नेगिन खोरासानी पूर्णता के मनोभाव के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण बताती हैं - हम इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कैसे विकसित करेंहम कैसे याद करें कि हम वास्तव में कितने एकीकृत हैंजिसकी शुरुआत हर सुबह जागने पर हम दुनिया का अभिवादन करते हुए कर सकते हैं?

 

ब मैं आग को देखती हूँ और उसकी गर्माहट में खुद को डुबो देती हूँ तब मुझे उस पल में जीवन की पूर्णता का एहसास होता है। मुझे दिखाई देता है कि यह पल हर मायने में और हर तरह से परिपूर्ण है। मैं जीवन के साथ, पूरे अस्तित्व के साथ एक हूँ। जो कुछ भी है, उसके साथ एक होने की भावना के माध्यम से मुझे अपनी पूर्णता महसूस होती है। मैं ब्रह्मांड हूँ। ॐ सोहम्!

कभी-कभी, अपनी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों में, अत्यधिक व्यस्त रहने की आदत में, हम पूर्ण के साथ अपना जुड़ाव भूल जाते हैं। हम अपने अस्तित्व की परिपूर्णता, प्रवीणता एवं व्यापकता को भूल जाते हैं। हम जो पहले से ही हैं उसके पूर्णत्व को भूल जाते हैं। हम जीवन के चमत्कार को भूल जाते हैं।

किसी समय, सभी ने हममें कुछ मनोहारी देखा था - जब हम पहली बार पैदा हुए थे। गर्भाधान से लेकर जन्म तक हमारे अस्तित्व को चमत्कार माना जाता था। पहली बार जब हमने अपनी आँखें खोली थीं तब सबको ऐसा लगा जैसे सूर्य फिर से उग आया हो। हमारी पहली मुस्कान हमारे माता-पिता और प्रियजनों के लिए प्रसन्नता का साकार रूप थी।

फिर क्या हुआ? क्या हम जीवन की सुंदरता को भूल गए जो हमारे भीतर और हमारे आसपास विद्यमान है? क्या हमने अस्तित्व के प्रति श्रद्धा की भावना खो दी है? क्या हम अपने शरीर की हर हरकत को चमत्कारी मानते हैं? अपने सबसे बुरे दिनों में भी हम इस धरती पर चमत्कार ही हैं - हमारा शरीर, हमारा मन और प्राण-शक्ति, जो हमारी हर साँस और गतिविधि में मौजूद है, बहुत शानदार है।

क्या हम हर सुबह जागने का चमत्कार महसूस करते हैं? क्या हम सुबह बिस्तर से उठने से पहले इस बात की भव्यता का एहसास करते हुए विस्मय और प्रशंसा में थोड़ी देर लेटे रह सकते हैं? क्या हम जागने पर इस जागरूकता को अपने दिलों में असीम कृतज्ञता से भरकर इसका आनंद उठा सकते हैं? क्या हमारी यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि हम इस जीवन रूपी चमत्कार के लिए, भले ही एक पल के लिए, मौन प्रशंसा का भाव रखते हैं?

शायद हम हर दिन जागने पर इसी बात पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। और जैसे-जैसे हमारा दिन आगे बढ़ता है, हम खुद को बार-बार स्रोत के साथ अपने जुड़ाव, अपनी संपूर्णता की ओर वापस ला सकते हैं और लगातार खुद को याद दिला सकते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं तथा हमारे भीतर दिव्यता का वास है। कितना अच्छा हो यदि हम दिन भर ऐसा ही करें - जानते-बूझते मन द्वारा बनाई गई उन सीमाओं को खत्म कर दें जो हमें हर चीज़ और हर व्यक्ति से अलग करती हैं।

ऐसा होने पर, जब हम चलेंगे, बात करेंगे और दैनिक गतिविधियों में संलग्न होंगे, तब हम सचेत रूप से एकता की इस याद में खुद को डुबो देंगे। इस संपूर्णता के प्रति जागृत होना ही सही उपचार है। सभी दुख अलगाव के भ्रम से उत्पन्न होते हैं जिससे भय, चिंता, अयोग्यता और अपर्याप्तता की भावनाएँ आने लगती हैं।

 

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ऐसे क्षण भी होते हैं जब हम बस बने रहते हैं - ताकि हम अस्तित्व की पूर्णता में रह पाएँ और ‘पूर्णता’ के साथ जुड़ाव में जीवन के सौंदर्य और चमत्कार को महसूस कर सकें।


एकात्मकता के मनोभाव के साथ हमें एहसास होगा कि हम पहले ही अपने गंतव्य पर पहुँच चुके हैं। हम हर चीज़ के स्रोत के साथ एक हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है और कोई भी नहीं है जिसे हमें पूर्ण महसूस करने के लिए पकड़े रहना चाहिए। हम पहले से ही संपूर्ण हैं। इस संपूर्णता के न होने का भाव केवल मन की एक रचना, एक भ्रम है जिसे हम जागरूकता के साथ अपनी इच्छा से भंग कर सकते हैं। तब हम अपनी शाश्वत और सर्वव्यापी प्रकृति को पहचान लेते हैं। तब हमें पता चलता है कि समय और स्थान भी मन की रचनाएँ हैं और ऐसा भ्रम हैं जिससे अस्तित्व के प्रति हमारी समझ बनती है।

जैसे-जैसे हम इस सत्य के प्रति अधिक जागरूक होते हैं, निरंतर कार्य करने का तनाव कम होता जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम कोई कर्म न करें, कर्म करने के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। हमारा कर्म जीवन की प्रतिक्रिया में स्वाभाविक रूप से होता है, न कि अभाव की भावना से। हम अब कुछ पाने के लिए कर्म नहीं करते, क्योंकि पूर्णता में, कुछ भी कमी नहीं होती। हमारे कर्म इच्छा रहित हो जाते हैं और परिणामों के प्रति आसक्त नहीं रहते।

हमारे दिन गतिविधियों से भरे हो सकते हैं, लेकिन हम व्यस्त महसूस नहीं करते। हम एक कार्य से दूसरे कार्य को करने के लिए भागते नहीं रहते हैं। हम प्रत्येक कार्य के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर देते हैं और जब तक हम पूर्ण महसूस नहीं करते, उसी में लगे रहते हैं। फिर कोई दूसरा कार्य हमारा ध्यान आकर्षित कर सकता है। प्रत्येक क्षण में हम पूरी तरह से उपस्थित होते हैं, पूरी तरह से शामिल होते हैं।

और ऐसे क्षण भी होते हैं जब हम बस बने रहते हैं ताकि हम अस्तित्व की पूर्णता में रह पाएँ और ‘पूर्णता’ के साथ जुड़ाव में जीवन के सौंदर्य और चमत्कार को महसूस कर सकें।

याद रखें कि आप ब्रह्मांड हैं। इसे अपने अंदर समाहित कर लें। अपने आप से कहें -
ॐ सोहम्।


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नेगिन खुरासानी

नेगिन खुरासानी

नेगिन एक सामाजिक उद्यमी एवं सक्रिय कार्यकर्ता हैं जो आंतरिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्ध हैं। वे एक लेखिकाऔर पढ़ें

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