नीरजा कैरम अमेरिका के न्यू जर्सी में रहने वाली चिकित्सक हैं। दुःख से संबंधित जटिल भावनाओं से गुज़रने पर समाज के प्रति जो कृतज्ञता उन्होंने महसूस की, वे उसे व्यक्त कर रही हैं और हमारी समझ बढ़ा रही हैं।
29 नवंबर 2020 की तारीख मेरे दिमाग में हमेशा के लिए छप चुकी है क्योंकि इस दिन मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया था। मेरे पति जो मेरे साथ 27 वर्ष रहे, अचानक 50 वर्ष की आयु में चल बसे। मैं उस समय को अपने जीवन का विभक्ति बिंदु मानती हूँ - उनकी मृत्यु से पहले और उनकी मृत्यु के बाद का समय।
तब से तीन वर्ष गुज़र चुके हैं और मैं एक अलग ही इंसान बन चुकी हूँ। शुरुआती दिनों और महीनों के बारे में सोचती हूँ तो उस समय में मुझे दुःख, दर्द, कृतज्ञता और दृढ़ता की मिली-जुली भावनाएँ दिखाई देती हैं। मैं अभी भी इस नए जीवन की यात्रा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हूँ जिसकी न तो मैंने और न ही मेरे बच्चों ने कभी अपेक्षा की थी। इस दौरान मुझे पता चला कि किस प्रकार समाज और मेरे बनाए गए संबंधों से मिली सहायता से मैं सबसे कठिन समय में भी विकास कर पाई।
उनकी मृत्यु के परिणामस्वरूप दुःख के बादलों से घिरी अनेक मिश्रित व जटिल भावनाएँ उभरीं। उन शुरुआती दिनों में मैं उदासी, अकेलेपन, भय और असहाय होने की भावना से पीड़ित थी। मैं बहुत लोगों को ऊपर से ठीक ही लगती थी क्योंकि आगे बढ़ने के लिए मैंने अपनी पूरी ताकत जुटाई थी जिसका एकमात्र उद्देश्य था अपने बच्चों को स्थिरता देना।
इस नए एकाकी जीवन के साथ अपने पूर्णकालिक व्यवसाय को संतुलित करना बहुत कठिन था विशेषकर जब मुझ पर अपने स्वर्गीय पति के व्यापार का प्रबंधन करने की ज़िम्मेदारी भी आ गई थी। उनके कर्मचारी भी अपने प्यारे बॉस को खोने के कारण संघर्ष कर रहे थे और अपनी आजीविका को लेकर चिंतित थे। इसलिए वे चाहते थे कि मैं उनका नेतृत्व करूँ। इसके अलावा अपने तीन किशोर बच्चों के लिए, जो अभिभावक के रूप में केवल मुझ पर निर्भर रह गए थे, निरंतर चिंता मुझे खाए जा रही थी।

दुःख एक ऐसी जटिल भावना है जिसे अक्सर गलत समझा जाता है। हम सभी को अपने जीवन में कभी न कभी इसका सामना करना पड़ता है। फिर भी इसे स्वीकार करने और इसके बारे में खुलकर बताने में हमें कठिनाई होती है। हमारे आस-पास के लोगों को इससे जो परेशानी होती है, उसकी वजह से दिल पर बहुत भारी बोझ लगता है क्योंकि हम अक्सर अपनी भावनाओं को अपने तक ही सीमित रखने के लिए मजबूर होते हैं। बल्कि अच्छी नीयत से पूछा गया यह सवाल, “आप कैसे हो?” भी उस दुःखी व्यक्ति को कठिन स्थिति में डाल सकता है क्योंकि उसे समझ नहीं आता कि वह उसका क्या जवाब दे।
सांत्वना देने वाले लोगों को भी कई जटिल भावनाओं का सामना करना पड़ता है। दया व समानुभूति के अलावा कई बार एक तरह की बेबसी उत्पन्न हो जाती है जब वे समझ नहीं पाते हैं कि उस दुःखी व्यक्ति के दुःख को कैसे कम किया जाए। कभी चिंता होती है कि कहीं कोई गलत बात मुँह से न निकल जाए तो कभी सही शब्द न मिलने पर हताशा होती है; कभी यह सोचकर अटपटा लगता है कि क्या कहें या क्या करें तो कभी इन कष्टप्रद भावनाओं से बचने के लिए परिस्थिति से बचने की इच्छा होती है। मैंने खुद ये भावनाएँ महसूस की हैं।
हमारे समाज में दुःख के बारे में चर्चा करने में संकोच महसूस होता है और अक्सर इसे सबके सामने स्वीकार भी नहीं किया जाता। तो क्या कोई तरीका है जिससे इस फ़ासले को कम किया जा सके और इसके प्रति अधिक स्वीकार्यता व समझ लाई जा सके? इसके लिए ज़रूरी है कि अलगाव की इस दूरी को कम करके दु:ख के बारे में बात करने को चर्चा का आम विषय बनाया जाए। अंततः इस यात्रा में सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है
इसका मतलब है, लोगों के समान अनुभवों को पहचानना और जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण पलों के दौरान एक-दूसरे की सहायता करना।
ताकि पारंपरिक प्रतिबंधों को तोड़ा जा सके। इसका मतलब है, लोगों के समान अनुभवों को पहचानना और जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण पलों के दौरान एक-दूसरे की सहायता करना।
मैं सौभाग्यशाली थी कि मुझे अपने जीवन में ऐसे महत्वपूर्ण लोग मिले जिन्होंने मुझे ज़रूरी मदद दी। उन्होंने मुझे तसल्ली और मार्गदर्शन तो दिया ही, साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मैं अपनी देखभाल के लिए थोड़ा समय निकालूँ। उनकी दृढ़ उपस्थिति के बावजूद मैं अकेलेपन के ज़बरदस्त एहसास से जूझ रही थी। मुझे लगता था कि जब तक कोई इस परिस्थिति से खुद न गुज़रा हो तब तक वह मेरी क्षति की गहराई को सचमुच नहीं समझ सकता। यह केवल मेरे पति, मेरे सबसे अच्छे मित्र और मेरे बच्चों के सबसे बड़े सहारे के जाने की क्षति ही नहीं थी बल्कि यह उस भविष्य की क्षति भी थी जिसकी कल्पना हम दोनों ने मिलकर की थी। मैंने अपनी यात्राओं, संगीत समारोहों और अन्य अभियानों पर जाने वाले अपने साथी को खो दिया था। मैंने उनके बिना दुनिया में अपनी पहचान को खो देने का और अपने जीवन में उद्देश्य की स्पष्ट भावना को खो देने का सामना किया था।
मेरे पति के गुज़रने के कुछ समय बाद ही मेरी एक पुरानी सहकर्मी और मित्र ने, जिसने हाल ही में अपने पति को कैंसर के कारण खोया था, मेरा परिचय एक ऑनलाइन सहायता समूह से कराया जो चिकित्सक विधवाओं के लिए था। शुरुआत में ‘विधवा’ शब्द से दुःख होता था लेकिन समय के साथ यह शक्ति व दृढ़ता का प्रतीक बन गया। इन महिलाओं से मुझे बहुत अपनापन मिला और कई बातों की समझ मिली। उनमें विधवापन के साथ जुड़ी अनेक भावनाओं के प्रति समानुभूति थी जैसे दुःख, अपराध-बोध, भय, जो चीज़ें होनी चाहिए और सभी अपेक्षित व अनअपेक्षित उत्प्रेरक। इस समर्थक समुदाय ने मुझमें अपनी भावनाओं के प्रति सामान्य होने का भाव जगाया और उसी वजह से मैं दूसरों की सहायता कर पाई जो उसी दुःख से गुज़र रहे थे। हाल ही में किसी ने मुझे कहा, “मेरे पास बहुत से लोग हैं जिनके साथ मैं बहुत कुछ कर सकती हूँ लेकिन ऐसा कोई भी नहीं जिसके साथ मुझे कुछ नहीं करना है।” उस पल मेरे सामने कुछ प्रकट हुआ। मैं उस भावना के साथ जुड़ पाई हालाँकि उसे व्यक्त करने के लिए बहुत समय तक मुझे सही शब्द नहीं मिल रहे थे। इन विशिष्ट महिलाओं के इस समुदाय में मुझे तसल्ली और परस्पर सहारा मिला।
मुझे अनअपेक्षित स्रोतों से भी सहायता मिली। मैं आज भी उस अनुभव से विस्मित हूँ जो मेरे पति के जाने के एक वर्ष के बाद हुआ। छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। क्रिसमस के 12 दिनों में प्रतिदिन हमारे घर के बरामदे में एक उपहार रखा होता था। उसके साथ एक कार्ड होता था जिस पर लिखा होता था, “आपके सच्चे मित्र।” तेरहवें दिन हमें अंतिम उपहार मिला जिससे उन रहस्यमयी उपहारों का अर्थ समझ में आया - जोऐन हुइस्ट स्मिथ द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘द थर्टीन्थ गिफ़्ट’। अपनी इस पुस्तक में वे अपनी कहानी बताती हैं कि क्रिसमस के एकदम पहले जब उनके पति की मृत्यु हुई थी तब क्या हुआ था। हमारी तरह उनके परिवार को भी अजनबियों से 12 उपहार मिले थे जिन्होंने उन छुट्टियों के दिनों में दुःख से उबरने में उनकी मदद की थी। आज तक हमें नहीं पता कि वो उपहार किसने भेजे थे लेकिन उस अप्रत्याशित दयालुता व करुणा से भरे कृत्य का प्रभाव हमारे दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो चुका है।
जब मैं पिछले तीन वर्षों पर नज़र डालती हूँ तो मुझे उन लोगों की याद आती है जो मेरे साथ खड़े थे जब मैं कठिन समय से गुज़र रही थी; जो मुझे सुन रहे थे जब मैं चाहती थी कि कोई सुने और जिन्होंने मुझे अकेले रहने दिया जब मुझे उसकी ज़रूरत थी। उन्होंने मुझे धीरे-धीरे करके आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। यह प्रियजनों व अजनबियों सभी के सहयोग व दयालुता का प्रभावशाली प्रमाण है। यह उदाहरण प्रस्तुत करता है कि सचमुच एक-दूसरे की देखभाल करने से कितनी मदद मिलती है।


नीरजा कैरम
नीरजा पिछले 25 वर्षों से बोर्ड प्रमाणित बाल रोग विशेषज्ञ और बाल आपातकालीन चिकित्सा में विशेषज्ञ हैं। वे वर्तमान में अपने तीन बच्चों के साथ न्यू जर्सी, यूएसए में रहती हैं और सामान्य ... और पढ़ें
