मेघा बजाज कुछ दिन पूर्व ही माँ बनी थीं। वे परवरिश की जीवन को बदल देने वाली खुशी की और जिस तरह बच्चों के लिए माता-पिता के प्रेम का संतुलन दुनिया को बनाए रखता है, उसकी सराहना करती हैं।

मेरी माँ अब शारीरिक रूप में मौजूद नहीं हैं। और मुझे इसका कोई खेद नहीं है क्योंकि मुझे लगता है कि जब तक वे मेरे साथ थीं मैंने हर साँस, हर धड़कन के साथ उनसे प्रेम किया। वे कुछ वर्ष बीमार रहीं और उस समय मैंने उनके लिए सब कुछ किया - उनके बालों में कंघी करने से लेकर उन्हें नहलाने तक, उनकी पीठ पर तेल लगाने से लेकर उन्हें खाना खिलाने तक। मैं उनके साथ अपने रिश्ते को लेकर बहुत संतुष्ट महसूस करती हूँ जो मेरे जीवन के लगभग चार दशकों का था। सच कहूँ तो, मैं उनकी सबसे ज़्यादा लाडली थी। मेरे लिए उनका प्रेम पूरी तरह से पक्षपाती, तर्कहीन और पवित्र था। मैं जहाँ भी जाती हूँ, उनका वह बावला प्रेम मेरे साथ होता है।
एक बात की मैं अक्सर कामना करती हूँ (मैं जानती हूँ कि यह तर्कहीन है लेकिन कामनाएँ हमेशा तर्कसंगत नहीं होती हैं) कि काश मैं माँ बनने के बाद उन्हें ‘धन्यवाद’ कह सकती। ‘आद्यासा’ का जन्म मेरी माँ के गुज़र जाने के बाद हुआ। अब मैं अपनी माँ की पहले से अधिक गहराई से, अधिक उच्च रूप में और पहले से अधिक संपूर्णता से कदर करती हूँ। काश! मैं उन्हें वह सब बता पाती जो मैं महसूस करती हूँ।
हम बस अपने नन्हे-मुन्नों को प्रेम करना चाहते हैं क्योंकि वे हमारा हिस्सा हैं - हमारा सबसे पवित्र हिस्सा - जिसे हम पीछे छोड़ जाएँगे।

एक बच्चे का पालन-पोषण करने में बहुत मेहनत लगती है। मैं लगभग हर हफ़्ते एक अलग शहर में जाती थी और अपनी कंपनी, WoW, के माध्यम से हर संभव तरीके से प्रभाव पैदा करती थी। मैं कभी एक जगह टिक कर नहीं रहती थी। मुझे अलग-अलग जगहों पर जाना और अलग-अलग तरह के काम करना पसंद था। मैं किसी भी काम में कूद पड़ती थी जो मेरी आत्मा को तृप्त करता था। और अब मैं नौ महीने की गर्भावस्था से लेकर नौ महीने से अपनी बेटी की देखभाल करते हुए यहीं एक ही जगह पर हूँ। मैं मुश्किल से ही बाहर निकलती हूँ। कभी-कभार ही मैं अपने इस व्यस्त जीवन में थोड़ा विराम लेती हूँ जब मुझे वास्तव में इसे लेने की आवश्यकता होती है। इसमें मेरे पिता और पति अरुण दोनों पूरे दिल से मेरी सहायता करते हैं। साथ ही हमारे बढ़िया कर्मचारी भी पूरा सहयोग देते हैं जिनके लिए मैं खुद को धन्य महसूस करती हूँ। लेकिन मैं अब एकदम उठकर कहीं जा नहीं सकती। आप सोचेंगे कि इससे मुझे बंधन महसूस होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। मैं अपने आप को परिपूर्ण महसूस करती हूँ और मैं इस भावना को कैसे व्यक्त करूँ?
ये कोई बड़ी बातें नहीं हैं बल्कि छोटी-छोटी बातें हैं जो मुझे संतुष्टि देती हैं - उसे हर भोजन अपने हाथों से खिलाना; हर मीटिंग या बाहर जाने की योजना इस तरह बनाना कि उसके जागने से पहले वह काम हो जाए। मुझे लगता है कि जब वह उठे तब उसे मुझे देखना चाहिए। बहुत पहले मैंने रवींद्रनाथ टैगोर की एक पंक्ति सुनी थी जो कुछ इस तरह थी - प्रेम तब होता है जब एक शिशु अपनी दोपहर की नींद से उठता है, अपनी माँ को देखता है, मुस्कुराता है और वापस सो जाता है। और यही मैं आद्यासा के लिए करना चाहती हूँ।
मैं उसे पढ़कर सुनाती हूँ, हालाँकि उसे किताबें चबाना ज़्यादा पसंद है। मैं उससे बात करती हूँ और वह कू-कू करके जवाब देती है। यदि वह अस्वस्थ होती है तो कभी-कभी मेरे आँसू निकल आते हैं और वह चुपचाप मेरी उंगली पकड़ लेती है जैसे कि मुझे आश्वस्त कर रही हो कि वह ठीक है। घंटों मैं उसे अपनी गोद में रखती हूँ और बस उसके सोते हुए चेहरे को देखती हूँ। मैं किसी तरह उसे सपनों में भी सुरक्षित रखना चाहती हूँ।
अरुण सबसे बेहतरीन पिता हैं। आद्यासा को देखकर वे उसके प्रेम में पिघल जाते हैं और उसकी छोटी-सी हरकत भी इस 6’3” लंबे इंसान को छोटे बच्चे की तरह खिलखिलाकर हँसा देती है। उनके बीच पिता-बेटी का बहुत पवित्र रिश्ता है। मैं उन्हें उस सुखद क्षेत्र में खिलने देती हूँ जो उन्होंने अपने लिए बनाया है और जो कभी-कभी मेरी समझ के परे होता है। एक आदमी जो अपनी नियमित नींद के बिना काम नहीं कर सकता था, आज अपनी बेटी की मुस्कान देखने का इंतज़ार करता है और जब तक उसे उसकी ज़रूरत होती है तब तक जागता रहता है। वह पहले से अधिक नरम है, अत्यधिक कोमल है और यह बच्ची उसके पवित्र प्रेम को उजागर करती है।
मेरा मानना है कि यही प्रेम दुनिया के संतुलन को बरकरार रखता है - वह प्रेम जो माता-पिता अपने बच्चे के लिए महसूस करते हैं, जो कुछ भी नहीं माँगते हैं और केवल सब कुछ देना चाहते हैं जो उनके पास है।

मैं सोचती हूँ कि हम माता-पिता के रूप में जो कुछ भी करते हैं, वह क्यों करते हैं। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि आद्यासा मेरे लिए कुछ करे और मुझे यकीन है कि मेरे माता-पिता ने भी नहीं सोचा होगा और न ही आपने सोचा होगा अगर आप माता या पिता हैं। हम बस अपने नन्हे-मुन्नों को प्रेम करना चाहते हैं क्योंकि वे हमारा हिस्सा हैं - हमारा सबसे पवित्र हिस्सा - जिसे हम पीछे छोड़ जाएँगे। आद्यासा मेरी सबसे गौरवपूर्ण विरासत होगी और मैं अपनी बच्ची के लिए सब कुछ सर्वोत्तम चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि वह ऐसी इंसान बने जो जहाँ भी जाए वहाँ आनंद व प्रेम फैलाए और सभी अच्छी चीज़ें प्रचुरता में दे।
यदि किसी को लगता है कि दुनिया में प्रेम नहीं बचा है तो बस किसी पार्क या समुद्र तट पर बैठिए और माता-पिता को अपने बच्चे के साथ देखिए - जिस तरह से उनकी आँखें चमकती हैं, चेहरे पर कोमल मुस्कान और सूक्ष्म गर्व का भाव होता है। उनमें यह भावना होती है कि मेरा सबसे खूबसूरत हिस्सा मेरे बच्चे के रूप में मेरे सामने है और मैं उसे एक ऐसी ज़िंदगी दूँगी या दूँगा जो मेरी ज़िंदगी से या मेरी कल्पित ज़िंदगी से बेहतर होगी। यदि यह प्रेम नहीं है तो क्या है?
इससे भी बेहतर है कि अपने माता-पिता का हाथ थाम लें और उनकी आँखों में देखें। उनमें वर्षों के अनुभवों, बोझ, प्यार, हँसी, दर्द और विकास के एहसासों के रहते आप निश्चित रूप से अपने लिए गहरे प्रेम की मृदु चमक को देख पाएँगे।
मेरा मानना है कि यही प्रेम दुनिया के संतुलन को बरकरार रखता है - वह प्रेम जो माता-पिता अपने बच्चे के लिए महसूस करते हैं, जो कुछ भी नहीं माँगते हैं और केवल सब कुछ देना चाहते हैं जो उनके पास है।
हर बेहतरीन माता-पिता को धन्यवाद। हम अपने बच्चों को किन शब्दों में बता पाएँगे कि 2 बजे रात को जब उन्हें बुखार था तब हम पर क्या गुज़री थी या जब हमने उन्हें पहली बार गोद में लिया था तब हमने कैसा महसूस किया था? हम किन शब्दों में उन्हें बता सकेंगे कि जब उनकी तुतलाहट ‘माँ’ और ‘पापा’ शब्दों में बदल गई तब हमें कैसा महसूस हुआ था? इन एहसासों को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। हम सिर्फ़ एक-दूसरे को देखकर, माता-पिता होने के अपने साझा अनुभव पर मुस्कुरा सकते हैं और अपने अंतरतम से यह समझ सकते हैं कि माता-पिता बनना शायद पूरे जीवन के सबसे शुद्ध आध्यात्मिक अनुभवों में से एक है।

