डॉ. इचक अडीज़ेस आपसी विश्वास के मनोभाव के साथ-साथ रिश्तों में देने और लेने के बारे में चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि हम आपसी विश्वास एवं सम्मान की संस्कृति कैसे बना सकते हैं। वे इसे परिवार, कार्य संस्कृति और युद्धरत देशों के बीच संबंधों पर लागू करते हैं।
आपसी विश्वास व्यक्तिगत संबंधों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है। जब विश्वास नहीं होता है तब बहुत सारी ऊर्जा नष्ट होती है और जिन समस्याओं में आपसी सहयोग की आवश्यकता होती है, उन्हें हम प्रभावी रूप से हल नहीं कर पाते हैं।
हम विश्वास कैसे बना सकते हैं? पश्चिमी जगत में एक कहावत है, “जीवन देना और लेना है।” मध्य पूर्व में, वे इसे अलग तरीके से कहते हैं, “जीवन लेना और देना है।”
इनमें क्या अंतर है?
जब आप पहले देते हैं तब आप भरोसा दिखाते हैं कि दूसरा व्यक्ति बदले में कुछ देगा। यदि आप पहले लेते हैं तो यह दर्शाता है कि आपको दूसरे व्यक्ति पर पूरा भरोसा नहीं है कि वह बदले में कुछ देगा।
पहले देना विश्वास बनाने का एक तरीका क्यों है? जब आप पहले देते हैं तब आप खुद को कमज़ोर बनाते हैं। आप कुछ खोने के लिए तैयार रहते हैं। जब आप देते हैं और बदले में कोई अपेक्षा नहीं रखते हैं - जब आप गुमनाम रहकर देते हैं - तब आप पूर्ण विश्वास दिखाते हैं, ज़रूरी नहीं कि जिस व्यक्ति को आपने दिया है उस पर विश्वास करते हैं बल्कि व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। यदि आप धार्मिक हैं तो आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं कि आपके योगदान का सही उपयोग किया जाएगा।
इस चर्चा से मुझे यह अंतर्दृष्टि मिली है कि सभी रचनात्मक परिवर्तन विश्वास से, पहले देने से, शुरू होने चाहिए। आमतौर पर गलती यही होती है कि हम दूसरे व्यक्ति से पहले बदलने की उम्मीद करते हैं। कई परिवारों में तलाक का शायद यही कारण है। सभी पारिवारिक रिश्तों में ऐसी समस्याएँ होती हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। हम आमतौर पर दूसरे पक्ष से बदलने की उम्मीद करते हैं। और वे हमसे पहले बदलने की उम्मीद करते हैं। इसका परिणाम या तो तलाक हो सकता है या असंतोषजनक विवाह।
यदि टूटते संबंधों में परिवर्तन की आवश्यकता है तो प्रत्येक सहभागी को दूसरे पक्ष से पहले बदलने की अपेक्षा करने के बजाय खुद को बदलने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। यदि कोई भी कमज़ोर पड़ने को तैयार नहीं है तो समाधान की कोई संभावना ही नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि मुझे लगता है कि यह परिज्ञान अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर भी लागू होता है। मैं मध्य पूर्व में आए हुए संकट से परेशान हूँ। इज़राइल को फ़िलिस्तीनियों से समस्या है और हज़ारों लोग मारे गए हैं। उनमें से कई बच्चे और महिलाएँ हैं। इस स्थिति को बदलने की ज़रूरत है, लेकिन सबसे पहले बदलाव कौन करेगा? इज़राइली मुझे बताते हैं कि बदलाव फ़िलिस्तीनियों को ही करना चाहिए।
मुझे लगता है कि इस चर्चा से यही समझ में आता है कि सबसे पहले हमें ही बदलना चाहिए, उदाहरण के लिए उनके साथ अपने बर्ताव को बदलना चाहिए। दूसरी ओर, दूसरों से पहले बदलाव की उम्मीद करना कारगर साबित नहीं होता है, खासकर मध्य पूर्व में, जहाँ की संस्कृतियों में अविश्वास गहराई से समाया हुआ है।
बस कुछ सोच और एहसास,
इचक के. अडीज़ेस


