क्लार्क पॉवेल
हे.मालिक रूमी, ब्रह्मांड की गति के साथी,
तुमने तड़प को शब्द दिए
और मौन को घर -
तुम्हारे शब्दों को सुनकर मैं नंगे पाँव दौड़ा चला आता हूँ।
मेरी लेखनी को अर्थ नहीं मिल रहे हैं,
सार्थक बनना सिखला दो इसे फिर से।
कविता का मिट जाए गुमान
और लय को याद रहे दिल की धड़कन।
तुम ही ने सूनेपन को संगीत में बदल दिया
धीरे से बता दो मुझे जो तुमने बाँसुरी से कहा -
यही ना कि जुदाई तो बस पहला सुर है,
मिलन के लंबे गीत का।
मैंने प्रेम को इस तरह लिखा, मानो जानता था मैं उसे,
अब प्रेम ही को लिखने दो इन हाथों से
कि हर पंक्ति खुल जाए इस तरह से,
कोई द्वार खुलता हो उस अदृश्य शहर का जैसे।
हे प्रेमाग्नि के स्वामी, थाम लो मेरा हाथ तुम,
दग्ध कर दो ऐसे कि राख भी मेरी बाकी न रहे।
मेरी हर कविता हो एक छोटा-सा समर्पण,
मुड़ना हो उस ओर जो कभी न जाता छोड़कर।
शब्दों के अस्तित्व का अर्थ जब स्मरण न रहे मुझे,
तुम याद दिलाना मुझको -
ये वो कदम हैं
जो लौट जाते हैं प्रियतम की ओर।

दोगेन की जीवन भर की मेहनत, उड़ गई खिड़की से बाहर
आधी रात को यह हुआ था,
जब उन्होंने लिखना पूरा किया ही था
वह अंतिम पृष्ठ,
उन खूबसूरत शिक्षाओं का जिन्हें वे सात वर्षों से लिख रहे थे,
एक-एक अक्षर जोड़कर,
अक्षरों से शब्द बनाकर।
सात वर्षों तक
उन्होंने वह सब कुछ लिखा था,
जो उन्होंने अपने गुरुओं से सीखा था,
और वह भी जो अपने दिल से सीखा था।
फिर हवा का एक बड़ा झोंका आया
पर्वत से
और खोल दी खिड़की अपने वेग से,
जो थी उस मेज़ के ऊपर।
वह ले गई उड़ाकर पन्नों को
उस रात के अँधेरे में।
दोगेन जागे तो देखा खिड़की से,
उन पन्नों को दूर-दूर तक उड़ते हुए,
आँगन और घाटी में,
मठ की दीवार के परे,
बरसात की उस रात में।
सात लंबे वर्षों की पूरी मेहनत
उड़ गई थी हवा में।
सुबह होते ही भिक्षु
आए और बोले, “प्रभु,
जितना हम कर पाएँगे,
उन्हें खोजेंगे और ढूँढ लाएँगे!”
दोगेन खिड़की पर खड़े मुस्कुरा रहे थे,
उस पर्वत को देख रहे थे
जो सारे पन्ने उड़ा ले गया था।
क्यों? वे नीचे खड़े भिक्षुओं से बोले,
क्या हवा ने हमें नहीं सिखाया
जो जानते थे हम पहले ही से?
कि यह छूट जाना तो
हर उस चीज़ के साथ होता है,
जिसे हम अपना मानकर पकड़े रहते हैं।
भिक्षुओं ने कहा,
लेकिन, प्रभु! शिक्षाएँ अनमोल हैं ये,
आप और हम कैसे
यूँ ही मिट जाने दें इन्हें?
दोगेन ने वह पूरी रात
खिड़की पर बैठ बिताई थी।
वे पुनः मुस्कुराए और बोले,
देखो! कैसे करुणा पर लिखे
मेरे शब्दों को हवा ने प्रकाशित कर दिया,
ताकि पक्षियों के घोंसले बन सकें।
अनासक्ति के बारे में लिखे मेरे शब्द
उसने उन पेड़ों को दे दिए
ताकि वे उन्हें पत्तों को दे सकें
जो उसकी जड़ों पर गिर जाते हैं
और वहीं विलीन हो जाते हैं।
इसलिए कि आगे आने वाले पेड़ों को पोषित कर सकें
जो शायद बाद में कागज़ बनें,
जिस पर किसी और के शब्दों में छुपा ज्ञान
लिखा जाए।
क्या प्रकृति ने उन्हें
प्रकृति को ही नहीं लौटा दिया?
लेकिन आपके शब्द हमने हैं खो दिए!
भिक्षु दुखी मन से यह बोले।
दोगेन ने अपना हाथ
हृदय पर रखा और कहा,
शब्द यहाँ से आए थे
और वे अब भी हैं यहाँ।
वे फिर लौटेंगे
नए शब्द बनकर हृदय से।
भिक्षुओं ने अपने सिर हिलाए
और आश्चर्यचकित हो लौट गए।
दोगेन फिर मुस्कुराए
और सो गए।
लंबी तूफ़ानी रात के बाद
सूरज ने एक और दिन को रोशन किया
पहाड़ों के बीच की दरार से।
एक नया सूर्योदय हुआ,
जिसे दोगेन ने नहीं देखा।


क्लार्क पॉवेल
क्लार्क पॉवेल सबसे पहले एक कवि हैं। वे एक पुरस्कार विजेता स्तंभ लेखक हैं, और पढ़ें
