घरेलू गौरैया आमतौर पर शहरी क्षेत्रों में पाई जाती है। लेकिन पेड़ों के कम होते जाने और बढ़ते शहरीकरण के कारण घरेलू गौरैया की संख्या बच्चे

बच्चा दुनिया में मौजूद ईश्वर का सौंदर्य है, जो सारा बब्बर हमें अपने शब्दों में एक सुंदर पारंपरिक पंजाबी लोककथा सुनाती हैंजो एक छोटी गौरैया की उदारता और मेहनत की कहानी है। इसके बाददो मज़ेदार और रचनात्मक गतिविधियाँ भी हैं जिनसे आप अपने नए साल की शुरुआत कर सकते हैं। आइए कहानी का आनंद लें!

 

क समय की बात है, एक छोटी सी गौरैया थी। उसने एक खेत में कुछ अनाज बोने का फ़ैसला किया। उसका एक दोस्त था, कौवा। उसने अपने दोस्त कौवे से खेत तैयार करने में मदद माँगी। खेत को पानी देकर नम करना था। कौवे ने कहा कि वह चलकर इस काम को शुरू करे और वह पीछे-पीछे आ जाएगा। गौरैया देर तक इंतज़ार करती रही, लेकिन कौवा नहीं आया। फिर वह खुद ही खेत को पानी देने लगी।

कुछ दिनों बाद खेत में बीज बोने के लिए क्यारियाँ बनाने का समय आया। वह फिर से अपने दोस्त कौवे से टकरा गई और उससे मदद माँगी। कौवे ने फिर से वही कहा कि वह काम को शुरू करे और वह भी पीछे-पीछे खेत पर पहुँच जाएगा। गौरैया ने बीज बोना शुरू कर दिया लेकिन कौवा नहीं आया। दिन बीतते गए और बीज अंकुरित होने लगे। अब उन्हें देखभाल और रखवाली की आवश्यकता थी। गौरैया को पता था कि अब खेत को कीड़ों से बचाना और पानी देना ज़रूरी था। उसे मदद की ज़रूरत थी और वह अकेले यह काम नहीं कर सकती थी। एक बार फिर वह कौवे के पास गई, जो पेड़ पर आराम कर रहा था। कौवे ने इस बार भी कहा कि उसे गौरेया की मदद करने में खुशी होगी और वह उसके पीछे-पीछे पहुँच जाएगा।

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गौरैया खेत पर जाकर काम करने लगी लेकिन कौआ इस बार भी नहीं आया। गौरैया ने कड़ी मेहनत से खेत को कीड़ों से बचाया और उसकी अच्छी तरह देखभाल की जिससे फसल बहुत अच्छी हुई।

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तभी वहाँ कौवा उड़ते हुए आया और गौरैया को बोला कि उसने बहुत अच्छा काम किया है और यदि उसे कभी मदद की ज़रूरत पड़े तो वह करेगा। गौरैया ने कहा कि उसे फसल काटने में मदद चाहिए। कौवे ने वादा किया कि वह हाथ बँटाएगा। गौरैया ने फसल काटना शुरू किया, लेकिन कौवा वहाँ नहीं आया। गौरैया ने अनाज को इकट्ठा करके एक थैले में रख लिया। तभी कौवा आया और अनाज के थैले को लेकर उड़ गया। गौरैया के पास रह गया सिर्फ़ भूसा और पराली।

कुछ दिनों बाद एक बड़ा तूफ़ान आया। तेज़ वर्षा होने लगी और कौवा अनाज की बोरी में छुपने की कोशिश करने लगा लेकिन वह भीगने से बच नहीं सका। दूसरी ओर, गौरैया ने भूसे और पराली से अपने लिए एक घर बना लिया था, जिसने बारिश और तूफ़ान से उसका बचाव किया।

हर वर्ष, 5 जनवरी को भारत में डॉ. सलीम अली के नाम पर राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है। सलीम अली को ‘भारत के बर्डमैन’ (पक्षी-पुरुष) कहा जाता है। आज़ादी से पहले के समय जब सलीम अली एक छोटे बालक थे, उन्हें एक एयर गन उपहार में मिली थी। खेल-खेल में उसे आज़माते हुए उनके हाथों एक पक्षी पर गोली चल गई। वह एक ऐसी चिड़िया थी जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। उस पक्षी के गले पर पीली धारी थी। वे उसे मुंबई प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में ले गए जहाँ उन्हें पता चला वह चिड़िया पीतकंठ गौरैया थी। तभी से उनकी पक्षियों में रुचि शुरु हुई और उनका नाम भारत में पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया।

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सारा बब्बर

सारा एक कहानीकार, मोंटेसरी सलाहकार और बच्चों की एक पुस्तक की लेखिका हैं। वे एक प्रकृतिवादी भी हैं और बाल्यावस्था में पारिस्थितिकी चेतना के विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं। वे आठ वर्षों... और पढ़ें

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