दाजी सातवें सार्वभौमिक नियम के विषय में बता रहे हैं। यह नियम है - दूसरों की गलतियों के लिए प्रतिशोधद्वेष और बदले की भावना न रखना और उसके बजाय कृतज्ञता की कला विकसित करना। इसमें कृतज्ञ होने के साथ-साथ धन्यवाद देना भी शामिल है। इस सातवें नियम की सहायता से हमें प्रतिकूल परिस्थिति में भी प्रतिक्रियात्मक एवं नकारात्मक सोच से उबरने में मदद मिलती है। जैसे-जैसे हम विकसित होते जाते हैंजीवन में जो कुछ भी मिलता है उसे स्वीकार करने और उस पर भरोसा करने में हमारी सहायता करने के लिए यह नियम एक उत्तम साधन बन जाता है ताकि हम चेतना की उच्चतर से उच्चतर अवस्थाओं में बढ़ते जाएँ।

 

नियम 7-

अगर किसी से कोई कष्ट पहुँचे तो उसका
बदला लेने की न सोचें। उसे ईश्वर की तरफ़ से
समझें और उसका धन्यवाद करें।

क्या बदला लेना हमारी प्रकृति है?

हाँ भी और नहीं भी। आपमें से अधिकांश लोग बच्चों की रोआल्ड डॉल की पुस्तकें, महाभारत की कहानियाँ और ग्रिम्म्स की परियों की कहानियाँ जानते होंगे। इन्हें विश्व भर में बच्चे और बड़े समान रूप से पसंद करते हैं। फिर भी ये कहानियाँ किसी गलत काम के जवाब में लिए गए बदले से भरपूर हैं। प्रायः इनका आधार नैतिक मूल्याँकन होता है। बुरे लोगों को अंत में हमेशा अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। लेकिन बदले की भावना के कारण कई लोगों को कष्ट भोगना पड़ता है। ‘चार्ली एंड द चॉकलेट फ़ैक्ट्री!’ में लालची और स्वार्थी बच्चों के साथ जो हुआ उसके बारे में सोचें। किसी न किसी रूप में और अनोखे तरीकों से सभी को दंड मिलता है। केवल चार्ली जो उदार व निष्कपट है, प्रशंसा प्राप्त करता है।

प्रचिलित साहित्य व मीडिया पर सरसरी निगाह डालने से पता लगता है कि बदला लेने को आमतौर पर सराहा जाता है, उसका गुणगान किया जाता है और उसे उचित सिद्ध किया जाता है। वास्तव में, अधिकांश फ़िल्मों व कहानियों में बदला लेना विषय-वस्तु का एक प्रमुख अंश होता है। मार्वल स्टूडियो की हर फ़िल्म में हमेशा अच्छाई की बुराई पर विजय होती है और अंतिम परिणाम में प्रतिशोध का एक तत्व होता ही है। वास्तव में, बदला लेने और धर्म के मार्ग पर डटे रहने में बहुत सूक्ष्म अंतर है। यह इरादे पर निर्भर करता है। क्या यह प्रतिशोध अनेक लोगों के भले के लिए लिया जा रहा है या यह किसी के किए का बदला लेने के लिए लिया जा रहा है?


हमें उच्चतर चक्रों को जागृत करके उन पर प्रभुत्व पाना होगा। इसकी शुरुआत हृदय-चक्र से होती है जो हमें चेतना के ऐसे ऊँचे स्तरों में ले जाती है जिनमें हृदय की उदारताएकात्मकता और सभी के लिए प्रेम होता है।


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बदले की कहानियाँ हमारी नीतिकथाओं, पौराणिक कथाओं व दंतकथाओं में भी भरपूर हैं। उदाहरण के लिए, यूनानी देवताओं की रानी हेरा और उसकी सौतेली बेटी एफ्रोडाइट के बीच के षड्यंत्रों को देखें। या फिर महाभारत की कहानी को लें जिसमें द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न द्रोण से बदला लेता है और उनका सिर काट देता है - एक छोटे से अपमान के कारण जीवन की हानि हुई। इसके कारण अश्वत्थामा के दिल में कड़वाहट भर जाती है जो फिर अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहता है। बदले का परिणाम और अधिक प्रतिशोध होता है और यह बढ़ता जाता है। हम यह भी देखते हैं कि किस प्रकार अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण भीष्म प्रतिशोधपूर्ण कर्मों का शिकार बनते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं और किस प्रकार शिखंडी का जन्म उनका विनाश करने के लिए हुआ था। यह चलता ही रहता है। इन प्रतिशोधपूर्ण कर्मों का अंत कैसे होगा?

युगों-युगों से बदला लेना हमारी प्रतिस्पर्धात्मक भावना की अभिव्यक्ति रहा है। हम इसका मूल अधिकांश पशुओं की प्रत्स्पर्धात्मक प्रवृत्ति में देख सकते हैं। पारितंत्र में हम भोजन, सहवासी और क्षेत्र के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धाओं को देखते हैं। मनुष्यों में बदला लेना, उसी पाशविक प्रकृति यानी मानव-तंत्र के तीन निचले चक्रों से संबंधित है। लेकिन यह और अधिक जटिल हो जाता है जब यह मनोभाविक नियोजन मानव-हृदय की भावनाओं के साथ उलझ जाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से हम असुरक्षित महसूस करते हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे एक शेरों का सरदार महसूस करता है जब दूसरा शेर उसके प्रतिष्ठित पद को चुनौती देता है। लेकिन हम उन परिस्थितियों में भी प्रतिस्पर्धा का तड़का लगा देते हैं जिनमें जीवन को कोई खतरा नहीं होता यानी परिवार व मित्रों के साथ और कार्यक्षेत्र में होने वाले दिन-प्रतिदिन के मामले। और जब हम उस व्यक्ति से बदला लेते हैं जिसे हम प्रतिद्वंद्वी मानते हैं तब हमें अपने अंतर्मन का भी सामना करना पड़ता है।

अधिकांश जनजातीय संस्कृतियों में तो बदला लेना जीने का तरीका होता है जो खानदानी झगड़ों और कुल-युद्ध के रूप में दिखाई देता है। बदला न लेने की इच्छा को आमतौर पर कायरता या कमज़ोरी माना जाता है। दुर्भाग्यवश, कथित विकसित सभ्यताओं में भी यही व्यावहार का आधार है। यह ‘आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत’ का सिद्धांत है और अधिकांश लोग इसी को कर्म का नियम समझते हैं।

इस विचार को कि ‘बदला लेने से सुख प्राप्त होता है’ अनेक आधुनिक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने चुनौती दी है। इन अध्ययनों में यह पाया गया है कि अधिकांश लोग जो बदला लेने की भावना से कुछ करते हैं, अंततः उसके लिए पछताते हैं। इससे बाद में उन्हें अपराध-बोध और शर्मिंदगी होती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो प्रतिशोध के डर के कारण पलटवार नहीं करते। वे अपने दिल में बदले की भावना को बनाए रखते हैं जो फिर कड़वाहट बन जाती है और उनके मन में इतना ज़हर घोल देती है कि वह उस व्यक्ति को धीरे-धीरे करके नुकसान पहुँचाती है। यह बात हम प्रायः अगाथा क्रिस्टी की हत्या की रहस्यात्मक कहानियों में देखते हैं। इन दोनों श्रेणियों के लोग अलग-अलग प्रकार के क्रोध की भावनाओं में बर्बाद हो जाते हैं। लोगों की एक तीसरी श्रेणी भी है जिनके साथ जब कुछ गलत हो जाता है तो वे दुखी, अपमानित और मान व प्रतिष्ठा से वंचित महसूस करते हैं। इसके कारण उनमें शर्मिंदगी, पश्चाताप और अवसाद की भावनाएँ आ जाती हैं। वे शोषित महसूस करते हैं और हमेशा डर व आत्म-दया की भावनाओं में फँसे रहते हैं।

बदला लेना उन व्यवहारों में से एक है जो नकारात्मक भावनाओं के एक पूरे वर्णक्रम को जागृत कर देते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का दुष्चक्र बनता है। बाबूजी ने जब सातवाँ नियम बनाया तब उन्हें आशा थी कि हम अपनी अंतर्निहित मान्यताओं को रूपांतरित कर लेंगे। वे हमें बताते हैं कि बदला लेना हमारा स्वभाव नहीं होना चाहिए लेकिन उसके लिए हमें प्रतिस्पर्धात्मक पाशविक प्रवृत्तियों से ऊपर उठना होगा। और उसके लिए हमें उच्चतर चक्रों को जागृत करके उन पर प्रभुत्व पाना होगा। इसकी शुरुआत हृदय-चक्र से होती है जो हमें चेतना के ऐसे ऊँचे स्तरों में ले जाती है जिनमें हृदय की उदारता, एकात्मकता और सभी के लिए प्रेम होता है।

इस क्रमिक विकास को आध्यात्मिक यात्रा कहा जाता है और इसका वर्णन ‘स्पिरिचुअल एनाटमी’ पुस्तक में किया गया है।


हमारे संस्कार ही वर्तमान परिस्थितियों व लोगों को हमारी ओर आकर्षित करते हैं। शायद उनके कारण हमें कष्ट हो लेकिन उसके साथ-साथ वे हमारे संस्कार और उनसे जुड़ी मानसिक जटिलताएँ भी हटाते हैं। अतः यदि हम उन्हें अपनी प्रगति के उत्प्रेरक के रूप में समझें तो हम स्वाभाविक रूप से कष्टों को कृतज्ञतापूर्ण मनोभाव से देखने लगेंगे।


कृतज्ञता विकसित करना - एक उन्नत प्रतिक्रिया

लगभग सभी दार्शनिक एवं धार्मिक परंपराएँ हमें शांतिपूर्वक रहने, आहत करने वाले को क्षमा करने और किसी भी प्रतिशोध को ईश्वर पर छोड़ देने का उपदेश देती हैं। लेकिन यह तब तक संभव नहीं है जब तक हम पाशविक प्रवृत्तियों के अनुसार, प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत पर निर्भर करते हुए अपने निम्नतर चक्रों के स्तर से काम करते हैं? जब तक हृदय-चक्र को जागृत करके उस पर प्रभुत्व प्राप्त करके मानवता, करुणा, प्रेम, उदारता और विनम्रता की भावनाएँ विकसित न हों, तब तक बदले की भावना से भरे स्वभाव को छोड़ना संभव नहीं है। हम शांति, सौहार्द और सामंजस्य का सपना देख सकते हैं लेकिन हम अपनी वर्तमान परिस्थिति में फँसे रहेंगे जिसमें आजकल की हिंसक गतिविधियों का शायद एकमात्र सबसे बड़ा कारण ‘बदले की भावना’ है।

बदला लेने की इच्छा उस क्रोध से उत्पन्न होती है जिसका कारण कोई ऐसा कर्म है जिसे हम गलत समझते हैं। हमारा पलटवार प्रत्यक्ष और आक्रामक हो सकता है या सूक्ष्म रूप से चुपचाप हो सकता है। कभी-कभी बदला लेने के लिए लोग वर्षों इंतज़ार करते हैं। बदले की भावना से तनाव का अंतहीन चक्र बन जाता है जो कभी-कभी पीढ़ियों और कई जीवनकालों तक चलता है।

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बिना अपवाद के, हम सभी ने शायद तब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है जब किसी ने हमारे साथ कुछ गलत किया। इसी प्रकार जब कोई हमारा भला करता है, आमतौर पर हम अनुकूल प्रतिक्रिया देते हैं। सकारात्मकता से सकारात्मक और नकारात्मकता से नकारात्मक व्यवहार होता है। जब प्रेम के बदले प्रेम मिलता है तब इसे बदला तो नहीं कहा जाता, लेकिन वह प्रतिक्रिया भी उतने ही आवरण और जटिलताएँ बनाती है जितने कि एक प्रतिशोधात्मक नकारात्मक प्रतिक्रिया। कोई भी प्रतिक्रिया, भले ही वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, हमारे हृदय में जटिलताएँ पैदा करती है जिससे हमारी चेतना के क्षेत्र में छापें बन जाती हैं। ये छापें कठोर होकर ऊर्जा की गहरी ग्रंथियाँ बन जाती हैं जिन्हें संस्कार कहते हैं। हमारे संस्कारों के स्पंदन बाहर से अपनी ओर उसी प्रकार के स्पंदनों को आकर्षित करते हैं जिससे अविरत दुष्चक्र बन जाता है।

साधु-संत एवं दार्शनिक सामान्यतः इस बात से सहमत हैं कि हमारे साथ जो कुछ भी होता है, हमारे विचारों व कर्मों का परिणाम होता है। शायद ही कोई इस सिद्धांत के परे किसी बात से कष्ट भोगता है। तो हम इन संस्कारों के बीज बनाना कैसे बंद करें? इसका उत्तर अध्यात्म के क्षेत्र में मिल सकता है जो हमें एक बहुत ही अलग दृष्टिकोण देता है। यह हमें नए संस्कारों को बनने से रोकने के और अतीत में जमा किए गए संस्कारों को हटाने के साधन देता है। वास्तव में, एक बार जब हम जान जाते हैं कि संस्कारों को कैसे बनने से रोका और हटाया जाए तो हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता बन जाते हैं। तब हम एक अलग ही स्तर से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

जब तक हम पूरी तरह उस स्तर तक नहीं पहुँच जाते तब तक जो संस्कार हमने अतीत में अपने विचारों व कर्मों द्वारा बनाए हैं, सूक्ष्म शरीर में छाप के रूप में मौजूद रहते हैं। ये तभी हटते हैं जब इनके प्रभाव को व्यक्ति भोग लेता है। इस प्रक्रिया को ‘भोग’ या कर्मों को भोगना कहते हैं। हमारे संस्कार ही वर्तमान परिस्थितियों व लोगों को हमारी ओर आकर्षित करते हैं। शायद उनके कारण हमें कष्ट हो लेकिन उसके साथ-साथ वे हमारे संस्कार और उनसे जुड़ी मानसिक जटिलताएँ भी हटाते हैं। अतः यदि हम उन्हें अपनी प्रगति के उत्प्रेरक के रूप में समझें तो हम स्वाभाविक रूप से कष्टों को कृतज्ञतापूर्ण मनोभाव से देखने लगेंगे। ऐसा नहीं है कि हमें उनका आनंद उठाना है, लेकिन जैसा कि डेविड स्टाइन्डल-रास्ट कहते हैं, “जो सबसे बुरी घटनाएँ हुई हैं, वे भी जीवनदायिनी हैं। विनाश के बाद ही आप वहाँ पहुँचे हैं जहाँ आप अभी हैं।”

जब संस्कार जमा हो जाते हैं तब हमारी दशा में भारीपन आ जाता है जिससे नकारात्मकता, अवसाद और विभिन्न प्रकार की मानसिक परेशानियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। निरंतर सोचने और गतिविधियों के कारण जटिलताओं व अशुद्धियों की परतें दर परतें बनती चली जाती हैं। यह प्रक्रिया हमारे कर्ता होने के भ्रम से और भी प्रबल होती जाती है। सामान्यतः हमारी आत्मा शुद्धता व सहजता की ओर लौटना चाहती है। अतः यह इन अशुद्धियों व जटिलताओं से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करती है। इससे भोग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसका परिणाम होता है दूसरों द्वारा दिए गए कष्ट। दुर्भाग्य से हम इसे गलत समझते हैं और अनभिज्ञता के कारण प्रतिक्रिया करने लगते हैं।

जब ईश्वर प्रतिक्रिया स्वरूप किसी को दंड देता है तब कोई भी इसे प्रतिशोधपूर्ण कार्य नहीं कहता क्योंकि ईश्वर का मन नहीं होता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति मामले को अपने हाथ में लेता है तब यह प्रतिशोधपूर्ण बन जाता है क्योंकि इस कर्म में हृदय व मन मिल जाते हैं। जब हम भोग के सिद्धांत को समझ जाते हैं तो फिर हमें ईश्वर द्वारा कष्ट मिलने या लोगों के द्वारा कष्ट मिलने में अंतर करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। दोनों प्रकार के कष्ट संस्कारों को निष्क्रिय कर सकते हैं और उनको निकालने में सहायता कर सकते हैं। हमारे अपराधी वस्तुतः हमारी सहायता ही कर रहे हैं। बात केवल इतनी है कि अपनी अज्ञानता के कारण हम नहीं देख पाते हैं कि जो विरोधाभास प्रतीत हो रहा है वो वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि हम प्रतिक्रिया करते हैं तो यह हमारे पैर से काँटा निकालने वाले डॉक्टर पर हमला करने के समान है। जब काँटा बाहर निकाला जाता है तो दर्द होता है लेकिन इससे राहत मिलती है और हम बेहतर महसूस करते हैं। हम कितनी तरह से विकसित हो सकते हैं यदि हम इस प्रक्रिया पर भरोसा करने लगें और अपने अपराधियों को अपना सहायक मानने लगें। तब हम उस क्षण में कृतज्ञता महसूस करेंगे और अपने अंदर शांति प्राप्त करेंगे।

इसके बाद हम अगले स्तर पर बढ़ पाएँगे जहाँ हम अपने सभी कथित शत्रुओं को स्वीकार कर पाएँगे, जिसका मतलब है उन्हें सुन पाएँगे। यह आगे की ओर एक बड़ा कदम होगा। एकसाथ मिलकर हम व्यक्ति को नहीं, बल्कि चुनौतियों व मुद्दों को देख पाएँगे। व्यक्तिगत और वैश्विक स्तर पर यही सामूहिक कार्य का, समाज का और पूर्वाग्रहों से उबरने का मूल आधार है।

नया आदर्श - जिम्मेदारी लेना

इस सातवें नियम के द्वारा बाबूजी ने जिम्मेदारी को ईश्वर से बदल कर हम पर डाल दिया है और हमारी मानसिकता को बदल दिया है। हम स्वयं को पीड़ित न मानकर सशक्त समझने लगते हैं। जब हमारे मार्ग में कष्ट आते हैं, उस समय यदि हम थोड़ा रुककर इस बात को समझ लें कि उन्हें हमारे स्पंदनीय प्रारूप ने ही आकर्षित किया है और अंततः वे हमारी भलाई के लिए ही हैं तो हम उन लोगों के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे जिनके कारण हमें कष्ट हुआ है और उन्हें धन्यवाद देंगे।

अतः इस नियम की मूल शिक्षाएँ क्या हैं और अपने जीवन को रूपांतरित करने के लिए हम इन्हें कार्यान्वित कैसे करें?

सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि संस्कार कैसे बनते हैं। संस्कार वे छापें हैं जिनके कारण व्यावहारिक प्रवृत्तियाँ, कार्मिक प्रभाव एवं अवचेतन आदतें व प्रवृत्तियाँ बनती हैं। हम सभी इस सिद्धांत से परिचित हैं लेकिन संस्कारों के बनने की प्रक्रिया में और भोग की प्रक्रिया में इन संस्कारों की भूमिका में कुछ सूक्ष्म भेद हैं।

बाबूजी लिखते हैं, “जब हम अपने मस्तिष्क व हृदय का उपयोग करके कुछ करते हैं तब हम छापें बनाते हैं।” इसका अर्थ है कि अकेले विचार से छाप नहीं बनती है। इसके लिए उसमें भावनाओं का जुड़ना आवश्यक है। सागर की उपमा लें - जब सागर का पानी तेज़ हवा, तूफ़ान या भूकंप संबंधी घटना के संपर्क में आता है तब ऊर्जा की बहुत बड़ी मात्रा पानी में स्थानांतरित होती है और ऊँची-ऊँची लहरें बनती हैं। इसी प्रकार जब हमारे विचार प्रासंगिक भावनाओं के साथ उलझ जाते हैं तब चेतना के क्षेत्र में हलचल पैदा होती है। इसी हलचल के परिणामस्वरूप मनस पर छाप बन जाती है जो एक विशिष्ट भावनात्मक संकेत या स्पंदन के साथ स्मृति के रूप में जमा हो जाती है।

जब हम छापों के इर्द-गिर्द कहानियाँ बनाते चले जाते हैं और अपने अनुभवों का मतलब निकालने का प्रयास करते रहते हैं तब ये छापें और भी दृढ़ हो जाती हैं। हम उनका वर्गीकरण करके नाम देने लगते हैं। जैसे-जैसे ये बढ़ती जाती हैं, हमारी चेतना में भारी बनकर ये विषाक्त होती जाती हैं। यह अशुद्धि का ही एक रूप है जिसका अपना विशिष्ट स्पंदन होता है।

अपनी मान्यताएँ बदलना – कृतज्ञता की कला

इस विचार का कि हमारी भावनाएँ चेतना के क्षेत्र में स्पंदन पैदा करती हैं जो ब्रह्मांड में स्पंदनीय संकेत भेजती हैं जिससे विशिष्ट परिस्थितियाँ व लोग आकर्षित होते हैं, बहुत गहरा परिणाम हो सकता है। यही आकर्षण के नियम का आधार है।

जब हमारे द्वारा प्रेषित स्पंदनीय संकेतों के आधार पर ब्रह्मांड से हमें कोई उत्प्रेरक प्राप्त होता है तब क्या होता है? मान लीजिए कि कोई हमें देखकर इशारा करता है। यदि हम यह सोचते हैं कि हमारा अपमान हुआ है या हमारे साथ गलत व्यवहार हुआ है तो इसी विचार से क्रोध की भावना उत्पन्न हो सकती है। यह उत्प्रेरक की हमारी अपनी व्याख्या होती है जिसके कारण भावना उत्पन्न होती है और ये व्याख्याएँ हमारी मान्यताओं से आती हैं। हमारी मान्यताओं की शुरुआत हमारे पसंद-नापसंद, अच्छा-बुरा आदि वर्गीकरण से होती है। संक्षेप में, ये हमारी मान्यताएँ ही हैं जो हमारे अनुभवों को ढालती हैं। और फिर हमारे अनुभव हमारी मान्यताओं को और दृढ़ कर देते हैं।

सातवें नियम का पालन करके हम अपनी मान्यता में यह बदलाव करते हैं कि हम ही अपने साथ होने वाली गलतियों के लिए परिस्थितियाँ बनाते हैं। हम ही जिम्मेदार हैं। यह एक सबक है जो हमें सीखना है। दूसरे लोग तो उस सबक को सीखने में हमारी सहायता कर रहे हैं। इसलिए इस अवसर के लिए कृतज्ञ हों और धन्यवाद दें कि हमारा विकास हो रहा है।

अपने जीवन में हम इसे कैसे लागू करें? जैसे को तैसा देने की इच्छा छोड़कर। एक प्रतिशोधपूर्ण कार्य और कुछ नहीं बल्कि किसी से हिसाब बराबर करने की चाहत है। जब आप यह समझ जाते हैं तो यह विवेक का आरंभ है। और यह हिसाब बराबर करने वाली प्रतिक्रिया, ज़रूरी नहीं है कि आक्रामक ही हो। ये छोटी-छोटी चीज़ें जैसे किसी व्यक्ति की उपेक्षा करना या समूह से बाहर रखना भी हो सकता है। इसलिए इसके बजाय शांत हृदय के साथ सोचने का प्रयास करें और संकल्प लें, “मैं उस व्यक्ति को क्षमा करता हूँ, मेरा दिल बहुत बड़ा है।” जब हम ऐसा करेंगे तब अपने हृदय को मुक्त कर लेंगे। अतः मूल रूप से एक करुणामयी एवं कृतज्ञतापूर्ण हृदय में छापें पनप नहीं सकतीं।

लेकिन यह तब तक बहुत कठिन है जब तक हृदय चक्र पूरी तरह खिल न जाए और उसके भीतर के सभी बिंदु शुद्ध और जागृत न हो जाएँ। इसलिए सबसे पहला कदम होगा हार्टफुलनेस के अभ्यासों के माध्यम से आंतरिक यात्रा की शुरुआत करना। इसमें सफ़ाई की प्रक्रिया द्वारा संस्कारों की परतों को भी हटाया जाता है। केवल तभी हम प्रारंभिक आधार पर पहुँचकर उदारतापूर्वक प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

तब हमें अत्यधिक शांति का अनुभव होगा। हमें अपनी चेतना में विस्तार महसूस होगा। हमें और भी अधिक विवेक प्राप्त होगा। हमें लगेगा मानो हमने जीवन में किसी अद्भुत बात को समझ लिया है।

बदला लेने की सोचने से पहले थोड़ा रुकें। ऐसे पलों में आँकलन करें कि आपमें बदले की भावना कैसे भर गई और उससे कैसे बचें। क्या कदम लिए जाएँ? सामान्यतः आप आहत महसूस करते हैं। कोई व्यक्ति या घटना एक ऐसी परिस्थिति बना देती है जिसमें आपकी सत्यनिष्ठा पर संकट आ जाता है, आपके व्यक्तित्व पर प्रश्न उठने लगते हैं या आपके इरादों पर सवाल उठते हैं। दूसरों को सवाल उठाने का अधिकार है तो उन्हें उठाने दें। आप परेशान क्यों होते हैं? आपके हृदय की उदारता आपको प्रतिक्रिया करने से रोकेगी।


बदला लेना केवल एक प्रतिक्रिया होती है और वह अविरत रहती है। यदि आप में दूसरों के द्वारा की गई गलती के प्रति बदले की भावना है तो न तो आप समझदार हैं और न ही वह व्यक्ति समझदार है जिसने आपके साथ गलत किया है। तब दो नासमझों के बीच झगड़ा होता है। आप दोनों कटु और क्रोधी बन जाते हैंएक-दूसरे को हानि पहुँचाते हैं।


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अन्यथा, आप पर आरोप लगाने वाले व्यक्ति पर निर्भर करते हुए, तीन परिदृश्य सामने आ सकते हैं। यदि आप पर आरोप लगाने वाला व्यक्ति बहुत शक्तिशाली है, जैसे आपका बॉस, तो आप तुरंत बदला नहीं लेंगे। आप चुपचाप इंतज़ार करेंगे - “मैं एक दिन अवश्य कुछ करूँगा!” इस छुपे हुए इरादे से आप लंबे समय तक अपने हृदय को विषाक्त बनाए रखेंगे। जैसे ही आपका बॉस थोड़ा कमज़ोर पड़ेगा, आप उठकर उसे आहत करेंगे। यदि आप पर आरोप लगाने वाला व्यक्ति कमज़ोर है, शायद उसके वाक्य पूरा करने से पहले ही आप उसे मार डालना चाहें। एक तीसरा परिदृश्य भी है जिसमें आपको आत्म-दया का अनुभव होता है और आप स्वयं को अभागा और परिस्थिति का शिकार मानने लगते हैं। इससे भी एक अलग तरह की बदले की भावना उत्पन्न हो सकती है यानी भावनात्मक दूरी बनाकर और छल-कपट करके।

मैं चाहूँगा कि आप इस चौथे परिदृश्य के बारे में सोचें - रुकें, इंतज़ार करें और उससे जो कुछ सीख सकते हैं, सीखकर पूरी घटना को भूल जाएँ। न केवल आप सबक सीख सकते हैं बल्कि प्रयास करें कि दूसरा व्यक्ति भी कुछ सीखे ताकि आप मित्र बन जाएँ। यह एक उत्कृष्ट परिणाम होगा।

समझदार लोग कुछ अलग तरह से व्यवहार करते हैं। दूसरों पर केंद्रित रहने के बजाय वे स्वयं पर केंद्रित रहते हैं और देखते हैं कि उन्होंने कहाँ गलती की। इस डाँट या दुर्व्यवहार या आलोचना का क्या कारण है? वे अपने कर्मों को आँकते हैं और फिर उचित निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। हमें सोचना होगा - क्या यह बात आपा खोने योग्य है? एक शांतिपूर्ण समाधान की कितनी संभावना है? क्या मतभेदों को समाप्त करने की कोई संभावना है?

बदला लेना केवल एक प्रतिक्रिया होती है और वह अविरत रहती है। यदि आप में दूसरों के द्वारा की गई गलती के प्रति बदले की भावना है तो न तो आप समझदार हैं और न ही वह व्यक्ति समझदार है जिसने आपके साथ गलत किया है। तब दो नासमझों के बीच झगड़ा होता है। आप दोनों कटु और क्रोधी बन जाते हैं, एक-दूसरे को हानि पहुँचाते हैं। अपने प्रियजनों से बदला लेना विरोधाभासी लगता है लेकिन यह जीवन का कटु सत्य है। आपके स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है, परिवार को हानि पहुँचती है और आप सोचने लगते हैं कि कितना बदला लेना है। क्या आप बदला लेने के नियमों का अनुमान लगा सकते हैं? बदले या पलटवार की कितनी मात्रा देनी है? क्या कोई यह आँकलन कर सकता है?

एक महान चीनी दार्शनिक कन्फ़्यूशियस का एक कथन है - “बदला लेने की यात्रा शुरू करने से पहले आप दो कब्रें खोद लें।” एक और महान दार्शनिक ने कहा है, “जब तक विवेक प्रकट न हो जाए तब तक प्रतिशोध को रोक लें या उसे टाल दें।”

क्या आपके पास बातों को छोड़ने वाला और माफ़ करने वाला हृदय है? क्या आपने बदले की कीमत का अनुमान लगाया है - वह कीमत जो आपको संस्कारों के रूप में चुकानी पड़ेगी? बदला लेने में आप हमेशा स्वयं के बजाय दूसरों पर केंद्रित रहेंगे। यदि आप में विवेक है तो आप अपने बारे में सचेत हो जाएँगे - “मैंने प्रतिक्रिया क्यों की? क्या मुझे बदला लेना चाहिए?” “मैं इसका समाधान कैसे करूँ ताकि मैं प्रगति कर पाऊँ?” भगवान के लिए रिश्तों को मज़बूत बनाएँ। बदले या पलटवार से कभी भी समस्या का शांतिपूर्ण अंत नहीं होगा।

इसके अलावा, क्या न्याय करने के नाम पर बदला लेकर हम स्वयं को धोखा दे रहे हैं?

बुरी भावनाओं को छोड़ देने से बहुत ज़्यादा स्वतंत्रता का अनुभव होता है। यह छोड़ना अनायास और स्वाभाविक होना चाहिए। यह कोई कमज़ोरी नहीं है। उसे न छोड़कर हम बाकी बची दिव्यता से भी लड़ते रहते हैं और फिर स्वयं को अलग कर लेते हैं। इस अलगाव से एक और परत चढ़ जाती है।

चलिए, सभी को एक सहानुभूतिपूर्ण हृदय से देखें। हो सकता है उनके कृत्यों का कोई औचित्य हो। हो सकता है हम ही गलत हों। तो चलिए, प्रार्थना करते हैं, “ईश्वर मुझे क्षमा करें।”

दूसरों के साथ रिश्ते सुधारने के लिए बाबूजी के गुरु लालाजी द्वारा दी गई इस तकनीक का प्रयोग करने का भी मैं सुझाव देता हूँ -

आराम से बैठकर अपनी आँखें बंद कर लें। उसकी शक्ल को अपने सामने बिठाने की कल्पना करें।

यह विचार लें, “यह व्यक्ति मेरा मित्र और शुभचिंतक है।”

सोचें कि उसकी ओर से आपके प्रति बुराई के सभी विचार बाहर निकल रहे हैं और उनके बजाय आपकी बेहतरी के विचार समा रहे हैं।

जब कभी उस व्यक्ति के पास जाने का अवसर मिले तो धीरे से और सूक्ष्मता से, बिना घूरे, उसके चेहरे पर अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान दें।

जब आप साँस को बाहर छोड़ें तब यह विचार लें कि आपके प्रेम व स्नेह के कण उसके हृदय में प्रवेश कर रहे हैं।

जब आप साँस अंदर लें तब यह विचार लें कि आप उसके हृदय से आपके प्रति सभी नकारात्मक विचारों को बाहर निकालकर फेंक रहे हैं।

शुरू में यह कार्य कठिन लग सकता है और आपको प्रतिरोध भी महसूस हो सकता है, लेकिन यदि आप साहसी हैं तो अभ्यास के साथ यह आसान हो जाएगा।

जब आप थोड़े से विराम के लिए समय निकालेंगे, आप जीवन के उपहारों की कदर करेंगे। इसलिए ध्यान करें, कृतज्ञ हों, जीवन के लिए धन्यवाद दें। फिर आपको लगेगा कि इस मनोभाव से सब कुछ बदल जाता है।

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दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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