रूबी कार्मेन ज़ेन (Zen Budhism) के ध्यान, श्वास के प्रति जागरूकता और ‘खाली प्याले’ जैसी ग्रहणशीलता के बारे में बता रही हैं और हमें मन को एक नवीन दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
ज़ेन शब्द आम बोलचाल में आ गया है; यह ‘ज़ेन’ क्या है, इसकी पूरी समझ के बिना ही यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुस गया है।
रोज़मर्रा की बातचीत में ज़ेन का मतलब शांति और आराम का एहसास है। यह तनावमुक्त और ज़िंदगी के प्रति बेफ़िक्र दृष्टिकोण का प्रतीक भी बन गया है।
ज़ेन बैठकर ध्यान करने का एक तरीका है और यह चीनी शब्द चान से निकला है।
ज़ेन को बौद्ध धर्म के एक रूप के तौर पर बेहतर समझा जा सकता है, जिसमें ध्यान और उत्कृष्टता पर ज़ोर दिया जाता है यानी किसी व्यक्ति की स्वयं की उत्कृष्टता या पूर्णता।
द्वार रहित द्वार
ज़ेन को एक विचारधारा के बजाय जीवन जीने के एक तरीके के रूप में परिभाषित किया गया है। यह कई आध्यात्मिक मार्गों और पद्धतियों के लिए सच है। ज़ेन को एक विचारधारा के बजाय जीवन जीने का एक ऐसा तरीका माना जाता है जिसमें कोई तय सिद्धांत या हठधर्मिता नहीं है। इसमें लिखी हुई शिक्षा पर बहुत कम ज़ोर दिया जाता है, जिससे यह उन लोगों को बहुत पसंद आता है जो पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं से असंतुष्ट हैं।
ज़ेन का अभ्यास करने के लिए, आइए इसकी तीन-चरण प्रक्रिया को समझें। ये चरण हैं - शरीर, श्वास और मन। इस तरीके को कभी-कभी ज़ेन शब्द अभ्यास-ज्ञानोदय के रूप में बताया जाता है। यह शब्दों और अक्षरों – जिन्हें हम सिद्धांत या दर्शन कहते हैं - पर निर्भर रहने के बजाय अभ्यास की ज़रूरत पर ज़ोर देता है।
शरीर तत्व के संबंध में बात करें तो अभ्यासी को ध्यान के लिए अपने शरीर को समायोजित करने की ज़रूरत होती है। इसका मतलब है सही खान-पान बनाए रखना, शारीरिक व्यायाम करना और ऐसी आदतों से बचना जो शरीर और मन के संबंध पर बुरा असर डालें। ज़ेन में ध्यान करने के लिए सबसे अच्छा आसन पद्मासन या अर्ध पद्मासन है।
श्वास तत्व के संबंध में, अपनी साँसों को गिनने का एक अभ्यास होता है। इस श्वास प्रक्रिया का उद्देश्य शरीर और मन को पुनः ताज़ा करना, शरीर और मन में ऊर्जा भरना तथा विषैले तत्वों एवं नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालना है। इस प्रक्रिया के दौरान मन भटक सकता है। यह अक्सर सभी के साथ होता है जो ध्यान का अभ्यास शुरू करते हैं। इस प्रक्रिया में हमारे मन में वर्तमान चिंताएँ, डर, परेशानियाँ व यादें उठ सकती हैं। इसे भटकते हुए मन का एक लक्षण माना जाता है। हम पूछ सकते हैं कि क्या कोई और तरह का मन भी है! विभिन्न विधियाँ और मार्ग मन को भटकने से रोकने के लिए साधक को कोई केंद्र, कोई आधार, कोई वस्तु प्रदान करते हैं जिस पर वह अपने मन को केंद्रित कर सके।
ज़ेन में यह सुझाव दिया गया है कि साँसों को गिनने से हमें अवचेतन मन को नियंत्रित करने में और भावनाओं को सुव्यवस्थित करने या उन पर काबू पाने में मदद मिलती है। कई मार्गों और परंपराओं ने श्वास और इंसान की भावनात्मक अवस्था के बीच के संबंध पर ज़ोर दिया है। उदाहरण के लिए, हम शांत अवस्था में अपनी श्वास की तुलना उस अवस्था की श्वास से कर सकते हैं जब हम बहुत ज़्यादा गुस्से में होते हैं।
मन और मनहीन या विचार-शून्य अवस्था
अब, हम मन तत्व पर आते हैं। मन के बारे में क्या कहें? हम मन को अनुकूल बनाने के लिए मन का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? एक ज़ेन अभ्यासी स्वेच्छा से ध्यान की अवस्था या दशा में जाते हुए अपने मन को ध्यान के लिए तैयार करता है। प्रश्न उठता है, कैसे? ध्यान के दौरान स्वयं को सचेतन रूप से ज़िंदगी की रोज़मर्रा की चिंताओं से अलग किया जाता है। आसन और श्वास प्रक्रिया यानी साँसों की गिनती करने की यह क्रिया इसमें मदद करती है, क्योंकि इसमें सिर्फ़ श्वास पर ही ध्यान देना होता है। ध्यान हमें खुद का सामना करने का प्रशिक्षण देता है। ऐसा करने से, यह हमें स्वयं के साथ बने रहने का प्रशिक्षण देता है। यह एक प्रकार की मानसिक शांति, यहाँ तक कि एकाकीपन पैदा करता है, ताकि आत्म-अध्ययन या आत्म-चिंतन के लिए एक आंतरिक वातावरण बन सके। ध्यान के ज़रिए हमें आंतरिक मन की दुनिया में प्रवेश करने का अवसर मिलता है। ध्यान में हमें एक दृष्टा बनने की कला सिखाई जाती है। मन एक कैनवास की तरह है जिस पर विचार, इच्छाएँ और पूर्वाग्रह जैसी अनेक रंगीन छवियाँ उभर सकती हैं। हम उनमें शामिल हुए बिना या उनसे ज़्यादा जुड़ाव महसूस किए बिना उन्हें देखना सीखते हैं। जैसे-जैसे चेतना का स्तर बदलता है, अहंकार की शक्ति कम होती जाती है; असल में, अहंकार कमज़ोर होता जाता है।
इस श्वास प्रक्रिया का उद्देश्य शरीर और मन को पुनः ताज़ा करना, शरीर और मन में ऊर्जा भरना तथा विषैले तत्वों एवं नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालना है।
ज़ेन में, सालों के अभ्यास और ध्यान से, एक साधक ‘विचार-शून्य’ अवस्था में पहुँच सकता है जिसमें वह मन के द्वंद्वों के परे चला जाता है। अन्य ध्यान परंपराओं में इसे ‘अस्तित्वहीनता’ या ‘शून्य’ कहा जाता है और हार्टफुलनेस में इसे ‘केंद्र’ कहा जाता है। यहाँ विचार-शून्य अवस्था के बारे में कुछ समझाने की ज़रूरत है। इसका मतलब है कि मन अब किसी विशेष विचार या भावना में फँसा हुआ या उलझा हुआ नहीं है, बल्कि मन हर चीज़ को स्वीकार कर लेता है। वास्तव में, एक ज़ेन कहावत है, “मन के बिना मन,” जिसका बस यही अर्थ है कि मन हर चीज़ के लिए खुला रहता है और किसी भी प्रकार की आसक्ति से मुक्त रहता है।
आजकल के माइंडफुलनेस अभ्यासों में, जो ज़ेन और अन्य बौद्ध परंपराओं से प्रेरित हैं, अनात्मवाद (non-identification) की शिक्षा है, “मैं अपने विचार नहीं हूँ,” “विचार सिर्फ़ विचार हैं - वे ‘मैं’ नहीं हैं।”

ध्यान में हमें एक दृष्टा बनने की कला सिखाई जाती है। मन एक कैनवास की तरह है जिस पर विचार, इच्छाएँ और पूर्वाग्रह जैसी अनेक रंगीन छवियाँ उभर सकती हैं। हम उनमें शामिल हुए बिना या उनसे ज़्यादा जुड़ाव महसूस किए बिना उन्हें देखना सीखते हैं। जैसे-जैसे चेतना का स्तर बदलता है, अहंकार की शक्ति कम होती जाती है; असल में, अहंकार कमज़ोर होता जाता है।
खाली प्याला
इन शब्दों में ज़ेन के सार को छूने की एक कोशिश है। जो पहले लिखा गया है, उससे यह बात स्पष्ट है कि ज़ेन हो या कोई भी अन्य आध्यात्मिक साधना हो, उसका प्रत्यक्ष अनुभव करना ज़रूरी है। ज़ेन में असलियत को जानने या समझने के लिए - जो अपनी प्रकृति और भौतिक जगत की प्रकृति है - उसे अनुभव करना होगा और उससे आगे भी बढ़ना होगा।
खाली प्याले की एक प्रसिद्ध कहानी है और वह इस तरह है -
एक दिन एक शिष्य सलाह लेने के लिए ज़ेन गुरु से मिलने गया। उसने कहा, “मैं आपसे ज़ेन के बारे में सीखने के लिए आया हूँ।”
थोड़े समय बाद यह स्पष्ट हो गया कि शिष्य अपनी ही राय और ज्ञान से भरा हुआ था। वह बार-बार अपनी कहानियों से गुरु की बातों में बाधा डालता था और ज़ेन गुरु की बात नहीं सुनता था। गुरु ने शांतिपूर्वक चाय पीने का प्रस्ताव रखा।
फिर, गुरु ने उसके सामने चाय का प्याला रखा और उसमें चाय डालने लगे। प्याला भर गया, फिर भी उन्होंने चाय डालना जारी रखा। चाय मेज़ पर, फ़र्श पर और हर जगह फैल गई। शिष्य चिल्लाया, “रुकिए! प्याला भर चुका है। क्या आप देख नहीं सकते?”
“बिलकुल,” ज़ेन गुरु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “तुम इस प्याले की तरह हो - इतने विचारों से भरे हो कि इसमें और कुछ नहीं समाएगा… मेरे पास खाली प्याला लेकर वापस आना।”

ज़ेन गुरु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ““तुम इस प्याले की तरह हो - इतने विचारों से भरे हो कि इसमें और कुछ नहीं समाएगा… मेरे पास खाली प्याला लेकर वापस आना।”

रूबी कार्मन
रूबी एक हार्टफुलनेस प्रशिक्षक, शिक्षक व अनुभवी परामर्शदाता हैं और कभी-कभी लिखती भी हैं... और पढ़ें
