डॉ. अनंतनेनी श्रीनाथ रामायण की जीवन-रक्षक बूटी, संजीवनी की वानस्पतिक, औषधीय और पौराणिक यात्रा के बारे में बता रहे हैं।
संजीवनी एक पवित्र औषधि है जो अपने अद्भुत जीवनदायी एवं औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है और इसका प्राचीन भारतीय महाकाव्य रामायण में प्रमुख रूप से वर्णन किया गया है। यह बिना फूल वाला पौधा है जिसे वनस्पति-शास्त्र में सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस के नाम से जाना जाता है। यह सेलाजिनेलेसी परिवार और टेरिडोफ़ाइटा प्रजाति से संबंधित है। यह सूखने के बाद फिर से जी उठने की अपनी खास क्षमता के लिए जानी जाती है जो ब्रायोफ़ाइट जैसी ही विशेषता है।
संजीवनी के ऐतिहासिक महत्व, औषधीय उपयोग और आधुनिक शोधों ने रामायण के समय से लेकर आज तक सदियों से लोगों का ध्यान खींचा है। यह मुख्य रूप से चट्टानी ढलानों पर और पृथ्वी की सतह से ऊपर निकले चट्टानी अंश पर उगती है जहाँ पानी जमा होता है। इसका उपयोग भारतीय पारंपरिक औषधि में कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। बेहोशी दूर करने और बुखार, लकवा तथा त्वचा की बीमारियों जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभ देने की इसकी अद्वितीय क्षमता ने इसे देसी इलाज की पद्धति में एक बहुमूल्य जड़ी-बूटी बना दिया है।
संजीवनी का मतलब है “पुनर्जीवित करने वाली।” यह एक पवित्र और दिव्य बूटी है जिसने रामायण के अनुसार भगवान राम के भाई लक्ष्मण की प्राण रक्षा की थी।
यह एक बिना फूल वाला पौधा है जो टेरिडोफ़ाइटा प्रजाति से संबंधित है और क्रम-विकास में ब्रायोफ़ाइट और एंजियोस्पर्म के बीच आता है। ब्रायोफ़ाइट पानी में डालते ही तुरंत फिर से ज़िंदा होने की अपनी विशिष्ट क्षमता के लिए जाने जाते हैं, यहाँ तक कि मिट्टी से अलग होने और सूखने के बाद भी। इसके विपरीत, एंजियोस्पर्म और ज़्यादातर टेरिडोफ़ाइटा एक बार मिट्टी से अलग करने और सूख जाने के बाद पानी डालने से ज़िंदा नहीं होते, भले ही उन्हें पानी में डुबो दिया जाए।
जब भी संजीवनी सूखी और बेजान दिखती है (चित्र 2) तब यह पानी के संपर्क में आने पर फिर से ज़िंदा हो जाती है (चित्र 3)। इस पुनः जी उठाने की क्षमता, जो ब्रायोफ़ाइट के सभी पौधों में है, के कारण सेलाजिनेलेसी परिवार के इस पौधे का नाम सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस (संजीवनी) रखा गया। अब इसे कान्हा शांतिवनम् के निकट, कान्हा सरोवर के पास की पहाड़ियों पर और दूसरी छोटी जगहों पर देखा गया है, जहाँ वर्षा का पानी इकट्ठा होकर कुछ समय तक ठहरा रहता है। उनकी इस मौजूदगी को लिखित रूप से दर्ज किया गया है।
विवरण
संजीवनी, जिसे वनस्पति-विज्ञान में सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस (चित्र 3) के नाम से जाना जाता है, अपने असाधारण चिकित्सकीय और पुनर्जीवित करने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथों - चरक संहिता और सुश्रुत संहिता - में इसका उल्लेख किया गया है।

यह जड़ी-बूटी भारत के ऊँचे पहाड़ी इलाकों में व्यापक रूप से पाई जाती है जहाँ आदिवासी समुदाय इसे इकट्ठा करते हैं और श्रीशैलम, अहोबिलम, तिरुपति, हरिद्वार और वाराणसी जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर बेचते हैं।
रामायण में वैद्य सुषेण ने इस बूटी का उल्लेख और वर्णन हनुमान से किया था और उन्हें बताया था कि यह भारत में हिमालय की द्रोणागिरी पर्वत श्रृंखला में पाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में व्यापक शोध और मौजूदा भौगोलिक अध्ययन से पता चला है कि संजीवनी देशभर के अलग-अलग इलाकों में पाई जाती है। इसका उल्लेख प्रायः दक्षिण भारत के पूर्वी घाट पर्वत श्रृंखला में द्रोणाचलम क्षेत्र के संबंध में भी किया जाता है जिसे कुछ धार्मिक परंपराएँ हिमालय और श्रीलंका के बीच उसी उत्तर-दक्षिण रास्ते से जोड़ती हैं, जिसका वर्णन महाकाव्य में किया गया है।
यह पौधा मुख्य रूप से छायादार चट्टानों और प्राकृतिक पानी के स्रोतों के पास पतली दरारों में पनपता है। यह चट्टानों पर बारीक मिट्टी के जमाव वाले स्थानों पर और चट्टानी दरारों में उगता है (चित्र 1)। यह अत्यधिक अनुकूलनीय है और कई तरह के मौसम और नमी वाले हालातों में ज़िंदा रह सकता है। यह पौधा ज़मीन पर फैलता है जिसका तना दो शाखाओं वाला होता है। इसमें लगभग साठ डिग्री के कोण पर एक के बाद एक पत्तियाँ होती हैं और तने के निचले हिस्से में छोटी पत्तियों की दो कतारें होती हैं।


संजीवनी के उपयोग और लाभ
आंध्र प्रदेश के नल्लामलाई इलाके की आदिवासी चेंचू जनजातियाँ संजीवनी को ‘पित्त अडुगु’ कहती हैं। वे पारंपरिक रूप से इसकी धूप जलाते हैं और इससे एक टॉनिक बनाते हैं जो नवजात बच्चों के लिए एक शक्तिशाली प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा है।
संजीवनी का उपयोग बेहोश मरीज़ों को जल्दी से होश में लाने और तेज़ बुखार कम करने के लिए किया जाता है। पूरे भारत में यह पारंपरिक दवाइयों के नुस्खों में एक मुख्य सामग्री है जिनका उपयोग कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है - जैसे तंत्रिकाओं में कमज़ोरी, शुक्राणुओं की संख्या में कमी, कब्ज़, आंत्रशोथ, अपचन, बुखार, गर्भपात, रक्त की कमी, गुर्दे की पथरी, लकवा, त्वचा की बीमारियाँ, हड्डियों का टूटना, पीलिया, दाँत दर्द, रक्त में थक्का बनने से संबंधित विकार, दस्त, दमा, फोड़ा, पीठ दर्द और सामान्य रक्त शुद्धिकरण।
दस्त से परेशान और थके हुए तथा कमज़ोर मरीज़ों में जल्दी ऊर्जा वापस लाने के लिए इसकी सूखी जड़ी-बूटी का पाउडर गाय के दूध में मिलाकर देने से तुरंत आराम मिलता है।



रामायण में संजीवनी
रामायण के युद्ध कांड में राम और रावण के बीच युद्ध के दौरान भगवान राम के भाई लक्ष्मण और रावण के पुत्र मेघनाथ (इंद्रजीत) के बीच भीषण युद्ध होता है। इस युद्ध के दौरान लक्ष्मण को एक ज़हरीला तीर लगता है जिससे वे मूर्छित हो जाते हैं और विष की प्रबलता के कारण उनकी जान खतरे में पड़ जाती है। तब राम लंका के आयुर्वेदिक चिकित्सक सुषेण को बुलाते हैं।
लक्ष्मण की जाँच करने के बाद सुषेण सलाह देते हैं कि उनके इलाज के लिए सूरज उगने से पहले कुछ खास जड़ी-बूटियाँ लानी होंगी। और चूँकि ये जड़ी-बूटियाँ आसपास नहीं मिलतीं, इसलिए इन्हें हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत श्रृंखला से लाना होगा। जब राम पूछते हैं कि इतनी दूरी तय करके कौन समय पर वापस आ सकता है तब हनुमान आगे आकर कहते हैं, “मैं जाकर उन्हें लाऊँगा।”
सुषेण हनुमान को निर्देश देते हैं, “तुरंत द्रोणागिरी पर्वत की चोटियों पर जाओ और ये चार जड़ी-बूटियाँ ले आओ - संजीवनी (वह जड़ी-बूटी जो पुनः जीवित करती है), विशल्यकरणी (वह जड़ी-बूटी जो विष का प्रतिकार करती है और तीर निकालती है), संधानकरणी (वह जड़ी-बूटी जो टूटी हड्डियों और जोड़ों को जोड़ती है) और सवर्णकरणी (वह जड़ी-बूटी जो घाव भरती है और त्वचा को स्वस्थ कर उसकी चमक वापस लाती है)।” वे हर जड़ी-बूटी के गुण बताते हैं और हनुमान को उस स्थान पर उन्हें पहचानने में मदद करने के लिए संकेत देते हैं।
हनुमान जल्दी से द्रोणागिरी पहुँचकर जड़ी-बूटियों को ढूँढना शुरू करते हैं। बहुत ढूँढने के बाद भी जब वे उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाते तब पूरा पहाड़ ही उठाकर लंका ले जाते हैं। लंका में पहाड़ को नीचे रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी इसलिए हनुमान सुषेण को जड़ी-बूटियाँ लेने के लिए पहाड़ पर आने को कहते हैं।
सुषेण जड़ी-बूटियाँ इकट्ठा करके दवा बनाते हैं और उसका उपयोग लक्ष्मण और दूसरे घायल योद्धाओं के इलाज के लिए करते हैं। लक्ष्मण और बाकी योद्धा ठीक हो जाते हैं। फिर हनुमान पहाड़ को उसकी असली जगह पर वापस ले जाते हैं। कहा जाता है कि उसे ले जाते समय उसके कुछ हिस्से अलग-अलग जगहों पर गिर गए थे – कुछ लंका में और कुछ बड़े हिस्से दक्षिण भारत के पूर्वी घाट पर्वत श्रृंखला में नल्लामलाई पहाड़ों के पास।
निष्कर्ष
प्राचीन और आधुनिक दोनों चिकित्सा पद्धतियों में संजीवनी के पौधे को सम्मान दिया जाता है। जैसा रामायण में बताया गया है कि इसकी जीवन बचाने की क्षमता और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इसके अनेक चिकत्सकीय उपयोग भारतीय संस्कृति और उपचार में इसके महत्व को दिखाते हैं।
आधुनिक शोध ने कई जगहों में इस बूटी की मौजूदगी और इसके भरोसेमंद लाभों की पुष्टि की है जिससे यह लगातार अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है। रामायण में हनुमान द्वारा संजीवनी लाने की कहानी न सिर्फ़ इसकी पौराणिक अहमियत पर ज़ोर देती है बल्कि प्राकृतिक दुनिया में भी इसके महत्व को सुदृढ़ करती है।
द्रोणाचलम क्षेत्र और कान्हा सरोवर - वे स्थान जिन्हें बाद में हनुमान की हिमालय से श्रीलंका तक की यात्रा से जोड़ा गया - पर संजीवनी के मिलने की खबरें इसके प्रतीकात्मक और औषधीय दोनों तरह के महत्व को दर्शाती हैं। जैसे-जैसे इसके गुणों के बारे में शोध आगे बढ़ रहा है, संजीवनी प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच स्थायी संबंध का प्रमाण बनी हुई है।
संजीवनी का मतलब है ““पुनर्जीवित करने वाली।” यह एक पवित्र और दिव्य बूटी है जिसने रामायण के अनुसार भगवान राम के भाई लक्ष्मण की प्राण-रक्षा की थी।
