सारा बब्बर अनुभव और विवेक का महत्व समझाने के लिए एक सुंदर जापानी लोककथा सुनाती हैं और हमसे आत्म-चिंतन करने के लिए कहती हैं।

 

जापानी लोककथा

एक बार की बात है, एक किसान अपनी माँ के साथ एक छोटी सी जगह पर रहता था। वह खेत-मज़दूरी करके अपना परिवार पालता था। गरीब होने के बावजूद वह खुश था और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके देश ‘शाइनिंग’ पर एक तानाशाह राजा राज करता था। वह एक कुशल योद्धा भी था। उसके अंदर एक कमी थी - योद्धा होने के बावजूद वह हर उस चीज़ से डरता था जिससे अस्वस्थता और ताकत की कमी का संकेत मिलता था। उसका मानना था कि कमज़ोरी देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। एक दिन उसने सभी बुज़ुर्ग लोगों को कमज़ोर और बीमारी का प्रतीक बताते हुए एक कठोर आदेश जारी किया कि उन्हें देश छोड़ना होगा। लोग शक्तिशाली राजा से बहुत डरते थे, इसलिए उन्होंने इस आदेश पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

 

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गरीब किसान अपनी प्यारी माँ को जीवन में किसी भी चीज़ से ज़्यादा प्यार और सम्मान देता था। इसलिए क्रूर शासक के इस आदेश से उसे बहुत दुख हुआ। वह अपनी माँ का त्याग नहीं करना चाहता था।

उसने अपनी माँ को बचाने की योजना बनाई लेकिन यह योजना उसके काम नहीं आई। बेचारे किसान ने राजा की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को तैयार किया क्योंकि राजा की अवज्ञा करने का उसमें साहस नहीं था। वह अपनी माँ को छोड़ने के लिए कुछ अच्छे तरीके सोचने लगा और इसलिए उसने उसे ऐसे पहाड़ पर ले जाकर छोड़ने का फैसला किया जहाँ से लौटना नामुमकिन था।

अगले दिन अपना काम पूरा करने के बाद वह अपनी माँ को पहाड़ पर ले जाने के लिए तैयार हुआ। उसने सामान बाँधा जिसमें उसने थोड़े से कच्चे चावल डाले और ठंढे मीठे पानी से भरी तुंबी को अपने गले में लटका लिया। फिर भारी मन से उसने अपनी माँ को उठाकर अपनी पीठ पर लाद लिया।

 

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किसान ने अपनी यात्रा शुरू की। पहाड़ की चढ़ाई लंबी और कठिन थी। चढ़ते समय शिकारियों और लकड़हारों द्वारा बनाए गए कई रास्तों को देखकर वह भ्रमित हो गया। फिर भी उसने चलना जारी रखा। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि वह कौन से रास्ते पर चल रहा था। बिना कुछ सोच-विचार के वह ओबात्सुयामा यानी “वृद्धा का परित्याग” करने के लिए आगे बढ़ता रहा। अपनी ढलती उम्र के बावजूद उसकी माँ की दृष्टि बहुत तेज़ थी। उसने देखा कि उसका बेटा परिणाम के बारे में सोचे बिना तेज़ी से पहाड़ की चोटी तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था। किसान पूरी तरह से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने पर केंद्रित था, इस बात से बेखबर कि वह रात को घर कैसे लौटेगा।

दूसरी ओर उसकी माँ इसी बारे में सोच रही थी क्योंकि उम्र और अनुभव से उसमें वह विवेक था। वह जानती थी कि उसका बेटा पहाड़ के इतने सारे रास्तों से अपरिचित था और उसकी वापसी संकटपूर्ण हो सकती थी। उसने उसकी सुरक्षित घर वापसी सुनिश्चित करने के तरीकों के बारे में सोचा और उसे एक उपाय सूझा। उसने रास्तों के किनारे खड़े पेड़ों से छोटी टहनियों को तोड़ लिया और पहाड़ पर चढ़ते हुए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर वह उन्हें गिराती गई। टहनियों के छोटे-छोटे ढेर, जो उसने रास्तों पर नियमित दूरी पर गिराए, से एक बिंदीदार रेखा बन गई। वह जानती थी कि ऐसा करने से उसके बेटे को सुरक्षित लौटने में मदद मिलेगी।

पहाड़ की चोटी पर पहुँचकर किसान इस यात्रा और माँ को छोड़ने के विचार से थकान महसूस करने लगा। उसने माँ को नीचे उतारा, कुछ गिरे हुए देवदार के पत्तों को इकट्ठा किया और माँ के विश्राम के लिए एक नरम गद्दी बनाई। उसने माँ के झुके हुए कंधों के चारों ओर एक कोट लपेटा और दर्द भरे दिल व नम आँखों से विदाई ली।

 

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माँ ने काँपती आवाज़ में अपने बेटे को एक आखिरी सलाह दी। किसी भी माँ की तरहअपनी मृत्यु को नज़दीक देखकर भी वह अपने बेटे की सुरक्षा के बारे में ज़्यादा चिंतित थी। उसने उसे चेतावनी दी कि वह पहाड़ों में इधर-उधर न घूमे क्योंकि वह खतरनाक हो सकता था। उसने पहाड़ी रास्ते पर खुद के द्वारा गिराई गई टहनियों से बने रास्ते पर चलने की सलाह दी।


माँ ने काँपती आवाज़ में अपने बेटे को एक आखिरी सलाह दी। किसी भी माँ की तरह, अपनी मृत्यु को नज़दीक देखकर भी वह अपने बेटे की सुरक्षा के बारे में ज़्यादा चिंतित थी। उसने उसे चेतावनी दी कि वह पहाड़ों में इधर-उधर न घूमे क्योंकि वह खतरनाक हो सकता था। उसने पहाड़ी रास्ते पर खुद के द्वारा गिराई गई टहनियों से बने रास्ते पर चलने की सलाह दी। किसान ने पीछे मुड़कर देखा और टहनियों को देखकर हैरान रह गया। उसने अपनी माँ के हाथों को भी देखा जो टहनियों को इकट्ठा करने से खरोंच और खून से भरे हुए थे।

माँ के स्नेह ने उस पर गहरा प्रभाव डाला। उसने कहा, “आदरणीय माँ! आपकी दयालुता ने तो मेरा दिल द्रवित कर दिया।” वह ज़ोर से बोला, “मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। हम दोनों टहनियों के रास्ते वापस जाएँगे और जो भी परिणाम होगा उसे एक साथ भुगतेंगे।” किसान ने एक बार फिर अपनी प्यारी माँ को उठाया और चाँदनी रात में टहनियों के रास्ते जल्दी से पहाड़ से नीचे अपनी छोटी सी झोपड़ी में वापस आ गया। उसने अपनी माँ को रसोई के फ़र्श के नीचे छिपा दिया जहाँ उसने भोजन संग्रहीत कर रखा था। वह उसे सब कुछ देता था जिसकी उसे ज़रूरत होती थी। बस उसे केवल इस बात की चिंता थी कि लोगों को माँ के वहाँ होने के बारे में पता न चले। कई दिनों तक जब किसी ने उसकी बूढ़ी माँ को नहीं देखा तब उसने राहत की साँस ली।


माँ के स्नेह ने उस पर गहरा प्रभाव डाला। उसने कहा, ““आदरणीय माँ! आपकी दयालुता ने तो मेरा दिल द्रवित कर दिया।” वह ज़ोर से बोला, ““मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। हम दोनों टहनियों के रास्ते वापस जाएँगे और जो भी परिणाम होगाउसे एक साथ भुगतेंगे।”


उधर तानाशाह शासक ने लोगों पर अपना प्रभुत्व रखने और उन्हें परेशान करने के लिए एक और अतार्किक आदेश जारी किया। उसकी प्रजा के लिए वह आदेश बेतुका था क्योंकि प्रजा को राख से रस्सी बनाकर प्रस्तुत करनी थी जो एक असंभव काम लग रहा था। शाइनिंग के लोगों को डर था कि अगर उन्होंने उसके आदेशों का पालन नहीं किया तो उन्हें अवज्ञाकारी माना जाएगा। बेचारा किसान भी चिंतित था कि उस आदेश का पालन कैसे किया जाए।

उसने अपनी बुज़ुर्ग माँ को राजा की आज्ञा के बारे में बताया। कुछ दिनों बाद बुद्धिमान माँ ने अपने बेटे को मुड़े हुए पुआल से एक रस्सी बनाने और उसे ऐसी रात में सपाट पत्थरों की एक पंक्ति पर जलाने की सलाह दी जब हवा न चल रही हो। किसान ने शाइनिंग के लोगों को बुलाया और अपनी माँ के निर्देशों का पालन किया। तब एक चमत्कार हुआ! आग के बुझने के बाद पत्थर पर लगी राख रस्सी की तरह लग रही थी। इस तरह किसान ने राजा के आदेश का पालन किया।

 

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राख की रस्सी को देखकर राजा किसान की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हुआ। वह जानना चाहता था कि उसे ऐसा विचार कहाँ से आया। फिर किसान ने उसे अपनी माँ के घर में छिपे होने के बारे में बताया। कुछ समय के लिए राजा चुपचाप खड़ा रहा, फिर उसने एक नए निर्णय की घोषणा की। उसने कहा कि वह किसान को दंडित नहीं करेगा बल्कि अपने द्वारा स्थापित किए गए पुराने कठोर कानून को हटा देगा। उसने अपने नागरिकों से कहा कि शाइनिंग को युवाओं से ज़्यादा किसी और की भी ज़रूरत है। युवा देश की रक्षा में अपने प्रयासों को समर्पित करते हैं लेकिन बड़ों के अनुभव और विवेक के बिना उनका यह प्रयास व्यर्थ साबित होगा।


युवा देश की रक्षा में अपने प्रयासों को समर्पित करते हैं लेकिन बड़ों के अनुभव और विवेक के बिना उनका यह प्रयास व्यर्थ साबित होगा।


 


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सारा बब्बर

सारा एक कहानीकार, मोंटेसरी सलाहकार और बच्चों की एक पुस्तक की लेखिका हैं। वे एक प्रकृतिवादी भी हैं और बाल्यावस्था में पारिस्थितिकी चेतना के विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं। वे आठ वर्षों... और पढ़ें

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