गायत्री रामचंद्रन बातचीत में ईमानदारी और साहस के मूल्यों का महत्व बता रही हैं जो पहले अपने साथ और फिर दूसरों के साथ संवाद में बहुत ज़रूरी हैं। वे शिक्षिका के रूप में भारत के चेन्नई में स्थित श्री नटेसन विद्याशाला स्कूल की प्रमुख हैं और एक लेखिका के रूप में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के शिक्षा संस्करण और बहुत-सी राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में नियमित रूप से योगदान देती रही हैं। गायत्री आत्म-देखभाल का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त कर रही हैं जो निश्चित रूप से उनके साथी शिक्षकों और छात्रों को अपने हृदयों को खोलने और सत्यता के सदियों पुराने नैतिक मूल्य को अपनाने में उनकी सहायता करेगा।
जीवन परिपूर्ण था या कम से कम ऐसा प्रतीत होता था। मेरे पास वह सब कुछ था जिसकी सामान्यतया सभी को चाहत होती है - मेरा काम बढ़िया चल रहा था, मेरा निजी जीवन सुचारू था और बाहर से मैं खुश, सुखी और संतुष्ट दिखाई देती थी। मुझे लगता था जैसे मैं सफल और प्रसन्न थी। क्या मैं सचमुच थी? यदि आपने उस समय मुझसे पूछा होता तो मैं हाँ कहती — एक ज़ोरदार हाँ। कहीं कोई ऐसा तनाव नहीं था। कोई नाटक नहीं था। कुछ भी बिखरा हुआ नहीं था।
लेकिन एक छोटी-सी ‘ना’ भी थी। एक बहुत ही मद्धम-सा स्वर जो मेरे दिल के एक कोने में छिपा हुआ था। मैं इसे ठीक से समझा नहीं सकती थी लेकिन कुछ था जो ठीक नहीं लगता था। सब कुछ होने के बावजूद ऐसे भी दिन थे जब मुझे बिस्तर से उठने में संघर्ष करना पड़ता था; ऐसी रातें भी थीं जब बहुत कोशिश करने के बाद भी मुझे नींद नहीं आती थी। यहाँ तक कि जो काम मुझे कभी पसंद थे — जैसे मेरी सुबह और शाम की सैर — वे भी मुझे उबाऊ लगने लगे थे। लोगों से मिलकर मैं पहले ऊर्जावान महसूस करती थी और अब उसमें थकावट महसूस होती थी। मैं मुस्कराती थी, हँसती थी, लेकिन अंदर ही अंदर मुझे पता था कि यह असलियत नहीं थी। मैं उलझन में थी। मैं डरी हुई थी। मुझे नहीं पता था कि क्या हो रहा था। और सबसे खराब बात यह थी कि मैं जानती नहीं थी कि इस बारे में मुझे किससे बात करनी चाहिए।
क्या मुझे मदद लेनी चाहिए? मैं जिस तरह की इंसान हूँ या मैं जो काम करती हूँ... मैं कैसे मान सकती थी कि मेरे साथ कुछ गलत था? बाहर से सब कुछ ठीक था। लेकिन अंदर से सब ठीक नहीं था।
अंदर कुछ ठीक न होने की यह अनुभूति और भारीपन, आकस्मिक बीमारियाँ, अचानक आँसू आ जाना, धीरे-धीरे दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे थे। ये उस हद तक बढ़ गए कि मैं उन्हें फिर अनदेखा नहीं कर सकती थी। वह सिर्फ़ एक दौर नहीं था, वह एक तूफ़ान था जो चुपचाप मुझे अंदर अत्यधिक दुखी कर रहा था।
मुझे एहसास होने लगा कि शायद ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं अपनी ज़रूरतों को बहुत समय से अनदेखा कर रही थी। मैं अपने प्रियजनों को दुख पहुँचाने से इतना डरती थी कि मैंने वह सब करना बंद कर दिया था जो मुझे पसंद था। मैंने हमेशा दूसरों की खुशी को प्राथमिकता दी भले ही उसके लिए मुझे अपनी खुशी का त्याग करना पड़ा। मैं स्वयं से कहती थी कि मैं इस स्थिति को संभालने के लिए बहुत मज़बूत हूँ। जब तक मेरे आसपास के लोग ठीक हैं तब तक यदि मैं दुखी भी हूँ तो उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन सच्चाई तो यह थी कि उससे फ़र्क पड़ता था।
फिर मैंने अपनी एक बहुत ही करीबी मित्र को खो दिया जो मेरी सलाहकार व मेरे जीवन की मार्गदर्शक थी। जब भी मुझे अपने दिल की बात कहने की ज़रूरत पड़ती थी, वह हमेशा मेरा हाथ थामने, मुझे परामर्श देने और मेरी बात सुनने के लिए मौजूद रहती थी। मुझे लगा कि मैं उसे खोने के दुख से उबर चुकी थी। मैंने खुद से भी कहा कि मैं आगे बढ़ चुकी हूँ। लेकिन वास्तव में मैं उबर नहीं पाई थी। उसकी अनुपस्थिति का दर्द मुझे रह-रह कर कचोटता था। कभी-कभी छोटी-छोटी बातें - उसकी कोई याद, उसके साथ बिताया कोई पल - मुझे याद दिलाती थीं कि वह अब नहीं थी।
जीवन परिपूर्ण नहीं है और ऐसा होना ज़रूरी भी नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं पूरी तरह से और ईमानदारी से उन लोगों से अपनी बात स्पष्टतः कह पाऊँ जो मेरे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं।
ये खयाल कि अब मैं उससे मिल नहीं सकती, उसकी आवाज़ नहीं सुन सकती और उसका सहारा नहीं ले सकती, मुझे इतना गहरा दर्द देते थे कि मैं उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। मुझे उसकी बहुत याद आती थी और जितना मैं इस खयाल को दूर करने की कोशिश करती थी उतना ही यह मेरे साथ ही बना रहा और हर गुज़रते दिन के साथ भारी होता गया।
यह भारीपन कुछ ऐसा था जिसे मैं और अनदेखा नहीं कर सकती थी। बात केवल उसे खोने की नहीं थी, बल्कि यह अपने उन हिस्सों को खोने की बात थी जो तब तक देते रहे जब तक कुछ भी नहीं बचा। मुझे लगता था कि मेरे जीवन की नाव किसी भी तूफ़ान से पार पाने के लिए बहुत मज़बूत थी लेकिन फिर मैं सोचने लगी कि बहुत छोटा सा छेद भी धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से पानी को अंदर आने दे सकता है। और यदि समय रहते इसे ठीक नहीं किया गया तो यह मुझे डुबो भी सकता है। इसलिए इस दिखावे को, कि सब कुछ ठीक है, बंद करने का समय आ गया था। मैं बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी। यह उस छोटे शब्द ‘ना’ को सुनने का समय था।
मैंने अकेलेपन से बाहर निकलने की कोशिश की। मैंने लिखना शुरू किया और अपनी भावनाओं को कागज़ पर उड़ेलना शुरू कर दिया। क्या इससे मदद मिली? हाँ, लेकिन थोड़ी-सी। मैंने हर दिन में जो अच्छा था उस पर ध्यान दिया और उसका आभार व्यक्त करने के लिए डायरी लिखना शुरू किया। क्या इससे मदद मिली? हाँ, लेकिन थोड़ी सी ही। मैं फिर से गाना गाने लगी। मुझे उम्मीद थी कि इससे मुझे पहले जैसी खुशी मिलेगी। क्या इससे मदद मिली? हाँ, लेकिन वह भी कम ही थी। मैंने अपने दिन में मौन रहने के कुछ और पल जोड़े — पाँच मिनट से शुरू करके ग्यारह मिनट हो गए और फिर मैं दिन में दो बार इसका अभ्यास करने लगी। क्या इससे मदद मिली? हाँ, लेकिन वह भी थोड़ी सी ही।
इसी दौरान मुझे एहसास हुआ कि ये सभी चीज़ें सिर्फ़ थोड़ी ही मदद कर पा रही थीं। वे मेरे अंदर बढ़ते खालीपन को भरने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। एक दिन मैंने तय किया कि मुझे किसी से बात करने की आवश्यकता थी। मैंने सोचा था कि शायद बात करने व किसी को कह देने से मन का बोझ हल्का हो जाएगा। लेकिन जब बात करने का समय आया तो मैं ऐसा नहीं कर सकी।
डर ने मुझे रोक लिया -
दूसरों द्वारा आँके जाने का डर।
न समझे जाने का डर।
अनदेखा किए जाने का डर।
मूर्ख लगने का डर।
चुप रहने का डर।
गलत बात कहने का डर।
सबसे करीबी लोगों से भी बात करने में डर।
ये सारे डर मेरे अंदर घूम रहे थे, मेरे दिल में पड़ी गाँठों को और भी अधिक कस रहे थे और मेरे अंदर का संतुलन बिगाड़ रहे थे। मेरे अंदर की ऊर्जा उस तरह से प्रवाहित नहीं हो रही थी जैसी होनी चाहिए। मेरी नाव के छेद को और अनदेखा नहीं किया जा सकता था। परिस्थिति का सामना करने का समय आ गया था। अपने अंदर के घाव का उपचार करने का समय आ गया था। सब कुछ ठीक होने का दिखावा करना बंद करने का समय आ गया था।
और अंततः जब मैंने अपनी एक मित्र से बात की तब सब कुछ स्पष्ट होता गया। मुझे अपने संघर्ष की असली वजह का पता चल गया - बात करने का डर। अंदर ही अंदर मुझे डर था कि कहीं मुझे यह न कह दिया जाए कि मैं असभ्य, तर्कहीन या अस्वीकार्य हूँ। मुझे डर था कि मेरे शब्द बहस में तब्दील हो जाएँगे या दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाएँगे। धीरे-धीरे इस डर ने मुझे चुप करा दिया था। यह मेरे दिल में एक रुकावट बन गया था जो सालों तक दृढ़ होता रहा और अंततः मुझ पर पूरी तरह हावी हो गया।
उस दिन मुझे एक महत्वपूर्ण बात का एहसास हुआ – “मौन सुरक्षित महसूस करा सकता है लेकिन यह एक धीमा ज़हर भी हो सकता है। यह वहाँ भी दूरी पैदा करता है जहाँ निकटता होनी चाहिए। यह वहाँ दीवारें खड़ी कर देता है जहाँ पुल होने चाहिए।”
दूसरों को अपने विचारों और भावनाओं से बचाने की कोशिश में मैंने अनजाने में खुद को ही दंडित कर दिया। इससे भी बदतर, मैंने उन लोगों को दंडित किया जो मुझसे प्रेम करते थे, जो मेरी ईमानदारी के हकदार थे।
जब कुछ भी ठीक नहीं लग रहा था उस समय मुझे जो महसूस हो रहा था, उसे किसी को बताना चाहिए था, जो मैं चाहती थी उसे व्यक्त करना चाहिए था या जो मुझे चाहिए था उसे कह देना चाहिए था। इसके बजाए मैं सब कुछ दबाती चली गई और सब कुछ अपने अंदर रखती चली गई, जब तक यह मेरी सहनशक्ति से बाहर नहीं हो गया। और ऐसा करने में मैंने बहुत सारे खूबसूरत पलों को हाथ से जाने दिया। जब मुझे इस बात का एहसास हुआ तब मैं रो पड़ी। मैं अपने खोए हुए कीमती समय के लिए रोई, उन दिनों और महीनों के लिए रोई जिन्हें मैं कभी वापस नहीं पा सकती थी। उस समय के लिए रोई जब मैं ईमानदार हो सकती थी और मैं उन लोगों से गहराई से जुड़ सकती थी जो मेरे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते थे।
लेकिन पछतावे के उन आँसुओं के बीच कृतज्ञता के आँसू भी थे।
कृतज्ञता उस सर्वज्ञ, सर्व-प्रेममयी शक्ति के लिए जिसने मुझे इन सबके बीच भी संभाले रखा। कृतज्ञता इस बात के लिए कि अपनी चुप्पी के बावजूद मैंने वह नहीं खोया जो वास्तव में मायने रखता था। मुझे बहुत गहरी क्षति हो सकती थी और मेरा जीवन उस पड़ाव पर आ सकता था जहाँ आगे बढ़ने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता, जहाँ मैं अपने प्यार, अपनी खुशी, अपनी कृतज्ञता, अपने संघर्षों, अपनी असफलताओं और अपनी सफलताओं को व्यक्त नहीं कर पाती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेरे लिए जो कुछ भी और जो कोई भी प्रिय है, वह अभी भी मेरे पास है। और इसके लिए मैं बहुत आभारी हूँ।
अब अंततः मुझे अपनी नाव में छेद मिल गया है।
जीवन परिपूर्ण नहीं है और ऐसा होना ज़रूरी भी नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं पूरी तरह से और ईमानदारी से उन लोगों से अपनी बात स्पष्टतः कह पाऊँ जो मेरे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं।
मेरी नाव में छेद केवल चुप्पी नहीं थी बल्कि यह अपनी बात कहने का डर था। मुझे लगता था कि चुप्पी मेरी रक्षा करेगी। लेकिन मैं अब उस छेद को बंद करना सीख रही हूँ।

मैं बातचीत करना सीख रही हूँ, अपनी बात कहना सीख रही हूँ। मैं अपने आप को उन लोगों के सामने व्यक्त करना सीख रही हूँ जो मेरे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं, भले परिणाम कुछ भी हो। मैं नहीं चाहती कि डर मुझे कभी फिर से जकड़े।
मुझे उम्मीद है कि यदि आप इसे पढ़ रहे हैं तो आपको भी ऐसा करने का साहस मिलेगा। आकलन या अस्वीकृति के डर को अपने ऊपर हावी न होने दें। अपना सच बोलें। अपने दिल की बात कहें। अपने जीवन की नाव को ठीक करें।
क्योंकि इस कीमती जीवन को डूबने नहीं दिया जा सकता है।

गायत्री रामचंद्रन
गायत्री चेन्नई में श्री नटेसन विद्याशाला स्कूल की प्रमुख हैं। वे शिक्षा, और पढ़ें
