मेगन स्टीवर्ट बता रही हैं कि अहिंसा की शुरुआत घर से कैसे होती है और समझा रही हैं कि भावनात्मक आत्मीयता, आत्म-नियंत्रण और संबंधों को सुधार लेना किस तरह परिवारों को संघर्षों से निपटने में मदद करते हैं।
संघर्ष अध्ययन के पाठ्यक्रम में अहिंसा के बारे में जानने की कोशिश करते हुए मैंने पाया कि अंहिसा की चर्चा अक्सर एक सिद्धांत के रूप में की जाती है न कि जीवन में अपनाने योग्य व्यवहार के रूप में। सैद्धांतिक रूप से इस बात पर सहमत होना आसान है कि हिंसा हानिकारक होती है और हमें शांति के लिए ही प्रयास करना चाहिए। दैनिक जीवन, विशेषतया पारिवारिक जीवन, में अहिंसा बहुत ही सूक्ष्म तरीकों से प्रकट होती है। यह व्यक्ति के बात करने के लहज़े, समय, अपनी बात को प्रस्तुत करने के तरीके और एक-दूसरे के व्यवहार को लेकर निजी समझ के माध्यम से प्रकट होती है। इस एहसास ने मुझे अहिंसा, बच्चों की परवरिश और उनके विकासात्मक मनोविज्ञान के मध्य के संबंध को बहुत बारीकी से जाँचने के लिए और यह जानने के लिए प्रेरित किया कि शांति कैसे केवल समाज में ही नहीं बल्कि निकायों और व्यक्तिगत रिश्तों में विकसित होती है।
संघर्ष अध्ययन में शांति के अर्थ को मात्र युद्ध और प्रत्यक्ष हानि के अभाव तक ही सीमित नहीं समझा जाता। शांति संबंधों के अनेक स्तरों पर विद्यमान होती है - हमारे भीतर, व्यक्तियों के बीच, परिवारों में, समुदायों में व संस्थानों में – और ये सारे स्तर आपस में जुड़े हुए हैं। जैसा कि हम माइंडफुलनेस अभ्यास में देखते हैं, जो कुछ भी हमारे अंदर होता है, उसी के अनुसार हमारी बाह्य प्रतिक्रिया होती है। एक विकासात्मक और सामाजिक शिक्षण के दृष्टिकोण से देखें तो व्यक्ति की परवरिश सबसे आरंभिक और प्रभावशाली माहौल बनाती है जिसमें संबंधों के प्रतिरूप बनते हैं, अपनाए जाते हैं, व्यवहार में लाए जाते हैं और आगे बढ़ाए जाते हैं।
विकासात्मक दृष्टिकोण से परस्पर संबद्धता बहुत महत्वपूर्ण है। मस्तिष्क के वे भाग जो भावनात्मक नियंत्रण, आवेग नियंत्रण और कुछ विशेष कार्यों के निष्पादन से संबंधित होते हैं, युवावस्था तक लगातार विकसित होते रहते हैं। इसीलिए बच्चे तीव्र भावनात्मक स्थितियों को स्वयं नहीं संभाल पाते और वे शांत होने, स्थिति को समझने और सामान्य स्थिति में लौटने के लिए अपने देखभाल करने वालों पर निर्भर रहते हैं। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि बच्चे पहले संबंधों के माध्यम से स्वयं को नियंत्रित करना सीखते हैं। बाद में यह क्षमता उनके भीतर स्थायी रूप से विकसित हो जाती है।

जब बच्चे तीव्र भावनाएँ व्यक्त करते हैं, अलग-थलग रहते हैं या अधिक शरारत करते हैं तब वे यह दिखाते हैं कि उन्हें अभी भी किन बातों में सहायता की ज़रूरत है। इस पर ध्यान देने से बच्चों की परवरिश का तरीका धीरे-धीरे बदल जाता है। माता-पिता फिर व्यवहार प्रबंधन के बजाय संबंधों की सुरक्षा एवं भावनात्मक समीपता की ओर अधिक ध्यान देने लगते हैं जिससे बच्चों के अंदर स्वयं को नियंत्रित करने की क्षमता विकसित हो जाती है। अवधान में इस बदलाव से हमें बच्चों के साथ रहने का एक अलग तरीका पता चलता है। उनके व्यवहार की तुरंत ही व्याख्या करने या सुधारने की कोशिश करने के बजाय थोड़ा रुकने से यह समझने की गुंजाइश होती है कि सतह के नीचे क्या चल रहा है। वास्तव में सुधार से पहले जुड़ाव की गुंजाइश रहती है।
पारिवीरिक जीवन में जुड़ाव बनाने की बार-बार कोशिश करने से भावनात्मक आत्मीयता बढ़ती है। जब माता-पिता अपने आप में स्थिर रहते हुए बच्चे के आंतरिक अनुभव के साथ हमेशा मौजूद रहते हैं यानी उसकी भावनाओं को समझते हैं तब उनके बीच गहरा संबंध बन जाता है। बार-बार होने वाली सामान्य बातचीत से बच्चे समझ जाते हैं कि उनकी भावनाओं और विचारों को स्वीकारा जा रहा है या नहीं। जब उनकी भावनाओं को शांत मन के साथ समझा जाता है तब बच्चे यह सीखते हैं कि संबंधों को चोट पहुँचाए बिना भी भावनाएँ अभिव्यक्त की जा सकती हैं। जब बच्चों की भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है या जल्दबाज़ी में ठीक से सुना नहीं जाता या उनकी आलोचना की जाती है तब अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए वे खुद को ढाल लेते हैं - कभी अपनी भावनाओं को छिपा लेते हैं तो कभी उन्हें और ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं।
भावनात्मक नियम बचपन से ही, धीरे-धीरे आकार लेते रहते हैं, निर्देशों से नहीं बल्कि अनुभव के माध्यम से। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे अपने आसपास हो रही प्रतिक्रियाओं के अनुकूल बन जाते हैं और समझने लगते हैं कि कौन-सी बातें उन्हें दूसरों से जुड़ाव बनाए रखने में मदद करती हैं। इसी आधार पर वे अपने भीतर की दुनिया को व्यवस्थित करने लगते हैं। इस परिदृश्य में बच्चों के प्रति अलग-अलग देखभालकर्ता की अलग-अलग तरह की अपेक्षाएँ विकसित होती हैं। पिता को लग सकता है कि स्थिरता का अर्थ अपनी भावनाओं को काबू में रखना है जबकि माँ महसूस कर सकती है कि तकलीफ़ यदि क्रोध या कुंठा का रूप नहीं ले रही है तो बर्दाश्त की जा सकती है। ये पैटर्न जानबूझकर नहीं बनाए जाते लेकिन समय के साथ वे इस बात को प्रभावित करते हैं कि किन भावनाओं को प्रकट किया जाता है और किन्हें चुपचाप अंदर ही अंदर संभाल लिया जाता है।
बेल हुक्स एक अफ़्रोअमेरिकन नारीवादी लेखिका और शिक्षाविद हैं जो प्रेम, शक्ति और संबंधों में सुधार लाने से संबंधित अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वे लिखती हैं, “बच्चों की परवरिश ऐसे वातावरण में की जानी चाहिए जिसमें वे सीख सकें कि प्रेम वह क्रिया है जिसमें देखभाल, ज़िम्मेदारी, सम्मान और ज्ञान को व्यवहार में लाया जाता है” (हुक्स, 2015,पृ.142)। परिवर्तनवादी पालन-पोषण के बारे में वे कहती हैं कि माता-पिता व बच्चे के संबंधों में नियंत्रण की प्रवृत्ति, चाहे वह कितनी ही सूक्ष्म या अच्छे इरादे से हो, भावनात्मक सुरक्षा को चोट पहुँचा सकती है। भावनात्मक आत्मीयता तब बढ़ती है जब परिवार के बड़े लोग बच्चों के लिए भावनात्मक रूप से उपलब्ध हों न कि भावनात्मक रूप से नियंत्रण करने वाले हों।
मुझे याद है कि मैं ‘सर्किल ऑफ़ सिक्योरिटी’ के ढाँचे पर आधारित एक परवरिश संबंधी पाठ्यक्रम में भाग ले रही थी जब प्रशिक्षक ने एक ऐसी बात कही जो आज भी मुझे सोचने पर मजबूर करती है - “जिन बच्चों को सबसे ज़्यादा प्यार की ज़रूरत होती है, वे इसे सबसे खराब तरीके से माँगते हैं।” उन्होंने आगे समझाया कि जब बच्चे डरे हुए, आहत, अभिभूत या असुरक्षित महसूस करते हैं तब उनके व्यवहार हमेशा ऐसे नहीं लगते जैसे वे जुड़ाव चाहते हों बल्कि वे अवज्ञा, अलगाव या उपेक्षा जैसे भी लग सकते हैं।

उस कमरे में उपस्थित अभिभावकों के बीच एक और आम धारणा जो सामने आई, वह यह थी कि बच्चे “सिर्फ़ ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।” इस विचार पर गहराई से सोचने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि ध्यान आकर्षित करने की ज़रूरत के पीछे छुपी जुड़ाव की ज़रूरत को कई बार नहीं समझा जाता। अधिकतर मामलों में यह सिर्फ़ ध्यान आकर्षित करना नहीं बल्कि जुड़ाव की ज़रूरत होता है।
यह अक्सर कुछ ऐसा दिखाई देता है -
एक माँ घर पर बीमार व कमज़ोर है और अपने किशोर बेटे से पालतू कुत्ते को घुमाने के लिए कहती है। वह उस बात पर ध्यान नहीं देता है। थोड़ी देर बाद जब वह उसे दोहराती है तब वह तीखी प्रतिक्रिया देता हुआ कहता है, “सब कुछ आपके कहने से नहीं होता है, माँ।” माँ के शरीर में कसाव होने लगता है। उसे सीने में जलन महसूस होती है। विचार तेज़ी से आने-जाने लगते हैं, जो थकावट और लंबे समय से चले आ रहे भय से प्रभावित हैं। उसे एक जानी-पहचानी कहानी बनती हुई नज़र आती है - सब कुछ करना, सराहना नहीं मिलना, उसे एक सख्त माँ समझा जाना जबकि पिता को खुशमिजाज़। बिना सोचे-विचारे वह आवेश में अपने त्याग और ज़िम्मेदारियों को गिनाने लगती है। इस तरह सारी बातचीत विरोधात्मक हो जाती है।
अनेक माता-पिता ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं जब थकावट, अनकहे डर और बहुत सारी ज़रूरतें एक साथ आ जाती हैं। अंततः स्थिति बदलती है। बेटा अपनी बैचेनी और विश्राम की ज़रूरत के बारे में बताता है और माँ भी माफ़ी माँगती है। माँ को एहसास होता है कि उसकी प्रतिक्रिया का संबंध उस अनुरोध से कम और अभाव, तुलना और अपर्याप्तता से जुड़ी उन दबी हुई भावनाओं से ज़्यादा था जो पहले से ही उसके मन में मौजूद थीं। जो बात पहले व्यक्तिगत लग रही थी, वह बाद में समझ आ जाती है।
जैसे ही ऐसी स्थिति सामने आती है, अपनी आंकलन करने की प्रवृत्ति को पहचानना आसान हो जाता है। यह समझना सरल हो जाता है कि हमारा अनुभव कितनी जल्दी उन कहानियों से प्रभावित हो सकता है जो इस बारे में होती हैं कि किसी बात का हमारे लिए क्या अर्थ है या वह हमारे बारे में क्या कहती है। थोड़ा विराम लेने से, ध्यान वापस वर्तमान में आ जाता है - अपने शरीर, अपने कमरे और अपने संबंध पर। चिंतनशील अभ्यास इस वापसी में सहायक होता है और हमें अपनी संवेदनाओं के साथ बने रहने, विचारों को मात्र विचार ही समझने और प्रतिक्रिया देने की जल्दबाज़ी किए बिना भावनाओं को प्रवाहित होने देने का मार्ग प्रदान करता है।

विकासात्मक और लगाव संबंधी शोध लगातार यह दर्शाते हैं कि जब माता-पिता या देखभाल करने वाले बच्चों को संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देते हैं तब वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखते हैं। जब अभिभावक तनावपूर्ण क्षणों में भी उपस्थित और जुड़े रहते हैं तब बच्चों का तंत्रिका तंत्र संतुलन में लौटना सीखता है। समय के साथ, यह व्यवहार उसके अंदर समा जाता है और वह दृढ़ एवं भावनात्मक रूप से लचीला बन जाता है। सुरक्षित लगाव निरंतर सामंजस्य से नहीं बल्कि बार-बार सुधार के अनुभवों से बनता है।
अक्सर यहीं से परवरिश में अहिंसा की भावना विकसित होती है। बच्चे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जिन तरीकों को देखते और अपनाते हैं, उनके माध्यम से ही उनमें यह भावना विकसित होती है। जब मार्गदर्शन और सीमाएँ स्थिर रहती हैं तब भावनाओं को गंभीरता से लिए जाने के लिए उन्हें तीव्रता से व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बच्चे अपनी ज़रूरतों को व्यक्त करने के ऐसे तरीके सीखने लगते हैं जो डर पर कम और रिश्तों पर अधिक आधारित होते हैं।

विकासात्मक और लगाव संबंधी शोध लगातार यह दर्शाते हैं कि जब माता-पिता या देखभाल करने वाले बच्चों को संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देते हैं तब वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखते हैं। जब अभिभावक तनावपूर्ण क्षणों में भी उपस्थित और जुड़े रहते हैं तब बच्चों का तंत्रिका तंत्र संतुलन में लौटना सीखता है।
इस परिदृश्य में माता-पिता के लिए अपना खयाल रखना भी अत्यंत आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्हें भी तनाव, थकान और विरासत में मिले भावनात्मक स्वरूपों से जूझना पड़ता है। जब माता-पिता अपनी ही प्रतिक्रियाओं पर कठोरता से अपनी आलोचना करते हैं तब उनका तंत्रिका तंत्र सक्रिय बना रहता है, जिससे उनके लिए वर्तमान में उपस्थित रहना कठिन हो जाता है। अपने प्रति करुणापूर्ण बने रहने से भावनाओं पर नियंत्रण पाने में सहायता मिलती है क्योंकि तंत्रिका तंत्र तब शांत रहता है जब उसे सुधारे जाने के बजाय स्वीकार किया जाता है। यह शांति सीधे तौर पर माता-पिता की अपने बच्चे के लिए भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहने की क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।
दयालुता और देखभाल पर केंद्रित अभ्यास माता-पिता को अपनी बेचैनी में लंबे समय तक संभले रहने में मदद करते हैं ताकि उनकी फिर से चुनाव करने की क्षमता उभर सके। थकान, भय या निराशा पर कोमलता से ध्यान देने से ये भावनाएँ शर्म या बचाव की भावना में तब्दील हुए बिना आसानी से निकल जाती हैं। इससे आंतरिक संवाद बदल जाता है -
“मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ तो ज़रूर मुझमें ही कुछ गलत है,” के बजाय माता-पिता यह सोचने लगते हैं, “इस समय स्थिति ऐसी ही है और इसे ठीक करने या सही ठहराने की आवश्यकता के बिना मैं इसके साथ रह सकता हूँ।”
समय के साथ, इससे सुधार करने के लिए अधिक गुंजाइश बनने लगती है और बच्चे की भावनात्मक अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत रूप देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है।
इस बात को लेकर मेरी समझ विपश्यना अभ्यास से और गहरी हो गई। अप्रिय संवेदनाओं को सुलझाने या उनसे बचने की कोशिश किए बिना, उनके साथ वर्तमान में रहना सीखने से मुझे वह धैर्य मिला जो अब मेरे बच्चों की परवरिश में सहायक हो रहा है। इस धैर्य के कारण मैं भावनाओं से जुड़कर तुरंत अपने बारे में कहानी बनाए बिना उन्हें सुन पाती हूँ। इससे प्रतिक्रिया करने के बजाय प्रत्युत्तर देना और भावनात्मक तनाव के क्षणों के बाद जुड़ाव को पुनर्स्थापित करना आसान हो जाता है।
दयालुता और देखभाल पर केंद्रित अभ्यास माता-पिता को अपनी बेचैनी में लंबे समय तक संभले रहने में मदद करते हैं ताकि उनकी फिर से चुनाव करने की क्षमता उभर सके।
एक सरल बात मुझे हमेशा मार्गदर्शन देती है - कोई भी बात तब तक मेरे बारे में नहीं होती जब तब मैं स्वयं उसे अपना नहीं बना लेती। इस दृष्टिकोण से संतुलन बना रहता है। बच्चों की भावनाएँ योग्यता की कसौटी नहीं होतीं। वे विकास के संकेत और रिश्तों में मार्गदर्शन का आह्वान हैं। बेल हुक्स हमें याद दिलाती हैं कि प्रेमपूर्ण लालन-पालन में अभिभावक देखभाल की ज़िम्मेदारी के प्रति जवाबदेह बने रहते हुए नियंत्रण नहीं करते हैं (हुक्स, 2015)। जब परिवार में वयस्क लोग नियंत्रण रखे बिना अधिकार बनाए रखते हैं और बिना भावनात्मक रूप से बिखरे उपस्थित रहते हैं तब परिवार ऐसे स्थान बन जाते हैं जहाँ परवाह, सुधार और भावनात्मक ईमानदारी के माध्यम से शांति से अहिंसा को व्यवहार में लाया जाता है।
समय के साथ बच्चे माता-पिता की प्रतिक्रिया के सही होने से कम और उसके परिणाम से अधिक सीखने लगते हैं। जब माता-पिता वापस वर्तमान में मौजूद रह पाते हैं और साथ में अपना खयाल रख पाते हैं तब भावनात्मक आत्मीयता बनाए रखना आसान हो जाता है। बार-बार छोटे-छोटे सुधार करने और आपस में जुड़े रहने से परिवार में शांति का विकास होता है।
मेगन स्टीवर्ट के काम के बारे में अधिक जानने के लिए, www.mindfulnessmeghan.com पर जाएँ।
संदर्भ-
बेल हुक्स (2015). रेवोलुशनरी पेरेंटिंग। फ़ेमिनिस्ट थ्योरी - फ़्रॉम मार्जिन टू सेंटर में (3 rd ed., pp 133-147)। रूटलेज़। https://doi.org/10.4324/9781315743172-10
मेनाकेम, आर. (2017). माय ग्रैंड मदर’ज़ हैंड - रेशियलाइज़्ड ट्रॉमा एंड द पाथवे टू मेंडिंग अवर हार्ट्स एंड बॉडीज़। सेंट्रल रिकवरी प्रेस।
सैंट्रॉक, जे. डब्ल्यू. (2020). चाइल्ड डेवलपमेंट (2nd केनेडियन ed.). मैकग्रा हिल एजुकेशन.
सीगल, डी. जे. एंड ब्रायसन, टी. पी. (2012). द होल-ब्रेन चाइल्ड - 12 रिवोल्यूशनरी स्ट्रैटेजिज़ टू नर्चर योर चाइल्ड’ज़ डेवलपिंग माइंड। बैंटम बुक्स।
स्टीवर्ट, एम. (n d)। विपासना टेकअवेज़। माइंडफुलनेस मेगन https://www.mindfulnessmeghan.com/blog/vipassanatakeaways

