उदय कुमार प्रेम और विकास के एक साधन के रूप में छोड़ देने के मनोभाव का विश्लेषण कर रहे हैं। वे प्रकृति से उदाहरण लेकर प्रेम, विकास और अनासक्ति के बीच के संबंधों को उजागर कर हमें बता रहे हैं कि संपूर्ण जीवन का चक्र इन्हीं आवश्यक गुणों पर निर्भर करता है।
अवलोकन और चिंतन रहस्योद्घाटन के साधन हैं। प्रकृति का बारीकी से अवलोकन करना और उसके बाद चिंतन करना अक्सर उन अंतर्निहित सिद्धांतों का खुलासा करता है जो प्रकृति के कामकाज को संचालित करते हैं। उदाहरण के लिए, जब हम एक बीज को अंकुरित होकर एक नन्हे पौधे में बदलते हुए और फिर एक फूल वाले पौधे में विकसित होता देखते हैं, जिसके फूल बाद में बीज बन जाते हैं, तब हमें एक मौलिक सत्य समझ में आता है - सभी कुछ वापस अपने स्रोत को लौट जाता है।
इसी प्रकार मैं तीन परस्पर जुड़े सिद्धांतों के बारे में बात करना चाहता हूँ जो आपको ‘प्रेमपूर्ण अनासक्ति’ की गहरी समझ हासिल करने में मदद करेंगे -
- अनासक्ति का अर्थ है विकसित होना।
- विकसित होना प्रेम की अभिव्यक्ति है।
- प्रेम करने का अर्थ है अनासक्त होना।
यदि आप बारीकी से देखें तो ये तीन विचार एक ज़ंजीर की कड़ियों की तरह हैं जो एक अनवरत चक्र बनाते हैं। प्रत्येक सिद्धांत अगले सिद्धांत को आगे बढ़ाता है और एक शाश्वत लय को मज़बूत करता है। आइए, हम इन्हें एक-एक करके समझते हैं।
अनासक्ति का अर्थ है विकसित होना -
बीज में उस पौधे की जीवन शक्ति निहित होती है जो उसे बनना है। लेकिन पौधा बनने के लिए बीज को अपने सुरक्षात्मक खोल को तोड़कर बाहर निकलना होता है। जब वह खोल से अलग होता है तभी वह बढ़ता है – तब तक पौधे के उगने की केवल संभावना ही रहती है, वास्तविकता नहीं बनती।
एक और उदाहरण पर विचार करें - शरद ऋतु में पत्ते पेड़ों से अलग हो जाते हैं जिससे वसंत में नई कोंपलों के लिए जगह बनती है। यदि पत्ते अलग होने से इनकार कर दें तो पेड़ की वृद्धि ठीक से नहीं होगी।
एक आखरी उदाहरण, जन्म से पहले माँ और बच्चा एक इकाई थे। जन्म के बाद यह एकत्व समाप्त हो जाता है और बच्चे का विकास इस दुनिया में शुरू होता है। जन्म अलग होने की एक क्रिया है जिसके कारण विकास का अगला चरण संभव हो पाता है।
इन उदाहरणों से हम एक प्रतिमान देखते हैं - विकास से पहले अलगाव होता है। आपकी आकांक्षाएँ जो भी हों, आपको नई संभावनाओं को अनावृत करने के लिए कुछ छोड़ने की आवश्यकता होती है। इससे हम अगले सिद्धांत पर आते हैं।
विकास प्रेम की अभिव्यक्ति है
विकास एक रचनात्मक कार्य है और हर रचनात्मक कार्य प्रेम की अभिव्यक्ति होता है। यदि आप अपने चारों ओर देखें तो पाएँगे कि सभी प्रकार की रचनाएँ चाहे बड़ी हों या छोटी, प्रेम से ओतप्रोत हैं। कैनवास पर पेंटिंग करने वाला कलाकार, धुन बनाने वाला संगीतकार और यहाँ तक कि प्रेमी युगल भी, सभी रचनात्मक कार्य प्रेम से उत्पन्न होते हैं।
सबसे बड़े पैमाने पर देखें तो वह पहला आवेग, जिससे यह सृष्टि बनी यानी बिग बैंग, को प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। ‘परमतत्व’ के भीतर जो हलचल हुई, वह प्रकट होने की, स्वयं को अनंत विविधता में व्यक्त करने की एक लालसा थी। एक से बहुलता का प्रादुर्भाव हुआ। प्रेम के इस आदिम आवेग के कारण परम तत्व से अलगाव यानी पृथकता हुई जो अंततः सारे विकास का आधार बनी।
इस तरह जहाँ भी प्रेम है, वहाँ विकास है। प्रेम कारण है जिसका प्रभाव विकास है। जैसा कि बाबूजी ने एक बार कहा था, “प्रेम दुनिया का इंजन है।”
अब आइए, तीसरे सिद्धांत को समझते हैं।
प्रेम करने का अर्थ है अनासक्त होना
अब तक हमने यह समझा है कि अलगाव से विकास होता है और विकास प्रेम की अभिव्यक्ति है। लेकिन यहाँ एक विरोधाभास है कि सच्चे प्रेम के लिए अनासक्ति यानी अलगाव की आवश्यकता होती है।
पहली नज़र में यह विरोधाभासी लग सकता है। क्या प्रेम में आसक्ति नहीं होती? लेकिन इस पर विचार करें कि क्या प्रेम वहाँ मौजूद हो सकता है जहाँ बंधन है?
क्या गुलाब की कली खिल सकती है यदि उसकी बाहरी पंखुड़ियाँ आंतरिक पंखुड़ियों को न छोड़ें?
क्या तितली बाहर निकल सकती है यदि ककून अपने धागों की पकड़ ढीली न करे?
क्या हृदय वास्तव में एक हो सकते हैं यदि वे अपेक्षाओं से बंधे हों?
प्रेम में कोई बंधन नहीं होता केवल स्वतंत्रता होती है। सच्ची अनासक्ति रूखी उदासीनता नहीं है बल्कि इतना गहरा प्रेम होती है कि यह अधिकार जमाने के बजाय मुक्त करती है। अपने रिश्तों के बारे में विचार करें - यदि हम दूसरों पर अपेक्षाएँ थोपते हैं और बंधनों का बोझ डालते हैं तो क्या प्रेम पनप सकेगा?
जहाँ प्रेम है वहाँ स्वतंत्रता है। जहाँ स्वतंत्रता है वहाँ अनासक्ति है - निराशा या मायूसी के कारण नहीं बल्कि शुद्ध प्रेम की वजह से। प्रायः जिसे हम गलती से अनासक्ति समझते हैं वह वास्तव में घृणा है या एक तरह का पलायन है जो अधूरी अपेक्षाओं से उत्पन्न होता है। इस प्रकार की अनासक्ति एक लेन-देन है जो हृदय पर बोझ डालता है।
प्रकृति एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करती है। एक पौधा जानता है कि जिस फूल को वह धारण करता है उसे हवा उड़ा ले जाएगी। वह जानता है कि जिस फल को वह पोषित कर रहा है वह एक दिन गिर जाएगा। लेकिन फिर भी वह प्रतिरोध नहीं करता। वह अपने विकास को नहीं रोकता। उसका स्वभाव है बढ़ना, अनासक्त रहना और ऐसा करते हुए और ज़्यादा जीवन का निर्माण करना।
मनुष्य होने के नाते हमें आत्म-जागरूकता और स्वतंत्र इच्छाशक्ति का उपहार मिला है। फिर भी अहंकार ‘मैं-पन’ और ‘मेरे-पन’ के बंधन बनाता है तथा हमें चीज़ों को पकड़े रहने, बंधन में रहने और स्वयं को आसक्तियों द्वारा परिभाषित करने के लिए राज़ी करता है। ध्यान विवेक और वैराग्य को जागृत करके इन बंधनों को तोड़ने में हमारी मदद करता है। विवेक से हम कारण और प्रभाव, वास्तविकता और भ्रम का अंतर समझना सीखते हैं। हम निम्न स्व से अलग होकर उच्चतर स्व की ओर तथा नश्वर जगत से अलग होकर शाश्वत जगत की ओर रुख करते हैं। यह बदलाव प्रेम का कार्य है।
जहाँ प्रेम है वहाँ स्वतंत्रता है। जहाँ स्वतंत्रता है वहाँ अनासक्ति है - निराशा या मायूसी के कारण नहीं बल्कि शुद्ध प्रेम की वजह से।
लेकिन इस प्रेमपूर्ण अनासक्ति का अर्थ अपने परिजनों को छोड़ देना या दुनिया को त्यागना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है बिना किसी अधिकार-भावना के या बिना किसी अपेक्षा के और बिना किसी भय के जीवन को पूरी तरह अपनाना।

शायद प्रेमपूर्ण अनासक्ति का सबसे सुंदर उदाहरण हार्टफुलनेस के संस्थापक गुरु लालाजी के जीवन से मिलता है। एक दिन वे सामूहिक ध्यान करा रहे थे कि तभी उन्हें खबर मिली कि उनकी एक बेटी, जो कुछ समय से अस्वस्थ थी, का निधन हो गया है। खबर सुनकर वे भावहीन मौन में बैठे रहे और कुछ क्षण बाद उनके गालों पर आँसू की बूंदें गिरने लगीं। वहाँ बैठे एक साधू ने टिप्पणी की, “एक सर्वोत्तम दशा प्राप्त संत कैसे शोक मना सकता है, वह आसक्ति के आँसू कैसे बहा सकता है?”
लालाजी कुछ देर और चुपचाप बैठे रहे। फिर उन्होंने पास में पड़े कुछ सूखे पत्ते उठाए और उन्हें मसल दिया। ऐसा करते ही पत्ते चरमराने लगे। फिर उन्होंने कहा, “सूखे पत्ते भी कुचलने पर आवाज़ करते हैं। मैं तो एक जीवित इंसान हूँ, जिसके पास हृदय है। जब आपस में जुड़े हुए तत्व अलग होते हैं तब आवाज़ ज़रूर होती है। ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है।” प्रेम, परवाह करने और लगाव की भावना मनुष्य के लिए स्वाभाविक है चाहे वह मुक्त हो गया हो या न हुआ हो। हमारी यात्रा मानव से मानवीय और फिर दैवीय और उसके भी आगे जाने की है। इस विकास-यात्रा में आप सृष्टि रचना की अंतर्निहित वास्तविकताओं से परे नहीं जाते बल्कि आप उनके साथ एक हो जाते हैं।
बाबूजी ने इन सभी सत्यों को एक ही वाक्यांश में व्यक्त किया है -
प्रेमपूर्ण अनासक्ति।
अनासक्ति का अर्थ है विकसित होना।
विकसित होना प्रेम की अभिव्यक्ति है।
प्रेम करने का अर्थ है अनासक्ति।
और इस प्रकार यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
हमारी यात्रा मानव से मानवीय और फिर दैवीय और उसके भी आगे जाने की है। इस विकास-यात्रा में आप सृष्टि रचना की अंतर्निहित वास्तविकताओं से परे नहीं जाते बल्कि आप उनके साथ एक हो जाते हैं।

