पूज्य श्री गिशी दोरजी दामदुल ‘परम पूज्य दलाई लामा सांस्कृतिक केंद्र’ तिब्बत हाउसनई दिल्ली के निदेशक हैं। वे मानव जाति की समस्याओं के हल के लिए सार्वभौमिक आचार-संहिता का समर्थन करते हैं। यहाँ वे विश्व शांति के मनोविज्ञान पर अपने कुछ विचार व्यक्त कर रहे हैं और उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण भी सुझा रहे हैं।

 

दि हम विश्व शांति के बारे में बात करना चाहते हैं तो पहले हमें स्वयं आंतरिक शांति का अनुभव करना चाहिए जिस प्रकार सोने का निर्यात करने के लिए सोना हमारे पास होना चाहिए। लेकिन इस संदर्भ में हमसे कहाँ गलती हो रही है? यह मुख्यतया आंतरिक शांति के मनोविज्ञान को समझ पाने में हमारी असफलता है।

अपने जीवन के उस एक क्षण के बारे में सोचें जब आपने अधिकतम शांति को महसूस किया - वह सबसे सुंदर क्षण! अब कल्पना करें कि आप इसका विस्तार अपने परिवार के सभी सदस्यों तक, अपने सारे देशवासियों तक और समस्त विश्व तक कर रहे हैं। यही विश्व शांति है।


अपने जीवन के उस एक क्षण के बारे में सोचें जब आपने अधिकतम शांति को महसूस किया - वह सबसे सुंदर क्षण! अब कल्पना करें कि आप इसका विस्तार अपने परिवार के सभी सदस्यों तकअपने सारे देशवासियों तक और समस्त विश्व तक कर रहे हैं। यही विश्व शांति है।


इस संबंध में, अपने मन में सबसे सुंदर व महत्वपूर्ण घटना की कल्पना करें। अक्सर लोग सूर्यास्त देखने की बात करते हैं लेकिन सबसे अच्छा क्षण जो हममें से अधिकतर लोगों ने अनुभव किया है, वह है अपनी माँ का प्यार जब हम दो, तीन, चार, पाँच या छ: साल के थे। यदि आप उसी तरह का प्रेम व स्नेह भाव सबके प्रति रख सकें तो यही सार्वभौमिक शांति है, यही सार्वभौमिक करुणा है।

अब, हम इसको कैसे कर सकते हैं? इसके लिए हमें थोड़ा मनोविज्ञान के बारे में जानना पड़ेगा कि मन कैसे काम करता है। जब हमने जन्म लिया था तब हममें माँ के प्रति कोई प्यार नहीं था। लेकिन कुछ वर्षों में ही हमारे अंदर उनके प्रति गहन प्रेम विकसित हो गया। जिस चीज़ ने इस प्रेम को विकसित किया, वह था - हमारा अपनी माँ को एक लाभप्रद स्रोत के रूप में देखना। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपने हर सुख के लिए अपनी माँ पर पूरी तरह से निर्भर थे।

इसलिए यदि किसी तरह हम दूसरों पर - अपने पड़ोसी पर, अपने देश के समस्त स्त्री-पुरुषों पर, विश्व और प्रकृति पर – निर्भरता महसूस करने लगें तो हमारे अंदर उनके प्रति भी प्रेम विकसित हो जाएगा। यही हमारी समझ का राज़ है, “मुझे प्रकृति का ध्यान रखना है, मुझे अपने परिवार के सदस्यों का और इस विश्व के समस्त नागरिकों का ध्यान रखना है।” यह हमें जुड़ाव का एहसास कराता है। इसी को सार्वभौमिक शांति कहते हैं।

इस संदर्भ में मुझे याद आता है कि परम पूज्य चौदहवें दलाई लामा जब भारत और विदेशों में भ्रमण कर रहे थे तब श्रोताओं की ओर से, खासतौर से शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से, अनेक बार यह प्रश्न आता था, “हम कहाँ गलत जा रहे हैं? विश्व में शांति की कमी होती जा रही है।” और बिना एक बार भी सोचे परम पूज्य दलाई लामा का उत्तर होता था, “यह हमारी आधुनिक शिक्षा पद्धति की सीमितता का परिणाम है।” हमारी आधुनिक शिक्षा पद्धति इस तरह से बनाई गई है कि जो भी यह बता दे कि ‘दो और पाँच मिलकर सात’ होता है, उसकी प्रशंसा होती है। जबकि यदि आप में महात्मा गाँधी के समान बनने की क्षमता भी हो तो भी यदि आप जवाब में ‘दो और पाँच का जोड़ तकरीबन सात’ कह दें तो आप असफल माने जाएँगे। कोई भी आपके दिल को और आपके साहस व दृढ़ विश्वास को महत्व नहीं देगा।

परम पूज्य दलाई लामा कहते हैं कि हमें अपनी आधुनिक शिक्षा पद्धति को पूरक बनाने की आवश्यकता है जो वास्तव में औद्योगिक क्रांति का अवशेष है। इसमें दिल की शिक्षा जोड़ना ज़रूरी है। यही उनका संदेश है। यदि हम अपने साथी मनुष्यों और प्रकृति के साथ अपनी परस्पर संबद्धता की संज्ञानात्मक समझ के माध्यम से ऐसा कर पाते हैं तो प्रकृति से और समस्त मनुष्य जाति से हमें स्वतः ही प्रेम हो जाएगा।

(कान्हा शांतिवनम् में 14 से 17 मार्च, 2024 के बीच हुए विश्व आध्यात्मिक महोत्सव के दौरान दी गई वार्ता से उद्धृत अंश।)


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गिशी दोरजी दामदुल

गिशी दोरजी दामदुल

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