीमित हो जाते हैं। मैं कोशिश कर रहा हूँ कि संग्रहालय को कॉलेज परिसर से निकालकर शहर के पास स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि हम लोगों को यह दिखा सकें कि हम अपने कॉलेज के शैक्षणिक ध्येय के प्रति प्रतिबद्धता और अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन ला रहे हैं। यह एक दीर्घकालिक योजना है। मैं कॉलेज को भी यह दिखाना चाहता हूँ कि हम चाहते हैं कि समुदाय के ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसमें दिलचस्पी लें। हम चाहते हैं कि आम लोग यहाँ निःसंकोच घूमने आ सकें। और यह उन बातों में से एक है जिनका मैं समर्थन करने वाला हूँ।

प्रश्न - क्या यहाँ पर कुछ खास परियोजनाएँ हैं जिन पर आप काम कर रहे हैं?

फ़िलहाल हम एक सार्वजनिक सहभागिता की परियोजना पर काम कर रहे हैं। हम अमरीका और प्रजातंत्र की धारणा, अमरीका की शिक्षाएँ जैसे विषयों पर एक प्रदर्शनी की योजना बना रहे हैं। हम इस विषय पर भी काम कर रहे हैं कि कॉलेज एक ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ भावी नेताओं का विकास हो।

मैं पर्टो रिको के बारे में सोचने लगा हूँ जो वास्तव में अमरीका की एक कॉलोनी है, एक अधिकृत क्षेत्र जिसे हमारा देश नियंत्रित करता है। पर्टो रिको की स्थिति देखकर हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या अमरिका वास्तव में एक प्रजातंत्र है? क्या स्वतंत्रता सचमुच हमारी पहचान है? 

इस प्रदर्शनी की विषय सामग्री पर्टो रिको म्यूज़ियम ऑफ़ कॉन्टेम्पोररी आर्ट से ली गई है जिसका नाम है, “ट्रॉपिकल इज़ पोलिटिकल – कैरेबियन आर्ट अंडर द विज़िटर इकॉनमी रिजीम।” अमरीकी पहचान से जुड़े कुछ मुद्दों को इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है। मेसाचुसेट्स के कुछ शहरों जैसे, होलियोक, स्प्रिंगफील्ड में बाकी देश की तुलना में पर्टो रिको के रहने वाले लोगों की आबादी सबसे ज़्यादा है। लेकिन सर्वोत्कृष्ट कॉलेजों में यह समुदाय फिर भी अपने आपको पूरी तरह से स्वीकृत नहीं पाता है। इसलिए मुझे आशा है कि इस प्रदर्शनी के द्वारा जब हम पर्टो रिको और कैरेबियन की स्थिति के बारे में बताएँगे तो ये सारे लोग इस संग्रहालय में आकर अपनी कहानी को देखेंगे। इस प्रदर्शनी में सारे लेबल अंग्रेज़ी और स्पेनिश में होंगे। तो अपने आस-पास के लोगों के बारे में प्रदर्शनी करके मेरा एक प्रयास है लोगों को जोड़ने का, उन्हें सम्मिलित करने का।

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ऐसी जगह जो आपकी रफ़्तार को धीमी कर दे, आपके मानसिक स्वास्थ्य को ज़रूर बेहतर बना सकती है।


प्रश्न - आशा करती हूँ की इसका विस्तार उसी तरह होगा जैसा आप चाहते हैं।

यहाँ आते ही सबसे पहले मैंने अपने कार्यकर्ताओं से पूछा कि क्या वे लोग ‘सेंसरी अक्सेसबिलिटी (अनुभव को अधिक आकर्षक बनाना विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें संवेदी प्रसंस्करण में कठिनाई होती है) में प्रशिक्षण चाहेंगे। सब मान गए। यह संग्रहालय अब प्रमाणित ‘संवेदी समावेशी’ (सेंसरी इंक्लूसिव) है, यानी हम उन लोगों की ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं जिनकी अक्षमताएँ दिखाई नहीं देती हैं (उदाहरणतः - स्ट्रोक, ऑटिज़्म या किसी भयानक घटना के बाद हुई तनाव की स्थिति)। अगर किसी स्थान में तेज़ आवाज़ या रोशनी हो तो यहाँ पर लोगों को उसके प्रति सचेत करने के लिए संकेत-चिह्न लगे हुए हैं। उसी तरह अगर किसी को तेज़ आवाज़ से परेशानी हो तो उनके लिए हमारे पास आवाज़ कम करने वाले हेडफ़ोन हैं। अगला कदम है ‘रंगों की सुलभता’, जिसके लिए हम विशेष चश्मे खरीदते हैं। कुछ लोग रंगों के अंधेपन (color blindness) के कारण दृश्य कलाओं का पूरी तरह से अनुभव नहीं कर पाते हैं। इन विशेष चश्मों से वे इस कला का पूरा अनुभव ले पाते हैं। 

प्रश्न - निश्चित रूप से इन सबमें ज़रूर काफ़ी पैसा खर्च होता होगा। क्या आपको लगता है कि इस प्रयास से बड़े-बड़े समुदायों की साझेदारी बढ़ेगी?

बिलकुल, हालाँकि इसमें वक्त लगेगा। सामुदायिक साझेदारी के मामले में जल्दबाज़ी नहीं की जा सकती है। जोखिमों को ठीक तरह से आंकना होगा। जोखिमों से मेरा मतलब है कि हम किसी का भरोसा तोड़ सकते हैं, किसी का विश्वास जीतने में ज़्यादा समय लग सकता है प्रदर्शन के अनुरूप साझेदारी को परखना होता है और सबको खुश रखने की कोशिश करनी होती है।

हम एक ऐसे स्कूल के साथ मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कला परियोजना कर रहे हैं जहाँ के बच्चों को सीखने में कठिनाई होती है और जो सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हम उनकी कलाकृतियों को अपनी लॉबी में प्रदर्शित करते हैं। हम उनके लिए खास समय सुनिश्चित करते हैं क्योंकि उनमें से कई बच्चे लोगों के सामने नहीं आना चाहते। हम ऐसा इसलिए नहीं करते कि हमें अच्छा महसूस हो; यह एक ऐसी सुविधा है जो हम उन्हें देते हैं और हम चाहते हैं की ये बच्चे उसका लाभ उठा सकें। लेकिन उनके साथ साझेदारी करने में हमें बेहद संवेदनशीलता से पेश आना पड़ता है। इन सारी चीज़ों में वक्त लगता है। 

प्रश्न - हमारे आसपास बहुत उथल-पुथल है। उसके रहते वर्तमान समस्याओं, जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रति डर, का सामना करने में कला की भूमिका पर मैं आपके विचार जानना चाहूँगी। क्या कला, चित्रशालाएँ, संग्रहालय ऐसे मुद्दों के समर्थन में कुछ कर सकते हैं?

इसे करने के कई अलग-अलग तरीके हैं। अभी-अभी आपने जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न भय के बारे में बात की इससे जूझने के लिए एक तरीका यह है कि कला के द्वारा इस समस्या के लिए समाधान प्रस्तुत किए जाएँ। सवाल यह है कि क्या कला यह काम इस तरीके से कर सकती है जिससे सार्वजनिक हित हो? मैंने ऐसे कुछ कलाकारों के बारे में सुना है जो प्रवालभित्तियों (coral reefs) को बुनकर दर्शाते हैं ताकि अन्य लोग भी आकर उसमें भाग ले सकें। यह साथ मिलकर किया गया काम है जो जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में आई किसी विशेष चीज़ के बारे में है। ये समस्याओं के बारे में बात करने के रचनात्मक तरीके हैं।

कला समस्या का निदान सुझा सकती है। कला के द्वारा हम अलग-अलग तरीकों से जातिवाद और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को इस तरह दर्शा सकते हैं जो शब्दों द्वारा नहीं किया जा सकता। गलत शब्दों के इस्तेमाल और उससे लोगों की भावनाओं को चोट पहुँचाने के प्रति काफ़ी संवेदनशीलता रहती है। लेकिन कला इनमें से कुछ जटिलताओं को कृतियों के रूप में व्यक्त कर सकती है जो दिल को बहुत गहराई तक छू जाता है। 

इस बात का दूसरा पहलू यह है कि आप इससे लोगों की संवेदनशीलता उभार भी सकते हैं, हैं न? हो सकता है कि कभी-कभी आपको विषय-वस्तु से संबंधित चेतावनी भी लिखनी पड़े। उदाहरण के लिए आप लिख सकते हैं, “अगली कृति जातिवाद और यौन हिंसा जैसे विषयों से संबंधित है। इसका यहाँ प्रस्तुत किए जाने का कारण यह है कि इन विषयों में ऐसे कई पहलू हैं जिन्हें प्रस्तुत और शामिल किया जाना ज़रूरी है। अगर आप इन कलाकृतियों को नहीं देखना चाहते हैं तो आप संग्रहालय के अन्य भाग में जाएँ।” किसी पर ज़बरदस्ती डर थोपने के बजाय आपको उन्हें कठिनाइयों या डर का सामना करने या न करने का विकल्प देना चाहिए।

आखिरकार, यह सब दर्शक के अनुभव के बारे में है। आपको कलाकृतियों, कलाकृतियों की देखरेख, सही प्रस्तुति व इतिहास और आगंतुकों के अनुभव के बीच संतुलन बनाना होता है। संग्रहालयों में वस्तुओं को उनके ऐतिहासिक महत्व के अनुरूप प्राथमिकता दी जाती है। अब उनमें परिवर्तन आ रहा है और मैं यकीनन उन लोगों में से हूँ जो दर्शक के अनुभव को अधिक महत्व देते हैं; कलाकृतियाँ इसमें सहयोग देती हैं। दर्शक एक अच्छा अनुभव पाएँ इसके लिए ज़रूरी है कि उन्हें विकल्प दिया जाना चाहिए कि वे प्रदर्शनी में जो देखना चाहें देखें न कि उनका सामना किसी ऐसी चीज़ से कराया जाए जिसे देखने के लिए वे तैयार न हों। अब, आप सांस्कृतिक संदर्भ और इतिहास में उस समय जो कुछ हो रहा था, उसके बारे में जान सकते हैं। आप क्या जानना चाहते हैं? आपके पास विकल्प हैं, आप अपना अभियान खुद चुन लें। 


संग्रहालय एक ऐसी जगह हो सकती है जहाँ हमारी जीवन की गति धीमी हो जाए; जहाँ हम सिर्फ़ एक के बाद एक 
तस्वीर देखते चले जाने के बजाय रुककर उसे थोड़ा करीब से, थोड़ा गहराई से देखें।


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प्रश्न - आपने कुछ आध्यात्मिक पहलुओं को जैसे समानुभूति, स्वास्थ्य, जुड़ाव आदि को भी सम्मिलित करने के बारे में बात की है। पीबॉडी में आप ध्यान किया करते थे। क्या यहाँ भी आप कुछ वैसा कर रहे हैं?

चूँकि मैं यहाँ निदेशक हूँ और संस्था में सभी के साथ निभाकर चलना पड़ता है, मैंने अभी उसकी शुरुआत तो नहीं की है लेकिन स्वास्थ्य और उसमें कला की भूमिका के प्रति मेरी प्रतिबद्धता में कोई बदलाव नहीं आया है। मैं जब विद्यार्थी था उसकी तुलना में आज ज़्यादा विद्यार्थी विशेषज्ञों की परामर्श-सेवाएँ लेना चाहते हैं। महामारी के बाद से बड़ी तादाद में विद्यार्थी मानसिक स्वास्थ्य के लिए मदद माँग रहे हैं। इस स्थिति में मैं मानता हूँ कि कला संग्रहालय उपचार, नवीनीकरण, पुनरुद्धार, आराम और रफ़्तार धीमी करने का एक स्थान बन सकता है। ये सारे के सारे एक ही चीज़ के अलग-अलग पहलू हैं। 

मैंने गौर किया है कि इंटरनेट पर नकारात्मक खबरों को पढ़ने में ज़रूरत से ज़्यादा समय बिताने (doom scrolling) के कारण मेरे अंदर चिंता की भावना पैदा हुई है। मैं इसे महसूस कर सकता हूँ क्योंकि इतने सारे समाचार हैं और छवियाँ भी बदलती रहती हैं। मैं एक स्वचालित व्यक्ति या ज़ोंबी (zombie) की तरह बन जाता हूँ और बस बिना सोचे-विचारे स्क्रॉल करता चला जाता हूँ जब तक मैं पूरी तरह से परेशान नहीं हो जाता। मुझे लगता है कि अगर मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ तो यकीनन और भी कई लोग इसका अनुभव कर रहे होंगे और संभवतः मुझसे बुरी स्थिति में होंगे क्योंकि शायद उन्हें इस बात का पता भी नहीं होगा।

संग्रहालय एक ऐसी जगह हो सकती है जहाँ हमारी जीवन गति धीमी हो जाए; जहाँ हम सिर्फ़ एक के बाद एक तस्वीर देखते चले जाने के बजाय रुककर उसे थोड़ा करीब से, थोड़ा गहराई से देखें। मैं सच में यह मानता हूँ कि अगर लोग किसी तस्वीर को देखते हुए, कुछ अनुभव करते हुए, अपनी रफ़्तार कम कर लेते हैं तो यह तेज़ी से एक के बाद एक तस्वीरों को पागलों की तरह देखने के बिलकुल विपरीत अनुभव होगा, चाहे वो कोई डेटिंग एप हो या फिर इंस्टाग्राम। ऐसी जगह जो आपके जीवन की रफ़्तार को धीमी कर दे, आपके मानसिक स्वास्थ्य को ज़रूर बेहतर बना सकती है।

हमारे परिसर में परामर्श-सेवा सेंटर भी है। मैं समझता हूँ कि ऐसे लोग जो यौन हिंसा से पीड़ित हैं  या अल्कोहलिक एनोनिमस (शराब की लत छोड़ने के इच्छुक) और ओवरईटर्स एनोनिमस (ज़रूरत से ज़्यादा खाने की लत छोड़ने के इच्छुक) हैं वहाँ वैयक्तिक सत्र या सामूहिक सत्र के लिए जा सकते हैं। मैं इस बात पर विचार कर रहा हूँ कि क्या हम इस संग्रहालय में इनमें से कुछ समूहों को मिलने की जगह दे सकते हैं? क्योंकि हमारे पास एक बहुत ही खूबसूरत छोटा सा कमरा है जिसमें लकड़ी के पैनल लगे हैं और जिसे पूरी तरह से बंद करके एक अंतरंग वातावरण बना सकते हैं। वह बहुत सुंदर व आरामदेह कमरा है जिसका वातावरण किसी घर की बैठक की तरह है जहाँ लोग आराम से बातचीत कर सकते हैं। यह एक बहुत ही सुरक्षित जगह है जिसमें किसी भी चुनौती के बारे में बातचीत करने में सहूलियत होगी। मैं अभी इस संभावना की जाँच कर रहा हूँ।

ज़रा परीक्षाओं के होने वाले तनाव के बारे में सोचिए। मुझे अभी भी याद है कि परीक्षाओं का कितना तनाव होता था। और उसके साथ पास होते ही नौकरी ढूँढने का भी तनाव होता था। शायद साधारण परिवार से होने के कारण हाथ में ज़्यादा पैसे नहीं होते थे और ऐसा लगता था कि अब हम ज़िम्मेदार होने जा रहे हैं। ये सारे दबाव और साथ में अपने रूप-रंग से असंतोष, अपनी लैंगिक पहचान को लेकर उठते प्रश्न, ये सब विद्यार्थियों के लिए बहुत ही गंभीर मुद्दे होते हैं।

प्रश्न - मुझे लगता है कि पुराने अवलंब बिखर चुके हैं और गायब हो चुके हैं। ऐसा लगता है कि वे सभी अब व्यर्थ हो चुके हैं। अब एक अलग तरह की प्रणाली की ज़रूरत है जहाँ गुमनामी हो, जहाँ कोई पूर्वधारणा न हो, जिसमें पूरी तरह खुलापन भी हो और पूरी तरह से सहयोग भी मिले। मैं सच में चाहती हूँ कि यह विचार साकार हो जाए और आपकी कोशिश सफल हो जाए क्योंकि वह कमरा एक सुंदर आश्रय की तरह प्रतीत हो रहा है।

बिलकुल। इसके अतिरिक्त, पता नहीं हर कोई ऐसा महसूस करता है या नहीं, पर मेरे लिए  सुंदरता उपचार का काम करती  है। जब आप बीमार होते हैं तब अस्पताल उपचार के लिए बिलकुल भी उचित जगह नहीं लगती। वहाँ सैनीटाइज़र से सफ़ाई होती है, वे बहुत ज़्यादा ठंडे होते हैं, वहाँ की गंध भी अप्रिय लगती है और वहाँ हर समय मशीनों की बीप की आवाज़ आती रहती है। एक चिकित्सक का दफ़्तर भी बहुत ही नीरस और अप्रिय लग सकता है। किसी खूबसूरत जगह में होने से जिस तरह हम महसूस करते हैं, जिस तरह हम खुलकर बात करते हैं और जिस तरह हम लोगों से जुड़ने लगते हैं उसमें बदलाव आ जाता है। इसलिए मैं उम्मीद करता हूँ कि यह खूबसूरत कमरा इस काम के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकेगा।

सिद्धार्थ आपका फिर एक बार धन्यवाद।


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सिद्धार्थ वी. शाह

सिद्धार्थ वी. शाह

सिद्धार्थ एमहर्स्ट कॉलेज में मीड आर्ट म्यूज़ियम के संचालक हैं। यहाँ वे संकलन, अधिग्रहण, प्रदर्शनी एवं कार्यक्रमों की देख-रेख करते हैं और लोगों के साथ क़रीबी स... और पढ़ें

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