डॉ. इचक अडीज़ेस संगठनों के अंदर प्रभावी आंतरिक संवाद और निर्णय लेने की आवश्यकता के बारे में बात करते हैं और यह भी बताते हैं कि हम सभी इसमें कैसे योगदान दे सकते हैं।

 

मैं निर्णय लेने और निर्णय निर्धारण के बीच अंतर मनाता हूँ।

निर्णय निर्धारण में जानकारी इकट्ठा करना, विचार-विमर्श करना, इस विचार-विमर्श से उत्पन्न विचारों पर प्रकाश डालना और फिर यह आकलन करना कि क्या हम प्राप्त जानकारी से संतुष्ट हैं, शामिल हैं। अंततः, इन सब के आधार पर हम निर्णय लेते हैं जो निर्णय का अंतिम रूप होता है।

किसी निर्णय के प्रभावी होने के लिए यह ज़रूरी है कि उसमें सभी आवश्यक घटक शामिल हों, अन्यथा यह तीन पैरों वाले घोड़े यानी बीमार घोड़े के समान हो जाता है जो इच्छित परिणाम देने के काबिल नहीं होता। प्रभावी निर्णय में चार बातें अनिवार्य हैं - क्या किया जाना चाहिए, उसे कैसे किया जाना चाहिए, कब तक किया जाना चाहिए और उसके निष्पादन के लिए कौन ज़िम्मेदार है। इन अनिवार्यताओं में से किसी एक को भी स्पष्ट करने और बताने में विफलता से एक अंतर आ जाता है जिसे लोग अक्सर अपनी अपेक्षाओं से भरते हैं। इस अंतर से गलतफ़हमी उत्पन्न होती है जिससे एक-दूसरे के प्रति कटुता आ जाती है और ऊर्जा एवं परस्पर विश्वास की भी हानि होती है।

निर्देश प्राप्त करने वाले व्यक्ति की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि सभी चार अनिवार्यताओं पर कर्मचारियों की सहमति हो और उनके बारे में स्पष्टता हो ताकि कर्मचारियों को पता हो कि उनसे क्या अपेक्षित है। यदि निर्णय में कोई अनिवार्यता नहीं दी गई है तो उन्हें प्रश्न पूछकर स्पष्टीकरण माँगना चाहिए, जैसे, “आप इसे कब तक चाहते हैं?” और “आप इस कार्य की पूर्ति किस तरह चाहते हैं?” सभी अनिवार्यताओं के निर्देश के बिना किसी कार्य को स्वीकार करने से धारणाएँ बन जाती हैं, जिससे निर्देश देने वाले और निर्देश प्राप्त करने वाले के बीच अलग-अलग अपेक्षाएँ पैदा होती हैं।

एक ऐसी परिस्थिति पर विचार करें जहाँ किसी कार्य को समाप्त करने की अंतिम तिथि आ जाती है और कार्य के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति निर्धारित समय पर पूरा करने में विफल रहता है। आमतौर पर, बहाने और स्पष्टीकरण दिए जाते हैं। लेकिन बहानों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

इसकी उपमा उपभोक्ता अनुभव से ली जा सकती है - कल्पना करें कि उपभोक्ता किसी निर्दिष्ट तिथि तक उत्पाद की अपेक्षा करता है लेकिन उसे वह समय पर प्राप्त नहीं होता और विक्रेता बाद में कई स्पष्टीकरण देता है। इस निराशा से ग्राहक की हानि होती है। व्यावसायिक संदर्भों में भी यही होता है।

जब निर्देश प्राप्त करने वाले को पता चलता है कि समय सीमा का पालन नहीं हो सकता है तब उसे निर्देश देने वाले अधिकारी को समय रहते बता देना चाहिए। जिस तरह हम बाहरी ग्राहकों को देरी के बारे में सूचित करते हैं उसी तरह का शिष्टाचार आंतरिक ग्राहकों के लिए भी होना चाहिए।

ऐसा प्रतीत होता है कि हम अक्सर अपनी संस्था के आंतरिक सहकर्मियों की तुलना में बाहरी उपभोक्ताओं के साथ बेहतर व्यवहार करते हैं और उनसे अधिक उदारता व क्षमाशीलता की अपेक्षा रखते हैं। एक अच्छी तरह से काम करने वाली कंपनी के लिए प्रभावी टीमवर्क का होना, आपसी विश्वास व सम्मान का माहौल बनाना, आंतरिक ग्राहकों के साथ बेहतर नहीं तो उतना ही अच्छा व्यवहार करना, जितना बाहरी ग्राहकों के साथ करते हैं, अनिवार्य है। यह सिद्धांत विवाह और पारिवारिक जीवन पर भी लागू होता है।

बस कुछ सोच और एहसास,

Ichak Adizes.webp

डॉ. इचक अडीज़ेस

ichak@adizes.com


एक अच्छी तरह से काम करने वाली कंपनी के लिए प्रभावी टीमवर्क का होनाआपसी विश्वास व सम्मान का माहौल बनानाआंतरिक ग्राहकों के साथ बेहतर नहीं तो उतना ही अच्छा व्यवहार करनाजितना बाहरी ग्राहकों के साथ करते हैंअनिवार्य है।


 


Comments

डॉ. इचक अडीज़ेस

डॉ. इचक अडीज़ेस

डॉ. इचकअडीज़ेस विश्व

उत्तर छोड़ दें