गौर गोपाल दास एक भारतीय भिक्षु, लाइफ़स्टाइल कोच और प्रेरक वक्ता हैं जो पहले इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे। वे कहते हैं कि समस्याएँ तो अवश्यंभावी हैं। वे हमें बताते हैं कि किस प्रकार आंतरिक शांति की अवस्था विकसित करने से हमें समस्याओं से जूझने में मदद मिल सकती है और फिर ये समस्याएँ हमें एक संतोषप्रद और परिपूर्ण जीवन जीने से नहीं रोक पातीं।
आपमें से कितने लोग स्कूल में वर्तनी में अच्छे थे? आपमें से कितने लोग स्कूल में वर्तनी में खराब थे? आपमें से कितने लोगों को स्कूल में वर्तनी की परवाह ही नहीं थी?
एक लड़के से उसके शिक्षक ने पूछा, “तुम भारत के किस राज्य से हो?” उसने कहा, “मैडम, मैं अरुणाचल प्रदेश से हूँ।”
शिक्षक ने पूछा, “क्या तुम मेरे लिए इसकी वर्तनी बता सकते हो?”
लड़के ने कहा, “दरअसल, मैं गोवा से हूँ।”
अरुणाचल प्रदेश की वर्तनी की किसे ज़रूरत है? लेकिन यदि आप ‘सफलता’ (success) शब्द को अंग्रेज़ी में लिखते हैं तो दूसरा अक्षर ‘U’ (अर्थात आप) है। आपके बिना इतने भव्य समारोह का सफलतापूर्वक आयोजन किया जाना संभव ही नहीं था। ‘U’ के बिना सफलता (success) शब्द हो ही नहीं सकता है। आप सबके बिना ऐसा कोई आयोजन नहीं हो सकता है। मेरे मन में आप सब के प्रति बहुत सम्मान है क्योंकि आप सब आध्यात्मिकता के इस विविधतापूर्ण व गहन क्षेत्र के बारे में जानने के लिए इतने खुले दिल और खुले मन के साथ यहाँ आए हैं।
आप में से कितने लोग समस्याओं का सामना कर रहे हैं? कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या? कार्यस्थल पर होने वाली राजनीति संबंधी समस्या? कोई वित्तीय देनदारी? भावनात्मक मुद्दे? मानसिक स्वास्थ्य समस्या? रिश्तों की समस्या? आंतरिक शांति पाने में सबसे बड़ी बाधा समस्याएँ हैं। आपमें से कितने लोग समस्याओं का समाधान चाहते हैं? हम सभी चाहते हैं।
आप जो भी हों, समस्याएँ आपके जीवन का अभिन्न अंग हैं। क्या आपको लगता है कि इस मंच पर बैठे सम्मानित अतिथियों को कोई समस्या नहीं है? क्या आपको लगता है कि उन्हें कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं है या जब इतने बड़े पैमाने पर आयोजन किए जाने की बात आती है तो संचालन और क्रियान्वयन संबंधी समस्याएँ नहीं हैं? आध्यात्मिक हों या न हों, जब हम मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर रह रहे हैं तो हम सभी के सामने समस्याएँ आती हैं। ज़िंदगी हमें हर दिन परेशान करती है। जीवन ही हमारी आंतरिक शांति के लिए संकट उत्पन्न कर रहा है। चुनौतियाँ, मुद्दे, समस्याएँ, आपदाएँ, कठिन परिस्थितियाँ और कठिनाइयाँ हमारी आंतरिक शांति को नष्ट कर रही हैं।
आपमें से कितने लोगों ने महसूस किया है, “अब मेरा स्वास्थ्य बेहतर है।” क्या आपने कभी राहत की साँस ली है? जैसे ही कोई समस्या दूर हो जाती है आप राहत की साँस लेते हैं। बहुत से लोगों के लिए शांति की परिभाषा समस्याओं का अभाव है।

यह विश्व व्यक्तिगत चेतना का सामूहिक प्रतिबिंब है। यदि मैं शांतिपूर्ण नहीं हूँ तो दुनिया कैसे शांतिपूर्ण होगी? यदि इस पृथ्वी पर नागरिकों को शांति नहीं मिलती है तो यह विश्व शांतिपूर्ण कैसे हो सकता है?
आप यहाँ क्यों आए हैं? आप सबसे दूर होने और कुछ शांति पाने के लिए आए हैं। लोग सोचते हैं, “जब सारी समस्याएँ दूर हो जाएँगी तब मुझे शांति मिलेगी।” किंतु वास्तविकता इससे एकदम विपरीत है। जब आप शांतचित्त होंगे तभी आप अपनी समस्याओं से बेहतर ढंग से निपट सकेंगे। आज एक समस्या दूर होगी, कल दूसरी आ जाएगी। जब आपका स्वास्थ्य बेहतर होता है तब आर्थिक समस्याएँ आ जाती हैं। जब आपकी वित्तीय स्थिति बेहतर होती है तब रिश्तों में समस्याएँ आ जाती हैं। जब रिश्ते बेहतर होते हैं तब सामाजिक समस्याएँ आ जाती हैं। जब सामाजिक जीवन बेहतर होता है तब मौसम की समस्या होती है। समस्याएँ कभी समाप्त नहीं होंगी।
जब आपको आंतरिक शांति मिल जाती है तब आप अपनी समस्याओं से सफलतापूर्वक निपट पाते हैं। आज दुनिया में ऐसे व्यक्तियों की कमी है जो अपनी चुनौतियों से सफलतापूर्वक गुज़र पाते हैं। यह विश्व व्यक्तिगत चेतना का सामूहिक प्रतिबिंब है। यदि मैं शांतिपूर्ण नहीं हूँ तो दुनिया कैसे शांतिपूर्ण होगी? यदि इस पृथ्वी पर नागरिकों को शांति नहीं मिलती है तो यह विश्व शांतिपूर्ण कैसे हो सकता है?
मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ। एक राजा था जिसे कला से अत्यधिक लगाव था। चार दिनों तक एक शिष्य के रूप में अभ्यास करने के बाद उसने घोषणा की कि जो व्यक्ति शांति का चित्रण करने वाला सर्वोत्तम चित्र बनाएगा उसे एक हज़ार सोने के सिक्कों से पुरस्कृत किया जाएगा। हज़ारों कलाकारों ने चित्र बनाना शुरू किया और उन हज़ारों चित्रों में से दो को राजा के सामने प्रस्तुत किए जाने के लिए चुना गया। दोनों चित्र ढके हुए थे।
राजा ने पहले चित्र का अनावरण किया। उसमें उन्होंने पूर्णतः स्वच्छ और अतिसुंदर नीलहरित रंग के पानी को देखा। वे झील के तल को देख सकते थे। चित्र में सुंदर पहाड़ थे, उड़ते हुए पक्षी थे, साफ़ आसमान में हल्के-फुल्के बादल थे और झील की सतह पर सुंदर हंस तैर रहे थे। उन्होंने कहा, “यह शांति को दर्शाता सबसे अच्छा चित्र लगता है।” उसके बाद उन्होंने दूसरे चित्र का अनावरण किया जिसमें अंधकारमय, सूना और अवसादकारी आकाश था। उसमें कड़कती बिजली और मूसलाधार बारिश को चित्रित किया गया था। वहाँ एक सूखा पहाड़ था जिस पर कोई हरियाली नहीं थी। केवल एक पेड़ था जिसमें एक छोटी-सी शाखा थी। उस शाखा पर एक घोंसला था। उस घोंसले में एक मादा पक्षी अपने बच्चों को खाना खिला रही थी।
सोचो राजा ने किस चित्र को पुरस्कार दिया? दूसरे चित्र को, क्योंकि पहला चित्र एक मिथक है। जीवन प्रशांत, निर्मल और साफ़-सुथरा नहीं है। जीवन शांतिपूर्ण नहीं है। जीवन में चुनौतियाँ, अराजकता, तबाही, समस्याएँ, कठिनाइयाँ, कठिन परिस्थितियाँ और क्लेश हैं। इस अंधेरे के बीच मैं अपने हृदय में अपना आंतरिक घोंसला बना सकता हूँ। मेरा हृदय अंधकारमय आसमान के नीचे उस घोंसले की तरह है। मेरी नौकरी चली गई। मैंने अपने माता-पिता को खो दिया, मैंने अपना जीवनसाथी खो दिया, मैंने अपना स्वास्थ्य खो दिया, मैंने अपनी धन-संपदा खो दी... सब कुछ खो दिया। वह बाहर की दुनिया है लेकिन जब मैं अपने बच्चों को भोजन कराती चिड़िया की तरह अपने हृदय के शांतपूर्ण घोंसले में प्रवेश करता हूँ तो यह शांति का वास्तविक स्वरूप है - अराजकता और तबाही से भरी दुनिया में शांति प्राप्त करना।
5,000 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में यही हुआ था। अर्जुन को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? उसकी संपत्तियाँ छीन ली गईं, उसके अधिकार छीन लिए गए, उसकी पत्नी को निर्वस्त्र किया गया, उसके बेटों को मार दिया गया और इन सबके बीच वह युद्ध के मैदान में अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास कर रहा था। ऐसे असमंजस और अंधेरे में वह अपने मित्र और मार्गदर्शक श्री कृष्ण की ओर मुड़ा और कहा, “मुझे नहीं पता कि इस अंधेरे को कैसे पार किया जाए। हे कृष्ण! कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।”
उस घोंसले को खोजने में मदद करने के लिए हमें एक मार्गदर्शक, एक आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता है। आज हमारे पास यहाँ ऐसे आध्यात्मिक गुरु बैठे हैं। उनकी बातों को सुनें, किंतु केवल उनका अनुसरण करने के लिए नहीं। अन्यथा आप बस एक अन्य गुरु के अंधे अनुयायी बन जाएँगे। उन्हें उनकी आवाज़ सुनने के लिए नहीं सुनें। उनकी आवाज़ सुनें ताकि आप अपनी आवाज़ सुनना शुरू कर सकें। यदि आप अपनी आवाज़ को नहीं सुन सकते हैं तो इसका अर्थ है कि पूरी आध्यात्मिक यात्रा ही विफल हो गई है।
जीवन एक यात्रा है, चीज़ें विकसित होती हैं। आपको सभी समस्याओं का निदान इसी समय खोजने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप ईश्वर में आस्था रखते हैं तो ईश्वर की ओर मुड़िए। यदि आप नास्तिक हैं तो जीवन या ब्रह्मांड की ओर मुड़िए। आपको यह अकेले नहीं करना है। किसी के साथ जुड़िए और यह सब अपने दिमाग से निकाल दीजिए।

मैं चार चीज़ों की सिफ़ारिश करना चाहूँगा। प्रथम, जब आप चुनौतियों का सामना कर रहे हों और आप आंतरिक शांति पाना चाहते हों तब अपने आप से कहें, “एक समीकरण में पाई (π), 3.1814 है, जिसे आप बदल नहीं सकते हैं और एक एक्स (x) है।” एक्स पर केंद्रित रहना आपको सशक्त बनाता है। आप ‘पाई,’ जो बदल नहीं सकती, पर जितना अधिक केंद्रित रहेंगे उतने ही अधिक निराश होंगे। अतः अपने आप से कहें, “मैं ‘पाई’ पर अपनी ऊर्जा और शांति व्यर्थ नहीं करूँगा।”
दूसरी, स्वयं से कहें, “इस क्षण समस्त संसार की समस्याएँ मेरी समस्याएँ नहीं हैं। मुझे अभी तक परमज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। अभी तो मुझे अपनी समस्याओं से निपटना है।”
तीसरी, स्वयं से कहें, “मुझे इसी समय सभी प्रश्नों के उत्तर और सभी समस्याओं का समाधान नहीं चाहिए।” जीवन एक यात्रा है, चीज़ें विकसित होती हैं। आपको सभी समस्याओं का निदान इसी समय खोजने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप ईश्वर में आस्था रखते हैं तो ईश्वर की ओर मुड़िए। यदि आप नास्तिक हैं तो जीवन या ब्रह्मांड की ओर मुड़िए। आपको यह अकेले नहीं करना है। किसी के साथ जुड़िए और यह सब अपने दिमाग से निकाल दीजिए।
दाजी ने कहा है, “आज इस संसार में, धर्म को हमारे बीच अलगाव मत पैदा करने दीजिए।” दो और आठ मिलकर दस होते हैं। सात और तीन मिलकर भी दस होते हैं। छः और चार मिलकर भी दस होते हैं तथा नौ और एक मिलकर भी दस होते हैं। अंतिम लक्ष्य ‘दस’ तक पहुँचने के कई तरीके हैं। आइए, हम एक-दूसरे का सम्मान करें। जैसा कि दाजी ने कहा है, हमें एक-दूसरे को सहन नहीं करना है अपितु एक-दूसरे को स्वीकार करना है - सहनशीलता से स्वीकार्यता तक। इसे और आगे भी ले जाएँ। आइए, हम एक महान मानवता के रूप में पारस्परिक संबंधों का जश्न मनाएँ।

गौर गोपाल दास
गौर गोपाल दास एक भारतीय भिक्षु, लाइफ़स्टाइल कोच और ‘इंटरनेशनल सोसाइटी फ़ॉर कृष्णा कॉन्... और पढ़ें
