डॉ. गोरख पारुलकर विरोध समाधान पर अपने विचार व जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। व्यावसायिक रूप से वे एक रोग-निदान विशेषज्ञ हैं और हरदा के गुरुकृपा डायग्नोस्टिक सर्विसेज़ के निदेशक हैं। यहाँ वे मनोवैज्ञानिक विरोध की तुलना बीमारी से संबंधित रोग-निदान के अपने काम से करते हैं और कुछ दिलचस्प समानताएँ प्रस्तुत करते हैं।
आप शायद पूछें, “रोग-निदान विज्ञान का विरोध समाधान से क्या संबंध है?” रोग-निदान विज्ञान को अंग्रेज़ी में पैथोलॉजी कहते हैं जो दो शब्दों से मिलकर बना है - पैथोस और लोगोस। इसका अर्थ है पीड़ा का अध्ययन। क्या यही विरोध नहीं है? यह हमारे जीवन में कितनी सारी पीड़ाओं का स्रोत है, भले ही वे शारीरिक, मानसिक, रिश्तों में, घर पर हों या फिर कार्यालय में हों। सबसे पहले हमें समझना होगा कि विरोध क्या है?
क्या यह असहमति है? हाँ यह असहमति है। जब मेरे सहकर्मी या पत्नी का ऐसा मत होता है जो मेरे मत से मेल नहीं खाता है तो हमारे बीच असहमति होती है। और यदि मैं ज़िद पर अड़ा रहता हूँ तो यह असहमति बढ़ते-बढ़ते विरोध बन सकती है। लेकिन विरोध केवल एक मनोवैज्ञानिक चीज़ नहीं है। हमारे शरीर में कई तंत्र एकसाथ काम कर रहे होते हैं। जब तक वे सामंजस्य में एक-दूसरे का सहयोग करते रहते हैं, हम स्वस्थ रहते हैं। लेकिन जब कोई टकराव होता है (जब एक तंत्र दूसरे तंत्र के लिए समस्या बन जाता है), हममें रोग उत्पन्न हो जाता है।
असहमति से विरोध तक
हमारे परिवारों व संस्थाओं में भी यही होता है। हम असहमत हो सकते हैं और यह असहमति विरोध बन सकती है। लेकिन क्या यह लड़ाई है? अब तक नहीं। इसे सुलझाने के कई तरीके होते हैं। दुर्भाग्य से ज़्यादातर हम लड़ने लगते हैं। हम सही बात की असहमति से बढ़ते-बढ़ते इस विवाद पर चले जाते हैं कि कौन सही है और फिर इस विचार तक पहुँच जाते हैं कि मुझे खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करना है जिसके बाद हम लड़ने लगते हैं।
क्या यह पीड़ादायक नहीं है? क्या हमारे जीवन में इतने सारे कष्टों का कारण यही नहीं है?
क्या हम इसकी तह पर जाने की कोशिश कर सकते हैं जिससे हम देख पाएँ कि क्या कोई तरीका है जिससे विरोध को बढ़ने से रोका जा सके? क्या हम इसे किसी अलग तरह से ले सकते हैं, शायद मतभेद के लिए सहमत होना या फिर किसी ऐसे समाधान पर पहुँचना जिसमें दोनों का नज़रिया शामिल हो?
भगवान बुद्ध और रस्सी
महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ जगह-जगह यात्रा करते थे और उनकी एक दिनचर्या होती थी। हर सुबह वे उनके साथ बैठते थे और उनको प्रवचन देते थे। एक दिन शिष्यों ने देखा कि महात्मा बुद्ध अपने हाथ में रस्सी लेकर आ रहे हैं।
उन्होंने बैठकर शिष्यों से पूछा, “यह क्या है?”
उन्होंने कहा, “प्रभु, यह रस्सी है।”
उन्होंने रस्सी में एक गाँठ बाँधी और फिर पूछा, “अब यह क्या है?”
उन्होंने उत्तर दिया, “यह एक रस्सी है जिसमें गाँठ लगी हुई है।”
उन्होंने एक-एक करके दो और गाँठें लगा दीं और फिर पूछा, “क्या यह वही रस्सी है जो मैं अपने साथ लेकर आया था?”
वे हैरान-परेशान हो गए। “हाँ प्रभु, रस्सी तो वही है लेकिन इसमें तीन गाँठें लग गई हैं। अब यह इतनी सरल नहीं रही।”
तब उन्होंने कहा, “यदि मैं इसकी सरलता व सादगी को वापस लाना चाहूँ तो मैं क्या करूँ?”
शिष्यों ने उत्तर दिया, “गाँठें खोल दीजिए।”

फिर महात्मा बुद्ध रस्सी को खींचने लगे। शिष्यों को पता था कि वे उन्हें कुछ सिखाने की कोशिश कर रहे थे।
जब वे नहीं रुके तो एक शिष्य ने कहा, “यदि आप रस्सी को खींचते रहेंगे तो गाँठें नहीं खुलेंगी, वे और भी मज़बूत हो जाएँगी।”
मुस्कुराकर महात्मा बुद्ध ने पूछा, “तो मुझे बताओ कि मैं इन्हें कैसे खोलूँ।”
उस शिष्य ने कहा, “प्रभु, आपको रस्सी का तनाव कम करना होगा यानी उसे ढीला करना होगा और गाँठों को ध्यान से देखकर समझना होगा कि वे पहले कैसे बँधी थीं। फिर आप जान जाएँगे कि उन्हें कैसे खोलना है।”
हार्टफुलनेस ध्यान में हम यही करते हैं। हम अपने मन को तनावमुक्त करके अपने अंदर जाकर देखते हैं कि गाँठें कहाँ हैं। हम उन जटिलताओं व उलझनों को समझने की कोशिश करते हैं जो अतीत में हमारे मन में बन गई हैं। जब हम यह समझ जाते हैं कि गाँठें कैसे बनीं हैं तब हम उन्हें सुलझा सकते हैं जिससे हमारे विरोध भी सुलझ जाते हैं।
यदि हमें यह पता ही न हो कि इसे कैसे करना है तो क्या होता है? हम कोशिश करते हैं। किसी को विरोध करना अच्छा नहीं लगता है। हम सभी को शांति चाहिए। हम सभी को सामंजस्यपूर्ण रिश्ते चाहिए। और इसके लिए हम इसकी पूरी कोशिश करते हैं। कभी-कभी जब इन प्रयासों से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता तो हम सोचने लगते हैं, “मैं कहाँ गलत जा रहा हूँ? क्या मेरे प्रयासों से रस्सी और भी ज़्यादा खिंच रही है?” चीज़ों को छोड़कर तनावमुक्त होने से हमें थोड़ा सा समय मिल जाता है जिससे हम उन अनगिनत भावनाओं से परे जा पाते हैं जो विरोध के दौरान हमारे अंदर उभरती हैं।



डॉ. गोरख पारुलकर
गोरख एक रोग-निदान विशेषज्ञ, एक रोग-निदान संस्था के निदेशक और हार्टफुलनेस के अभ्यासी एवं प्रशिक्षक हैं। उनकी रुचियों में दूसरों को सुनना, कहानी सुनाना, पैदल यात्रा पर जाना, जैविक खेत... और पढ़ें
