एलिज़ाबेथ डेनली अवधान की बदलती गुणवत्ता के बारे में बताती हैं - केंद्रित अवलोकन से लेकर प्रेमपूर्ण तन्मयता तक।
“महान बनने के लिए, संपूर्ण बनो;
कुछ भी न छोड़ो और जो तुम नहीं हो उसे बढ़ा-चढ़ाकर मत दिखाओ।
जो भी करो, पूरे मन से करो।
अपने छोटे से छोटे कार्य में भी अपना संपूर्ण डाल दो।
तभी वह चमकेगा, जैसे हर झील में चाँद चमकता है,
क्योंकि चाँद ऊपर आकाश में पूर्णतः शोभायमान है।”
—फ़र्नांडो पेसोआ
“जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को ध्यानपूर्वक देखता है, चाहे वह घास का एक तिनका ही क्यों न हो, तब वह अपने आप में एक रहस्यमय, अद्भुत और अवर्णनीय रूप से भव्य संसार बन जाता है।”
—हेनरी मिलर
फ़र्नांडो पेसोआ के कथन, “अपने हर छोटे से छोटे कार्य में भी अपना संपूर्ण डाल दो,” का क्या अर्थ है? और हेनरी मिलर द्वारा हमें “किसी भी वस्तु को ध्यानपूर्वक देखने” के लिए प्रेरित करने के पीछे क्या आशय है? शायद आप रसायन विज्ञान पर, संगीत पर, अपने बच्चों पर या अपने आंतरिक अनंत ब्रह्मांड पर पूरा ध्यान देते हों। स्वामी विवेकानंद अपनी पुस्तक ‘राज योग’ में इस प्रक्रिया को सरल शब्दों में और वैज्ञानिक दृष्टि से वर्णित करते हैं। वे कहते हैं, “मन ही महत्वपूर्ण साधन है। एकाग्रता की शक्ति जब सही ढंग से मार्गदर्शित होकर आंतरिक जगत की ओर निर्देशित होती है तब वह मन का विश्लेषण करती है और हमारे लिए तथ्यों को उजागर करती है। मन की शक्तियाँ प्रकाश की किरणों की तरह छितरी रहती हैं; लेकिन जब ये शक्तियाँ एकत्रित हो जाती हैं तब वे आलोकित करती हैं। यह हमारा ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। हर कोई इसका उपयोग बाहरी जगत और आंतरिक जगत, दोनों में करता है। मनोवैज्ञानिक उसी सूक्ष्म निरीक्षण को आंतरिक जगत की ओर निर्देशित करता है, जिसे वैज्ञानिक बाहरी जगत की ओर निर्देशित करता है। और इसके लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता होती है।
अवधान की शुरुआत संकल्प से होती है, जो व्यक्ति को एक विशेष लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अपनी विचार-ऊर्जा को निर्देशित करने के लिए प्रेरित करता है। योग में ऊर्जा को ‘प्राण’ कहा जाता है और ऊर्जा पर नियंत्रण ‘प्राणायाम’ कहलाता है। प्राणायाम योग का चौथा अंग है। वास्तव में, प्राणायाम को अवधान की परिभाषा मानना उतना ही उपयुक्त है जितना कि उसे श्वास अभ्यास के रूप में परिभाषित करना जैसा कि सामान्यतः समझा जाता है। किसी विषय पर अपनी विचार-ऊर्जा केंद्रित करने से वह विषय स्पष्ट हो जाता है। मानव मन की शक्ति असीमित है। जब हम इस शक्ति का उचित उपयोग अपने आंतरिक और बाह्य संसार में करते हैं तब दोनों के रहस्य हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं।
इसे बिना बल प्रयोग के करना सर्वोत्तम है, क्योंकि बल प्रयोग क्षेत्र को संकीर्ण कर देता है। सबसे प्रभावी अवधान व्यापक और सहज होता है। इसे योग में समाधि के रूप में वर्णित किया गया है, जो योग का आठवाँ अंग है। समाधि ध्यान के अभ्यास द्वारा विकसित होती है। ध्यान में धारणा और ध्यान दोनों शामिल होते हैं, जो योग के छठे और सातवें अंग हैं। विशेष रूप से, धारणा का मतलब है, विचार को एकाग्रित करना। यह तब होता है जब हम अपना अवधान किसी एक वस्तु या बिंदु पर स्थिर रखते हैं ताकि अनुभव का प्रवाह सहज रूप से समाधि की ओर बढ़ सके। और ध्यान वह साधन है जो हमें परम सत्य तक पहुँचाता है।
अवधान अलग-अलग प्रकार का होता है - एक अवधान पूर्णतया अवलोकनात्मक या वैज्ञानिक होता है और दूसरा प्रेम, उपस्थिति तथा अवधान की वस्तु के साथ एकत्व से परिपूर्ण होता है। दोनों के अलग-अलग गुण हैं और दोनों का अपना महत्व है। वैज्ञानिक अवधान विवेक और स्पष्टता के लिए आवश्यक है, जबकि प्रेमपूर्ण अवधान एक अलग स्तर की अनुभूति प्रदान करता है जिसमें एकात्मकता का एहसास होता है। इस अवस्था में कृपा स्वतः हृदय में प्रवाहित होती है।
फिर एक ऐसा अवधान भी है जो चेतन क्षेत्र से परे है। यह एक मिथ्याभास जैसा लग सकता है, लेकिन अनुभव द्वारा इसकी पुष्टि की जा सकती है। चेतना में अहंकार और सभी अवचेतन आदतें व प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं। अवधान जब चेतन क्षेत्र से परे चला जाता है और जब हम उसमें पूरी तरह तल्लीन हो जाते हैं तब वह वास्तव में रोचक हो जाता है। इसके लिए ध्यान के माध्यम से भीतर की ओर मुड़ना सहायक होता है।
प्राणाहुति के साथ किया ध्यान इस उद्देश्य के लिए सर्वोत्तम है क्योंकि प्राणाहुति हमें थामे रखती है और हमें उच्चतर आयामों में अत्यंत सहज तरीके से पहुँचा देती है। फ़ारसी और उर्दू में प्राणाहुति के लिए ‘तवज्जो’ शब्द बिलकुल उपयुक्त है, जिसका अर्थ भी ‘ध्यान देना’ होता है। प्राणाहुति स्वाभाविक रूप से हमारे अवधान को आत्मा की प्रेरणाओं के माध्यम से हमारे अस्तित्व की सबसे भीतरी परतों तक ले जाती है। यह हमें उस क्षेत्र में ले जाती है जो सार्वभौमिक चेतना से भी परे है और जहाँ पहुँचने की इच्छा बहुत साधक रखते हैं।
अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनना यह जानने का एक अद्भुत तरीका है कि हम इन विभिन्न प्रकार के अवधान का उपयोग कैसे करते हैं। हम बहुत सटीक व गौर करते हुए सुन सकते हैं; प्रेमपूर्ण ढंग से सुन सकते हैं, जो समानुभूति और करुणा की सुगंध से भरा हो; और ऐसे ढंग से भी सुन सकते हैं, जो बिना परिस्थिति पर कोई अतिरिक्त बोझ डाले बस एक समर्पित हृदय में स्थित हो।
अंततः, हमारा अवधान स्वतः ही उन चीज़ों की ओर चला जाता है जिन्हें हम चाहते हैं, क्योंकि वहीं हमारी रुचि होती है। इसी कारण यह बहुत ज़रूरी है कि हम उन बातों को खोजें जिन्हें हम सच में चाहते हैं और उन्हें ईमानदारी से अपनाएँ, चाहे वे जीवन के अलग-अलग चरणों में बदलती रहती हैं।
हमारा अवधान स्वतः ही उन चीज़ों की ओर चला जाता है जिन्हें हम चाहते हैं, क्योंकि वहीं हमारी रुचि होती है। इसी कारण यह बहुत ज़रूरी है कि हम उन बातों को खोजें जिन्हें हम सच में चाहते हैं और उन्हें ईमानदारी से अपनाएँ, चाहे वे जीवन के अलग-अलग चरणों में बदलती रहती हैं।
