भुवरागसामी रतिनसबापति और अनंतनेनी श्रीनाथ फ़ाइकस (बरगद/अंजीर,आदि) पेड़ों की अदृश्य दुनिया के बारे में बताते हैं। ये महत्वपूर्ण पेड़ अपनी गुप्त कलियों, वफ़ादार ततैयों और अटूट उदारता के माध्यम से कान्हा के जंगलों को हर मौसम में जीवन प्रदान करते हैं।
फ़ाइकस — वन्य जीवन के मौन निर्माता जो कठिन समय में पूरे वन को भोजन देते हैं।
फ़ाइकस - वन्य जीवन का मुख्य आधार
कान्हा शांतिवनम् में अंजीर के पेड़ों (Ficus spp.) की 24 प्रजातियाँ पनप रही हैं जो पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र की प्रमुख आधार हैं। इन्हें अक्सर आधारभूत प्रजाति कहा जाता है क्योंकि ये अनेक प्रकार के जीव-जंतुओं जैसे पक्षियों, चमगादड़ों, तितलियों, कीटों, बंदरों इत्यादि को भोजन और आश्रय प्रदान करती हैं। अंजीर के पेड़ों की विशिष्टता है कि ये साल भर फल देते हैं जिससे कठोर मौसम में भी भोजन देकर ये वन्य-जीवन को सुरक्षित रखते हैं। इस प्रकार विविध प्रकार के जीव-जंतुओं को पोषित करके अंजीर के पेड़ पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं और कान्हा की जैव-विविधता को समृद्ध बनाते हैं।
अंजीर के पेड़ गर्मी आने से पहले फल क्यों देते हैं?
जब धरती सूखने लगती है तब अंजीर के पेड़ भोजन देना शुरू करते हैं। ये ठीक उसी समय फल देते हैं जब सूखा सबसे ज़्यादा होता है ताकि कोई भी प्राणी भूखा न रहे। गर्मी की तपिश से फलों का पकना और पेड़ से गिरना ज़्यादा तेज़ी से होने लगता है और इस संकेत से ठीक उसी समय पवित्र अंजीर ततैये वहाँ आने लगते हैं। इसके तुरंत बाद मानसून आता है और वन फिर से जी उठता है।
ऐसे फूल जिन्हें दुनिया देख नहीं सकती
अंजीर के पेड़ अपने फूल कभी बाहर नहीं दिखाते। इनके फूल भीतर की ओर खिलते हैं और साइकोनियम, जो सैकड़ों सूक्ष्म फूलों का एक गुप्त जगत है, के अंदर छिपे होते हैं। इन फूलों में केवल एक जीव प्रवेश कर सकता है - अंजीर ततैया, जो इसी एक पवित्र कार्य के लिए जन्म लेती है।
यह विकास के सबसे घनिष्ठ संबंधों में से एक है - एक अंजीर, एक ततैया, जो सदा के लिए एक-दूसरे से बंधे हैं।

अंजीर–ततैया सहजीवन - एक आदर्श साझेदारी
कान्हा में अंजीर की हर प्रजाति का अपना विशिष्ट परागण ततैया होता है जिससे परागण अत्यंत सटीक और प्रभावी होता है। यह चक्र इस प्रकार है -
- आयस्क से प्रवेश - मादा अंजीर ततैया आयस्क (Ostiole) नामक एक छोटे छिद्र से साइकोनियम में अपने साथ दूसरे अंजीर से लाया पराग लेकर प्रवेश करती है।
- परागण और अंडे देना - कुछ फूलों में अंडे रखते समय वह अनजाने में अन्य फूलों में भी परागण कर देती है।
- नई पीढ़ी का जन्म - नई पीढ़ी के ततैये अंजीर के भीतर ही पैदा होते हैं। नर ततैये पहले निकलते हैं, मादा ततैयों से वहीं संयोग करते हैं, फिर मादाएँ पराग लेकर बाहर निकलती हैं जो किसी दूसरे अंजीर के पेड़ पर जाकर उसी चक्र को दोहराती हैं।
- बीज निर्माण - जिन फूलों का ततैये उपयोग नहीं करते, वे बीज बन जाते हैं और इससे अंजीर के नए पेड़ उगते हैं।
जब धरती सूखने लगती है तब अंजीर के पेड़ भोजन देना शुरू करते हैं। ये ठीक उसी समय फल देते हैं जब सूखा सबसे ज़्यादा होता है ताकि कोई भी प्राणी भूखा न रहे।
कान्हा के अंजीर की प्रमुख बातें
बरगद (Ficus benghalensis)- गिरजाघर जैसे विशाल छत्र वाला पेड़ जो तोतों, ओरियलों , गिलहरियों और चमगादड़ों को भोजन देता है।
पीपल (Ficus religiosa)- यह निरंतर फल देता है, ऑक्सीजन देता है, सभी धर्मों में पूजनीय है।
गूलर (Ficus racemosa)- इसके फल सीधे तनों पर लगते हैं और यह नदी किनारे के वनों में पाया जाता है।
पिपली (Ficus amplissima)- यह फल-चमगादड़ों को प्रिय है और पुनर्वनीकरण के लिए आदर्श माना
°जाता है।
तिमला (एलीफैंट इयर फ़िग)(Ficus auriculata)- यह सबसे स्वादिष्ट अंजीरों में से एक है, जिनकी पत्तियाँ इतनी बड़ी हैं कि सपनों को भी छाया दे सकती हैं।
कृष्ण बढ़ (Ficus krishnae)- यह पौराणिक और पवित्र है तथा माखन-कटोरी की किंवदंती से जुड़ा है।
अधिकांश अंजीर के फल खाने योग्य होते हैं और वन्यजीवों व मनुष्यों दोनों का पोषण करते हैं। उनके स्वाद और स्वास्थ्य संबंधी फ़ायदों के कारण लोग इन्हें बहुत महत्व देते हैं। ये मीठे या हल्के खट्टे हो सकते हैं और अनेक व्यंजनों में ताज़े या सुखाकर खाए जाते हैं। सामान्य अंजीर (Ficus carica), पीपल और बरगद जैसे पेड़ उपयोगी फल देते हैं। अपनी विविधता के कारण अंजीर उष्ण और उपोष्ण वनों में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं जहाँ मनुष्य एवं वन्य जीव, दोनों इन्हें खाते हैं।
अंजीर के पौधे मंदिरों की दीवारों, खंडहरों और निर्जन तीर्थों पर उग आते हैं। जहाँ मनुष्य परित्याग कर देता है, वहाँ अंजीर फिर से आरंभ करता है।
बीज जो कल्पना से भी दूर जाते हैं
पक्षी, चमगादड़, बंदर। वे अंजीर को साथ ले जाते हैं और बीजों को फैलाते हैं, जिससे नए पेड़ उगते हैं और जंगलों का अस्तित्व बना रहता है। इसीलिए अंजीर के पौधे मंदिरों की दीवारों, खंडहरों और निर्जन तीर्थों पर उग आते हैं। जहाँ मनुष्य परित्याग कर देता है, वहाँ अंजीर फिर से आरंभ करता है।
पवित्र, उपचारक, कालातीत
- बोधि वृक्ष - बुद्ध का ज्ञानोदय।
- पीपल - ऋषियों का पवित्र ध्यान स्थल।
- बरगद - शाश्वत जीवन का प्रतीक।
- कृष्ण माखन कटोरी - कृष्ण की कृपा का सार।
फ़ाइकस को आयुर्वेद, लोककथाओं में सम्मान दिया जाता है और इसे शांति का प्रतीक समझा जाता है। कई साधक बताते हैं कि इसके नीचे बैठने पर वे जीवंत शांति का अनुभव करते हैं।

