पूर्णिमा रामकृष्णन और अनुजा चंद्रमौली पौराणिक कथाओं के माध्यम से उनके परिवर्तन के सफ़र का विवरण प्रस्तुत कर रही हैं।
कला निबंध
“जीवन कार चलाने जैसा है। आपको बार-बार पीछे देखने वाले शीशे में यानी अतीत को देखना पड़ता है। यह अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक तरीका है। यह जानने की कोशिश करना कि आप कहाँ से हैं, आपको अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने में मदद करता है जो आपकी पहचान का एक बड़ा हिस्सा है। प्राचीन संसार के बारे में जानने से आपको वर्तमान की समझ मिलती है। यदि आप वर्तमान में अपनी जीवन रूपी गाड़ी चलाते हुए हर समय भविष्य पर ही नज़र बनाए रखते हैं और पीछे देखने वाले दर्पण में अपने अतीत को नहीं देखते तो आपको यह समझ नहीं मिल सकती।”
अनुजा पौराणिक कथाओं के बारे में बात करती हैं। वे कहती हैं कि महाभारत, रामायण और पुराणों जैसी पौराणिक कहानियों ने उनके बचपन को आकार दिया और हर पल उनकी साथी रहीं। भगवान कृष्ण हमेशा से उनके पसंदीदा थे और उनकी मृत्यु के बारे में पढ़कर उन्हें बहुत दुख हुआ था।
अनुजा ने अर्जुन, मोहिनी, शक्ति और गंगा को नए रूप में कल्पित करने वाली चौदह पुस्तकें लिखी हैं। उनसे बात करते समय मुझे यह जानने की उत्सुकता थी कि प्राचीन कहानियाँ मुझ जैसे आध्यात्मिक साधकों की मदद कैसे कर सकती हैं। एक हार्टफुलनेस साधक होने के नाते मैं जानती हूँ कि अंदर झाँकने के लिए साहस और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
मेरे मन में यह विचार आया कि क्या ये पुरानी कहानियाँ किसी दूसरे तरीके का मार्गदर्शन दे सकती हैं।

अंदर देखना - वास्तविक यात्रा
अनुजा कहती हैं कि अधिकतर लोग जब यात्राओं के बारे में सोचते हैं तब वे बाह्य गतिविधियों की कल्पना करते हैं जैसे - हवाई यात्राएँ, स्मारक देखना, अनुभव जुटाना आदि। लेकिन जिस यात्रा का अनुजा वर्णन कर रही हैं, वह पूरी तरह से अलग है।
“लेखन और अपनी प्राचीन पौराणिक कथाओं को पढ़ने के माध्यम से आप स्वयं को अंदर देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसके लिए कुछ हद तक मानसिक अनुशासन की ज़रूरत होती है। इसके लिए आपको अपने अस्थिर और हमेशा मंथन करने वाले हृदय में शांति पाने तथा शांत चिंतन व आत्मनिरीक्षण के पलों में आनंद लेने की ज़रूरत होती है।”
मानसिक अनुशासन, आंतरिक स्थिरता और शांत चिंतन, वही तत्व हैं जिन्हें हम ध्यान के अभ्यास से विकसित करते हैं। जब हम ध्यान के लिए बैठते हैं तब हम बाहरी दुनिया से विमुख हो जाते हैं और जो अपने अंदर है, उसका सामना करते हैं। अनुजा जिस अनुशासन का वर्णन करती हैं, वह भी लगभग यही काम है, केवल उसका स्वरूप अलग है।
इन कहानियों के बारे में बताते हुए अनुजा ‘सार्वभौमिक चेतना’ तक पहुँचने का वर्णन करती हैं, एक ऐसा वाक्यांश जिसे सुनकर मैं ठिठक जाती हूँ। हार्टफुलनेस में हम चेतना के विस्तार और ध्यान को स्वयं से उच्चतर शक्ति अर्थात् ईश्वर से जुड़ने के एक साधन के रूप में देखते हैं। यहाँ एक लेखिका पौराणिक कथाओं के माध्यम से ऐसे ही अनुभव का वर्णन कर रही थी।
पाने के लिए खाली करना
अनुजा अपनी खोज की प्रक्रिया को ऐसे शब्दों में बताती हैं जो ऋषि-मुनियों के शब्दों जैसे लगते हैं। जब वे किसी पुस्तक पर काम शुरू करती हैं और महाकाव्य के विशाल सागर में गोता लगाती हैं तब सबसे पहले उन्हें अपनी अज्ञानता का भान होता है। ज्ञान की सामग्री तो बहुत अधिक है जो पीढ़ियों से एकत्रित की गई है। अनुजा कहती हैं कि इस अथाह ज्ञान के सामने उनकी अज्ञानता उन्हें कमतर होने का एहसास कराती है और कभी-कभी अभिभूत भी कर देती है।
“यह ऐसा है जैसे आप अपने अंदर से सब कुछ बाहर निकाल रहे हैं। आप अपने आप को पूरी तरह से खाली कर रहे हैं ताकि उसे प्राचीन ज्ञान के इस खूबसूरत भंडार से भर सकें जो आपको एक इंसान के तौर पर नया स्वरूप देता है। आप स्वयं को योग्य पात्र बनाने के लिए खुद को खाली कर रहे हैं।”
वे कहती हैं कि इसका तरीका यह है कि इस प्रक्रिया पर भरोसा करें, शोध करते रहें और इसको विनम्रता के साथ लिखते रहें। धीरे-धीरे आपको समझ में आने लगता है और आप जो प्राप्त करते हैं उसका उपयोग करना शुरू करते हैं और उसे पन्नों पर उतारते जाते हैं।
“जब ऐसा होता है तो उससे एक तरह का उपचार होता है। क्योंकि जैसा कि मैंने बताया, आपको खाली कर दिया गया है और एक बार फिर से आप सोच-समझकर स्वयं को गढ़ रहे हैं और गहन सत्य के शाश्वत प्रवाह में स्वयं को डुबो रहे हैं। आप एक बड़ी प्रक्रिया के सम्मुख समर्पण कर रहे हैं और आप उसमें से अधिक मज़बूत होकर निकलते हैं।”
शिक्षकों के रूप में पात्र
अनुजा ने चौदह पुस्तकें लिखी हैं। वे उन्हें अपने बच्चे कहती हैं क्योंकि उन्होंने इन पुस्तकों को बहुत ध्यान से लिखा और प्रस्तुत किया है। लेकिन वे उन्हें अपने माता-पिता भी कहती हैं क्योंकि वे ऐसी मार्गदर्शक हैं जिन्होंने उन्हें विकसित होने में मदद की है।
हर पात्र ने उनसे कुछ अलग माँगा है। हर पुस्तक के लिए उन्हें एक विशेष स्तर तक विकसित होने की ज़रूरत थी ताकि वे उसके साथ न्याय कर सकें।
उनकी पहली पुस्तक, ‘अर्जुन - सागा ऑफ़ अ पांडव वॉरियर-प्रिंस’ में क्रोध से सामना होने की बात सामने आई। क्रोध वह बचाव का कवच है जिसे हम ताकत समझ लेते हैं। अनुजा को इस पात्र के बारे में अपनी पूर्वधारणाओं, जिनके साथ वे बड़ी हुई थीं, को छोड़ना पड़ा। उन्हें एहसास हुआ कि इस प्रक्रिया के समक्ष समर्पण करने के लिए उन्हें अपना क्रोध छोड़ना होगा।
जो कोई भी नियमित रूप से ध्यान करता है, वह जानता है कि ध्यान के समय भीतर उठने वाले क्रोध का सामना करना कैसा होता है। सवाल हमेशा यही होता है - क्या हम क्रोध को सही ठहराएँगे या उसे जाने देंगे?
मोहिनी - असहजता का सामना
इसके बाद ‘मोहिनी - द एनचैंट्रेस’ पुस्तक आई। इस पात्र ने अनुजा को कामुकता और इंद्रिय-तृप्ति को लेकर अपने अंदर बसी असहजता का सामना करने के लिए मजबूर किया।
“महिलाएँ होने के कारण कामुकता को लेकर हमारे मन में बहुत सारी उलझनें होती हैं क्योंकि समाज या तो हमें यौन वस्तु (लैंगिक प्राणी होने के बजाए) के रूप में देखता है या पवित्रता और दबाई हुई कामुकता की मूर्ति बना देता है। ‘मोहिनी’ में मुझे एहसास हुआ कि मैं इस पात्र के साथ न्याय करने में बहुत झिझक रही थी और शर्म महसूस कर रही थी। पहली बार मैंने एक लेखक के तौर पर प्रथम पुरुष सर्वनाम का प्रयोग किया था क्योंकि मैं इस पात्र के करीब जाना चाहती थी और किसी ऐसे इंसान के साथ जुड़ने में अपनी झिझक खत्म करना चाहती थी जिसमें अपनी लैंगिक पहचान को लेकर इतना आत्मविश्वास था।”
दोहरेपन से परे
अनुजा की सबसे नई पुस्तक, ‘द वाइफ़ एंड द डांसिंग गर्ल’ (तमिल भाषा की उत्कृष्ट कृति, ‘शीलापथिकरम’ का एक नया रूप) एक और गलत चुनाव के मुद्दे पर बात करती है। इसे “मैडोना-होर” कॉम्प्लेक्स कहते हैं - अच्छी पत्नी बनाम नर्तकी। (महिलाओं को इंसान के बजाय दो चरम श्रेणियों में बाँटने की एक मानसिक विकृति जिसके अनुसार महिला या तो पवित्र व पूजनीय हो सकती है या फिर यौन आकर्षण की वस्तु)।
“मुझे यह पुस्तक लिखने में बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना था। हमें औरतों को या तो एक या दूसरी तरह से देखने के लिए मजबूर किया जाता है। लेकिन एक औरत के हज़ारों चेहरे होते हैं और वे सभी सही हैं।”
‘स्वधर्म’ का यही अर्थ है, अपने धर्म या सत्य का पालन करना।
शक्ति - आंतरिक ताकत प्राप्त करना
यदि कोई एक रचना अनुजा द्वारा वर्णित रूपांतरण शक्ति को मूर्त रूप में प्रस्तुत करती है तो वह है ‘शक्ति- द डिवाइन फ़ेमिनिन’।
“जब आप देवी माँ के अलौकिक गुण को जानने की कोशिश करते हैं तब आपको एहसास होता है कि जिन उत्तरों को आप बाहर ढूँढ रहे थे, वे आपके अंदर ही हैं। देवी आपको जो सबसे बड़ा सबक सिखाती हैं, वह सबसे आसान भी है और वह है - आप सक्षम हैं!”
अनुजा के लिए ‘शक्ति’ पुस्तक लिखने का मतलब था अपने अंदर के राक्षसों को बाहर निकालना, बेनाम डर का सामना करना, भय और बुरे अनुभवों से निपटना और ज़िंदगी भर जमा हुए आघातों से बाहर निकलना। पुस्तक खुद ही पुरस्कार बन गई और वह भी केवल अनुजा के लिए ही नहीं बल्कि केरल की बाढ़ के दौरान एक युवा लड़की के लिए भी जिसने इंस्टाग्राम पर उनसे संपर्क किया। वह फँसी हुई थी, पानी से घिरी हुई और भयभीत थी। उस लड़की ने अनुजा को बताया कि उस डरावने समय में ‘शक्ति’ उसके लिए संबल का ज़रिया थी।

“जब आप देवी माँ के अलौकिक गुण को जानने की कोशिश करते हैं तब आपको एहसास होता है कि जिन उत्तरों को आप बाहर ढूँढ रहे थे, वे आपके अंदर ही हैं। देवी आपको जो सबसे बड़ा सबक सिखाती हैं, वह सबसे आसान भी है और वह है - आप सक्षम हैं!”
गंगा – पवित्र को फिर से परिभाषित करना
अपनी पुस्तक ‘गंगा - द कॉन्स्टेंट गॉडेस’ में अनुजा नदी-देवी को एक ऐसी महिला के रूप में दिखाती हैं जो अपने दिल की सुनती हैं।
“उन्होंने एक जगह टिके रहने और एक आज्ञाकारी पत्नी बनने से इनकार कर दिया। वे सच में एक दिव्य प्रेमिका बनना चाहती थीं और एक ऐसे शाश्वत प्रेम का हिस्सा बनना चाहती थीं जो प्रकृति को उसकी असली सुंदरता में बनाए रखे। उन्होंने देवी के समान जीवन जीने का फ़ैसला किया।”
एक आसान तरीका
जब मैंने अनुजा से पूछा कि अपने अंदर बदलाव लाने के लिए पाठक इन कहानियों से कैसे जुड़ सकते हैं तब वे आपस में जुड़े हुए पैटर्न के बारे में बताती हैं – ऐसे रहस्यमय जुड़ाव जो सिर्फ़ निरंतर ध्यान देने से स्वयं सामने आ जाते हैं।
पौराणिक कथाओं में आपको क्या मिलता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उनके लिए क्या करते हैं। कहानियाँ कई उद्देश्यों को पूरा कर सकती हैं जिसमें सिर्फ़ मनोरंजन भी शामिल है। फिर भी यदि आप उन्हें बार-बार पढ़ते हैं तो आप यह देखकर हैरान हो जाएँगे कि वे आपके द्वारा कोई प्रयास किए बिना भी आपको शिक्षित करती हैं।
अनुजा एक आसान तरीका बताती हैं - हर दिन कुछ पन्ने पढ़ें। आप कुछ भी पढ़ सकते हैं - भगवद् गीता, महाभारत, रामायण, उपनिषद, आपकी पसंदीदा पौराणिक कहानियाँ, तेनाली रमन की कहानियाँ या आपकी अपनी लिखी हुई बातें। बस पढ़ें और आत्मसात करें।
“आपको बचपन से ही माँ के दूध और दाल-भात के साथ कहानियों का यह आहार भी दिया जाता है। यह आपके खून और हड्डियों का हिस्सा बन जाता है। बस कुछ पन्ने पढ़ें और जो बताया गया है उसे आत्मसात कर लें। धीरे-धीरे समय के साथ आप आपस में जुड़ी रहस्यमयी बातों को समझने लगते हैं जो गहरे सत्य प्रकट करती हैं।”
वे कहती हैं कि यह कभी भी स्पष्ट नहीं होता। यह कभी भी आसान नहीं होता। और फिर भी यह स्पष्ट और आसान दोनों है! यही विरोधाभास है।
अनुजा की रोज़ाना पढ़ने की आदत ध्यान के समान है - दोनों ही में उन्हें नियमित रूप से करना, आत्मसात करना और स्वयं को समर्पित करना आवश्यक है। समय के साथ बदलाव सूक्ष्म लेकिन गहरा होता जाता है और जब ज़रूरत होती है तब आपकी आंतरिक शक्ति सामने आ जाती है।
मृत्यु और सांब का रहस्योद्घाटन
हमारी बातचीत के अंत होने से पहले अनुजा अपने उस पल के बारे में बताती हैं जिसे वे अपना ‘यूरेका’ पल (अचानक मिला ज्ञान का पल) कहती हैं। उन्हें एक अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई जब वे अपनी पुस्तक ‘अभिमन्यु’ पर काम कर रही थीं।
“महाभारत के सभी पात्र अवतार थे, ऐसी विभूतियाँ थे जो इस धर्म युद्ध का हिस्सा बनना चाहते थे। वे विष्णु के अवतार कृष्ण की मदद करना चाहते थे क्योंकि वे भूमि देवी के सबसे योग्य रक्षक थे। एक बार जब किसी दिव्य सत्ता का उद्देश्य पूरा हो जाता है तब उसके इस दुनिया में बने रहने का कोई अभिप्राय नहीं रह जाता। उन्हें मुक्त कर दिया जाना चाहिए ताकि वे वापस लौट सकें। अंततः मुक्ति का अर्थ है जाने देना, विशेषकर उन सब को जिनसे आप बहुत अधिक प्रेम करते हैं।”
अनुजा यादवों के नरसंहार की, महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण के पूरे वंश के विनाश की बात करती है। बचपन में अनुजा के लिए इस बारे में सोचना लगभग असहनीय था। कृष्ण और जांबवती के बेटे सांब को शिव ने अपने अर्धनारीश्वर रूप में [आधी-स्त्री के रूप में शिव] आशीर्वाद दिया था। सांब कृष्ण की तरह सुंदर थे और महिलाओं को आकर्षित करने वाले थे लेकिन शापित भी थे। ऋषियों ने उन्हें एक लोहे की गदा को जन्म देने का श्राप दिया जो यादव वंश को नष्ट कर देने वाला था। ऊपरी तौर पर यादवों का अंत भयानक लग सकता है, फिर भी यह ईश्वर की योजना थी।
अनुजा की समझ बहुत गहराई तक जाती है।
मृत्यु और विनाश को, जो ‘संहारक’ शिव का कार्य है, अक्सर बुरा माना जाता है लेकिन वे जीवन के इस महान चक्र का हिस्सा हैं, चाहे हम इसे मानें या न मानें।
“कहानियाँ आपकी इन रहस्यमयी तरीकों को समझने में मदद करती हैं। वे आपको हिम्मत देती हैं। दुनिया के राक्षस शायद असली हों लेकिन आपके पास वह सब कुछ है जो इन सबसे निपटने के लिए आवश्यक है, चाहे वह मौत हो, अंदर के डर हों या कुछ और। आपको वह मिल जाएगा जिसकी आपको ज़रूरत है, बशर्ते आप बहादुर और दयालु हों।”

जीवित विरासत
जैसे ही हमारी बातचीत समाप्त होने लगती है, मैं पीछे देखने वाले शीशे की छवि पर वापस आ जाती हूँ। आगे बढ़ने के लिए हमें पीछे देखना होगा। अतीत हमें भविष्य की ओर बढ़ने में मदद करता है।
जैसा कि अनुजा कहती हैं, कहानियाँ एक तरह की जीवित प्राणी हैं। वे साँस लेती हैं लेकिन वे हर पीढ़ी के साथ बदलती भी हैं। हमेशा ज़रूरत के अनुसार उनमें कुछ जोड़ा जाता है और कुछ हटा दिया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कहानियाँ दूषित या कमज़ोर हो गई हैं। इसी तरह हम भी जीवित प्राणी हैं जिन्हें खाली करके फिर से भरा जा सकता है, बदला जा सकता है और ढाला जा सकता है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हम अपने अंदर के राक्षसों का सामना करने और अपनी ताकत खोजने की क्षमता विकसित करते हैं।
अंदर की यात्रा आसान नहीं है। इसके लिए सोच-विचार और साहस चाहिए। जिस प्रकार हम अपने ध्यान के लिए हर दिन वापस आते हैं, उसी प्रकार हम बार-बार प्राचीन कहानियों में छुपी शिक्षाओं पर वापस आ सकते हैं। तरीका वही है - मौजूद रहना, अपने हृदय को ग्रहणशील बनाना और बदलाव को होने देना।
अंदर की यात्रा आसान नहीं है। इसके लिए सोच-विचार और साहस चाहिए। जिस प्रकार हम अपने ध्यान के लिए हर दिन वापस आते हैं, उसी प्रकार हम बार-बार प्राचीन कहानियों में छुपी शिक्षाओं पर वापस आ सकते हैं। तरीका वही है - मौजूद रहना, अपने हृदय को ग्रहणशील बनाना और बदलाव को होने देना।

अनुजा चंद्रमौली
अनुजा चंद्रमौली एक लोकप्रिय भारतीय लेखिका हैं जिन्होंने पौराणिक कथाओं, पूर्णिमा रामकृष्णन पूर्णिमा संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार विजेता लेखिका और ब्लॉगर हैं। उन्होंने ‘ब्लॉग एच ई आर इंटरनेशनल एक्टिविस्ट’ अवार्डऔर पढ़ें
