परिधि सिंह एक वकील और स्वतंत्र लेखिका हैं जो लंदन में रहती हैं। वे हमें अपने उस समय के बारे में बता रही हैं जब वे वर्षों तक अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करते-करते बुरी तरह से थक गई थीं जिसके कारण वे थोड़ा रुकीं और फिर उन्हें एक अप्रत्याशित स्थान पर नया दृष्टिकोण मिला।

असफलताएँ और नाकामयाबियाँ जीवन का सामान्य हिस्सा हैं। लेकिन जब आप जीवन के हर काम को नियमानुसार, छोटी से छोटी चीज़ को ध्यान में रखते हुए करते हैं और फिर भी खुद को कहीं खोया हुआ पाते हैं तब क्या होता है?

इस वर्ष के आरंभ में मैं कुछ ऐसी ही स्थिति में थी। मैं अपने मानवाधिकार-वकील बनने की एक शानदार व लंबी यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। यह यात्रा तब शुरू हुई जब मैं भारत में एक स्कूल में पढ़ती थी और लगभग एक दशक के बाद इंग्लैंड में समाप्त हुई।

भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के एक छोटे से शहर में मैं सुरक्षित जीवन जी रही थी। यहाँ के माहौल में भरपूर प्यार और प्रकृति से निकटता थी। साथ ही मैं वहाँ के परे की दुनिया से अनभिज्ञ आनंदपूर्ण जीवन जी रही थी। जब मैं और मेरा भाई बड़े होने लगे, हमें अपनी उच्चतर शिक्षा के बारे में फ़िक्र होने लगी। तब मेरे माता-पिता ने हमें भारत की राजधानी दिल्ली में पढ़ने के लिए भेज दिया। अगर मैं यह कहूँ कि अपनी उस किशोर उम्र में दिल्ली ने हमें स्तब्ध कर दिया था तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ की जनसंख्या, विविधता, प्रदूषण, गरीबी और विशालता ने हमें अभिभूत कर दिया था।

बड़े शहर के जीवन के साथ समायोजन और तालमेल बैठाना सरल नहीं था, खासकर स्कूल में। यहाँ सभी विद्यार्थी धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में बोलते थे और इसके बगैर उस माहौल में रहना संभव नहीं था। मैं सोच में पड़ गई कि उसी परिवेश, उम्र, स्तर और पृष्ठभूमि से होने के बाद भी जब मैं उन सबसे जुड़ नहीं पा रही हूँ सिर्फ़ इसलिए कि मुझे अंग्रेज़ी बोलनी नहीं आती और क्योंकि मैं उनकी तरह बड़े शहर की लड़की नहीं हूँ, तो जो बच्चे वास्तव में ही अलग होते हैं उनका जीवन किस तरह का होता होगा? जैसे जो दिव्यांग बच्चे हैं या वे जिन्हें कभी शहर के किसी अच्छे स्कूल में जाने का अवसर नहीं मिल पाता है।

एक चिंगारी 

मानवाधिकार सुरक्षा एक ऐसा पेशा है जिसमें आप समाज के सबसे कमज़ोर लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करके और उन्हें उनके अधिकार दिलाकर सशक्त बना सकते हैं। मेरी माँ के एक मित्र वकील थे। उन्होंने इस पेशे के बारे में मुझे बताया था और यह बात तत्काल मेरे मन में बस गई थी। मैं तब नहीं जानती थी कि यह चिंगारी एक आग बनकर मेरे जीवन के आने वाले पूरे दशक में मेरे ध्यान का केंद्र बन जाएगी और मेरी संपूर्ण ऊर्जा इसमें लग जाएगी। 

मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, स्कूल में अच्छे अंक हासिल किए और अपनी अंग्रेज़ी सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हुई। इसमें मैं सफल भी हुई और भारत में कानूनी पढ़ाई के शीर्ष स्कूलों में से एक में मैंने प्रवेश प्राप्त किया। विश्वविद्यालय में अपनी स्नातक की पढ़ाई में मैंने और अधिक मेहनत की। मेरा लक्ष्य स्पष्ट और सरल था - किसी विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय में मानवाधिकार या अंतर्राष्ट्रीय कानून का अध्ययन करना और इस क्षेत्र में एक अच्छी नौकरी पाना।

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मुझे मेरे शिक्षकों, परिवार और दोस्तों से बहुत सहयोग मिला। उन्होंने हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। अपनी स्नातक की पढ़ाई के आरंभ में ही मैंने संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) में इंटर्नशिप करने का पक्का इरादा बना लिया था और, पढ़ाई के अपने पहले ही वर्ष में लगभग सौ आवेदन-पत्र भेजने के बाद, अंतत: मैंने इसे हासिल कर ही लिया। मेरी पहली इंटर्नशिप श्रीलंका के कोलंबो में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) में हुई थी। और इस तरह 19 साल की छोटी उम्र में ही मैं विदेश में रहने और काम करने चली गई। वह अनुभव मेरे लिए परिवर्तनकारी था और उससे मेरे इस संकल्प को और अधिक बल मिला कि वास्तव में यही मार्ग मेरे लिए सही है।

मैं जानती थी कि स्नातकोत्तर के शीर्ष लॉ स्कूल में प्रवेश पाने के लिए केवल अच्छे अंक पाने से काम नहीं चलेगा। इसलिए मैंने वाद-विवाद की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेना शुरू किया। मैंने कई देशों की यात्रा की, वहाँ काम किया और कई वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया। मैंने अतिरिक्त विषयों की भी पढ़ाई की और पाठ्यक्रम का ज़्यादा से ज़्यादा कार्य किया ताकि मैं खुद को दूसरों से अलग दिखा पाऊँ। मेरे लिए यह बहुत ज़्यादा काम था लेकिन यह सब करने के दौरान मुझे कुछ अद्भुत अनुभव भी हुए और दुनियाभर में मेरे ऐसे दोस्त बने जिनके मेरे जीवन में होने पर आज भी मुझे गर्व होता है। बाद में मास्टर्स डिग्री (स्नातकोत्तर उपाधि) के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय में मेरा चयन हुआ जो मेरे जैसे सामान्य पृष्ठभूमि के किसी व्यक्ति के लिए एक अकल्पनीय उपलब्धि थी।

एक दरार 

कैम्ब्रिज में प्रवेश पाने की हैरानी कम होने के बाद मैं बहुत थकी हुई और अंदर से बिलकुल खाली महसूस करने लगी। पाँच साल की स्नातक की पढ़ाई के दौरान मैंने बमुश्किल ही कोई अवकाश लिया था और यह एहसास मुझे बहुत ही ज़बरदस्त तरीके से हुआ। मुझे लगा जैसे मैं अपनी हड्डियाँ भी नहीं हिला पा रही हूँ। अपने भीतर का खालीपन मुझे भयावह लगने लगा था। मैंने अपनी माँ से बात करते हुए उनके सामने इसे स्वीकार भी किया। तब उन्होंने सौम्य और ‘मैं समझती हूँ’ वाली दृष्टि से मुझे देखकर कहा, “मुझे लगता है कि तुमको हार्टफुलनेस ध्यान आज़माना चाहिए।”

मैं उनके सुझाव पर चकित थी। मेरे परिवार में मेरे मामा एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो सक्रिय रूप से ध्यान करते हैं। मेरे माता-पिता वास्तव में स्वयं ध्यान नहीं करते और इससे पहले उन्होंने कभी मुझसे इसे करने के लिए कहा भी नहीं था। लेकिन मैंने माँ की बात मान ली और आज मैं इस बात के लिए बहुत आभारी हूँ कि मैंने उनकी बात मानी।

मेरे कैम्ब्रिज जाने के कुछ ही समय बाद मुझे एक संदेश मिला कि एक हार्टफुलनेस प्रशिक्षक ने कैम्ब्रिज में सप्ताह में एक बार आध्यात्मिक सेवा देनी शुरू की है। हर गुरुवार की सुबह मैं साइकिल से स्थानीय सामुदायिक केंद्र में जाने लगी और निश्चित समय पर वहाँ उनके साथ अपने साप्ताहिक ध्यान सत्र करने लगी।

वहाँ के प्रशिक्षक आज भी मेरे प्रशिक्षक हैं। वे एक समझदार और दयालु व्यक्ति हैं। जैसे-जैसे उनके साथ मेरे संबंध प्रगाढ़ होते गए वैसे-वैसे मेरा ध्यान का अभ्यास भी गहन होता गया। मेरे लिए चीज़ें पहले से बहुत बेहतर हो गईं। इससे मानवाधिकार के क्षेत्र में व्यावसायिक रूप से आगे बढ़ने की ललक तो कम नहीं हुई लेकिन आध्यात्मिकता के लिए भी मेरे भीतर एक और लौ जल उठी। कैंब्रिज में बिताए गए उस वर्ष को मैं हमेशा बड़े प्यार से स्मरण करती हूँ क्योंकि अंततः मुझे कड़ी मेहनत करने और जीवन का आनंद लेने के बीच संतुलन महसूस होने लगा था।

लेकिन कानून के क्षेत्र में काम करने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। उसके लिए जितना कुछ करना होता है उसकी तुलना में जो मैं कर रही थी, वह बहुत कम था। जब मुझे कैम्ब्रिज से स्नातक की उपाधि मिल गई तो मानवाधिकार के क्षेत्र में प्रवेश के लिए मेरे शिक्षकों और अन्य सलाहकारों ने मुझे इंग्लैंड में एक वकील के रूप में काम करके इसके लिए योग्यता प्राप्त करने की सलाह दी। इसका मतलब था, कानून में स्नातकोत्तर की दो और डिग्रियाँ लेना और लंदन में कानून की एक अच्छी व्यावसायिक कंपनी में दो साल तक काम करना।

मुझे लंदन की शीर्ष दो कानून कंपनियों में से एक में काम मिल गया। अगले चार साल कठिन थे। मैं हर रोज़ काफ़ी देर तक काम करती, यहाँ तक कि सप्ताहांत और अन्य दिवसों के बीच मेरे लिए कोई अंतर नहीं रहा। और मुझे हमेशा ऐसा लगता रहता कि आराम करने के लिए मुझे पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है।

लेकिन मुझे यह भी पता था कि मैंने कौन सी राह चुनी है। लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान मैं अपने दिन के समय का बहुत अच्छा नियोजन कर पाती थी हालाँकि यहाँ की कार्य संस्कृति में ‘नहीं’ कहने का विकल्प नहीं था। यहाँ वास्तव में किसी काम के लिए ‘न’ कहने को अक्सर कार्य के प्रति उत्साह की कमी के रूप में देखा जाता था।

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मैं हर रोज़ काफ़ी देर तक काम करती, यहाँ तक कि सप्ताहांत और अन्य दिवसों के बीच मेरे लिए कोई 
अंतर नहीं रहा। और मुझे हमेशा ऐसा लगता रहता कि आराम करने के लिए मुझे पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है।


इस सबका मेरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। लेकिन इसके कारण कुछ अच्छी चीज़ें भी हुईं जैसे मुझे अच्छा वेतन मिलने लगा और मेरी इतनी हैसियत हो गई कि मैं अपने परिवार के साथ कहीं भी छुट्टियाँ बिता सकती थी। मैंने अपने पहले घर के लिए अग्रिम राशि भी जमा की। लेकिन मैं मुश्किल से ही अपने परिवार के साथ समय बिता पाती थी। हालाँकि मैं एक वकील के रूप में कार्य करने की योग्यता प्राप्त कर चुकी थी लेकिन फिर भी मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या यही वह मुकाम है जिसे पाने के लिए मैं इतने बरसों से तैयारी कर रही थी।

और अब

पिछले साल मैं कान्हा शांतिवनम् गई और हार्टफुलनेस के वैश्विक मार्गदर्शक दाजी से बात की। उन्होंने जो बातें बताईं उनमें से एक यह थी कि जब हम सोचते हैं कि संसार में बहुत आर्थिक लाभ या भौतिक उपलब्धि है तब हम अपना बलिदान करने लगते हैं।

यह सुनकर मुझे बहुत बड़ा एहसास हुआ। मुझे अब तक समझ ही नहीं आया था कि मैंने अनजाने में यही किया था। अपने जीवन में व्यवसाय को सबसे ज़्यादा वरीयता दी और उसके लिए बाकी सबकुछ त्याग दिया था। यह सब मैंने अपने एक सपने को साकार करने के लिए किया था।

शुरू में इस एहसास ने मुझे बहुत विचलित कर दिया था लेकिन फिर बाद में मुझे बहुत राहत मिली और चैन मिला। ऐसा लगा जैसे अंततः मैं आत्मा के शांत बहाव के साथ किसी किनारे पर आ पहुँची हूँ। मेरी समझ में आ गया था कि हमारी श्रेष्ठ इच्छाएँ भी हमारी ऊर्जा को पूरी तरह से खर्च कर सकती हैं और हमें अपने हृदय में मौजूद उस वास्तविक शांति के अनुभव से वंचित कर सकती हैं जो हमें अपनी पूर्णता का बोध कराती है और बाह्य उपलब्धियों और सम्मान पर निर्भर नहीं करती। 

एक लंबे अंतराल के बाद मैंने अपने आप में वास्तविक शांति महसूस की। मैंने तय किया कि अब मैं इस शांति को संसार की किसी भी चीज़ के लिए बलिदान नहीं करूँगी। शायद इस समझ तक पहुँचने के लिए मुझे इस यात्रा से गुज़रना था। जो कुछ मैंने खो दिया है शायद उसे फिर से पाना संभव नहीं है लेकिन यह भी ठीक ही है। मैं आभारी हूँ कि मुझे इस बात का एहसास हो चुका है जब मेरे जीवन का ज़्यादातर हिस्सा अभी मेरे सामने है। मैं इस अद्भुत यात्रा के लिए भी आभारी हूँ जिसे जीने और अनुभव करने का अवसर बहुत कम लोगों को मिल पाता है।

अब मैं यह तय करने की कोशिश कर रही हूँ कि मुझे आगे कहाँ जाना चाहिए। मैं अभी भी मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्य करना चाहती हूँ लेकिन इस बार मैं अपने दिल को ज़्यादा महत्व दे रही हूँ। मैंने अपनी योग्यता प्राप्त कर ली है इसलिए मैंने वह लॉ फ़र्म छोड़ दी है जिसके लिए मैं काम कर रही थी। फ़िलहाल मैं स्वतंत्र लेखन, योग शिक्षण और स्वयंसेवी के रूप में मानवाधिकार संबंधी कार्य कर रही हूँ। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं वर्तमान में रहने का प्रयास कर रही हूँ – अपना जीवन जीना, पहले से सब कुछ योजनाबद्ध करने की कोशिश न करना और भविष्य के लिए वर्तमान का सौदा नहीं करना आदि। मैं इस हृदयपूर्ण जीवन शैली की ज्योति को अपने जीवन में जलाए रखना चाहती हूँ। यह लौ सर्द रातों में मुझे गरमाहट देगी और कभी जलायगी नहीं यानी मुझे परेशानियों में भी आराम देगी और कभी नुकसान नहीं पहुँचाएगी।

कोई भी जो ऐसी परिस्थिति से गुज़रा है और जिसने वह सब कुछ किया जो उसे करने के लिए कहा गया था और पारंपरिक अर्थों में सफलता हासिल की है और फिर भी अपनी इस मीलों लंबी यात्रा के अंत में थकावट महसूस कर रहा है तो वह दिल छोटा न करे। यह ठीक न होना भी ठीक ही है। दुनिया की हमारे प्रति कोई देनदारी नहीं होती लेकिन अपने खुद के प्रति हमारी इतनी देनदारी ज़रूर है कि हम किसी बाहरी या क्षणभंगुर चीज़ के लिए अपने शरीर, हृदय, मन और आत्मा का बलिदान न करें।

इसके अलावा आप जहाँ हैं वहाँ रहकर भी अगर अधूरापन महसूस कर रहे हैं तो जैसा कहा जाता है, “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।” 

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दुनिया की हमारे प्रति कोई देनदारी नहीं होती लेकिन अपने खुद के प्रति हमारी इतनी देनदारी ज़रूर है 
कि हम किसी बाहरी या क्षणभंगुर चीज़ के लिए अपने शरीर, हृदय, मन और आत्मा का बलिदान न करें।


 


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परिधि सिंह

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परिधि पेशे से एक वकील हैं, स्वतंत्र लेखिका तथा हार्टफुलनेस योग एवं ध्यान की प्रशिक्षिका हैं। वे लंदन में रहती हैं।

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