मानवीय रिश्तों में सच्चे जुड़ाव पुनर्स्थापित करना
नेगिन एम. खोरासानी अपनी माँ की बीमारी के दौरान उनके साथ रहने के अनुभव पर विचार करती हैं जिससे वे जान पाती हैं कि उपस्थिति, स्वीकार्यता और संबंधों पर ध्यान देने से हमारे रिश्तों में पुनः सच्चाई आ सकती है।
मैं.जो भी लिख रही हूँ, यह अपनी माँ की बीमारी में उनके साथ मौजूद रहते हुए मेरे अनुभव और निरंतर चिंतन से उत्पन्न हुआ है। यह एक ऐसी यात्रा है जो मेरी इस समझ को और भी गहरा करती है कि किसी के साथ पूरी तरह उपस्थित रहना क्या मायने रखता है।
हमारे आधुनिक जीवन में रिश्ते अक्सर लेन-देन तक सीमित हो जाते हैं। जीवन तेज़ी से आगे बढ़ता है; हम सवाल-जवाब, माँग-पूर्ति, क्रिया-प्रतिक्रिया करने में लगे रहते हैं और इस परिचित लय में जुड़ाव का मौन सत्व कहीं खो जाता है। रिश्ते इतनी आसानी से लेन-देन वाले बन सकते हैं जो इस बात से ज़्यादा प्रभावित होते हैं कि हम एक-दूसरे के लिए क्या करते हैं, बजाय इसके कि हम एक-दूसरे के साथ कैसे रहते हैं।
उपस्थिति की यह कमी तब और भी ज़्यादा दिखाई देती है जब हम जल्दबाज़ी में होते हैं - काम पर जाने की जल्दी में होते हैं और “मैं तुमसे प्यार करता /करती हूँ” कहने या सुनने के मौके से चूक जाते हैं। किसी यात्रा पर निकलने से पहले हम थोड़ा रुककर एक-दूसरे को प्यार से गले भी नहीं लगाते या इससे भी ज़्यादा पीड़ादायक बात उन पलों में होती है जब जीवन ही अंत की ओर तेज़ी से बढ़ रहा होता है; जैसा कि हम सहायता प्राप्त मृत्यु (euthanasia) की बढ़ती स्वीकार्यता में देखते हैं। कभी-कभी, उस जल्दबाज़ी में दिलों को मिलने, बात करने, जो कुछ घटित हो रहा है उसे समझने और शांति से विदा लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता है।
ऐसे ही पलों में हमें जुड़ाव के गहरे अर्थ की याद आती है कि हमारे रिश्ते सिर्फ़ कामों पर नहीं, बल्कि उपस्थिति पर बनते हैं। जो चीज़ हमें सबसे ज़्यादा पोषित करती है, वह यह नहीं है कि हम क्या देते हैं या लेते हैं, बल्कि वह है कि हम हर मुलाकात में किस तरह से उपस्थित रहते हैं।
सच्चा रिश्ता - काम से परे देखना
एक सच्चा रिश्ता पूरे किए गए कामों या निभाई गई भूमिकाओं के योग से परिभाषित नहीं होता है। बल्कि यह दूसरे व्यक्ति को एक पूर्ण, जीवित इंसान मानने में निहित है, जिसकी अपनी आंतरिक दुनिया, कमज़ोरियाँ और गरिमा है। जैसा कि दार्शनिक मार्टिन बूबर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आई एंड दाउ’ में लिखा है, मैं-तुम और मैं-यह के रिश्ते के बीच एक मौलिक अंतर है - पहले वाले में दूसरे को एक उपस्थिति के रूप में देखा जाता है न कि कोई वस्तु के रूप में, जिसे संभालने की ज़रूरत है।
ऐसे रिश्तों में संदेश सरल लेकिन गहरा होता है –
एक सच्चा रिश्ता पूरे किए गए कामों या निभाई गई भूमिकाओं के योग से परिभाषित नहीं होता है। बल्कि यह दूसरे व्यक्ति को एक पूर्ण, जीवित इंसान मानने में निहित है, जिसकी अपनी आंतरिक दुनिया, कमज़ोरियाँ और गरिमा है।
“आप जैसे हैं, आपको वैसे ही देखा जाता है, न कि सिर्फ़ इस बात से कि आप क्या करते हैं।”
मानवतावादी मनोविज्ञान में भी यही भावना निहित है। अपनी पुस्तक ‘ऑन बिकमिंग ए पर्सन’ में मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स निस्स्वार्थ सकारात्मक सम्मान की परिवर्तनकारी शक्ति का वर्णन करते हैं जिसमें वे बताते हैं कि लोग तब फलते-फूलते हैं जब उन्हें उनकी उपयोगिता या अपेक्षाओं के अनुरूप होने के बजाय उनकी मूलभूत सज्जनता के लिए दिल से स्वीकार किया जाता है।
स्वीकार्यता - सुधार से पहले जुड़ाव
स्वीकार्यता को अक्सर निष्क्रिय सहनशीलता के रूप में गलत समझा जाता है। फिर भी सच्ची स्वीकार्यता उपस्थिति का एक सक्रिय भाव है, न कि अनुपालन का। यह तब शुरू होती है जब हम सुधारने या नियंत्रित करने की इच्छा को रोकने का निर्णय लेते हैं और पूरे ध्यान से और सच्चे जुड़ाव की चाहत के साथ दूसरे के अनुभव को देखते हैं।
इंटरपर्सनल न्यूरोबायोलॉजी यानी पारस्परिक तंत्रिका जीवविज्ञान में, डैनियल सीगल और स्टीफ़न पॉरजेस एवं अन्य लोगों के काम के माध्यम से, यह बताया गया है कि भावनात्मक और संबंधपरक स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए रिश्तों में सह-नियमन अर्थात तंत्रिका तंत्र का आपसी तालमेल आवश्यक है। स्वीकार्यता से दोनों पक्ष सुरक्षित महसूस करते हैं जिससे वे अपनी रक्षात्मक प्रवृत्ति को छोड़कर वास्तविक संपर्क बनाते हैं।
स्वीकार्यता समझौता करने के समान नहीं है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि हम हानिकारक व्यवहार को माफ़ करें या सीमाओं को न मानें। इसके बजाय, इसमें दूसरे की वास्तविकता को स्वीकार करना निहित है जिससे समानुभूति, समझ और संबंधों में गहराई को पोषित करने के लिए मज़बूत आधार बनता है।
स्वीकार्यता को अक्सर निष्क्रिय सहनशीलता के रूप में गलत समझा जाता है। फिर भी सच्ची स्वीकार्यता उपस्थिति का एक सक्रिय भाव है, न कि अनुपालन का। यह तब शुरू होती है जब हम सुधारने या नियंत्रित करने की इच्छा को रोकने का निर्णय लेते हैं और पूरे ध्यान से और सच्चे जुड़ाव की चाहत के साथ दूसरे के अनुभव को देखते हैं।

लेन-देन से उपस्थिति तक - परिस्थितियों में बदलाव
कई रिश्तों में, विशेष रूप से परिवारों में, देखभाल करने में और संस्थागत संदर्भों में कार्यक्षमता पर अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि वहाँ भूमिकाएँ, कार्य और अपेक्षाएँ हावी होती हैं। सच्चाई को पुनः स्थापित करने के लिए हमें जानबूझकर इन यांत्रिक तरीकों को बाधित करना चाहिए
करने के बजाए होने पर केंद्रित रहें।
कुछ कहने या करने से पहले थोड़ा रुकें। अंदर ही अंदर पूछें - क्या मैं इस व्यक्ति को एक इंसान के रूप में देख रहा हूँ, जाँच-सूची के रूप में तो नहीं?
संबंधपरक सूक्ष्म-अभ्यास अपनाएँ।
छोटे, सोच-समझकर किए गए कार्य - एकसाथ चुपचाप बैठना, एक नज़र जिससे समझ आ जाता है कि आप सम्मान करते हैं, बिना किसी उद्देश्य के सुनने का एक क्षण - बातचीत को लेन-देन के बजाय संबंध जोड़ने वाली बनाते हैं।
अपने पर नियंत्रण रखकर उपस्थित रहें।
जब देखभाल करना आवश्यक हो या समय सीमित हो तब भी कार्य करने का तरीका गरिमा और स्वीकार्यता को व्यक्त कर सकता है। सेवा करने के साथ उपस्थित भी रहने से वह कर्म संबंध को बेहतर बनाता है।
केवल कार्यों में नहीं, बल्कि ध्यान देने में में पारस्परिकता का सम्मान करें।
रिश्ते वास्तव में इस बात से संतुलित नहीं होते कि कौन क्या करता है; वे एक-दूसरे की आंतरिक दुनिया की पारस्परिक स्वीकार्यता से संतुलित होते हैं।
इन उपायों की जानकारी ध्यान परंपराओं में भी है और संबंधपरक तंत्रिकाविज्ञान में भी है। ध्यान परंपराएँ उपस्थिति को रूपांतरण का माध्यम मानती हैं और संबंधपरक तंत्रिकाविज्ञान तालमेल में रहने वाले जुड़ाव के जैविक महत्व को उजागर करता है।
रिश्ते वास्तव में इस बात से संतुलित नहीं होते कि कौन क्या करता है; वे एक-दूसरे की आंतरिक दुनिया की पारस्परिक स्वीकार्यता से संतुलित होते हैं।
बीमारी के संदर्भ में हर मुलाकात जुड़ने का निमंत्रण है
बीमारी ज़िंदगी की सीमितता की बहुत अच्छी तरह याद दिलाती है। ऐसी परिस्थितियों में रिश्तों की अहमियत साफ़ हो जाती है - हमें नहीं पता कि हम कितने समय तक साथ रहेंगे और इसलिए हर मुलाकात की गुणवत्ता समय की मात्रा से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
जब रिश्ते सिर्फ़ निवेदनों और कामों तक सिमट जाते हैं तब उस रिश्ते की गहराई को खोने का खतरा होता है जो सबसे ज़्यादा मायने रखती है। यह विरोधाभास ही है कि बीमारी उस चीज़ को वापस पाने का मौका देती है जो शायद खो गई थी यानी रिश्ते का मर्म।
व्यावहारिक निहितार्थ में शामिल हैं -
- जानबूझकर धीमा होना - इरादतन समय निकालें ताकि आप सच में देख सकें और सुन सकें, भले ही बहुत ज़रूरी काम हों।
- समस्या के समाधान से ज़्यादा साथ रहने को महत्व देना - शांति से साथ रहना किसी काम को पूरा करने से ज़्यादा सुकून देने वाला हो सकता है।
- पलों का आनंद लेना - जब समय कम होता है तब छोटे-छोटे हाव-भाव, साथ मिलकर हँसना या चुपचाप स्वीकार करना, रिश्तों पर बहुत बड़ा प्रभाव डालते हैं।
- बातचीत को जुड़ाव में बदलना - हर बातचीत में, चाहे वह कितनी भी काम से संबंधित हो, आदर और सम्मान की भावना हो सकती है।
दूसरे शब्दों में, बीमारी रिश्तों की प्राथमिकताओं को बदल देती है - उपस्थित रहना सबसे महत्वपूर्ण तोहफ़ा बन जाता है जो हम दे सकते हैं। यहाँ तक कि एक सच्ची बातचीत भी जब अच्छे इरादे और प्यार से की जाती है तब बहुत ज़्यादा बदलाव ला सकती है।
आंतरिक स्थिति में बदलाव
बड़ा बदलाव अंदर से शुरू होता है। यह दूसरे को बदलने के बारे में नहीं है, बल्कि यह उनके साथ अपने व्यवहार को बदलने के बारे में है। एक सूक्ष्म आंतरिक स्थिति ऐसी लग सकती है -
- “किसी को सही करने की कोशिश करने से पहले, मैं समझूँगा।”
- “जवाब देने से पहले मैं तुम्हारी मौजूदगी को महसूस करूँगा।”
- “काम करने से पहले मैं स्थिति पर ध्यान दूँगा और फिर तय किए गए काम (एजेंडा) की ओर बढ़ूँगा।”
ये बदलाव भावनात्मक नहीं हैं; ये विकासवादी हैं। जब चिंतनशील विज्ञान और घटनात्मक दर्शन (अनुभव को समझने का दर्शन) मिलते हैं, हम यह समझने लगते हैं कि जिस तरह से हम चीज़ों पर ध्यान देते हैं, उसकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। यह रिश्तों को और इसमें शामिल सभी लोगों के आंतरिक संसार को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष - देखभाल की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति के रूप में उपस्थिति
जब ज़िंदगी अनिश्चित होती है, बीमारी का खतरा होता है या समय सीमित लगता है तब इंसानी रिश्तों की संवेदनहीनता और लेन-देन के तरीके उजागर हो जाते हैं। ये सुरक्षात्मक आदतें होती हैं जो सच्चे जुड़ाव को छिपाती हैं। सच्चाई को वापस पाना कोई विलासिता नहीं है - यह प्रेम और समझदारी का एक ज़रूरी
काम है।
असली जुड़ाव को फिर से बनाने का अर्थ है -
- •मामूली चीज़ों में पवित्रता को पहचानना।
- •अनुरोध के पीछे इंसान को देखना।
- •इस तरह परवाह की भावना के साथ जवाब देना जो आंतरिक संसार और व्यावहारिक वास्तविकता दोनों का सम्मान करे।
- •कम समय होने पर भी संबंधपरक उपस्थिति बनाए रखना जो उसे हमेशा पोषित करती रहे।
पार्कर पामर हमें अपनी पुस्तक, ‘ऑन द ब्रिंक ऑफ़ एवरीथिंग’, में याद दिलाते हैं, “मनुष्य की उपस्थिति दुनिया में बदलाव लाने के लिए सबसे शक्तिशाली ताकत है।” इस नज़रिए से रिश्ते सिर्फ़ कामचलाऊ लेन-देन नहीं रह जाते, बल्कि एक-दूसरे की जागृति के क्षेत्र बन जाते हैं जहाँ बीमारी, बुढ़ापा और सीमित समय होने पर हम ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं और हमें स्थायी सच्चाई का पता लगता है - उपस्थिति मार्ग भी है और उपहार भी।
इस नज़रिए से रिश्ते सिर्फ़ कामचलाऊ लेन-देन नहीं रह जाते, बल्कि एक-दूसरे की जागृति के क्षेत्र बन जाते हैं जहाँ बीमारी, बुढ़ापा और सीमित समय होने पर हम ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं और हमें स्थायी सच्चाई का पता लगता है - उपस्थिति मार्ग भी है और उपहार भी।

नेगिन खुरासानी
नेगिन एक सामाजिक उद्यमी एवं सक्रिय कार्यकर्ता हैं जो आंतरिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्ध हैं। वे एक लेखिकाऔर पढ़ें
