आयरिश गायिका और शिक्षिका,एलिश बटलर, संत हिल्डेगार्ड फ़ॉन बिंगन (1098-1176) के आध्यात्मिक भजन गायन को ‘अनकवरिंग द वॉयस’ (अपनी असली आवाज़ को बाहर लाना) के विकासवादी मार्ग के साथ जोड़ती हैं। इससे वे रहस्यमयी आध्यात्मिकता और संगीत के प्रति अपने जुनून को पूरा करती हैं।
हिल्डेगार्ड के संगीत को गाने से उनकी आध्यात्मिकता का सीधा अनुभव होता है जिससे फिर मुझे अपनी आध्यात्मिकता का अनुभव होता है। संसार के बारे में हिल्डेगार्ड के दृष्टिकोण को समझने और महसूस करने का सबसे अच्छा तरीका है उनकी ‘सिंफ़ोनिया आर्मोनिए सेलेस्टियम रेवेलेशनम’ की सतहत्तर रचनाओं में से किसी को गाना। सिंफ़ोनिया हिल्डेगार्ड के भजन मंत्रों का संग्रह है जिसमें एंटिफ़ोन्स (प्रतिगान), भजन या स्तोत्र, सीक्वेंस (संगीत का बार-बार दोहराया जाने वाला अंश) और रेस्पॉन्सरी (जवाबी भजन) शामिल हैं। यह उन्हें पश्चिमी जगत में पहली नामित संगीतकार के रूप में स्थापित करता है जो एक असाधारण उपलब्धि है, यह देखते हुए कि वे ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में रहने वाली एक महिला थीं।
चाहे वह एहसास तुरंत हो या धीरे-धीरे बढ़ता जाए, जब मैं हिल्डेगार्ड का संगीत गाती हूँ तब मुझे लगता है कि उनके भजन गायन की दूरदर्शी शक्ति मुझे जीने का एक नया तरीका सिखाती है; मैं आध्यात्मिक अन्वेषण की एक ऐसी प्रक्रिया में प्रवेश करती हूँ जिसमें आवाज़ मुझे मार्ग दिखाती है। प्रत्येक गायक के लिए यह व्यक्तिगत अनुभव है जो हमें सीधे और गहराई से छूता है। ऐसा केवल प्रेम की विकासशील शक्ति ही कर सकती है। हिल्डेगार्ड समझती थीं कि उनके भजन के माध्यम से प्रेम का कैसे उपयोग किया जा सकता है और कैसे उसे दिशा दी जा सकती है।
माना जाता है कि संत ऑगस्टीन ने कहा था, “क्वि बेने कैंटट बिस ओरत” जिसका हिंदी अनुवाद है, गाने का अर्थ है दो बार प्रार्थना करना। इससे हम समझ सकते हैं कि गायन प्रार्थना की शक्ति को बढ़ाता है। हिल्डेगार्ड हमें बताती हैं कि प्रेम की विकासशील शक्ति के उपयोग द्वारा गायन हमारी भीतर की स्वाभाविक आध्यात्मिकता को उजागर करके हमें रूपांतरित कर सकता है। हिल्डेगार्ड का ब्रह्मांड-विज्ञान ईशकृपा से आदम और हव्वा के पतन की घटना पर केंद्रित है जब उनको स्वर्ग से बाहर निकाल दिया गया था। उनके लिए भजन गायन शरीर और आत्मा को फिर से एक करने और मानव जाति को अपनी मूल पूर्णता या क्षमता में वापस लाने का एक माध्यम है। यह संसार भगवान की स्तुति का एक भजन है, जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी मनुष्यों के माध्यम से जुड़े हुए हैं। मनुष्य अपने गायन द्वारा संपूर्ण सृष्टि के साथ एकात्मकता की स्थिति बना लेते हैं।
मैंने हमेशा हिल्डेगार्ड की रचना को ‘गीत’ कहने में संकोच किया है क्योंकि इसकी उत्पत्ति एक मठ के धार्मिक वातावरण में हुई थी। भजन गायन का गीत के समान प्रदर्शनकारी उद्देश्य नहीं होता, बल्कि यह एक ध्यानमयी, प्रार्थनापूर्ण, आंतरिक अवस्था से उत्पन्न होता है, जिसमें आत्मा के पवित्र स्रोत के साथ एकीकरण की स्थिति की आकांक्षा होती है। मेरे गुरु, चारीजी ने एक बार कहा था, “मैं कुछ भी नहीं खोजता बल्कि उसे प्रकट करता हूँ जो पहले से ही मौजूद है।” मेरा मानना है कि उनके कहने का यह तात्पर्य था कि एक प्रभावी आध्यात्मिक साधना के लिए सेवा के मनोभाव की आवश्यकता होती है जो हमारी मूल अवस्था के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करने में सहायक होता है। एक बार यह शाश्वत सत्व अर्थात मनुष्य के हृदय में मौजूद प्रकाश प्रकट हो जाए तो उसमें आत्मा को स्रोत तक, अपने मूल निवास तक की यात्रा में मार्गदर्शन करने की क्षमता होती है।
इसी तरह, आवाज़ उजागर करने की प्रक्रिया से गुज़र सकती है, जिससे आत्मा का स्वर की वास्तविकता के साथ ऐसा संबंध बन जाता है जो हमारे सामान्य बोध से परे है। प्राचीन समय में हमारे पूर्वजों ने इसे ‘द म्यूज़िक ऑफ़ द स्फ़ीयर (ब्रह्मांड का संगीत)’ नाम दिया था। धीरे-धीरे उन परतों को हटाने से, जो आवाज़ को उसकी असली प्रकृति और कार्य को जानने से रोकती हैं, आवाज़ न केवल अधिक सुरीली और वास्तविक बन जाती है बल्कि यह हमें उच्चतर आयामों से भी जोड़ सकती है। इस तरह आवाज़ के माध्यम से देहधारी मनुष्य ब्रह्मांडीय ज्ञान को प्राप्त कर सकता है जिससे हमारी अंतर्निहित आध्यात्मिकता प्रकट होती है।
गायन, विशेष रूप से प्रार्थनापूर्ण गायन जैसे भजन, अपने आप में एक विकासशील मार्ग का प्रतीक हो सकता है। यह वाद्ययंत्र की संरचना के तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक विज्ञान और आवाज़ को उजागर करने के गूढ़ ज्ञान दोनों का उपयोग करता है। इससे आत्मा के संगीत के बारे में जागरूकता और बोध बढ़ सकता है। हिल्डेगार्ड, महान आध्यात्मिक साधिका, हमसे नौ सौ साल पहले थीं और उनके भजन हमें इस ज्ञान के साथ तालमेल बैठाने का आह्वान करते हैं। उनके संगीत को गाने का अर्थ है स्वयं को प्रकट होने देना।

एलिश बटलर
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