नींद का हर घंटा मायने रखता है 

स्टैनिस्लस लजूजी ने नींद की आरोग्य क्षमता पर कुछ बहुत महत्वपूर्ण शोध किए हैं। वे बता रहे हैं कि रात की आरामदायक नींद क्यों आवश्यक है और साथ ही यह भी समझा रहे हैं कि नींद के कुछ घंटे कम करने से नुकसान हो सकता है।

रात को गहरी नींद या बुरा दिन -

निद्रा हमारे जीवन में मुख्य भूमिका निभाती है। हमारा कार्यकारी चिंतन, जिसकी विशेषता कुशल मानसिक प्रक्रिया, अनुकूलन क्षमता और नवाचार है, रात्रि की तरोताज़ा कर देने वाली निद्रा पर निर्भर करता है।

फिर भी यह दुख की बात है कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और व्यावसायिक जीवन में नींद की गुणवत्ता और मात्रा, दोनों के महत्व को अक्सर कम आँका जाता है, जबकि इतिहास हमें बार-बार स्मरण कराता है कि नींद की कमी का हमारे स्वास्थ्य और मन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। वास्तव में, अतीत में इसका उपयोग यातना देने के एक साधन के रूप में किया जाता रहा है।

सोलहवी शताब्दी में स्कॉटलैंड में जब महिलाओं को डायन घोषित करके मृत्युदंड देने का प्रचलन अपने शीर्ष पर था तब जिन महिलाओं पर जादू टोना करने का आरोप होता था उन्हें पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया जाता था। उनके अपराध को सिद्ध करने से पहले उनसे पाप की स्वीकारोक्ति लेना आवश्यक होता था। इसके लिए आरोपी स्त्रियों को कई दिनों तक सोने नहीं दिया जाता था जिससे उन्हें मतिभ्रम हो जाता था और वे एक अलग मनोवैज्ञानिक दशा अनुभव करने लगती थीं। ऐसी दशा में उनके कथन को उनकी स्वीकारोक्ति के रूप में दर्ज कर लिया जाता था। वहीं से इस मुहावरे, “डायन को जगाना,” का जन्म हुआ।


विकसित देशों में लगभग दो-तिहाई वयस्कों को रात के लिए अनुशंसित सात से आठ घंटे की नींद नहीं मिल पाती।


द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने लगभग 175 शिविर संचालित किए थे जहाँ सैन्य कर्मियों और नागरिकों, दोनों से जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्हें नींद से वंचित रखा जाता था और अन्य यातना विधियों का उपयोग किया जाता था। ब्रिटिश सेना के पास भी ‘लंदन केज था जो युद्धबंदियों से पूछताछ के लिए एक प्रसिद्ध केंद्र था। वहाँ नींद से वंचित रखने सहित विभिन्न कठोर यातना तकनीकों का उपयोग किया जाता था। रंगभेद नीति के काल में दक्षिण अफ़्रीका ने नींद से वंचित रखने को एक यातना विधि के रूप में इस्तेमाल किया था जो वर्ष 1994 तक चलता रहा और अमेरिकी सेना ने कथित तौर पर वर्ष 2009 तक इसका इस्तेमाल किया।

इस तरह पूछताछ के साधन और यातना की विधि के रूप में नींद से वंचित रखने का एक लंबा इतिहास रहा है। कुछ समूहों ने इसे ‘परिष्कृत पूछताछ तकनीक का नाम दिया है। हालाँकि इससे शरीर पर कोई निशान नहीं पड़ते फिर भी संयुक्त राष्ट्र इसे यातना का ही एक रूप मानता है क्योंकि उसके अनुसार यातना की परिभाषा ‘शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा पहुँचाने वाले साधनहै। किसी को नींद से वंचित रखने से उसे मतिभ्रम, मनोविकृति, खंडित मनस्कता (schizophrenia) और असंगत कथन बोलने का विकार हो सकता है। इस कारण यह एक चिंताजनक और अमानवीय व्यवहार बन जाता है।

हालाँकि अब जादू-टोना करने वालों की खोज पर रोक लग गई है लेकिन नींद की कमी की समस्या दुनिया भर में व्यापक रूप से फैल गई है। यू.एस. सेंटर्स फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (अमेरिकी रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र) ने नींद की कमी को एक ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारीके रूप में वर्णित किया है। अमेरिका में एक अनुमान के मुताबिक 5 से 7 करोड़ वयस्क दीर्घकालिक निद्रा संबंधी रोगों से पीड़ित हैं। नीदरलैंड में हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि 27.3% लोगों (21.2% पुरुष और 33.2% महिलाएँ) में किसी न किसी प्रकार का नींद संबंधी विकार है। मानक प्रश्नावली के आधार पर किए गए मत संग्रहण में 32% लोगों ने नींद में आने वाली सामान्य गड़बड़ी की शिकायत की, जबकि 43.2% ने कहा कि उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है। यह भी देखा गया है कि विकसित देशों में लगभग दो-तिहाई वयस्कों को रात के लिए अनुशंसित सात से आठ घंटे की नींद नहीं मिल पाती। 55 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 50% व्यक्ति नींद संबंधी विकारों से पीड़ित हैं जिसमें नींद आने में देरी और नींद का बार-बार टूटना शामिल है। 

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हर एक घंटा मायने रखता है 

आखिर खुद को ज़बरदस्ती जगाकर रखने और कष्ट पाने की क्या ज़रूरत है? हमारी जीवनशैली में आए बदलाव और नींद के बारे में पर्याप्त जानकारी का अभाव इस समस्या के कारण हो सकते हैं जिनकी हमें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आइए हम नींद की कमी से हमारे अस्तित्व के सभी पहलुओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर गौर करें -

1. एक घंटे की नींद से वंचित रहने का क्या प्रभाव पड़ता है? 

‘दिवालोक बचत समय’ (daylight saving time), यानी गर्मियों में घड़ी एक घंटा आगे करने का समय, एक वार्षिक वैश्विक प्रयोग का नाम है जिससे 70 देशों के 150 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। यह एक घंटे की नींद से वंचित रहने के प्रभाव का एक स्पष्ट संकेत प्रदान करता है। प्रत्येक वर्ष, सोमवार को जब घड़ियाँ आगे बढ़ाई जाती हैं तब अस्पतालों में दिल का दौरा पड़ने से भर्ती होने वाले रोगियों की संख्या में 24% तक की वृद्धि देखी जाती है। और पतझड़ के मौसम में लोगों को जब एक अतिरिक्त घंटे की नींद का उपहार मिलता है तब इसका उलटा देखने को मिलता है और दिल के दौरों में 21% की कमी आ जाती है।

अमेरिका के एक स्कूल में एक प्रयोग किया गया। उन्होंने स्कूल शुरू होने का समय सुबह 7:45 से बदलकर सुबह 8:30 बजे कर दिया। इसका मतलब था कि छात्रों को सोने के लिए 45 मिनट का अतिरिक्त समय मिलना। इसके कारण उन छात्रों के मानकीकृत परीक्षण स्कोर (एसएटी) में 8 से 25% तक सुधार हुआ।

2. यदि आप रात में छह घंटे सोते हैं तो क्या हो सकता है?

यदि हमारे सोने का सामान्य समय आठ घंटे माना जाए (विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सामान्यतः सात से नौ घंटे सुझाया गया है), तो उसकी तुलना में यह दो घंटे कम है। सरे स्लीप रिसर्च सेंटर ने अपने अन्वेषण में पाया कि जो छात्र लगातार एक सप्ताह तक रात को सिर्फ़ छह घंटे सोए, उनके तंत्र में साढ़े आठ घंटे की गहरी नींद लेने वाले छात्रों की तुलना में 711 वंशाणु बाधित पाए गए। इनमें से आधे वंशाणुओं में सक्रियता अत्यधिक बढ़ गई थी जिनमें दीर्घकालीन सूजन (कैंसर का पूर्व लक्षण), कोशिकीय तनाव और हृदय संबंधी बीमारियों को बढ़ाने वाले वंशाणु शामिल थे। दूसरी तरफ़ स्थिर चयापचय और सर्वोत्‍कृष्‍ट प्रतिरक्षा क्रियाओं को बढ़ाने वाले वंशाणुओं की सक्रियता कम हो गई थी।

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लंबे समय तक काम करने, देर रात तक कॉल करने, अत्यधिक स्क्रीन टाइम आदि के कारण देर से नींद आना आधुनिक 
समय की एक प्रमुख चुनौती है। इससे अधिक से अधिक लोग नींद से संबंधित बीमारियों से प्रभावित हो रहे हैं।


3. रात में पाँच घंटे की नींद का क्या प्रभाव होता है? 

शिकागो विश्वविद्यालय के शोध से पता चला कि जब स्वस्थ युवा पुरुषों की नींद को एक सप्ताह तक पाँच घंटे प्रतिदिन तक सीमित किया गया तो उन्होंने टेस्टोस्टेरॉन के स्तर और अंडकोष के आकार में तीव्र गिरावट का अनुभव किया। इस परिवर्तन के प्रभाव से पौरुष क्षमता की दृष्टि से उनकी आयु दस से पंद्रह वर्ष बढ़ गई। टेस्टोस्टेरॉन के घटे स्तर ने न केवल उनकी यौन गतिविधि को कम किया बल्कि उनमें थकान को बढ़ाया जिसके कारण उनकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और मानसिक तीव्रता में भी कमी देखी गई। यह भी पाया गया कि इसका नकारात्मक प्रभाव महिलाओं के हार्मोन पर भी पड़ता है क्योंकि रात में छह घंटे से कम सोने के कारण उनके मासिक धर्म और प्रजनन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हार्मोन के उत्पादन में बाधा आई, यहाँ तक कि इस अनियमित दिनचर्या के कारण प्रजनन संबंधी समस्याएँ 80% तक बढ़ गईं।

4. रात में चार घंटे की नींद का क्या प्रभाव होता है?

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ. माइकल इरविन ने अपने अध्ययन में देखा कि सिर्फ़ एक रात व्यक्ति को चार घंटे की सीमित नींद मिलने पर उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली में उपस्थित 70% प्राकृतिक प्रतिरक्षा कोशिकाएँ नष्ट हो गईं। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि एक सप्ताह इस तरह की निद्रा की कमी से कितनी हानि हो सकती है। महीनों या वर्षों तक इस तरह की नींद की कमी के प्रभाव का तो अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

5. एक रात बिलकुल नींद न लेने से क्या होता है?

रैंडी गार्टनर सैन डिएगो, कैलिफ़ोर्निया से हैं। उन्होंने वर्ष 1964 में 17 वर्ष की उम्र में 11 दिन 24 मिनट तक लगातार बिना सोए रहने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया था। 

लगातार 24 घंटे तक न सोने से वही प्रभाव पड़ता है जैसा रक्त में अल्कोहल की मात्रा 0.10 प्रतिशत तक बढ़ने से होता है जिससे आप में निर्णय लेने, परखने, समझने, स्मृति और समन्वय करने की क्षमता में कमी आ सकती है। लेकिन आमतौर पर व्यक्ति के थोड़ी नींद ले लेने के बाद इन लक्षणों में सुधार होने लगता है।

इसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रयोग में कुछ प्रतिभागियों को अच्छी तरह से आराम करने वाले और नींद से वंचित समूहों (पूरी रात जागते रहने वाले) में विभाजित किया गया और उनकी सीखने की क्षमता का परीक्षण किया गया। दो रातों की नींद पूरी करने के बाद भी नींद से वंचित समूह के सदस्यों की स्मृति में 40% तक कमी देखी गई। यह समूह नई जानकारी को ग्रहण करने में कठिनाई अनुभव करता पाया गया। जो लोग ठीक से सोते थे उनमें मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस में काफ़ी सक्रियता देखी गई जो सीखने से संबंधित है, जबकि नींद से वंचित लोगों में सीखने की इच्छा न्यूनतम पाई गई। वास्तव में नींद की कमी ने उनकी स्मृति धारण प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया था। इसलिए परीक्षा के दिन से पहले की रात बहुत देर तक पढ़ते रहना अच्छी योजना नहीं है।

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जो लोग ठीक से सोते थे उनमें मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस में काफ़ी सक्रियता देखी गई जो सीखने से संबंधित है, जबकि नींद से वंचित 
लोगों में सीखने की इच्छा न्यूनतम पाई गई। वास्तव में नींद की कमी ने उनकी स्मृति धारण प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया था। 
इसलिए परीक्षा के दिन से पहले की रात बहुत देर तक पढ़ते रहना अच्छी योजना नहीं है।


इसी तरह के एक अन्य अध्ययन में युवा वयस्कों के दो समूह शामिल थे – एक समूह नींद से वंचित युवाओं का और दूसरा अच्छी तरह से आराम करने वाले युवाओं का। इस अध्ययन में यह पाया गया कि नींद से वंचित समूह के प्रतिभागियों में लड़ो या भागो की प्रतिक्रिया के केंद्र, एमिग्डाला, में भावनात्मक क्रियाशीलता 60% से अधिक तक बढ़ी हुई थी। इसके साथ ही उनमें तार्किकता और निर्णय लेने से जुड़ा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, भावनात्मक प्रेरकों को नियंत्रित करने में संघर्ष करता पाया गया। परिणामस्वरूप उनमें चिड़चिड़ापन और भावनात्मक उथल-पुथल बहुत बढ़ गई।

6. बिना नींद के 36 घंटों का क्या प्रभाव होता है?

ऐसी स्थिति में भूख, चयापचय, मनोदशा और तनाव के स्तर जैसे शारीरिक कार्य बाधित हो सकते हैं। इसके प्रभावों में अत्यधिक थकान, हार्मोन में असंतुलन, प्रेरणा में कमी, जोखिम भरे निर्णय, अटल तर्क-वितर्क और बोलने में कठिनाई आदि शामिल हैं। 

7. बिना नींद के 48 घंटों का क्या प्रभाव होता है?

प्रतिरक्षा प्रणाली खराब हो जाती है जिससे शरीर में सूजन बढ़ जाती है और प्राकृतिक प्रतिरक्षा कोशिकाओं की गतिविधि कम हो जाती है। 

8. बिना नींद के 72 घंटों का क्या प्रभाव होता है?

सोने की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है। कई कार्य एक साथ करने की योग्यता, स्‍मरण और ध्यान देने जैसे संज्ञानात्मक कार्यों की क्षमता में गंभीर रूप से गिरावट आती है। भावनात्मक स्थिरता प्रभावित होती है जिससे चिड़चिड़ापन, अवसाद, चिंता और दूसरों की भावनाओं को संसाधित करने में कठिनाई जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं। अनुभूतियाँ विकृत हो जाती हैं जिससे मतिभ्रम और भ्रम होने लगता है। 

9. लंबे समय तक नींद की कमी का क्या प्रभाव होता है?

संज्ञानात्मक, भावनात्मक और बोधात्मक कार्य उत्तरोत्तर बिगड़ते जाते हैं जिसका अंततः हमारे समग्र स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। 

लंबे समय तक काम करने, देर रात तक कॉल करने, अत्यधिक स्क्रीन टाइम आदि के कारण देर से नींद आना आधुनिक समय की एक प्रमुख चुनौती है। इससे अधिक से अधिक लोग नींद से संबंधित बीमारियों से प्रभावित हो रहे हैं।

तो, रात की आरामदायक नींद का क्या मतलब है ? इस विषय पर हम अगले अंक में बात करेंगे।


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स्टैनिस्लस लजूजी

स्टैनिस्लस लजूजी

स्टैनिस्लस फ्रांस के विदेश मंत्रालय में एक जनसेवक हैं। उन्होंने कई देशों में काम किया है और जहाँ भी वे जाते हैं, उन्हें ध्यान में लोगों का शौक जागृत करने में आनंद आता है। उन्होंने व... और पढ़ें

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