पूर्णिमा रामकृष्णन द्वारा लिए गए साक्षात्कार में मीराबाई बुश आध्यात्मिक साधना और उसके रिश्तों तथा विश्वासघात व हानि जैसे घावों के उपचार पर प्रभाव के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर रही हैं। वे आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से सभी प्राणियों के परस्पर संबंध और जीवन की नश्वरता के बारे में भी बात कर रही हैं।
प्र. – मीराबाई, आपका स्वागत है। आपके साथ फिर से बातचीत करना बहुत अच्छा लग रहा है।
पूर्णिमा, मुझे भी अच्छा लग रहा है, धन्यवाद।
प्र. - आज मैं आपसे पूछना चाहती हूँ कि आध्यात्मिक अभ्यास दूसरों के साथ हमारे रिश्ते को कैसे प्रभावित कर सकता है।
जब मैंने पहली बार बौद्ध परंपरा के ध्यान और अन्य अभ्यास सीखे, जो एक मठवासी व्यवस्था में किए जाते थे, उनमें गद्दी पर बैठकर अपनी आँखें बंद करके स्वयं के साथ बने रहना होता था। इसका दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं था। और योग कुछ ऐसा था जो आप दूसरे लोगों के साथ करते थे, लेकिन वह रिश्तों से संबंधित नहीं था। आत्म-निरीक्षण और कैसे चिंतनशील अभ्यास आपको दुनिया और दूसरों से जोड़ने के बजाय काट देते हैं, इनके बारे में कई पुरानी कहावतें हैं। सच तो यह है कि ध्यान जैसे चुप-चाप बैठकर किए जाने वाले कुछ अभ्यासों से आप कमरे में दूसरों की उपस्थिति में भी अपने आप में ही मस्त रहते हैं। लेकिन, आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से आप यह समझने लगते हैं कि आप अन्य लोगों सहित हर चीज़ से कैसे जुड़े हुए हैं।
करुणा समानुभूति है। यह स्वयं को दूसरे के स्थान पर रखकर उसकी भावनाओं को समझने और महसूस करने की क्षमता है। यही करुणा का मूल है।
जैसे-जैसे आप परस्पर संबद्धता की जागरूकता विकसित करने लगते हैं, आप स्वाभाविक रूप से यह जान जाते हैं कि इसमें सब कुछ समाहित है और यही सत्य है, दूसरा कोई नहीं है। हम एक नई पुस्तक पर काम कर रहे हैं, जिसमें परस्पर संबद्धता पर राम दास के कुछ लेखों को संकलित किया गया है और हम इसका नाम ‘देयर इज़ नो अदर’ (दूसरा कोई नहीं है) रखने जा रहे हैं। यह पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय, विशेष रूप से अमेरिका में और भारत में भी, लोग स्वयं को अन्य समूहों से अलग कर रहे हैं। हम जानते हैं कि दूसरों के साथ इस तरह से व्यवहार करना जैसे कि वे अलग हैं, का मतलब है कि हम उनके साथ उसी सेवा भाव, प्रेम व सम्मान से व्यवहार नहीं करते जैसा हम उन लोगों के साथ करते हैं जिन्हें हम अपने जैसा मानते हैं।
ध्यान और अन्य आध्यात्मिक अभ्यास हमें परस्पर संबद्धता की जागरूकता विकसित करने में मदद करते हैं, हमें एहसास कराते हैं कि यही सत्य है, दूसरा कोई नहीं। यह कुछ ऐसा है जिसे हम स्वयं जानने लगते हैं। हमें इसे किसी और से सुनने की ज़रूरत नहीं है, हालाँकि गुरु यह याद दिलाकर, कि हम अपने अंदर क्या खोज रहे हैं, हमारी मदद करते हैं।
साथ ही, करुणा, प्रेम और दयालुता के अभ्यास भी एक विशिष्ट तरीके से मदद करते हैं। करुणा समानुभूति है। यह स्वयं को दूसरे के स्थान पर रखकर उसकी भावनाओं को समझने और महसूस करने की क्षमता है। यही करुणा का मूल है। करुणा में दूसरों के दुख को दूर करना, उनकी खुशी में आनंदित होना (जो मुश्किल हो सकता है) और ऐसे तरीके अपनाना भी शामिल है जो उनके दुख को कम कर दें। ऐसा करने के लिए आपको जागरूक और समानुभूतिपूर्ण होने की आवश्यकता है - यह जानने की कि दूसरा व्यक्ति किस दौर से गुज़र रहा है और उसकी पीड़ा क्या है। आपको आत्म-जागरूकता की भी आवश्यकता है।
संवाद और रिश्तों में यह समझना महत्वपूर्ण है कि आप किसी परिस्थिति में क्या कर रहे हैं, साथ ही दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है। यह जागरूकता आत्म-जागरूकता से आती है। हम सभी जानते हैं कि कई परिस्थितियों में हम स्वत: ही अपनी पूर्वधारणाओं के वशीभूत व्यवहार करते हैं। यह जानना महत्वपूर्ण है। इससे आप यह देख पाते हैं कि दूसरा व्यक्ति कैसा है, जैसा आप चाहते हैं उससे कितना अलग है या आपके पूर्वाग्रह क्या हैं। ये अभ्यास सीधे और व्यावहारिक रूप से अच्छे संबंध बनाने और दूसरों के साथ वर्तमान पल में सही मायने में मौजूद रहने के लिए उपयोगी हैं।
मैं राम दास को संत नहीं बना रही हूँ, लेकिन उन्होंने मुझे इस बारे में बहुत कुछ सिखाया। जब मैंने पहली बार उनके साथ यात्रा की तब वे पहले से ही एक गुरु थे। लोग उनके सान्निध्य में रहना पसंद करते थे, उनकी बातें सुनना पसंद करते थे और उनसे बात करके हमेशा खुश होते थे। यह सामान्य लगता था और हम इसका महत्व नहीं समझते थे। हवाई अड्डे पर वे डेस्क पर जाते थे और बस वहाँ खड़े होते थे; वे न कुछ खास कहते थे और न कुछ खास करते थे, बस काउंटर के पीछे बैठे व्यक्ति के साथ वास्तव में मौजूद रहते थे। और मैं देखती थी कि कैसे वह व्यक्ति अपना काम करते हुए अचानक थोड़ा मुस्कुराता था या उन्हें उनका टिकट सौंपते हुए वास्तव में खुश दिखता था। ऐसा बार-बार हुआ करता था।
ऐसा कैसे होता है?
ऐसा उनसे मिलने वाले किसी विशेष व्यक्ति के साथ ही नहीं होता था। समय के साथ, मैंने स्वयं इस पर काम किया क्योंकि यह जीवन जीने का एक बहुत ही सुंदर तरीका है। ऐसे पल उन लोगों के साथ बिताना जिन्हें आप शायद फिर कभी न देखें या सभी तरह के लोगों के साथ और अपने सबसे करीबी रिश्तों में ऐसा करना बहुत सुखद होता है। उन पलों को इस सोच के साथ जीना, “हम यहाँ हैं, अपना काम कर रहे हैं। यह पल फिर कभी नहीं आएगा, चलो इसे भरपूर जी लें,” आनंददायक होता है। हम इस विचार के बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा करने की क्षमता, बाकी सब कुछ छोड़कर उस पल में पूरी तरह से मौजूद रहना, अभ्यास से आती है। मेरे अनुभव में, अभ्यास ने ही मेरी मदद की है।

आध्यात्मिक अभ्यास से हमें नकारात्मक भावनाओं को छोड़ने में मदद मिलती है। हम ऐसी भावनाओं को दबाते नहीं हैं बल्कि छोड़ देते हैं और वर्तमान में बने रहते हैं।
प्र. - धन्यवाद। यह सच में बहुत सुंदर है। मैं आपसे रिश्ते के दूसरे पहलू के बारे में पूछना चाहूँगी - आध्यात्मिक अभ्यास विश्वासघात, क्षति और दुःख जैसे घावों से उबरने में कैसे मदद करते हैं? इन विचारों पर चर्चा करना आसान है, लेकिन हम वास्तव में अपने हृदय के घावों को कैसे भर सकते हैं? विश्वासघात, क्षति और भरोसा उठ जाना न केवल जीवनसाथी या साझेदार के साथ संबंधों में होता है बल्कि दोस्ती,व्यावसायिक संबंधों या किसी बंधन में भी होता है।
इस कॉल पर आने से पहले मैं इस बारे में सोच रही थी और मेरे जीवन के कुछ प्रसंग मेरे मनस में उभर आए, जैसे कि अमेरिकी ब्लूज़ गायक केब मो का एक ब्लूज़ गीत। उन्होंने कहा, “मैं खाली शेल्फ़ पर पड़ी धूल की तरह महसूस कर रहा हूँ।” मुझे याद है कि मैंने भी ऐसा महसूस किया है।
कुछ मूलभूत बातें जो एक आध्यात्मिक पद्धति हमें सिखाती है, वे हैं - पहली, संसार में सब कुछ परस्पर संबंधित है और दूसरी, सब कुछ नश्वर है। अब 85 वर्ष की आयु में मैं यह कह सकती हूँ कि सब कुछ निरंतर बदलता रहता है। इसमें सीखने वाली बात यह है कि हमें इसे पहचानना होगा। पल आते-जाते रहते हैं, जीवन में बहुत कुछ आता-जाता रहता है और रिश्तों में भी कुछ न कुछ बदलाव होते रहते हैं। आध्यात्मिक अभ्यास से हमें नकारात्मक भावनाओं को छोड़ने में मदद मिलती है। हम ऐसी भावनाओं को दबाते नहीं हैं बल्कि छोड़ देते हैं और वर्तमान में बने रहते हैं। यदि कोई आपके जीवन से जा चुका होता है और आप उस कारण दुखी होते हैं, तब भी वर्तमान पल में सब कुछ ठीक होता है। आप सोचते हैं “मैं यहाँ हूँ, मैं जीवित हूँ और भविष्य मेरे सामने है।”
आत्म-जागरूकता वास्तव में भारी क्षति से उबरने में मदद करती है। इससे आप यह समझ पाते हैं कि क्षति कितनी वास्तविक है और आप उसे कितना बढ़ा रहे हैं। एक सामान्य रिश्ते में यह सोच हो सकती है, “ठीक है, वह चला गया है। वह अब मुझसे प्रेम नहीं करता। वह चला गया है।”
आत्म-अवलोकन का पूरा मुद्दा महत्वपूर्ण है। इसका मतलब अपने भीतर उठती भावना को रोकना नहीं है, बल्कि उसे उठते हुए देखना और फिर उसे बाहर निकलने देना है। इस प्रक्रिया को करते रहना है। आत्म-करुणा की भावना रखने से आप स्वयं से प्रेम करने लगते हैं। सरल आत्म-करुणा का अभ्यास, जैसे अपने हृदय पर हाथ रखना और कहना, “मैं अभी कठिन समय से गुज़र रही हूँ। हर कोई कष्ट भोग रहा है। मैं अभी कष्ट भोग रही हूँ। मैं स्वयं के लिए वही देखभाल और दया का भाव रखती हूँ जो मैं एक अच्छी मित्र के लिए रखती यदि वह कष्ट में होती,” वास्तव में मदद कर सकता है। अपने प्रति यह प्रेममयी दयालुता का भाव बनाए रखने से बहुत फ़र्क पड़ता है।
हाल के वर्षों में, मैंने मृत्यु से जुड़े दुख और क्षति पर बहुत काम किया है। मैंने राम दास के साथ ‘वॉकिंग ईच अदर होम’ पुस्तक लिखी। मैं अब बूढ़ी हो गई हूँ, इसलिए मेरे साथ के लोग मर रहे हैं। हर रिश्ते का किसी न किसी तरह से अंत होता है। अंततः एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी और उस रिश्ते का अंत हो जाएगा। लेकिन प्रेम भरे रिश्तों का वास्तव में कभी अंत नहीं होता। जब लोग मर जाते हैं तब भी आपके भीतर उनके प्रति प्रेम बना रहता है। वह व्यक्ति एक अलग तरीके से आपके साथ होता है, आप अकेले नहीं होते। मैंने पहले भी ऐसा सुन रखा है। लेकिन इतने सारे करीबी लोगों को खोने के बाद मुझे एहसास हो गया है कि यह सच है।
राम दास की मृत्यु के बाद मुझे उनके बारे में एक सपना आया। हम 50 साल से दोस्त थे और उन्हें खोना मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति थी। सपने में हम एक घेरे में गद्दियों पर बैठे थे और चुपचाप इंतज़ार कर रहे थे। मैंने पीछे झुककर उन्हें छुआ और मुझे एक गर्म, हल्का एहसास हुआ कि सब कुछ ठीक है। वे भी झुके और बोले, “मैं यहाँ हूँ।” यह सपने का अंत था। यह एक प्रकार से इस बात की पुष्टि थी कि भले ही मृत्यु के कारण क्षति हो, लेकिन प्रेम और जुड़ाव बना रहता है।
सभी तरह के रिश्ते - प्रेम-प्रसंगी, पारिवारिक और मित्रता - प्रशंसा और क्षमा करने से लाभान्वित होते हैं। करुणापूर्ण व्यवहार मदद करता है - यह पहचानना कि यह व्यक्ति मेरी तरह बस खुश रहना चाहता है और वही कर रहा है जो उसे लगता है कि उसे खुशी देगा, भले ही इससे मुझे दुख हो। उसने भी मेरी तरह ही दुख झेले हैं।
यह जानना ज़रूरी है कि हम इसलिए शोक मनाते हैं क्योंकि हमने ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसे हम प्रेम करते हैं। प्रेम के बिना कोई दुख नहीं होता।
हम सभी इस समय अपनी समझ के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं। यह दृष्टिकोण मदद करता है। यह आप से ही संबंधित नहीं है, यह दूसरों से भी संबंधित है। मैं ऐसी व्यक्ति रही हूँ जो परिस्थितियों से भाग जाती थी और यह भी चुनौतीपूर्ण होता है। अभ्यास आपको स्वयं को अति गंभीरता से न लेने और चीज़ों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखने में मदद करता है।
प्रश्न - आपने प्रेम करने और मरने के बारे में, रिश्तों में अस्थिरता के बारे में और यह महसूस करने के बारे में, कि वह व्यक्ति मरने के बाद भी आपके साथ है, बात की। जब हम ऐसे दृढ़ वचन बोलते हैं, जैसे, “हाँ, मेरा प्रिय मेरे साथ है,” या किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं जो गुज़र चुका है, तब हम उसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। कभी-कभी हमें किसी ऐसे व्यक्ति के साथ बहुत कम समय मिलता है जिसे हम बहुत प्रेम करते हैं, अपने दिल में बसाए रखते हैं और जो हमारे करीब होता है। मैं सोचती हूँ कि भले ही साथ बिताया गया समय बहुत कम रहा हो, फिर भी प्रेम कैसे बना रहता है।
उदाहरण के लिए, दादा-दादी और परदादा-परदादी जीवन में बहुत महत्व रखते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ, एक दादी। मेरी एक पोती है। उसके साथ मेरा रिश्ता मेरे जीवन में सबसे अनमोल है और मुझे पता है कि उसके लिए भी ऐसा ही है। मैं यह भी जानती हूँ कि मैं उसके मरने से बहुत पहले ही मर जाऊँगी। जब मैंने पुस्तक लिखनी शुरू की तब मैं सोचने लगी कि हमारे मरने के बाद लोग हमें कितने समय तक याद रखते हैं। मैं अपनी माँ के बारे में सोचने लगी जो 40 साल पहले मर गई थी। मैंने याद करने की कोशिश की, यह देखने के लिए कि मुझे वास्तव में उनके बारे में क्या याद है। मेरे मन में अपनी माँ के बारे में एक विचार है, लेकिन वास्तव में मुझे कितना याद है, यह सोचने की बात है।

मैं आध्यात्मिक अभ्यास में महिलाओं के समूह का संचालन करती थी। शुरुआत में हम समूह के सदस्यों को बारी-बारी से अपना परिचय देने के लिए कहते थे। प्रत्येक महिला अपना नाम, अपनी माँ का नाम, अपनी दादी का नाम, जितना हो सकता था उतना पीछे जाकर अपने पूर्वजों का नाम बताती थी। इस देश में अधिकतर महिलाएँ अपनी दादी के पहले नाम से आगे नहीं जा सकीं। आप्रवासन ने कई कारणों से बहुत सी पारिवारिक वंशावली को समाप्त कर दिया है। इससे मुझे एहसास हुआ कि यदि भविष्य में डाहलिया (मेरी पोती) की बेटी होगी तो वह शायद मेरा नाम भी नहीं जानती होगी। यह बात मुझे चुभ गई। ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन यह कई महिलाओं के लिए सच था।
इसलिए मैंने अपने आप से पूछा - हम अपने प्रियजनों को मृत्यु के बाद भी जीवित रखने के लिए क्या कर सकते हैं, ताकि उन्होंने दुनिया को जो कुछ भी दिया, वह हम सभी के लिए एक उपहार की तरह बना रहे?
कई संस्कृतियों में, वे पहले से ही ऐसा करते हैं, लेकिन मैंने एक छोटी सी मेज़ रखकर वेदी बनाई। उसके ऊपर मैंने अपने उन प्रियजनों की तस्वीरें रखीं जो मर चुके हैं। मैंने उनसे हर दिन मिलने का वादा किया, भले ही उन्हें याद करने के लिए उनकी तस्वीरों के सामने एक पल के लिए ही खड़े होना हो। मैंने इसे अपने ध्यान कक्ष में रखा और हर रोज़ मैं उस छोटी सी मेज़ के सामने खड़ी होकर प्रत्येक तस्वीर को देखती थी। मैंने पाया (यह एक अलग बात है, लेकिन इसका उम्र बढ़ने से संबंध है) कि शुरुआत में लगभग आधा दर्जन तस्वीरें ही थीं। दो साल के अंत तक, जिस दौरान मैं पुस्तक लिख रही थी, इतनी सारी तस्वीरें हो गई थीं कि मुझे एक और मेज़ रखनी पड़ी। मेरे परिचित बहुत से लोग मर रहे थे। अब वहाँ ढेर सारी तस्वीरें हैं। मुझे अंदर जाकर हर एक को नमस्ते कहना पड़ता है। कई बार, हमारे पास सिर्फ़ उन लोगों की तस्वीरें होती हैं जिन्हें हम प्रेम करते हैं और जो मर चुके हैं, लेकिन मैंने इसे ज़्यादा अनुष्ठानिक, ज़्यादा औपचारिक बनाने की कोशिश की, जिससे यह एक अभ्यास बन गया। मैं हर दिन ऐसा करना चाहती हूँ, बजाय इसके कि कभी-कभार ही उन तस्वीरों को देखकर उनकी सराहना करूँ।
यह जानना ज़रूरी है कि हम इसलिए शोक मनाते हैं क्योंकि हमने ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसे हम प्रेम करते हैं। प्रेम के बिना कोई दुख नहीं होता। यदि किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु होती है जिसकी आपको परवाह नहीं है तो उसके जाने का दुख नहीं होता, वह बस चला जाता है। दुख वास्तव में प्रेम से संबंधित है और वह व्यक्ति के चले जाने के बाद भी बना रहता है। आप उन्हें अपने दिल में रखते हैं। आपको बस उनके प्रति अपने प्रेम को जगाने, उन्हें याद करने की ज़रूरत है, ताकि वे आपके भीतर जीवित हो जाएँ। जैसा कि मैंने कहा, मैंने अपने जीवन में ये शब्द सुन रखे थे, लेकिन जब मैं उन लोगों को खोने लगी जिन्हें मैं सच में प्रेम करती थी, जिन्हें मैं खोना नहीं चाहती थी तब मैं दुख को क्षति के रूप में नहीं, बल्कि एक बदलाव के रूप में देखने लगी।
नीम करोली बाबा महाराज जी ने कहा, “प्रेम मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली है।” इसका यह तात्पर्य है कि हम जिन लोगों से प्रेम करते हैं, वे उस प्रेम में मरने के बाद भी जीवित रहते हैं।
मैंने अभी-अभी एक संस्मरण लिखना समाप्त किया है क्योंकि मैं चाहती थी कि उसमें ये कहानियाँ हों। हम कहानियों के माध्यम से सीखते हैं। साथ ही, दुख वास्तविक होता है। चूँकि केवल शरीर ही मरता है इसका मतलब यह नहीं है कि दुख वास्तविक नहीं होता। यह हर किसी के लिए अलग होता है, क्योंकि यह पूरे रिश्ते और पिछली क्षतियों पर निर्भर करता है जो फिर से उभर आती हैं। दुख आश्चर्यजनक तरीकों से महसूस होता है।
नीम करोली बाबा महाराज जी ने कहा, ““प्रेम मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली है।” इसका यह तात्पर्य है कि हम जिन लोगों से प्रेम करते हैं, वे उस प्रेम में मरने के बाद भी जीवित रहते हैं।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए, “मुझे शोक नहीं करना चाहिए,” बल्कि इसका सम्मान करना चाहिए। यदि आप दुखी हो रहे हैं तो इसे स्वीकार करें - “हाँ, मैं दुखी हूँ। लोग तब दुखी होते हैं जब वे ऐसे व्यक्ति को खो देते हैं जिसे वे प्रेम करते हैं।”
उस दुख का सम्मान करें। उसे दबाएँ नहीं। उसे समझने के लिए, सम्मान देने के लिए उसी आत्म-करुणा का उपयोग करें क्योंकि वह किसी कारण से है। वह इसलिए है क्योंकि आपने किसी से बहुत प्रेम किया है और यह उस प्राणी के साथ जुड़े रहने का एक नया तरीका खोजने का प्रयास है।
प्र. - मुझे आपकी बात अच्छी लगी - यह अपने प्रियजन के साथ बने रहने का एक नया तरीका है। यह इसे देखने का एक बहुत ही परिपक्व तरीका है। मैंने इसके बारे में कभी ऐसा नहीं सोचा था। इस खूबसूरत और ज्ञानवर्धक समय के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद जो हमने साथ में बिताया।
आपका भी धन्यवाद।

मीराबाई बुश
मीराबाई ध्यानशील अभ्यास सिखाती हैं और संस्थाओं के लिए मननशील सिद्धांतों व मूल्यों पर आधारित ... और पढ़ें