कल्याणी अदुसुमिली ‘यादों के अपने व्यक्तिगत अनुभव और वर्तमान व भूतकाल के बीच के संबंध के बारे में बात कर रही हैं। कुछ दर्द भरे अनुभवों के ज़रिए उन्होंने सीखा कि भूतकाल के जाल में फँसे रहने के बजाय किस तरह से वे सकारात्मक रूप से केंद्रित रह सकती हैं।

या द एक ऐसा भारी भरकम, गहरे अर्थों वाला शब्द है जो हमारे दिलों-दिमाग पर काफ़ी बोझ डालता है। चूँकि इसका अर्थ है स्मरण या स्मृतियाँ, इससे ऐसी भावनाएँ उभरकर आती हैं जो दर्दभरी भी हो सकती हैं और खुशनुमा भी। आमतौर पर किसी प्रियजन या गौरवशाली व्यक्ति को मरणोपरांत उसके सम्मान में याद किया जाता है। कई देशों में अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध में शहीद हुए सिपाहियों के साहस व त्याग का सम्मान करने के लिए ‘स्मृति दिवसमनाया जाता है। चाहे एक अनुष्ठान के द्वारा या फिर अकेले अपने विचारों में याद करने से लोगों को अपना आदर-भाव व्यक्त करने का मौका मिलता है। भले ही यादों के साथ अक्सर दुःख जुड़ा होता है, फिर भी याद करके अपने प्रियजन को हमेशा अपने दिलो-दिमाग में रखने से सुकून मिलता है। औरों को अपनी यादों के बारे में बताने से हमें अंदरूनी ताकत मिलती है और हम एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं।

जब मैं याद के बारे में लिखती हूँ तब मैं स्वाभाविक रूप से अपनी प्यारी बहन के बारे में सोचने लगती हूँ जो करीब पैंतीस साल की उम्र में एक कार दुर्घटना में चल बसी थी। शुरुआत में जब मेरे दिल के घाव ताज़े और हरे थे, मैं उसकी बरसी के दिन उसे याद कर दुःख व शोक में डूब जाया करती थी। गुज़रते वक्त के साथ जब मेरे घाव भरने लगे तब मैंने सिर्फ़ अपनी क्षति पर केंद्रित रहना छोड़ दिया। उसके बजाय मुझे खुशियों के उन अनेक पलों को याद करके आराम मिलने लगा जो मैंने अपनी बहन के साथ बिताए थे। उसके हर जन्मदिन को मैं उस खूबसूरत आत्मा की याद में, उसकी पसंद की हर बात, खासकर चॉकलेट केक, को याद करके मनाती हूँ। 

पहले मैं अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी में उसकी गैर-मौजूदगी को याद कर उदास हो जाती थी, लेकिन फिर मैं सोचने लगी कि वह अब भी मेरी और मेरे बच्चों की ज़िंदगी का हिस्सा है और मैं अब भी उसकी दी हुई हर चीज़ से, जिसमें उसका मुझपर अटूट विश्वास भी शामिल है, अंदरूनी ताकत पा सकती हूँ। उनमें से कुछ भी उसके साथ नहीं मरा। अपने बच्चों की ज़िंदगी में उसकी कमी होने पर मैं इतनी केंद्रित थी कि मैं भूल गई की उनकी ज़िंदगी में मैं खुद वही उल्लास और खुशी भर सकती हूँ जो मेरी बहन ने मेरी ज़िंदगी में भरी थी। अब मैं उस मुकाम पर पहुँच चुकी हूँ जहाँ मैं शांति से उसके साथ बिताए हुए समय को याद करती हूँ और उसके निस्स्वार्थ प्रेम की अमर विरासत पर विश्वास रखती हूँ। 

निस्संदेह, यादें हमेशा मौत के साथ नहीं जुड़ी होतीं। कभी-कभी हम अतीत की किसी घटना या मन पर पड़ी किसी ज़बरदस्त छाप को भी याद करते हैं। अपने बच्चों की उपलब्धियों की मधुर स्मृतियाँ या अपनी पहले की यात्राओं के कुछ अपूर्व अनुभव भी मेरी यादों में सम्मिलित हैं। और बढ़ती उम्र के साथ जब हम हर तरह के बदलाव से कतराने लगते हैं तब बीते हुए सुनहरे दिनों (मेरे लिए ये दिन 80 और 90 के दशक के हैं) को याद करने की हमारी प्रवृत्ति कई गुना बढ़ जाती है। 

स्वाभाविक है कि हर याद खुशनुमा नहीं हो सकती। जब हम किसी अप्रिय अनुभव को याद करते हैं तब उससे जुड़ी नकारात्मक भावनाओं से प्रभावित होना आसान होता है, खास करके जब वह याद उस आघात को फिर से जीवंत कर देती है। लेकिन इस तरह की दुखदायी घटनाओं का भी अपना एक मकसद होता है। वे हमें उनसे कुछ सीखने का, अपने आपको विकसित करने का मौका देती हैं। गुलामी और जातिवध जैसे नृशंस कृत्यों को याद करने से हमें एक चेतावनी मिलती है कि आगे की पीढ़ियाँ फिर उन्हीं कृत्यों को न दोहराएँ। इस तरह की ऐतिहासिक यादें हमारे घावों को भरने में और क्षमा का भाव विकसित करने में मदद कर सकती हैं। 

अपने अतीत को समझने से हमें अपने उद्देश्य को जानने और अपने पूर्ण सामर्थ्य को प्राप्त करने में भी मदद मिलती है। अंततः, हमारी यादों की ताकत इसी बात में है कि अपने वर्तमान से बंधे होने के बावजूद हम अपने अतीत के महत्व को मानें और उसके पड़ने वाले निरंतर प्रभाव को समझें।


(अपने अतीत को समझने से हमें अपने उद्देश्य को जानने और अपने पूर्ण सामर्थ्य को प्राप्त करने में भी मदद मिलती है।)


कलाकृति - जास्मी मुद्गल

 


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कल्याणी अदुसुमिली

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