नीलाक्षी राजखोवा भारत में बहाई मत की नेशनल स्पिरिचुअल असेंबली (राष्ट्रीय आध्यात्मिक सदन) में सार्वजनिक मामलों के कार्यालय की निदेशक हैं। महोत्सव के दौरान उन्होंने मौजूदा संकट से उबरने हेतु एकजुट होने के लिए सबका आव्हान किया और कहा कि इसकी शुरुआत हृदय से होनी चाहिए।

 में से हर एक व्यक्ति को बहाई समुदाय की ओर से सादर प्रणाम। इस वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव में भाग लेते हुए मैं बेहद खुश और सम्मानित महसूस कर रही हूँ। हम सबको इस जगह पर एकत्रित करने के लिए धन्यवाद।

बहाई समुदाय के एक उद्धरण से मैं शुरुआत करना चाहूँगी, “हे आत्मपुत्र, मेरा सबसे पहला परामर्श यही है - अपने हृदय को शुद्ध, दयावान और उज्ज्वल बनाओ ताकि तुम्हारी सत्ता चिरकालिक, अविनाशी और चिरस्थाई हो।”

इस सब की शुरुआत हृदय से होती है और हार्टफुलनेस हर हृदय को खोलने की कोशिश कर रहा है ताकि हम जाति, धर्म और लिंग भेद से परे जाकर प्रेम, एकता और करुणा को अपना सकें। इस प्रयास में भाग लेकर मैं बहुत खुश हूँ और आप लोगों के साथ बहाई समुदाय के कुछ विचार साझा करना चाहती हूँ।

दोस्तों, हम ऐसे कई कारकों को देखते हैं जो भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करके रखते हैं। देश को जोड़नेवाला एक महत्वपूर्ण बल है 'आध्यात्मिकता'। आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति इंसान को ईश्वर की रचना मानने में होती है और इसमें सभी पृष्ठभूमि के उन लोगों को स्वीकार किया व अपनाया जाता है जो हर प्राणी में ईश्वर की झलक देखते हैं। इसके चलते, एक आदर्श जीवन के लिए हर संबंध आदर, सौम्यता और अहिंसा से परिपूर्ण माना जाता है। यही वह सर्वव्यापी एकता की भावना है जो “वसुधैव कुटुंबकम,” यानी सारा विश्व एक परिवार है, के प्राचीन लोकाचार में कही गई है।

सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में एकजुटता राष्ट्रों की एकता के प्रगतिशील प्रदर्शन का एक पड़ाव होगा। मानवीय एकता का सिद्धांत जब हर एक की चेतना में बस जाएगा और जब सारी दुनिया एक परिवार की तरह एकजुट हो जाएगी तभी यह आदर्श पूर्ण रूप से फलीभूत होगा।

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इतिहास गवाह है कि सिर्फ़ धर्म ही लोगों को गहराई तक प्रेरित कर सकता है और ऐसे लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी उत्कृष्टतात्याग और पहल करने की भावना का आह्वान कर सकता है।


पिछले कुछ दशकों में धार्मिक रूढ़ीवाद पुनः सक्रिय होने लगा है जो धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता का प्रतीक है। सामाजिक और राजनैतिक मुख्यधारा में भी इसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है और कई देशों में तो सार्वजानिक भाषणों में यह हावी रहता है। इस कारण से धर्म की अवधारणा के बारे में भ्रांतियाँ बढ़ गई हैं क्योंकि धर्म की एकीकृत करने वाली और सकारात्मक भूमिका अब केवल एक पहचान पाने के दृष्टिकोण द्वारा धूमिल हो गई है। ये चुनौतियाँ बेहद अनिश्चितता के दौर में उभर रही हैं जब वर्तमान और आने वाले संकटों से सफलतापूर्वक पार पाने के लिए एकता की बहुत ज़रूरत है। इसमें कोविड की महामारी, भूराजनैतिक अस्थिरता, युद्ध, आर्थिक मंदी, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, खाद्य-संकट, ऊर्जा-संकट जैसे कई संकट शामिल हैं।

इस समय ज़रूरत है सकारात्मक बातचीत की यानी सामाजिक सामंजस्य में धर्म के योगदान के विषय पर एक ऐसे संवाद की जिसमें सारे धर्म गुरु और धर्मों के प्रतिनिधि शामिल हों। इस संवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने का काम धर्म के मूल स्वरूप और उसके उद्देश्य तथा हर धर्म के समान आधार को स्पष्ट करके किया जा सकता है। इस तरह के संवाद से एक ऐसा व्यावहारिक पथ प्रदर्शन मिलना चाहिए जिससे हम अंतरधार्मिक सहयोग प्राप्त कर पाएँ। सभी धर्मों में भाईचारे की परंपरा को बचाए रखने के लिए हर व्यक्ति को, धार्मिक गुरुओं को, समुदायों को और संस्थाओं को प्रयास करने होंगे। लेकिन ऐसे प्रयास बहुत सीमित रह सकते हैं यदि सभी धर्मों में एकता को एक सामाजिक आवश्यकता के रूप में समझने के बजाय उसे ही लक्ष्य मान लिया जाता है।

इतिहास के इस समय में सारे एकजुट समुदायों को, सामाजिक रूपांतरण और निरंतर बढ़ती हुई भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि में योगदान देने के साझे लक्ष्य को पाने के लिए प्रेरित होना होगा। अन्यथा यह एकता मौजूदा हालात और उससे जुड़े अन्याय और चुनौतियों की बस एक निष्क्रिय स्वीकृति बनकर रह जाएगी।

जब सारे धर्म आध्यात्मिक सिद्धांतों को अपनाकर एक संयुक्त, न्यायोचित और समृद्ध समाज बनाने के लिए एकजुट होंगे तब वह निश्चित ही सभी धर्मों में सामंजस्य का सबसे सुरक्षित आधार होगा। इक्कीसवीं सदी की जटिल व अभूतपूर्व चुनौतियों से जूझने के लिए हमें अपने विचारों और व्यवहार के तरीके में गहन बदलाव लाना होगा और लोक कल्याण के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना होगा। प्रकृति के साथ अपना संतुलन बहाल करने और अधिक एकीकृत रहने के लिए हमें अपने ढाँचे और व्यवस्था में जिस तरह के बदलावों की ज़रूरत है, उसके लिए अभूतपूर्व पैमाने के और अभूतपूर्व अवधि के लिए निस्स्वार्थ प्रयासों की आवश्यकता होगी।

इतिहास गवाह है कि सिर्फ़ धर्म ही लोगों को गहराई तक प्रेरित कर सकता है और ऐसे लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी उत्कृष्टता, त्याग और पहल करने की भावना का आह्वान कर सकता है। इस वक्त दुनिया के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि धर्म फिर से हमारी रग-रग में बस जाए और अपनी चुनौतियों से जूझने के लिए हम एक सामूहिक प्रतिक्रिया करने लगें।


युवा दुनिया को हिला सकते हैं। प्रगतिशांतिमानवीय समृद्धि के क्षेत्रों में इन युवाओं की बहुत ही अहम भूमिका है। चाहे वे कहीं भी रह रहे हों परंतु युवा एक बेहतर समाज चाहते हैं। वे पक्षपात और पूर्वाग्रहों से परे एकता में विश्वास रखते हैं। वे अपने और अपने साथियों के लिए एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य चाहते हैं।


आज धार्मिक गुरुओं की यही भूमिका है कि अपने अनुयायियों का ध्यान दुनिया की आवश्यकताओं की तरफ़ मोड़ें। कोविड-19 महामारी के सबसे भयंकर दौर में इस बात के कई मर्मस्पर्शी उदाहरण देखे गए। भारत के 25 धर्मगुरु और अंतर-धार्मिक अभियानों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया था जिसमें उन धार्मिक सिद्धांतों का उल्लेख किया गया था जो इस संकट के दौरान लोगों की प्रतिक्रिया करने के सबसे अच्छे ढंग से संबद्ध थे। भारत के बहाई समुदाय द्वारा समन्वित वक्तव्य में सारे धर्मों का आव्हान किया गया था कि उस संकट के लिए उपयुक्त आध्यात्मिक सिद्धांतों के प्रति एक सामूहिक ज़िम्मेदारी निभाएँ। और वह वक्तव्य आज की चुनौतियों के लिए भी उतना ही उपयुक्त है - जैसे सभी धर्मों की अखंडता, मानव जाति की एकात्मकता, लोक कल्याण के लिए निःस्वार्थ और त्यागमयी सेवा तथा धर्म व विज्ञान की संपूरकता को समझना। भले ही यह एक मामूली सी कोशिश थी लेकिन यह कोशिश समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उस अत्यधिक सामर्थ्य को दर्शाती है जो आम लोगों की आध्यात्मिकता में मौजूद है, जिसका कभी उपयोग ही नहीं किया गया और जिसे सभी धर्म गुरु एकजुट होकर लोक कल्याण के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

एक और समूह जिसमें बेइंतहा क्षमता और काबिलियत है वह है हमारे युवा। युवा दुनिया को हिला सकते हैं। प्रगति, शांति, मानवीय समृद्धि के क्षेत्रों में इन युवाओं की बहुत ही अहम भूमिका है। चाहे वे कहीं भी रह रहे हों परंतु युवा एक बेहतर समाज चाहते हैं। वे पक्षपात और पूर्वाग्रहों से परे एकता में विश्वास रखते हैं। वे अपने और अपने साथियों के लिए एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य चाहते हैं।

अब वक्त आ गया है कि एकता और सामंजस्य हमारा प्रमुख विचार बन जाए, हमारी प्रमुख पहचान बन जाए और हम धार्मिक मतभेदों को उस प्राचीन इतिहास में वापस भेज दें जो भावनात्मक रूप से कम विकसित था। आइए हम धर्म के ज्ञान की ताकत को उन सकारात्मक प्रयासों की ओर मोड़ें जिनसे हम भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि ला सकें। इस तरह, भारत वैश्विक सामंजस्य और शांति में अपना योगदान दे सकता है और विश्व में आध्यात्मिकता और और सभी धर्मों में सामंजस्य स्थापित करने में नेतृत्व कर सकता है।

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अब वक्त आ गया है कि एकता और सामंजस्य हमारा प्रमुख विचार बन जाएहमारी प्रमुख पहचान बन जाए और हम धार्मिक मतभेदों को उस प्राचीन इतिहास में वापस भेज दें जो भावनात्मक रूप से कम विकसित था। आइए हम धर्म के ज्ञान की ताकत को उन सकारात्मक प्रयासों की ओर मोड़ें जिनसे हम भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि ला सकें।


 


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