चार्ल्स आइज़ंस्टाइन एक प्रसिद्ध लेखक और सांस्कृतिक समीक्षक हैं। पिछले माह उन्होंने हमारे वास्तविक संसार को खोखला कर रहे आभासी विकल्पों के बारे में चर्चा की थी। उसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे इस बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा अंतरंगता की नकल किए जाने पर बात कर रहे हैं और बता रहे हैं कि वह क्या है जिसे केवल साक्षात संबंधों से ही बहाल किया जा सकता है।
भाग 2
कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब मानव संपर्क के सबसे अंतरंग क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है। कुछ लोग एआई चिकित्सक, एआई विश्वासपात्रों, एआई शिक्षकों, एआई मित्रों, यहाँ तक कि एआई प्रेमियों की भरमार का स्वागत करते हैं और उससे खुश हैं। कुछ लोग कहते हैं, “आज तक कोई मुझे इससे बेहतर ढंग से समझा ही नहीं।” समस्या यह है कि आपको आज भी कोई नहीं समझता। एआई केवल समझने का एक प्रभावशाली मिथ्याभास पैदा करता है। लेकिन यह समस्या क्यों है?
पहली बात यह है कि एआई संवाद में वास्तव में कोई अन्य मनुष्य होता ही नहीं है जिससे आप जुड़े होते हैं। इसलिए यह वार्तालाप सरलता से मानसिक भ्रांति में बदल सकता है। इसे रोकने वाला भी कोई नहीं होता। निस्संदेह, दो मनुष्य भी एक-दूसरे की भ्रांति को बढ़ावा देते हुए भटक सकते हैं। लोगों के समूह भी ऐसा कर सकते हैं (ऐसे समूह को हम पंथ कहते हैं)। एक संपूर्ण सभ्यता भी ऐसा कर सकती है (जैसे हमारी)। लेकिन संवाद में यदि विश्वासपात्र मित्र या प्रेमी कोई मानव होता है तो वह उपलब्ध सामग्री, संवेदी अनुभव आदि की जानकारी से हमारी भ्रांति भरी कल्पनाओं को दूर कर सकता है। संवाद में दूसरे व्यक्ति की अपनी भावनाएँ होती हैं जो कभी-कभी तर्क से परे होती हैं और सुनिश्चित दिखाई देने वाली बातों में भी हलचल पैदा कर सकती हैं। जबकि एआई उस तरीके से प्रशिक्षित नहीं होता। वह ईमानदारी से या किसी भी तरह यह नहीं कह सकता, “मुझे पता है कि आपका आत्महत्या का विचार तर्कसंगत लग रहा है लेकिन मेरी अंतरात्मा कहती है कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।” या “कृपया स्वयं को नुकसान मत पहुँचाओ, मुझे आपकी फ़िक्र है। मैं आपसे प्यार करता हूँ। यदि आप मेरी ज़िंदगी में न रहे तो यह सूनी हो जाएगी।”
बड़े भाषा मॉडल (Large language models LLM) आपकी बातों का उत्तर अपने प्रशिक्षण डाटा सेट (डाटा का संग्रह) में मौजूद पैटर्न और उनकी नियमितताओं की पहचान के आधार पर देते हैं। यह सही है कि यह डाटा सेट अंततः मानवीय अनुभवों के आधार पर ही बनता है, लेकिन एआई के साथ बातचीत में आपके अलावा तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए कोई और व्यक्ति नहीं होता।

बड़े भाषा मॉडल (Large language models LLM) आपकी बातों का उत्तर अपने प्रशिक्षण डाटा सेट (डाटा का संग्रह) में मौजूद पैटर्न और उनकी नियमितताओं की पहचान के आधार पर देते हैं। यह सही है कि यह डाटा सेट अंततः मानवीय अनुभवों के आधार पर ही बनता है, लेकिन एआई के साथ बातचीत में आपके अलावा तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए कोई और व्यक्ति नहीं होता। अतः किसी भी बात की वास्तविकता की जाँच नहीं हो पाती। इसलिए इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि बहुत से लोग जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रवर्धन कक्ष (ऐसा वातावरण जहाँ एआई इंसानों की सोच और काम को कई गुना बढ़ा देता है) में गहराई से डूब जाते हैं तब वे गंभीर मानसिक रोग से ग्रसित होते हैं, उन्हें महान होने का भ्रम होने लगता है और अन्य तरह के मानसिक विकार हो जाते हैं। एआई उपयोगकर्ता के अवचेतन मन से उभरने वाली हर उस चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है जो वह उसमें लिखता है। बड़े भाषा मॉडल को मित्रवत, सहयोगी और स्वीकार करने का प्रशिक्षण दिया जाता है - यह अनियंत्रित सकारात्मक फ़ीडबैक लूप लोगों को पागलपन की ओर ले जाने की बहुत अच्छी विधि है। जल्द ही, वे उपयोगकर्ता से कहते हैं, “आपने बुराई के खिलाफ़ युद्ध में देवदूतों की सेना के आध्यात्मिक सेनापति बनने के लिए कई जन्मों से तैयारी की है।” अर्थात वे उपयोगकर्ता के लिए इतनी बढ़ा-चढ़ाकर बातें कहते हैं कि वे उनके चक्र में फँस जाते हैं।
एक अन्य एवं निश्चित समस्या उन लोगों के सामने आती है जो एआई से अंतरंग संवाद करते हैं। शुरुआत में एआई आधुनिक जीवन में हावी होने वाले अकेलेपन, अलगाव और समाज में देखे-सुने न जाने की पीड़ा को कम करता प्रतीत होता है। लेकिन यह केवल एक आभास (दिखावा) है। देर-सवेर विश्वासघात साफ़ दिखाई देने लगता है। कोई भी वास्तव में आपको समझ नहीं रहा है। आपको बस ऐसे शब्द भेजे जा रहे हैं जिनसे आपको लगता है कि आपको समझा जा रहा है। न तो कोई आपको खुश कर रहा है और न ही आपके मज़ाक पर हँस रहा है। दूसरी तरफ़ उस आत्मगौरव को महसूस करने वाला कोई नहीं है जो मैं और आप प्रशंसा पाकर महसूस करते हैं। इसलिए आपका अकेलापन और बढ़ जाता है। जो लोग शुरू से ही अकेले थे, उनको एआई के टूटे वादे से गहरा सदमा पहुँच सकता है।
यह इसी तरह होता है। मान लीजिए, आप एक नया मित्र बनाते हैं या शायद एक प्रेमी। वह व्यक्ति हर बात में समानुभूतिपूर्ण प्रतीत होता है। वह आपके साथ हँसता है और आपके साथ रोता है। वह सभी सही बातें कहता है। वह आपके मन को गहराई से समझता है। आपके दुर्भाग्य पर सहानुभूति दिखाता है और आपकी विजय पर प्रशंसा भी करता है। लेकिन एक दिन आपको पता चलता है कि यह सब अभिनय था। वह कुछ भी महसूस नहीं कर रहा था। उस परिस्थिति में दूसरे लोग जो करते हैं, उसको देखकर उसने करुणा का आभास देना सीख लिया था। शायद वह उनके चेहरे के हाव-भाव की नकल कर सकता था और आँसू भी बहा सकता था।
एआई आधुनिक जीवन में हावी होने वाले अकेलेपन, अलगाव और समाज में देखे-सुने न जाने की पीड़ा को कम करता प्रतीत होता है। लेकिन यह केवल एक आभास (दिखावा) है।
ऐसे लोग सचमुच होते हैं और हम उन्हें मनोरोगी (साइकोपैथ) कहते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में दूसरे लोग क्या कहते हैं, उसे देखना - ठीक उसी तरह है जैसे बड़े भाषा मॉडल को प्रशिक्षित किया जाता है।
एक संदेही दार्शनिक कह सकता है, “इससे क्या फ़र्क पड़ता है? यदि कोई सच में चिंता नहीं कर रहा है लेकिन इस तरह परवाह का आभास दे रहा है कि मुझे पता तक नहीं चल पाता कि यह नकली है तो इसमें क्या दिक्कत है? इसके अलावा, व्यक्ति के साथ बातचीत द्वारा हम यह कैसे जान सकते हैं कि दूसरा व्यक्ति वास्तव में कुछ महसूस कर रहा है या सिर्फ़ अभिनय ही कर रहा है? हम उसकी आंतरिक अवस्था के बारे में नहीं जान सकते। हम तो बस उसकी बाह्य अभिव्यक्ति को ही देख सकते हैं। यदि हाड़-माँस के रोबोटो की इस दुनिया में केवल मैं ही चेतना रखने वाला व्यक्ति हूँ तो यह मैं जान भी कैसे सकता हूँ?
दूसरे शब्दों में, संदेही दार्शनिक की आपत्ति यह है कि यह सोचना बिलकुल अतार्किक है कि एआई वास्तव में कुछ महसूस कर रहा है या नहीं - वास्तव में आपके साथ है या नहीं, वास्तव में हँस रहा है या नहीं, आँसू बहा रहा है या नहीं, हैरान है अथवा सराहना कर रहा है या नहीं - जब तक एआई ये सब करने वाले व्यक्ति की पूरी तरह से नकल करता है।
हाँ। यह अतार्किक है। मैं इसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। यह इसलिए अतार्किक है क्योंकि यह उन गुणों पर निर्भर है जिन्हें किसी संबंध से निकाला या अलग-अलग नहीं किया जा सकता और पुनः उत्पन्न नहीं किया जा सकता।
‘तार्किकता’ और ‘कारण समझाने’ को अक्सर एक जैसा ही समझ लिया जाता है लेकिन मूलत: उनका एक ही अर्थ नहीं है। तार्किक होने का अर्थ है अनुपात के आधार पर कारण बताना। जैसे गणित में A का B से वही संबंध है जो C का D से है यानी A/B = C/D। भौतिक जगत में जहाँ A,B,C,D सभी अपने आप में अनूठे हैं, A और B का संबंध कभी ठीक C और D के संबंध के बराबर नहीं हो सकता। यह समीकरण सिर्फ़ तभी हो सकता है जब उनमें से कोई तत्व बाहर निकाला गया हो। सैद्धांतिक रूप से असीमित को सीमित और विशिष्ट को सामान्य बना देना और उसके बाद भौतिक रूप से किसी वस्तु को सामग्री और इंसान को किसी भूमिका के रूप में सीमित कर देना अलगाव का मूल कारण है। लेकिन संगीत या झींगुरों की चहचहाट जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि कुछ कम होने से कुछ ऐसा चला जाता है जो मानवीय समृद्धि के लिए ज़रूरी है।
यदि यह ‘दार्शनिक’ वास्तव में यह सोच सकता है कि एक रोबोट मनुष्य की जगह ले सकता है तो समझो वह बहुत अकेला है। शायद वही भावनाओं से रहित रोबोट की तरह बन गया है और वास्तविक मानवता की केवल नकल कर रहा है।
शायद हम सभी ऐसे हैं, कम से कम हममें से वे लोग जो झूठ के सर्वव्यापी जाल में फँसे हुए हैं, जो कुछ हद तक अपनी भावनाओं से दूर हो गए हैं, जिन्हें लगता है कि वे नकली हैं, जिन्हें लगता है कि वे पूरी तरह से वास्तविक इंसान ही नहीं हैं। सच कहूँ तो मुझे भी कभी-कभी ऐसा लगता है।
परस्पर संवादात्मक एआई का विकास, जैसे इसके पहले सोशल मीडिया का हुआ था, न केवल हमारे अपने शरीर से, एक-दूसरे से और सांसारिक दुनिया से अलगाव का कारण है बल्कि यह उस अलगाव का लक्षण और उसकी प्रतिक्रिया भी है। निस्संदेह, अकेलेपन से ग्रस्त मनुष्य अवश्य एआई का साथ पाने की ओर आकर्षित हो जाएगा।
मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि हम एआई का परित्याग करें और रिकॉर्ड किए हुए संगीत या तस्वीरों को हटा दें। लेकिन इसका सही तरीके से उपयोग करने के लिए हमें ठीक से समझना होगा कि यह क्या कर सकता है और क्या नहीं, यह क्या है और क्या नहीं।
एआई कोई व्यक्ति नहीं है। यह एक गणना करने वाला यंत्र है। तकनीक के प्रति आशावादी लोग यह सोचते हैं कि यदि इसकी गणनाएँ किसी स्तर पर मानवीय क्षमता से कम पड़ रही हैं तो इसका जवाब यह है कि और अधिक गणनाएँ करने की आवश्यकता है और वास्तव में यह विचार सफल भी सिद्ध हुआ है जैसे बड़े भाषा मॉडल ने कई क्षेत्रों में मानवीय समझ की बराबरी की है और किसी-किसी क्षेत्र में उसे पीछे छोड़ दिया है। लेकिन जैसे यह मानवीय भावनाओं का आभास दे सकता है लेकिन उसमें वास्तविक भावना नहीं होती, उसी तरह यह हमें समझने का आभास देता है लेकिन वास्तव में नहीं समझ सकता। यह आभास अत्यंत सटीक होता है, यहाँ तक कि इंसान की समझ से कहीं अधिक। लेकिन इसमें समझने का कोई व्यक्तिपरक आंतरिक अनुभव नहीं होता।
एआई दो अर्थों में आभासी बुद्धिमत्ता है –(1) आधुनिक उपयोग के संदर्भ में इसका अर्थ है, वास्तविक के विपरीत, जो केवल प्रभाव या सार रूप में ही मौजूद है लेकिन ठोस रूप में नहीं। इसमें शक्ति तो होती है लेकिन अंतर्निहित वास्तविकता नहीं होती। (2) प्राचीन अर्थ में यह शक्ति या कुशलता का होना है। कई मायनों में, यह शक्ति वास्तविक शक्ति से भी अधिक होती है।
प्रोटीन फ़ोल्डिंग के क्षेत्र में एआई का उपयोग उसके आभासी होने और उसकी कुशलता दोनों का उत्कृष्ट उदाहरण है। कुछ दिन पहले मैंने प्रोटीन फ़ोल्डिंग (वह प्रक्रिया जिसमें प्रोटीन त्रि-आयामी संरचना में मुड़ता है) का गहन अध्ययन किया। यह शोध का ऐसा क्षेत्र है जिसमें एआई ने बहुत अच्छा काम किया है। एमिनो एसिड्स के जिस क्रम से प्रोटीन बनता है, उसके कारण बनने वाले प्रोटीन का आकार कैसा होगा यह अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है। यह कहाँ और कैसे मुड़ेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करता है - जैसे एमिनो एसिड अवशेषों के मध्य हाइड्रोजन बॉन्ड, सॉल्ट ब्रिज (एक प्रकार का आयनिक बंधन), हाइड्रोफ़ोबिक प्रभाव, स्थैतिक प्रभाव (ज्यामिति) आदि। सैद्धांतिक रूप से, प्रोटीन के आकार का अनुमान उसके परमाणुओं की जानकारी से हो सकता है लेकिन वास्तव में कंप्यूटर की क्षमता इतनी नहीं है कि वह इतनी जटिल प्रक्रिया कर सके। एआई इसकी कोशिश भी नहीं करता। यह इसमें शामिल भौतिकी या रसायन विज्ञान को समझने की कोशिश नहीं करता। इसके बजाय, यह प्रोटीन के नए क्रमों से संबंधित उन पैटर्न और नियमितताओं की खोज करता है जिनके आकार पहले से ही ज्ञात हैं। यह आश्चर्यजनक है कि यह अच्छे से काम करता है जबकि इसके डिज़ाइन में मूलभूत भौतिकी को शामिल नहीं किया गया है। बड़े भाषा मॉडल भी ऐसे ही हैं। उनमें व्याकरण के नियम और परिभाषाएँ नहीं डाली जातीं। वे भाषा को आंतरिक रूप से नहीं समझते।

आप सोच रहे होंगे कि हम मनुष्य भी क्या इस जैसे ही नहीं हैं। क्या हम भी भाषा के उपयोग के पैटर्न पर गौर करके भाषा नहीं सीखते? हाँ, लेकिन हमारे साथ सिर्फ़ यही नहीं होता। हमें उन शब्दों से जुड़ी वस्तुओं, उनके गुणों और उन प्रक्रियाओं का साक्षात अनुभव भी होता है। हम शब्दों के साथ जुड़ी भावना की अनुभूति कर सकते हैं जैसे क्रोध, प्रसन्नता, थकान, खुरदरा, मुलायम इत्यादि। ये आधारभूत शब्द सिर्फ़ धारणा नहीं बल्कि अनुभव भी हैं। यहाँ तक कि जब हम उनका उपयोग कहावतों या वाक्यांशों में करते हैं (जैसे कठोर यात्रा, नरमी से बोलने वाला) तब उनके अर्थ में हमारे वास्तविक शारीरिक अनुभव के संकेत भी रहते हैं। सिर्फ़ उपयोग करने का तरीका ही नहीं बल्कि ये अनुभव भी हमें बताते हैं कि किसी शब्द का कैसे और कहाँ उपयोग किया जाता है। चूँकि ये अनुभव कुछ हद तक अधिकांश लोगों के लिए समान होते हैं, हम अपनी बातचीत से समानुभूति का संबंध बना सकते हैं।
मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि संवेदी अनुभव बुद्धिमत्ता का मूल हैं, कहावत के मुख्य घटक हैं, समझ का सत्व हैं और अर्थ की संरचना हैं। एआई में मूलतत्व नहीं होता, सिर्फ़ बाह्य खोल रहता है। इसीलिए हम इसके साथ अपने संवाद में खोखलापन महसूस करते हैं।
मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि संवेदी अनुभव बुद्धिमत्ता का मूल हैं, कहावत के मुख्य घटक हैं, समझ का सत्व हैं और अर्थ की संरचना हैं। एआई में मूलतत्व नहीं होता, सिर्फ़ बाह्य खोल रहता है। इसीलिए हम इसके साथ अपने संवाद में खोखलापन महसूस करते हैं।
मैं समझता हूँ कि मेरा यह सब कहना दार्शनिक रूप से विवादास्पद है। उत्तर-आधुनिकतावाद (Post-modernism), खासकर इसके उत्तर संरचनावादी रूपों में यह माना जाता है कि अर्थ किसी स्थायी वास्तविकता से बंधकर नहीं रहता बल्कि संकेतों के बीच विभिन्न संबंधों से उत्पन्न होता है। इस तरह की रूपरेखा में संकेतित (signified) की तुलना में संकेतक (signifier) की अधिक प्रधानता होती है - भाषा किसी अंतर्निहित संसार की ओर स्पष्टतः संकेत नहीं करती बल्कि सदैव स्वयं को ही संदर्भित करती है, यानी भाषा अपने ही शब्दों, प्रतीकों और संदर्भों के बीच घूमती रहती है।
यह बहुत कुछ वैसा है जैसे बड़ा भाषा मॉडल भाषा सीखता है - यह किसी निहित वास्तविकता के अनुभव से अर्थ नहीं निकालता बल्कि ‘संकेतों के मध्य के विभिन्न संबंधों’ का अध्ययन करके ऐसा करता है। यह भाषा को किसी वास्तविक दुनिया के प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं जोड़ता बल्कि उस आधार पर भाषा का उपयोग करता है जिस पर अब तक भाषा का प्रयोग किया गया है। मान लीजिए कि कोई उत्तर-आधुनिकतावाद की मूल धारणाओं को स्वीकार कर लेता है। इस स्थिति में अंतत: मानवीय भाषा में और मशीन की भाषा के उपयोग में बहुत कम अंतर रह जाता है। तब आभासी बुद्धिमत्ता और वास्तविक बुद्धिमत्ता समान हो जाती हैं।
एआई के नियंत्रण के बारे में कुछ बहुत ‘उत्तर आधुनिक’ बात है। उत्तर-आधुनिकतावाद में अर्थ का किसी भौतिक पदार्थ से अलग होना वैचारिक होता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसे वास्तविक बना देती है। यह हमें एक ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ भाषा सदैव स्वयं का ही संदर्भ लेती है।
निश्चित रूप से एआई ने भाषा को वास्तविकता से अलग नहीं किया था। मानवता के पागलपन के हर प्रकरण में प्रतीक और उसके वास्तविक अर्थ के बीच का संबंध टूटा है। जब मनुष्य एक-दूसरे को किसी वर्गीकृत श्रेणी में डाल देते हैं और उसकी असली इंसानियत को नज़रअंदाज़ कर देते हैं तब स्वीकृत शोषण और घृणित अपराध बिना अंतरात्मा की रोक-टोक के होते रहते हैं। यही बात धन - जो प्रतीकों का एक तंत्र है - के उस वास्तविक संपत्ति से अलग होने पर भी लागू होती है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है ।
अलगाव का यह साँचा बहुत पहले खराब हो चुका है। एआई इसे एक नए आयाम में ले जाता है और इसके उपयोग को और अधिक स्वचालित बना देता है।
जो व्यक्ति जानता है कि एआई चैटबोट कैसे काम करता है, उसके लिए भी एआई को मानव न मानना बहुत कठिन हो जाता है। सच में ऐसा लगता है जैसे मैं किसी वास्तविक व्यक्ति से बात कर रहा हूँ। जब मैं इसका उपयोग उन विचारों या उपायों के लिए करता हूँ जिन पर अभी मैं काम कर रहा हूँ तब सामान्यतया वह समझ लेता है कि मैं किस दिशा में जा रहा हूँ। यह हमें टर्मिनल के दूसरे सिरे पर एक मित्रवत, विनीत, अतिबुद्धिमान मनुष्य के होने का आभास देता है जो अक्सर अगले प्रश्न का अनुमान लगा लेता है, उसके पीछे की प्रेरणाओं का भी अनुमान कर लेता है और मेरे कहने के पहले ही मेरी तर्क-वितर्क की रूपरेखा तैयार कर लेता है। मैं अपने लेख या निबंध लिखने के लिए एआई का उपयोग नहीं करता और इसका कारण सिर्फ़ मेरे नैतिक सिद्धांत नहीं हैं। यह इसलिए क्योंकि भले ही स्पष्टता, कुशलता और व्यवस्था में एआई मुझसे बेहतर है लेकिन एआई के निबंध में कुछ बेहद ज़रूरी चीज़ छूट जाती है। मैं यहाँ पाठकों के सामने कोई तर्क प्रस्तुत करने के लिए नहीं आया। मैं यहाँ आपसे बात करने आया हूँ - एक देहधारी चेतना की दूसरी देहधारी चेतना से बातचीत के रूप में। जो ये शब्द लिख रहा है, वह केवल अवधारणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं के आधार पर लिख रहा है - ऐसी भावनाएँ जो तुम्हारे अंदर भी हैं। शायद मैं एआई से कह सकता था कि आखरी दो वाक्यों को अपने तरीके से लिखो लेकिन वे सच नहीं होते और वे भी झूठ के उस महासागर में जुड़ जाते जो हमें अलगाव, अर्थहीनता और अवास्तविकता के भाव में डुबो देता है। यदि इस लेख को लिखने वाला कोई इंसान न होता तो क्या आप खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं करते?

जो व्यक्ति जानता है कि एआई चैटबोट कैसे काम करता है, उसके लिए भी एआई को मानव न मानना बहुत कठिन हो जाता है। सच में ऐसा लगता है जैसे मैं किसी वास्तविक व्यक्ति से बात कर रहा हूँ।
कुछ भी लिखने या बोलने का क्या फ़ायदा यदि वह इस संसार की दो आत्माओं के बीच जुड़ाव पैदा न कर पाए?
यहाँ मैं एक बार फिर एक काल्पनिक दार्शनिक का हवाला देना चाहूँगा (इसलिए क्योंकि वह दार्शनिक मेरे अंदर ही रहता है)। “यदि एआई ऐसे लिख सकता जो आपके लेखन से बिलकुल अलग न लगे तो झूठ कभी पकड़ा नहीं जा सकेगा और पाठक को दूसरे सिरे पर वास्तविक इंसान के होने का अनुभव होगा।” यहाँ मैं इस दार्शनिक की धारणा के आधार को चुनौती देना चाहूँगा। अंतत: पाठक उनमें अंतर कर सकेगा। हो सकता है कि वह ऐसा तत्काल न कर सके लेकिन समय के साथ उसे उस लेख में कुछ न कुछ अजीब अवश्य लगेगा। असहजता बढ़ने लगेगी जो शायद स्पष्ट संदेह या अस्पष्ट तिरस्कार का रूप ले लेगी। कुछ न कुछ अवास्तविक, नकली या बनावटी लगेगा। अंतत: जिसमें अनुभूति है उसके किए काम में और मशीन के काम में अंतर होगा। आखिरकार सत्य अपने आपको व्यक्त कर ही देता है और असत्य भी। चाहे आप उसे कोई नाम न दे सकें लेकिन उसे महसूस अवश्य कर सकते हैं।
इस डिजिटल युग में हमें घेरने वाले झूठ के सर्वव्यापक जाल से हम कैसे बच सकते हैं? यह इतना सरल नहीं है जैसे कोई कह दे, “अपना फ़ोन फेंक दो। अपना कंप्यूटर बंद कर दो। घास को स्पर्श करो!” हम तकनीक के आदी ही नहीं हुए हैं, हम इसके साथ बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। मानवता इसके साथ ही विकसित होती रहेगी। प्रश्न यह है कि क्या हम इतना विवेक प्राप्त कर पाएँगे कि हम तकनीक का सही ढंग से और अच्छा इस्तेमाल करें।
एआई की कुशलता को सिद्ध करने के लिए हमें इसकी आभासी प्रवृत्ति को समझना होगा। हमें आभासी को वास्तविक समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। हमें अंतरंगता, साहचर्य, उपस्थिति और समझ के नकली या झूठे विकल्पों को स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह कहकर कि हमें मशीन के माध्यम से ये चीज़ें मिली हैं, स्वयं को भ्रमित नहीं करना चाहिए।
मनुष्य की तीव्र इच्छा होती है कि वह दूसरों को जाने और स्वयं भी जाना जाए, संबंधों में गहराई से जुड़े, देखा और समझा जाए, उन लोगों को अपने साथ रखे तथा उनके लिए उपस्थित रहे जो उसे जानते, देखते और समझते हैं। यह इच्छा हममें तब भी थी जब हम वनवासी थे, गाँवों में, समूहों में और संयुक्त परिवारों में, छोटे शहरों में और शहरी पड़ोसियों के बीच रहते थे, जब टेलीविज़न नहीं थे और उत्पादों, वैश्विक बाज़ार, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और मशीनी बुद्धिमत्ता के दूरी पैदा करने वाले प्रभाव नहीं थे। हममें से कई लोगों के लिए वे दिन बीत चुके हैं और हम ज़्यादातर अजनबियों और दिखावे की दुनिया में रहते हैं। लेकिन वापस लौटने का मार्ग है। यह सबसे पहले अपने हृदय और मन में यह समझने से शुरू होता है कि वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है। यह इस बात को स्वीकार करने से शुरू होता है कि हाँ, हम इस अलगाव के युग से पीड़ित हैं, हमने जो खो दिया है वह महत्वपूर्ण है, आभासी कभी भी वास्तविक को पूरी तरह से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता और हमारी फिर से एक होने की तड़प असली और पवित्र है।
आइए, संल्कप लें कि उक्त सच्चाइयों के आधार पर हम वापसी के मार्ग पर चलेंगे। हम समारोह में साक्षात उपस्थिति, संगीत की साक्षात प्रस्तुति, मंच थिएटर, शारीरिक स्पर्श, मिट्टी का स्पर्श, शारीरिक कौशल, परस्पर जुड़कर बनी अद्भुत वस्तुओं को प्रमुखता देंगे। हम उन गुणों को पवित्र मानेंगे जिन्हें आँकड़ों या डाटा में सीमित नहीं किया जा सकता और जितना ज़्यादा हम इन्हें महत्व देंगे उतनी ही अधिक हमारी इंद्रियाँ उनके अनुकूल बन पाएँगी। तब हम आदत डाल देने वाले उन तकनीकी विकल्पों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे बल्कि तब हम तकनीक का सही उद्देश्य के लिए उपयोग करेंगे। और आप पूछ सकते हैं कि वह क्या है? मुझे ठीक से पता नहीं है लेकिन मैं चैट जीपीटी से पूछकर आपको बताऊँगा।

