सारा बब्बर ज्ञानसंवादसच्चाई और साहस के बारे में उपनिषदों से ली गई एक कहानी बताती हैं। वे हमें प्रकृति से जुड़ने के लिए कुछ विचार और एक गतिविधि भी देती हैं।

 

सत्यकाम

एक दिन एक छोटा लड़का ऋषि गौतम के पास उनके शिक्षण केंद्र में आया और बोला, “आदरणीय गुरुजी, मैं एक छात्र के रूप में आपके पास रहना चाहता हूँ। कृपया मुझे स्वीकार करें और मुझे शिक्षा दें।”

ऋषि ने पूछा, “प्रिय बालक, तुम कहाँ से आए हो?”

लड़के ने उत्तर दिया, “गुरुजी, मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ से आया हूँ। मैं अपनी माँ के साथ रहता हूँ जिसने मुझे बताया है कि वह जबाला है और मैं सत्यकाम हूँ। इसलिए गुरुजी, मैं आपके सामने अपने आप को सत्यकाम जाबाल के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।”

यह सुनकर ऋषि गौतम मुस्कुराए और उन्होंने कहा, “तुम एक साहसी और बहादुर लड़के हो और वाकई में सीखने के लिए तैयार हो। मैं तुम्हें एक छात्र के रूप में दीक्षा दूँगा क्योंकि तुम सत्य से विचलित नहीं हुए हो।”

इस प्रकार सत्यकाम जाबाल एक छात्र बन गया।

कुछ दिनों बाद ऋषि गौतम ने चार सौ दुबली-पतली और कमज़ोर गायों को छाँटा और सत्यकाम से कहा, “प्रिय बालक, इन गायों को जंगल में ले जाओ, उन्हें वहाँ चराओ और जब उनकी संख्या एक हज़ार हो जाए तब उन्हें वापस ले आना।”

सत्यकाम ने गुरु को प्रणाम किया और गायों को हाँकते हुए कहा, “गुरुजी, जब तक इन गायों की संख्या एक हज़ार नहीं हो जाती तब तक मैं वापस नहीं आऊँगा।”

सत्यकाम जंगल में रहता था और गायों की देखभाल करता था। कई साल बीत गए और गायों की संख्या बढ़कर हज़ार हो गई।

 

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एक शाम एक बैल सत्यकाम के पास आया और उससे बोला, “प्रिय बालक! अब हमारी संख्या एक हज़ार हो गई है। चलो हम गुरुकुल लौट चलें।” बैल ने सत्यकाम से कहा कि वह उसे सच्चे ज्ञानब्रह्म, का एक चौथाई भाग सिखाएगा। “वह इतना तेजस्वी है कि यदि कोई उस पर ध्यान करता है तो वह भी उतना ही तेजस्वी बन जाता है।”

भोर होते ही सत्यकाम ने गुरुकुल की ओर अपनी यात्रा शुरू की।

शाम को वह एक स्थान पर रुका और गायों को आराम करने के लिए इकट्ठा किया। उसने आग जलाई और उसके सामने बैठ गया। तब आग ने उसे संबोधित किया, “प्रिय बालक, मैं तुम्हें सच्ची विद्याब्रह्म, के बारे में थोड़ा और सिखाऊँगी। वह अनंत है। जो इस अनंत वास्तविकता पर ध्यान करता है वह असीमित सामर्थ्य के साथ अनंत बन जाता है।”

 

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अगली सुबह, सत्यकाम गुरुकुल की ओर चल दिया। सहसा एक हंस उड़ता हुआ आया और बोला, “सत्यकाम! मैं तुम्हें ब्रह्म के बारे में थोड़ा और सिखाऊँगा। वह दीप्तिमान है और अच्छाई प्रसारित करता है। जो उसे दीप्तिमान के रूप में जानता है और उस पर ध्यान करता है वह इस दुनिया में दीप्तिमान बन जाता है।” फिर हंस ने उसे बताया कि एक जलपक्षी उसे ब्रह्म का अंतिम भाग सिखाएगा।

 

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जैसे ही सत्यकाम गुरुकुल की ओर बढ़ने लगा वह जलपक्षी के संपर्क में आया जिसने उसे अंतिम रहस्य बताया। “सत्यकाम! मैं तुम्हें सच्चे ज्ञानब्रह्म, का अंतिम भाग बताऊँगा। वह संपूर्ण सृष्टि का आधार है। जो उसे सृष्टि के आधार के रूप में जानता है और उस पर ध्यान करता है वह वही बन जाता है।”

 

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जब सत्यकाम हज़ार गायों के साथ गुरु के आश्रम पहुँचा तो गुरु ने उससे पूछा, “प्रिय बालक, तुम्हारा चेहरा ब्रह्मज्ञान से चमक रहा है। तुम्हें यह किसने सिखाया?”

सत्यकाम ने उन्हें अपने चार शिक्षकों के बारे में बताया और कहा, “गुरुजी, अब मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरी शिक्षा को सार्थक बनाएँ क्योंकि मुझे जो ज्ञान मिला है वह आपके मार्गदर्शन से परिपक्व हो जाएगा।”

ऋषि ने वैसा ही किया और सत्यकाम ने उनसे सीखा। बाद में वह खुद भी एक शिक्षक बन गया।


प्रमुख विचार

शिक्षक हर जगह हैं। जिस प्रकार सत्यकाम ने प्रकृति से सीखा उसी प्रकार आप भी सोचें कि प्रकृति आपको क्या सिखा रही है।

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सारा बब्बर

सारा एक कहानीकार, मोंटेसरी सलाहकार और बच्चों की एक पुस्तक की लेखिका हैं। वे एक प्रकृतिवादी भी हैं और बाल्यावस्था में पारिस्थितिकी चेतना के विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं। वे आठ वर्षों... और पढ़ें

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