डॉ. इचक अडीज़ेस अपना दिल खोलने और बाद के जीवन में महसूस करने से शुरू करके प्रेम करना सीखने की प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं।

मैं.नाज़ियों द्वारा यहूदियों के नरसंहार से बच निकला था। बचपन में मैंने अपने दिल को बंद कर लिया था और मैं प्रेम नहीं कर पा रहा था क्योंकि मुझे डर था कि जिसे मैं प्रेम करूँगा, वह मर जाएगा। जीवन के पहले सत्तर वर्षों तक मैं बिना प्रेम के रहा और अपनी सारी ऊर्जा अपने मस्तिष्क के विकास पर ही लगा दी। इससे व्यावसायिक जीवन में तो बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ मिलीं लेकिन प्रेम के बिना मैं जीवन में खुश नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में मैंने यह समझने में समय लगाया कि दिल कैसे खोला जाए। (इसका वर्णन मेरी आत्मकथा ‘द अकॉर्डियन प्लेयर’ में किया गया है।) इस लेख में मैं इस विषय पर प्राप्त कुछ जानकारियाँ साझा करना चाहता हूँ और पाठकों से दो प्रश्न पूछना चाहता हूँ — शायद कोई मदद कर सके या उत्तर सुझा सके।

प्रेम करने के लिए पहली शर्त है महसूस करना। मैं प्रेम नहीं कर सका क्योंकि मैं महसूस करने से डरता था। मुझे डर था कि अगर मैंने खुद को महसूस करने दिया तो मैं बिखर जाऊँगा। तो, प्रेम करने के लिए मुझे पहले प्रेम भाव को महसूस करना सीखना था। लेकिन कैसे?

मुझे लगता है कि लोग कुछ चीज़ों के बारे में कुछ महसूस करते हैं। कुछ भी महसूस न करना असामान्य होगा। मेरे मामले में, मैंने तब महसूस किया जब मैंने अपने सामने अत्यंत सुंदर प्रकृति को देखा। जब मैं नॉर्वे के उत्तरी भाग में था और एक पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर एक खूबसूरत फ़्योर्ड (पहाड़ों के बीच का समुद्री भाग) को देख रहा था, जो मानव बस्ती से अछूता था, तब मेरे दिल में भावनाओं का आवेग उमड़ आया। मुझे अपार खुशी हुई, ऐसा कुछ जो मेरे सीने में भर गया। मुझे न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन ओपेरा में ला बोएम की एक अद्भुत प्रस्तुति भी याद है — न जाने क्यों, लेकिन वह इतनी अद्भुत थी कि मैं रो पड़ा। कोई-कोई संगीत — रैप आदि नहीं, जो मेरे बच्चे सुनते हैं — मेरा दिल खोल देता है और मैं उसमें डूब जाता हूँ। वही अनुभूति मुझे बेहतरीन कला व वास्तुकला को देखने या अपने पोते-पोतियों के साथ खेलने में होती है।

हम सभी किसी न किसी समय कुछ न कुछ महसूस करते हैं। कोई भी इससे अछूता नहीं है, जब तक कि उनके अंदर कोई गंभीर भावनात्मक रुकावट न हो। यहाँ तक कि उन नाज़ियों ने भी, जिन्होंने लोगों की हत्या की और बच्चों को गैस चेंबर में डाला, अपने बच्चों के साथ खेलते हुए प्रेम तो महसूस किया होगा।

यदि हम समझ सकें कि कुछ विशेष परिस्थितियों में हम प्रेम क्यों महसूस करते हैं तो शायद हम उस अनुभूति को दोहरा सकें और प्रेम को फैला सकें जिसकी इस दुनिया को बहुत ज़रूरत है। आधुनिक समाज में जिस अभूतपूर्व गति से परिवर्तन हो रहा है, उससे समस्याएँ पैदा हो रही हैं। ऐसे में यदि हम उन्हें प्रेम के बजाय घृणा से हल करने का आसान रास्ता चुनें तो यह दुनिया अपने विनाश की ओर बढ़ रही होगी।

 

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तो ऐसा क्या समान तत्व है जो अनछुई प्रकृति, संगीत, कला, वास्तुकला या किसी बच्चे के साथ खेलने से पैदा होने वाली भावनाओं को जोड़ता है?

जब हम महसूस करते हैं तब हम सोचना बंद कर देते हैं — मन शांत हो जाता है। दूसरा, कोई विघ्न या व्यवधान नहीं होता। तब हम उसके लिए, जिससे हमारी भावनाएँ जागृत होती हैं, पूरी तरह से उपस्थित होते हैं और उसमें लीन हो जाते हैं। समय का कोई भान नहीं रहता। एक और समान तत्व यह है कि हम सुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसा कोई खतरा या डर नहीं होता कि दिल खोलने से हमें कोई कष्ट होगा। मुझे यह विश्वास था कि अनछुई प्रकृति को देखने, बच्चे की मुस्कान देखने या संगीत में खो जाने से मैं आहत नहीं हो सकता। इनमें से किसी से भी मुझे कोई नुकसान नहीं हो सकता। मैं हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार था।


ध्यान में समय और स्थान की कोई बाधा नहीं होती। हम परमात्मा के साथ एकीकृत महसूस करते हुए किसी से दूर रहकर भी प्रेम कर सकते हैं।


महसूस करने के लिए ज़रूरी है - सोचना बंद करना, सुरक्षित महसूस करना, हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना और इस बात का डर न होना कि प्रेम करने से कोई चोट पहुँच सकती है। मन में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए ताकि हम अतीत या भविष्य से संबंधित भटकावों से मुक्त रहते हुए वर्तमान में बने रहें। ऐसे पलों में समय का कोई खयाल नहीं रहता। इस ज्ञान के आधार पर हम किस तरह लोगों की मदद कर सकते हैं ताकि वे महसूस कर सकें और परिणामस्वरूप प्रेम कर सकें?

मुझे लगता है कि ध्यान इन सभी शर्तों को पूरा करता है। जब हम ध्यान करते हैं तब हम सोचना बंद कर देते हैं और विचारों को बादलों की तरह गुज़रने देते हैं। हम फ़ोन जैसे विघ्नों को हटा देते हैं और खुद को एक शांत, सुरक्षित स्थान में पाते हैं। ध्यान हमें नुकसान नहीं पहुँचा सकता यदि हम अभ्यास के दौरान महसूस करने की कोशिश करें। इससे मेरे मन में एक विचार आया कि ध्यान में प्रशिक्षकों को किसी के हृदय की सफ़ाई की कल्पना करने के बजाय या सफ़ाई करने के साथ-साथ खुद प्रेम महसूस करना चाहिए और उस प्रेम को ग्रहणकर्ता को संप्रेषित करना चाहिए।

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ध्यान में समय और स्थान की कोई बाधा नहीं होती। हम परमात्मा के साथ एकीकृत महसूस करते हुए किसी से दूर रहकर भी प्रेम कर सकते हैं। यदि प्रशिक्षक प्रेम संप्रेषित करें तो मैं मानता हूँ कि ग्रहणकर्ता उसे अवश्य महसूस करेंगे। और चूँकि प्रेम की भावना संक्रामक होती है, ग्रहणकर्ता वह प्रेम दूसरों के साथ साझा करेंगे और इस प्रकार प्रेम फैलेगा।

क्या प्रेम को पोषित करने, प्रोत्साहित करने और विकसित करने का कोई और तरीका है?

मेरा मानना है कि महसूस करने से पहले ज़रूरी है ‘जागरूकता’। आधुनिक दुनिया हमें अंतहीन क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं में इतना व्यस्त रखती है कि हमारे पास यह देखने का समय ही नहीं होता कि हमारे चारों ओर क्या हो रहा है। इसलिए इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि प्रेम को आज के युग में इतना सराहा जाता है।

लेकिन प्रेम के लिए सिर्फ़ जागरूकता ही पर्याप्त नहीं है। हमें सचेत होना होगा, यानी हमें यह समझना होगा कि जो हम जानते हैं, उसमें निहित अर्थ क्या है। उदाहरण के लिए, शायद हमारा ध्यान सड़क किनारे एक बेघर व्यक्ति पर चला जाए। लेकिन क्या हम सच में इस बात के प्रति सचेत हैं कि वह भूखा और कष्ट में है? हो सकता है वह नशे का आदी हो और अब जब उसे नशा नहीं मिल रहा, तो पीड़ा में हो।

इसके बाद आती है समानुभूति — यह एक भावना है उस व्यक्ति के लिए जिसकी स्थिति के बारे में हम जानते हैं और जिसके प्रति हम सचेत हैं। मेरा मानना है कि समानुभूति ही महसूस करने की शुरुआत है। अगला कदम है, अगर हम उस भावना के आधार पर उनके लिए कुछ करते हैं जिनके प्रति हम समानुभूति महसूस करते हैं तो वह भावना तब प्रेम बन जाती है।

प्रेम करने और ‘प्रेम में होने’ में अंतर है। हम लाखों लोगों या पूरी सृष्टि से प्रेम कर सकते हैं। इसका मतलब है कि हम उनके लिए “महसूस करते हैं”, हम उनकी परवाह करते हैं, उनके प्रति समानुभूति रखते हैं। लेकिन हम एक समय में सिर्फ़ एक व्यक्ति से ‘प्रेम’ करते हैं जो हमारा प्रियतम है। यह अंतर किस कारण होता है? दूसरा प्रश्न यह है - हम चेतना से समानुभूति की ओर कैसे बढ़ें? कोई बता सकता है?

कुछ सोच और एहसास,

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इचक अडीज़ेस

ichak@adizes.com

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