लौरा ओटिस एमोरी यूनिवर्सिटी, अटलांटा, जॉर्जिया में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं। वे अपने कार्य में वैज्ञानिक और साहित्यिक विचारधारा को एकीकृत करती हैं और बहुसंवेदी कल्पनाओं व भावनाओं में विशेष रुचि रखतीं हैं। प्रोफ़ेसर ओटिस की एक भूतपूर्व छात्रा कशिश कलवानी द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत है। यह देखभाल की आचार नीति के बारे में है।
प्रश्न - प्रोफ़ेसर ओटिस आपका स्वागत है। क्या आप अपनी पृष्ठभूमि और आचारसंहिता व देखभाल में अपनी रुचि के बारे में कुछ बताएँगी?
मैंने विश्वविद्यालय में जैवरसायन (बॉयोकेमिस्ट्री) और तंत्रिका-विज्ञान (न्यूरोसाइंस) की पढ़ाई की। उसके बाद मेरी परिस्थितियाँ बहुत संकटमय रहीं और अंततः मैंने तुलनात्मक साहित्य में पीएच.डी. की। इसीलिए मेरे शोध और अध्यापन के कार्य में विज्ञान और साहित्य का सम्मिलन रहता है। मेरी रुचि देखभाल करने में तब जागृत हुई जब मेरी माँ को इकसठ-बासठ की उम्र में डिमेंशिया (मनोभ्रम) की समस्या शुरू हो गई। और इस वजह से मुझ में यह जानने की रुचि उत्पन्न हुई कि कहानियों, उपन्यासों और नाटकों में देखभाल करने को किस तरह से प्रदर्शित किया जाता है, देखभाल करने के बारे में लोग किस प्रकार की कहानियाँ बनाते हैं, वे कितनी सच्ची होती हैं और देखभाल करने में क्या आचार नीति शामिल है। यही कारण है जो मुझे इस पाठ्यक्रम के लिए एमोरी यूनिवर्सिटी ले आया।
प्रश्न - आपको यह कैसे लगता है कि आपके शैक्षणिक और दैनिक जीवन में साहित्य और तंत्रिका विज्ञान ने आपकी देखभाल और उससे जुड़ी आचार नीति की समझ व दृष्टिकोण को बनाया है?
साहित्य और विज्ञान अलग-अलग तरह से करुणा को जाग्रत करते हैं। विज्ञान हमें याद दिलाता है कि हम सभी कई तरह से एक समान हैं। साहित्यिक अध्ययन करने वाले बहुत सारे लोग सोचते हैं कि सब कुछ संस्कृति और भाषा द्वारा प्रभावित या नियत किया जाता है। लेकिन जब आप सोचते हैं कि मस्तिष्क किस तरह से काम करते हैं तब आपको यह एहसास होता है कि किसी के भी मस्तिष्क में समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हम सब एक जैसी समस्याओं से जूझते हैं। मानवीय तंत्रिका तंत्र संबंधी विकारों को देखकर मुझमें सहृदयता की भावना जाग्रत होती है। मुझे एहसास होता है कि यह तंत्र कितना अनमोल व सुंदर है और मैं इसका दुरुपयोग नहीं बल्कि देखभाल करना चाहती हूँ। जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति को देखती हूँ जिसे चलने या सोचने में परेशानी है तो मैं सोचती हूँ कि उस व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र में जो भी समस्या है वह मेरे या मेरे किसी करीबी व्यक्ति को भी हो सकती है। विज्ञान हमें याद दिलाता है कि हम सब में क्या समान है।
साहित्य मुझे देखभाल करने और रोग को समझने या अनुभव करने के प्रति विभिन्न दृष्टिकोणों के लिए ग्रहणशील बनाता है जो शायद अन्यथा मैं नहीं कर पाती।
प्रश्न - यह बातचीत जलवायु परिवर्तन, युद्ध, आर्थिक संकट, घर न होना जैसी समस्याओं के बारे में विशेष तौर पर प्रासंगिक है। यदि समुदायों, संगठनों और परिवारों में दूसरों की देखभाल करने का सवाल हो तो आपकी राय में नेताओं की मुख्य नैतिक ज़िम्मेदारियाँ क्या होंगी?
सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके पास पूरी जानकारी हो और सिर्फ़ जी-हज़ूरी करने वाले लोगों को न सुनें। आजकल लोग समुदायों में किस प्रकार से रहते हैं, हमारे पास इसकी अच्छी जानकारी है जिसमें समाज के समूहों का फ़ीडबैक भी शामिल रहता है। जो कुछ भी हो रहा है उसके प्रति ग्रहणशील बनें और उसे सुनने के लिए इच्छुक रहें।
दूसरों के कल्याण के लिए नेता कितने ज़िम्मेदार हैं, इसके बारे में विभिन्न राजनैतिक दर्शन मौजूद हैं। प्रत्येक व्यक्ति की खुद के प्रति ज़िम्मेदारी से लेकर राज्य के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सरकार की पूर्ण ज़िम्मेदारी तक के इस वर्णक्रम में सब कुछ शामिल है। और मैं इस सबके मध्य में कहीं आती हूँ।
लोगों को सुनें और फिर सरकार के स्रोतों से मदद हासिल करने के लिए तैयार रहें। यदि आप अगुआई कर काम करें तो यह सर्वोत्तम है और संभवतः अधिक सस्ता भी। अगले तूफ़ान या तबाही की प्रतीक्षा करने के बजाय पिछली तबाही का कारण ढूँढें और उसे फिर से घटित होने से रोकें।
प्रश्न - जलवायु परिवर्तन, सामाजिक असमानता और युद्ध जैसे वैश्विक मुद्दे, देखभाल के हमारे नैतिक दायित्व को व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों स्तरों पर कैसे प्रभावित करते हैं?
ऐसे देश जिनका वैश्विक तापक्रम वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) में सबसे ज़्यादा योगदान है उनका उत्तरदायित्व बनता है कि वे पीड़ित लोगों की सहायता करें जैसे उन लोगों की जिनके देश समुद्र का स्तर बढ़ने के कारण लुप्त होने की कगार पर हैं और उन लोगों की जिन्हें अपने घर छोड़ने पड़े हैं। धन सीमित है और हो सकता है कि धनी देशों के पास भी उन पर खर्च करने के लिए अतिरिक्त धन न हो। लेकिन जो कुछ हो रहा है वे उस पर विचार कर सकते हैं।
जितना हमें लगता है, संभवतः हम उससे अधिक अप्रवासियों की सहायता कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपनी सीमाओं को खोल दें और सभी को आने दें। लेकिन हम लोगों के बारे में यह जाँच करने के लिए कि क्या उन्हें आने का अधिकार है, ज़्यादा साधनों का निवेश कर सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन और युद्ध से प्रभावित लोगों की सहायता करने के लिए हमें प्रतिक्रियाशील होने के बजाय अधिक ठोस कार्य करने होंगे। हम उनके कारणों को कैसे रोक सकते हैं? क्या हम हरित ऊर्जा के उपयोग में अधिक तेज़ी ला सकते हैं?
प्रश्न - वैश्विक स्तर के बारे में बात करने के लिए धन्यवाद। आपने कहा कि आपकी माँ को डिमेंशिया था तो आपने उनकी देखभाल कैसे की? साथ ही आप अपनी दुनिया में और बाहरी दुनिया से भी कैसे व्यवहार करती रहीं?
डिमेंशिया में सबसे बुरा दौर तब आता है जब मरीज़ किसी ऐसे स्थान पर रहता है जहाँ सहायकों की सुविधा उपलब्ध नहीं है और वह पहले जैसा जीवन जीने की कोशिश करता है। जब व्यक्ति ऐसे स्थान पर रहता है जहाँ दिनचर्या के लिए सहायकों की सुविधा उपलब्ध है (यदि परिवार वह विकल्प चुनाता है) तब सब कुछ आसान हो जाता है। जिस दौरान हम यह निर्णय ले रहे थे कि हम क्या करेंगे, उन्हें कहाँ जाना चाहिए ताकि उनकी उचित देखभाल हो सके, उसी समय पर मैं अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे वक्त में आपसे अपेक्षाएँ बहुत ज़्यादा होती हैं। आपका हर समय मूल्यांकन होता रहता है। मैं अपने वैवाहिक जीवन में भी मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार का सामना कर रही थी और उससे बाहर आने की कोशिश कर रही थी। उस दौरान मैंने दुनिया के बारे में बहुत कम सोचा।
साहित्य मुझे देखभाल करने और रोग को समझने या अनुभव करने के प्रति विभिन्न
दृष्टिकोणों के लिए ग्रहणशील बनाता है जो शायद अन्यथा मैं नहीं कर पाती।
वर्ष 1993 और 1995 के बीच मैंने खुद को पीछे खींच लिया इसलिए उस समय की सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाओं की मुझे जानकारी नहीं है। यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है - आप डरा हुआ महसूस करते हैं, इसलिए आप सिर्फ़ स्वयं पर ही केंद्रित रहते हैं। लेकिन मैं इसकी सिफ़ारिश नहीं करती। विडंबना यह है कि खुद के परे सोचना वास्तव में आपकी सहायता कर सकता है। मैं अब इसे समझती हूँ। लेकिन उस समय मैं यह बात नहीं जानती थी।

प्रश्न - देखभाल को लेकर अलग-अलग समाज का जो दृष्टिकोण है, उसमें आप क्या परिवर्तन देखना चाहेंगी?
कोई गलत मान्यता नहीं हो। किसी की देखभाल खुद करने में कोई शर्म न हो या मना करने के लिए भी कोई शर्म न हो। अपने परिवार में किसी की देखभाल करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ने पर कोई शर्म न हो। देखभाल के लिए किसी सहायता प्रदान करने वाली व्यवस्था में अपने परिवार के सदस्य को रखने का निर्णय लेने में भी कोई शर्म न हो। परिवार के लिए जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसी तरह की देखभाल का विकल्प चुनना चाहिए।
मैं चाहूँगी कि सहायता प्रदान करने वाले आवास, जिसे पहले नर्सिंग होम कहते थे, में रहने को गलत नहीं माना जाए। यदि कोई परिवार इसका चुनाव करता है, क्योंकि वह अब किसी सदस्य की देखभाल करने में असमर्थ है, तो यह शर्म की बात नहीं है।
मैं अधिक किफ़ायती सहायता प्रदान करने वाले आवास देखना चाहती हूँ। हमें इन्हें स्थापित करने में रचनात्मकता की ज़रूरत है क्योंकि लोग अब लंबे समय तक जीवित रहते हैं और उन्हें अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अधिक देखभाल की ज़रूरत होती है। यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें हम कोई कामचलाऊ प्रबंध कर सकते हैं।
मुझे उन लोगों के लिए अफ़सोस होता है जिनके पास सहायता प्रदान करने वाले आवास के लिए धन नहीं है। उन्हें अपना सब कुछ स्वयं संभालना पड़ता है। मैं चाहूँगी कि इस देखभाल में सामाजिक और सरकारी सहभागिता बढ़े और किफ़ायती विकल्पों में वृद्धि हो।
प्रश्न - तो हम एक-दूसरे की देखभाल कैसे करें? हम सहायता कैसे माँगें?
अपने सबसे नज़दीकी लोगों से शुरू करें और फिर औरों की ओर बढ़ें। हम परिवार और मित्रों के साथ बातचीत से सीखते हैं कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना है। और मैं आशा करती हूँ कि जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं यह ज्ञान विकसित होता रहता है। कुछ लोग इसमें दूसरों से बेहतर होते हैं लेकिन हम सब जीवन के किसी भी पड़ाव पर दूसरों से व्यवहार करना सीख सकते हैं। एक नेटवर्क बनाएँ जो हमेशा फैलता रहता है। सबसे तर्कसंगत है कि आप अपने समुदाय में अपने परिवार और मित्रों के साथ इसकी शुरूआत करें लेकिन सिर्फ़ इसी से संतुष्ट होकर न रह जाएँ। इस दायरे को बढ़ाते रहें।

परिवार के लिए जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसी तरह की देखभाल का विकल्प चुनना चाहिए।
प्रश्न - मैं सहमत हूँ। स्वयं के लिए सहायता माँगने की अपेक्षा किसी से यह पूछना ज़्यादा आसान है कि वे किस प्रकार की देखभाल प्राप्त करना पसंद करेंगे लेकिन हमें भी देखभाल की ज़रूरत है। यह कठिन है क्योंकि हम इस भावना के साथ बड़े हुए हैं कि हम हर परिस्थिति में अपने जीवन को संभाले रहेंगे। हमारी उलझनों के लिए किसी के पास समय नहीं है। सभी के जीवन में कठिनाइयाँ हैं इसलिए हमें अपने जीवन को स्वयं ही संभालना होगा। हमें पूछना होगा, “मैं अपनी देखभाल कैसे कर सकती हूँ?”
सही बात है। मैं यह भी कहूँगी कि लोगों से यह पूछने में सावधानी रखें कि क्या उन्हें किसी चीज़ की आवश्यकता है क्योंकि हो सकता है कि आपको सही जवाब न मिले।
हम हमेशा एक-दूसरे की देखभाल और अच्छे से कर सकते हैं। जहाँ पर सांस्कृतिक ताकतें शामिल होती हैं वहाँ पर संतुलन नाज़ुक हो जाता है। अमेरिका में एक-दूसरे का खयाल रखने के विचार का मतलब है कि हम सभी अपनी देखभाल स्वयं करेंगे। कुछ लोग किसी भी मदद के प्रस्ताव को अनावश्यक दखलंदाज़ी या निरादरपूर्ण समझते हैं। यदि कोई सहसा उनकी मदद करना चाहता है तो भले ही यह रिश्तेदारी में हो, फिर भी टकराव हो सकता है। वे नहीं चाहते कि कोई उनकी देखभाल करे। उसमें शोषण भी हो सकता है। कुछ लोग अपेक्षा करते हैं कि उनकी देखभाल की जाए और वह भी ठीक नहीं है। पारस्परिक और सांस्कृतिक ताकतों से सावधान रहें जो देखभाल को लेकर भी मुद्दा बना देते हैं।
मैं स्वीकार करती हूँ कि जब लोग मेरी देखभाल करने का प्रयास करते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता है। मैं इसे अनुचित मानती हूँ। लेकिन जब भी मुझे मदद की ज़रूरत पड़ी तब उससे मैं कभी परेशान नहीं हुई। मैंने उसके लिए कृतज्ञता महसूस की। वर्ष 2000 में मेरी सड़क दुर्घटना हुई थी। मैं अपनी बाईक चला रही थी तब एक ट्रक ने मेरे पैर को कुचल दिया था। लोगों ने फौरन अपना काम छोड़कर मेरी सहायता की और मैंने उसकी सराहना की। उस समय मुझे सहायता लेने में कोई परेशानी नहीं हुई।
यह निर्णय लेना मुश्किल होता है कि कब सहायता करनी चाहिए। जब भी मैंने दूसरे लोगों को दुर्घटनाग्रस्त देखा तब मैंने अपना काम छोड़कर उनकी मदद की क्योंकि लोगों ने जो कुछ मेरे लिए किया था मैं उसकी कदर करती थी। लेकिन मैं लोगों की उनकी निजता में उनके गर्व के प्रति भी संवेदनशील हूँ। आप यही कर सकते हैं कि आप अपना सर्वश्रेष्ठ निर्णय लें।
हम हमेशा एक-दूसरे की देखभाल और अच्छे से कर सकते हैं। जहाँ पर सांस्कृतिक
ताकतें शामिल होती हैं वहाँ पर संतुलन नाज़ुक हो जाता है।

प्रश्न - आप अनेक पुस्तकों की लेखिका हैं। क्या आपकी पुस्तकों के कथानक या चरित्रों में कभी किसी प्रकार की कोई नैतिक या आचार से संबंधित दुविधा उत्पन्न हुई है?
लगभग सभी में! जो मुझे याद आती है वह ‘बैन्ड इमोशंस’ (निषिद्ध भावनाएँ) नामक नवीनतम पुस्तक में है। इस पुस्तक की पहली पंक्ति है, “लोगों को यह बताने के पीछे क्या नीति है कि उन्हें क्या महसूस करना चाहिए?”
यह पुस्तक एक निजी कहानी से प्रेरित थी। मेरा बहुत बुरा संबंध-विच्छेद हुआ था और प्रत्येक व्यक्ति के पास मेरे लिए कोई न कोई सलाह थी कि मुझे क्या करना चाहिए। लोग मुझे बता रहे थे कि मुझे क्या सोचना चाहिए और कब तक सोचना चाहिए। इससे मुझे परेशानी हो रही थी। भाग्यवश, सिर्फ़ क्रोधित व परेशान होने के बजाय मैंने बाहर की तरफ़ ध्यान दिया और मुझे एहसास हुआ कि लोग अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने का और दूसरों की भावनाओं को निर्धारित करने का कितना प्रयास करते हैं। मेरे लिए नैतिक पहलू यह है - मुझे यह कहने का क्या अधिकार है कि दूसरे व्यक्ति को क्या महसूस करना चाहिए? मैंने वह अनुभव नहीं किया है जो उसने अनुभव किया है।
मैंने कई स्वरूपों और भावनाओं के बारे में लिखा जैसे लंबे समय तक क्रोध, आत्म-दया, ईर्ष्या इत्यादि जिन्हें सामाजिक तौर पर हतोत्साहित किया जाता है। हमें इन्हें महसूस नहीं करना चाहिए, खासतौर पर आत्म-दया। इसके अलावा उन चीज़ों को महसूस न करने की सलाह सभी समान रूप से स्वीकार नहीं करते। ज़्यादातर यह उन लोगों को दी जाती है जिनके पास कम ताकत होती है। महिलाओं को यह अक्सर बताया जाता है कि उन्हें क्या महसूस करना चाहिए और क्या नहीं।
एक उदाहरण है, “जीवन न्यायसंगत नहीं है”- यह बात माता-पिता बच्चों से कहते हैं, जेल के संतरी कैदियों से कहते हैं, शिक्षक छात्रों से कहते हैं; यह विपरीत दिशा में नहीं चलता है। मैं यह कल्पना नहीं कर सकती कि यदि कुछ ऐसा हो गया हो जो माता-पिता को अच्छा न लगा हो तो एक बच्चा माता-पिता से कह रहा हो, “जीवन न्यायपूर्ण नहीं है।”भावनाओं के साथ ऐसा ही होता है। आप किसी से कह दें “ओह, तुम आत्मदया में डूबे हुए हो,” और उस व्यक्ति के पास शायद स्वयं पर दया करने या नाराज़ होने का कोई उचित कारण हो। जब आप उस तरह से महसूस करते हैं तो इसलिए करते हैं कि आपके साथ कभी अन्याय हुआ था। जब आप लोगों से कहते हैं, “आपको स्वयं के लिए दुःखी होने का कोई अधिकार नहीं है, आपको इसके ऊपर क्रोधित होने का अधिकार नहीं है, आपको सकारात्मक भावनाएँ रखने की ज़रूरत है,” तब आप वास्तव में उन्हें अन्याय के विरुद्ध अपने क्रोध का दमन करने के लिए कह रहे हैं।
इससे न्याय अचानक नहीं मिल जाएगा। आलोचना को रोकना एक प्रकार का नियंत्रण है। शिकागो विश्वविद्यालय की सिऐन नाई ने ‘अग्ली फीलिंग्स’ (बुरी भावनाएँ) नामक एक पुस्तक लिखी और उन्होंने कहा कि यदि आप कमज़ोर लोगों से कह रहे हैं कि आपको कुछ विशेष भावनाओं को महसूस करने की अनुमति नहीं है तो आप सामाजिक आलोचना को रोक रहे हैं।

अपनी स्वयं की भावनाओं पर ध्यान देना उपयोगी है क्योंकि यह आपको इसी प्रकार
की भावनाओं से गुज़र रहे दूसरे लोगों को समझने में सहायता करता है।
यह तो बहुत ज़बरदस्त कथन है।
यह जटिल है क्योंकि दूसरी तरफ़ लोग कहेंगे, “आत्मदया ने कभी किसी का क्या भला किया है?” लेकिन यदि कोई भी व्यक्ति आपके पक्ष में नहीं है तो स्वयं के लिए दुःखी होना और यह कहना वाजिब है, “मैं आहत हूँ। यह सही नहीं है।” ये विचार वाजिब हैं, जब तक ये आपको राहत पहुँचा रहे हैं। आपसे आगे बढ़ते रहने की अपेक्षा की जाती है, आपसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि आप चीज़ों को पकड़कर बैठे रहें। आपसे उन्हें छोड़कर आगे बढ़ने की अपेक्षा की जाती है। और अगर इसकी वजह से आपको स्वयं के लिए अफ़सोस होता है तो वास्तव में यह आपको आगे बढ़ने में मददगार हो सकता है। यदि आप कभी भी नाराज़गी के एहसास से आगे नहीं बढ़ पाते हैं तब इससे किसी को कोई लाभ नहीं होगा। यदि यह आपको राहत पहुँचाने में मदद करता है तो क्यों नहीं? हमें लोगों से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि उन्हें राहत पाने के लिए कैसा महसूस करना चाहिए।
अपनी स्वयं की भावनाओं पर ध्यान देना उपयोगी है क्योंकि यह आपको इसी प्रकार की भावनाओं से गुज़र रहे दूसरे लोगों को समझने में सहायता करता है।
मुझे लगता है कि इसी प्रकार से हम एक-दूसरे की देखभाल करते हैं।

लौरा ओटिस
डॉ. ओटिस एमोरी यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं। उनके शोध को मैकआर्थर, गुगेनहेम, फुलब्राइट और हम्बोल्ट फ़ेलोशिप द्वारा समर्थित किया गया है। वे अकाल्पनिक और काल्पनिक कहानिय... और पढ़ें
