माननीया पेट्रिशिया स्कॉटलैंड के.सी. राष्ट्रमंडल की महासचिव हैं। कान्हा शांतिवनम् में आयोजित वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव पर उन्होंने एक-दूसरे के साथ व पर्यावरण के साथ शांति स्थापित करने के लिए सहयोग देने में हमारी भूमिका के बारे में बात की।
यह बड़े सम्मान की बात है कि हमें इतिहास के इस महत्वपूर्ण और बुनियादी क्षण का सहभागी होने का अवसर मिला है। इस आयोजन की महत्ता को आसानी से कम आँका जा सकता है। वस्तुतः दाजी द्वारा संसार के इतने सारे संत महात्माओं और अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के लोगों को इस आध्यात्मिक माहौल में एक साथ लाना हम सबके लिए उत्सव मनाने की बात व अवसर है।
कुछ लोगों ने मुझसे पूछा, “महासचिव महोदया, आप यहाँ क्यों आई हैं? इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि राष्ट्रमंडल देशों में 250 करोड़ लोग रहते हैं जिनमें से तीस प्रतिशत की उम्र तीस वर्ष से कम है। उनमें से 150 करोड़ यहाँ भारत में रहते हैं। आपकी महासचिव के रूप में मेरा पुनीत कर्तव्य है कि मैं शांति बनाए रखने, उसे बढ़ाने, उसे विकसित करने और उसके लिए प्रोत्साहन देने में मदद करूँ।
आज के समय में शांति बहुत संकटग्रस्त है, बहुत मूल्यवान व बहुत आवश्यक है। सच तो यह है कि अगर हम एक शांतिपूर्ण संसार चाहते हैं तो हमें इसकी शुरुआत अपने आप से, हम में से प्रत्येक से करनी होगी क्योंकि हम ही इसके निर्णायक हैं। जैसा दाजी ने सुबह बताया कि जब हम शांति के बारे में बात करते हैं तो इसका मतलब सहनशीलता नहीं होता बल्कि परस्पर सम्मान, स्वीकार्यता और प्रेम होता है। इस आखिरी शब्द को आजकल हम टाल देते हैं और यह सबसे मूल्यवान है ।
हमें एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए। हर मत का सार प्रेम है। लेकिन यहाँ हमने कुछ और भी सुना है। हरेक मनुष्य मेरा भाई या बहन है। ऐसा क्यों है? सारे वैज्ञानिक मानते हैं कि संपूर्ण मानवता का जन्म छ: व्यक्तियों से हुआ है। इसलिए त्वचा के रंग, कदकाठी आदि के आधार पर भ्रमित क्यों होना चाहिए? 99.90% हमारे डीएनए समान हैं जिसका मतलब है कि चाहे हम इसे पसंद करें या न करें, हम सच में भाई-बहन हैं।
हम सभी कुछ चुनौतियों का सामना करते हैं। वैश्विक व्यवस्थाओं में फैले संकटों की उलझनों में हमारा संसार बंधा हुआ है। हम विवादों का सामना कर रहे हैं – ऐसे विवाद जो राजनैतिक मतभेदों,आर्थिक असमानताओं, धार्मिक विभेदों, सामाजिक अन्याय और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों के कारण हैं। अपने आस-पास जब मैं देखती हूँ तो मुझे वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव नज़र आता है लेकिन यह बच्चों में, युवाओं में, प्रकृति में और स्वास्थ्य में कैसे अभिव्यक्त हो रहा है। इसे और गहन किए जाने की आवश्यकता है।
ये विवाद, जो राजनैतिक मतभेदों, आर्थिक असमानताओं और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों के कारण हैं, कई तरीकों से प्रकट होते हैं - हमें छिन्न-भिन्न करने वाले सशस्त्र युद्धों से लेकर ऐसे सामाजिक तनावों में जिनसे विभिन्न समुदायों के विभाजित होने का खतरा पैदा हो जाता है।
हालाँकि हर विवाद का कारण उस स्थान विशेष से संबंधित होता है लेकिन हम सब उनके दुखद प्रभाव देखते और अनुभव करते हैं। धार्मिक और राजनैतिक नेताओं के रूप में और ज़िम्मेदार नागरिकों के तौर पर यह हमारा कर्तव्य है कि हम इनका समाधान खोजें, शांति स्थापित करने की कोशिश करें और परस्पर समझ व सहयोग के सेतुओं का निर्माण करें। इसका प्रारंभ हममें से हरेक से होता है। न्यायपूर्ण, वास्तविक और स्थाई शांति केवल बाह्य साधनों से प्राप्त नहीं की जा सकती; इसे हमारे भीतर से उभरना चाहिए।

यदि हमारे अंदर ही शांति नहीं है तो हम अपने परिवारों में शांति कैसे रख सकते हैं? हम अपने समाज में शांति कैसे स्थापित कर सकते हैं? अपने प्रदेश में शांति कैसे स्थापित कर सकते हैं? और हम अपने संसार में शांति कैसे स्थापित कर सकते हैं? हमारा संसार मूल्यवान है और यह हमारे जीवन मूल्यों के अनुसार ही बना है।
सिर्फ़ विवाद और कष्ट का न होना आंतरिक शांति नहीं है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसके गुण समरसता, स्पष्टता और समानता होते हैं। यह वह आधार है जिस पर हम करुणा, समानुभूति और दूसरों के प्रति अपनी समझ विकसित करते हैं। जब हम अपने आप में शांत होते हैं तब हम संसार की जटिलताओं से अपने ज्ञान और विवेक का प्रयोग कर बेहतर तरीके से निपट सकते हैं। आंतरिक शांति का यह गुण बहुत शक्तिशाली और संक्रामक है। जब हम अपने विचारों, वचनों और कर्मों में शांति को सम्मिलित करते हैं तब हम दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करते हैं। हम सकारात्मकता की ऐसी लहरें पैदा करते हैं जिनमें सभी सीमाओं को पार करके मानवता को सामंजस्य व सहजीविता के साझा उद्देश्य के लिए एक करने की शक्ति है।
हमारा राष्ट्रमंडल, जिसका भारत एक महत्वपूर्ण सदस्य है, वास्तव में उस शांति का प्रसार करने के लिए शक्तिशाली माध्यम है। आपके पास विश्व की एक तिहाई जनसंख्या की प्रतिभा और कल्पनाशक्ति है। आपकी जटिलता, आपकी विविधता हमारी शक्ति है। हमारी साझी मानवता में विचारों, संस्कृतियों, परंपराओं और अनुभवों की अमूल्य विविधता है। और हम जानते हैं कि एक-दूसरे को सुनकर हम अपनी कई समस्याओं के समाधान खोज सकते हैं।
मतभेद और कभी-कभार हुई ऐतिहासिक समस्याओं के बावजूद हमारे सभी देश आज के समय में बराबरी में एकसाथ बैठते हैं - अपने मिले-जुले अनोखे और स्थाई समान जीवन मूल्यों के साथ। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि जब हम अपनी भूमिका पर चिंतन करें तब हम समझें कि हममें से हरेक महत्वपूर्ण है। यदि हम चाहें तो हमारे पास प्रेम और जोश, जो हमें आपस में बाँधते हैं, को दूसरों के साथ साझा करके अपनी दुनिया को बदलने की शक्ति है।
जब हम अपने विचारों, वचनों और कर्मों में शांति को सम्मिलित करते हैं तब हम दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करते हैं। हम सकारात्मकता की ऐसी लहरें पैदा करते हैं जिनमें सभी सीमाओं को पार करके मानवता को सामंजस्य व सहजीविता के साझा उद्देश्य के लिए एक करने की शक्ति है। |
हमने विभिन्न मार्गों के बारे में बात की है और जब मैं कई लोगों को सुन रही थी तब मुझे जॉन के गोस्पेल में लिखी हुई बात का स्मरण हो आया। ईसा मसीह ने कहा था, “मेरे पिता के निवास में कई भवन हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं तुम्हें बता देता। और मैं तुम्हारे लिए एक जगह तैयार करता हूँ।” वह स्थान पृथ्वी पर मौजूद हरेक मनुष्य के लिए है और हम सबका एक ही ईश्वर है।
जब मैं कहीं यात्रा पर जाती हूँ तो मेरी माँ मुझे आशीर्वाद देती हैं। उसी आशीर्वाद के साथ मैं बात खत्म करती हूँ। हम सब अपने इस संसार में शांति लाने की यात्रा पर हैं। मेरी माँ कहती हैं, “ईश्वर तुम पर कृपा करे और तुम्हारी रक्षा करे। उनकी कृपापूर्ण दृष्टि तुम पर तुम्हारे जीवन के हर दिन बनी रहे। तुम्हारा रक्षक फरिश्ता सदा तुम्हारे साथ चलता रहे और ईश्वर तुम्हें हर तरह से सुरक्षित रखे।”

पेट्रिशिया स्कॉटलैंड
राष्ट्रमंडल की महासचिव नियुक्त होने वाली पहली महिला के रूप में, पेट्रिशिया ने अपने व्यावसायिक जीवन में कई चीजें ऐसी कीं जो दुनिया में पहली बार हुईं। वे राष्ट्रमंडल के 56 देशों को जल... और पढ़ें
