भिक्खु संघसेना ने वर्ष 1986 में लद्दाख में महाबोधि इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर (MIMC)  की स्थापना की। तब से उन्होंने प्रेमपूर्ण दयालुता और करुणा पर बुद्ध की शिक्षाओं को क्रियान्वित करने के लिए अथक रूप से और निस्वार्थ भाव से काम किया है। अब यह संस्था भारत में एक अग्रणी गैर सरकारी संस्था बन गई है। वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव में उन्होंने हम सभी का शांति पर की गई अपनी बात पर अमलअपने समय को संतुलित करने और शांति व करुणा को अपने जीवन में जगह देने का आह्वान किया। करन

 

प्रार्थना है कि ब्रह्मांड की सभी दिशाओं के सभी बुद्ध व बोधिसत्व, देवता व नाग, संत व साधु कृपया हमारी ओर देखें और इस खूबसूरत जगह पर हमारे एक साथ आने की सफलता के लिए हम पर अपना आशीर्वाद बरसाएँ।

मेरे प्रिय सत्य के साधकों और शांति के प्रेमियों, कृपया मेरा प्रेमपूर्ण अभिवादन स्वीकार करें। मैं आपको भगवान बुद्ध के अनुयायियों की ओर से भी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं आप सबको हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित सबसे ठंडी भूमि, लद्दाख की ओर से भी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

मैं ज़्यादा समय नहीं लूँगा लेकिन मेरे पास आपसे कहने के लिए बहुत कुछ है। आज के इस आधुनिक दौर में एक बड़े शहर में आपके पास महंगी घड़ियाँ तो हैं लेकिन समय नहीं है। हिमालय में हमारे पास महंगी घड़ियाँ नहीं हैं लेकिन हमारे पास समय है। यदि आपको और अधिक सुनने में रुचि हो तो हिमालय में आपका स्वागत है जहाँ हम बिना घड़ी के इत्मीनान से बैठेंगे और बिना समय देखे समय बिताएँगे।

जैसा कि हम सब जानते हैं विश्व शांति की शुरुआत मन में होती है। सामंजस्यपूर्ण संसार की शुरुआत मन में होती है। यूनेस्को के संविधान में भी इस बात का उल्लेख है कि युद्ध मानव मन में शुरू होते हैं, इसलिए मानव मन में ही शांति स्थापित करनी होगी। हमें इस विषय पर गहराई से सोचने की ज़रूरत है।

विकास के नाम पर शायद हमारे पास बहुत अधिक समय हो - जीवन के भौतिक पहलू, जीवन के सांसारिक पहलू, धन और प्रौद्योगिकी के लिए बहुत अधिक समय हो। यह आंतरिक और बाह्य, आध्यात्मिकता और भौतिकता, विज्ञान और धर्म, मनोविज्ञान और पारिस्थितिकी, भौतिकी और तत्व मीमांसा, ध्यान और चिकित्सा के बीच संतुलन बनाने के बारे में सोचने का समय है। यह ध्रुवीयताओं का समन्वय करने का समय है। यदि वैज्ञानिक ध्यान करें और आध्यात्मिक वैज्ञानिक बन सकें तो यह ईश्वर की एक बहुत बड़ी कृपा होगी और अगर आध्यात्मिक व धार्मिक लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना लें तो वे अंधविश्वास से बच पाएँगे।

न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में जो हुआ, वह अंधविश्वास का नतीजा था। और अंधविश्वास बम और बंदूक से भी ज़्यादा खतरनाक है। इसलिए बुद्ध और आइंस्टीन को एक साथ आना होगा, एक साथ काम करना होगा। यह सुनकर बहुत दुख होता है कि हमारे बमों और बंदूकों को बेहतर बनाने के लिए 30,000 से अधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक दिन-रात काम कर रहे हैं। यह बहुत भयानक है। यदि इन महान वैज्ञानिकों को आध्यात्मिक मूल्यों का मार्गदर्शन मिल जाए तो वे विनाशकारी उद्देश्यों के लिए अपने ज्ञान का दुरुपयोग नहीं करेंगे। वे अपने ज्ञान का उपयोग मानवता की सेवा के लिए करेंगे।

हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के लिए पश्चिमी समाज के आभारी हैं। इससे भौतिक शरीर को बहुत आराम मिला है। लेकिन यह कहते हुए खेद होता है कि पश्चिमी देश इस दुनिया में शांति लाने में बुरी तरह विफल रहे हैं। अब पूर्वी देशों की बारी है। हमें शांति के संदेशवाहक, करुणा के दूत और बोधिसत्व के रूप में दुनिया का शांतिपूर्ण नेतृत्व करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना चाहिए। हम चल रहे युद्धों के मूक दर्शक नहीं बने रह सकते।

रूस-यूक्रेन युद्ध को देखिए। हज़ारों लोग मारे गए हैं जिनमें माताएँ और बच्चे भी शामिल हैं। लोगों ने अपने घर खो दिए हैं और उन्हें शरणार्थी बनना पड़ रहा है। फ़िलिस्तीनियों और इज़राइलियों के बीच हज़ारों जानें जा चुकी हैं। हममें से प्रत्येक की ज़िम्मेदारी है कि हम उठें, अपनी आवाज़ उठाएँ और एक साथ जुड़ें।

हममें से जो लोग विश्व शांति के बारे में बात करते हैं उन्हें एक साथ मिलकर हर संभव प्रयास करना चाहिए। युद्ध मनुष्य द्वारा रचे जाते हैं। अतः उन्हें मनुष्य द्वारा ही रोका जा सकता है। हम इसे ऐसे नहीं देखते रह सकते जैसे यह टीवी पर चल रहा हो। वहाँ वास्तविक हत्याएँ हो रही हैं। इसलिए मैं युवा पीढ़ी से अपील करता हूँ - केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने, साक्षात्कार का सामना करने, नौकरी पाने, पैसा कमाने, खरीदारी करने और कोको-कोला व पेप्सी पीने के बारे में ही न सोचें।

मैं चाहता हूँ कि आप उठें और अपने अस्तित्व के लिए मात्र नौकरी ढूँढने से कहीं अधिक ऊँचा, कुछ बड़ा और व्यापक सोचें। लाखों युवा शांति के संदेशवाहक और करुणा के दूत बन सकते हैं जो इस दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। भारत की असली संपत्ति वसुधैव कुटुंबकम, करुणा और मैत्री है।

दुनिया बहुत खतरनाक तरीके से चल रही है। इसलिए यहाँ हम सभी, जो इस बात को गंभीरता से लेते हैं, आज यह शपथ लें कि हम शांति के संदेशवाहक, करुणा के दूत और बोधिसत्व बनेंगे। आइए, हम एक साथ जुड़ें और शांति के लिए प्रार्थना करें। मानव जीवन मूल्यवान है और यह संसार सुंदर है।

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मैं चाहता हूँ कि आप उठें और अपने अस्तित्व के लिए मात्र नौकरी ढूँढने से कहीं अधिक ऊँचाकुछ बड़ा और व्यापक सोचें। लाखों युवा शांति के संदेशवाहक और करुणा के दूत बन सकते हैं जो इस दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। भारत की असली संपत्ति वसुधैव कुटुंबकमकरुणा और मैत्री है।


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भिक्खु संघसेना

भिक्खु संघसेना

आदरणीय भिक्खु संघसेना आदरणीय आचार्य बुद्धरक्खित महाथेरा के शिष्य थे। वर्ष 1986 

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