दाजी 9वें सार्वभौमिक नियम की व्याख्या करते हैं। इससे हमें पता चलता है कि हम किस प्रकार अपना सर्वोत्तम स्वरूप बन सकते हैं। वे आंतरिक ध्यान-अभ्यास के पूरक के रूप में जीवनशैली के महत्व के बारे में बताते हैं। वे यह भी बताते हैं कि जीवनशैली के प्रति हमारा दृष्टिकोण किस प्रकार दूसरों के साथ हमारे रिश्तों में झलकता है।

शुरुआत में, 9वाँ नियम हमारे बीच की विविधता के महत्व को समझने और उसकी सराहना करने में हमारी सहायता करता है। अपने पूर्वाग्रहों को हटाकर और मानवता व अन्य प्राणियों की संपन्नता को स्वीकार करके हम दूसरों में प्रेम और साधुता जागृत करते हैं और उस विविधता में एकता विकसित करते हैं। जैसे-जैसे हम इस नियम की गहराई में जाते हैंहमें अपने दैनिक जीवन में प्रेम एवं कर्तव्यपरायणता की महत्वपूर्ण भूमिकाओं का एहसास होने लगता है। यदि हमें अपना सर्वोत्तम स्वरूप बनना है तो यह एहसास आवश्यक है।

 

नियम 9

अपना व्यवहार एवं रहन-सहन ऐसा बना लें जिससे
लोगों में प्रेम और नेकखयाली जागृत हो।

अब तक हमने आठ नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त की है जिन्हें हमने अभ्यास, नैतिक मूल्यों व व्यवहार के अंतर्गत वर्गीकृत किया है। नियम 9 में हम दूसरों के साथ अपने आचरण के मानदंड को और भी अधिक ऊँचा करते हैं ताकि वे हमसे प्रेरित हों और हमारा साथ उन्हें उदात्त बनाने वाला लगे। नियम 9 एक प्रकार से हमें अपना सर्वोत्तम संभव स्वरूप बनने के लिए और अपने सर्वोच्च स्व के साथ सामंजस्य में होने के लिए प्रेरित करता है। इसके लिए अपनी साधना और जीवन शैली के सभी पहलुओं को साथ लाने की आवश्यकता है। इसके लिए जागरूकता, परिष्करण और संतुलन की आवश्यकता है जो रूपांतरण के लिए अनिवार्य है। यह पिछले सभी नियमों की पराकाष्ठा है ताकि हम दूसरों के लिए अनुकरणीय बन पाएँ। इस प्रकार नियम 9 नेतृत्व से संबंधित है।

एक सच्चा नेता, दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में उदाहरण बनकर नेतृत्व करता है। और ऐसा नेता बनने के लिए कोई अन्य आसान उपाय नहीं है। इसमें पिछले सभी नियमों को अपने जीने के तरीके में शामिल करना होता है ताकि हम जहाँ भी जाएँ, प्रेम ही उत्पन्न हो।

आंतरिक रूपांतरण बाह्य व्यवहार को बदल सकता है

हमारे आंतरिक रूपांतरण का वास्तविक प्रमाण हमारे बाहरी बर्ताव और जीवन शैली में है जो हर व्यक्ति और हर चीज़ के साथ हमारे संबंध में झलकता है। योग में इसे ‘व्यवहार’ कहते हैं। दूसरों के साथ हमारा व्यवहार मुख्यतः हमारी बातचीत एवं कार्यों के माध्यम से होता है और हमारे आंतरिक पहलू जो इस बातचीत एवं कार्यों को ढालते हैं, वे हैं हमारे विचार व भावनाएँ। अपने रहन-सहन को सर्वोच्च स्तर का बनाने का अर्थ है इन सभी का रूपांतरण।

हम इसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अब आधुनिक वैज्ञानिक भी यह स्वीकार करते हैं कि चेतना प्रत्यक्ष ब्रह्मांड का पृष्ठाधार है। हर चीज़ चेतना से ही प्रकट होती है। अतः संसार में स्थायी परिवर्तन लाने के लिए, अपने जीवन को ढालने के लिए हमें अपनी चेतना का विस्तार और रूपांतरण करना होगा। और ऐसा करने के लिए ध्यान सबसे असरदार तरीका है। इसी कारण से, ध्यान उन लोगों में बहुत ही प्रचिलित हो गया है जिन्हें रूपांतरण में रुचि है।


अब आधुनिक वैज्ञानिक भी यह स्वीकार करते हैं कि चेतना प्रत्यक्ष ब्रह्मांड का पृष्ठाधार है। हर चीज़ चेतना से ही प्रकट होती है।


लेकिन ध्यान इस पूरी कहानी का केवल एक भाग है। दूसरा महत्वपूर्ण भाग है - हम उस विस्तारित चेतना को अपने जीने की शैली में शामिल करें। हम ऐसा क्या करें कि यह हमारे व्यवहार को रूपांतरित करके इतने ऊँचे स्तर का बना दे कि वह दूसरों में प्रेम और नेकखयाली जागृत कर सके? क्या हमें दूसरों के साथ व्यवहार में संज्ञानात्मक और भावनात्मक झुकावों की भूमिका पर ध्यान देने की आवश्यकता है?

हमारे जीने का तरीका कई बातों से संबंधित है - हम एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं, कैसे बोलते हैं, किसी भी वातावरण में कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं, किस प्रकार का हम इत्र लगाते हैं या नहीं लगाते हैं, हमारे शारीरिक हाव-भाव कैसे हैं, किस तरह से हम दूसरों के बारे में सोचते हैं या उन्हें महत्व देते हैं आदि। हमारा आचरण हमारे जीने के तरीके के बारे में सब कुछ बता देता है। उदाहरण के लिए, क्या हम इस तरह से जी रहे हैं जिससे दूसरों में जलन या ईर्ष्या का भाव पैदा न हो? इसका अर्थ है न्यूनतम आवश्यकताओं तक जीवन को साधारण बनाना।

नियम 4 को याद करें, “अपना जीवन सरल बना लें और वह ऐसा हो कि आपकी दिव्य प्रकृति के अनुरूप हो जाए।” मैं यहाँ जानबूझकर ‘दिव्य’ शब्द जोड़ रहा हूँ ताकि ‘प्रकृति’ शब्द का अर्थ स्पष्ट हो जाए। इसका पेड़ के नीचे सोने से कोई लेना-देना नहीं है। इसका संबंध पूरी तरह से अपने जीवन को सरल बनाने से है ताकि हम अपनी दिव्य प्रकृति को आत्मसात करें। जब हम सरलता के उस स्तर तक चले जाते हैं, न्यूनतम आवश्यकताओं तक, तब दूसरों में प्रेम और नेकखयाली जगाना संभव हो जाता है। वास्तव में यह बहुत ऊँचा लक्ष्य है। अतः सरलता तक पहुँचने के लिए जटिलताओं से छुटकारा पाना आवश्यक है।

हम यहाँ केवल स्वयं में प्रेम और नेकखयाली जागृत करने की बात नहीं कर रहे हैं, जो वैसे भी एक पूर्वावश्यकता है और एक वास्तविक उपलब्धि है। हम इसके अगले स्तर की यानी दूसरों में प्रेम और नेकखयाली जागृत करने की बात कर रहे हैं। निश्चय ही यह ईश्वर से पूर्णतः प्रेम करने और पवित्र बनने से कुछ अधिक है। इतना ही पर्याप्त नहीं है। सब कुछ ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होता है। यदि हमारी शुद्धता किसी में प्रवाहित होनी है, यदि हमें दूसरों में नेकखयाली पैदा करनी है, हमें उससे ऊँचे स्तर पर पहुँचना होगा ताकि वह ऊँचे से नीचे की ओर प्रवाहित हो पाए। बढ़ती शुद्धता तक पहुँचने के लिए भी अशुद्धियों को हटाने की आवश्यकता होती है।

दूसरों के साथ प्रेममय रिश्ते बनाना

अंग्रेज़ी में नेकखयाली को ‘पायटी’ कहते हैं जो लैटिन के ‘पियेटस’ शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है कर्तव्यपरायणता, लगाव, प्रेम, निष्ठा और कृतज्ञता। यहाँ कर्तव्यपरायणता के बारे में जानना उचित रहेगा। जब हम अपना कर्तव्य, अपना आचरण, अपना व्यवहार अच्छे से निभाते हैं तब अपने आप ही हम दूसरों के साथ एक प्रकार का सामंजस्य विकसित कर लेते हैं। जब हम अपने कर्तव्य पूरे नहीं करते तब दूसरे लोग प्रेम और नेकखयाली तो छोड़िए, हमारा सम्मान भी नहीं करते। उदाहरण के लिए, जब माता-पिता इतने अधिक व्यस्त होते हैं कि अपने बच्चों के पालन-पोषण, सुरक्षा और सहायता करने के लिए उनके साथ ठीक से समय नहीं बिता पाते तो उस परिवार में क्या होता है? अंततः वे बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते क्योंकि माता-पिता ने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। व्यवहार हमारे हृदय से अनुनादित होता है। वह अनुनाद इस तरह से पैदा होता है कि हमारे जीने के तरीके से दूसरे आहत नहीं होते। वे इन बातों से आहत नहीं होते - हमारे बोलने के तरीके से या इस बात से कि हमने उन्हें अनदेखा कर दिया या हम मुस्कुराए नहीं या हमें जो मिला है उसका दिखावा करते हैं। हमारा जीवन बिलकुल सादा होना चाहिए, न्यूनतम आवश्यकता तक। और इसमें दूसरों के प्रति आदर-भाव और सम्मान होना चाहिए। इसके लिए गहरी समझ-बूझ और सोच-विचार की आवश्यकता है।

क्या हम कृत्रिम रूप से प्रेम और नेकखयाली विकसित करके उसका दिखावा कर सकते हैं? नहीं, यह संभव नहीं है, यद्यपि इनको विकसित करने का प्रयास करने से सहायता अवश्य मिलती है। निश्चय ही, इससे एक उत्तम लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलेगी। हम पहले अपने आपमें वह दशा प्राप्त करके और अपने अंदर आंतरिक वातावरण पैदा करके ही अपनी जीवन शैली और व्यवहार में प्रेम व नेकखयाली को अभिव्यक्त कर सकते हैं। केवल इसके बारे में पढ़कर या किसी संत अथवा गुरु के साथ रहकर इसकी नकल नहीं की जा सकती। ध्यान-अभ्यास के फलस्वरूप इसे अंदर से प्रस्फुटित होना चाहिए। ऐसी दशा को हम ध्यान में कैसे प्राप्त कर पाएँगे? यह हमारे आंतरिक वातावरण को कैसे रूपांतरित करेगी? क्या केवल पेरिये पानी (मिनरल वाटर) की दो सुंदर बोतलों को देखकर हमारी प्यास बुझ जाएगी? नहीं। यह तभी होगा जब हम उसे अच्छे से ग्रहण करेंगे। यह तब होगा जब हमारे दिल में रिक्तता होगी। इसीलिए हार्टफुलनेस में सफ़ाई की प्रक्रिया इतनी आवश्यक है, क्योंकि इससे हमारी चेतना के क्षेत्र से जटिलताएँ व अशुद्धियाँ हट जाती हैं और उसमें खालीपन आ जाता है।

अंततः कुछ समय नियमित अभ्यास के बाद हम अपना रहन-सहन इतने ऊँचे स्तर का कर लेते हैं कि हमें सफ़ाई की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहना पड़ता क्योंकि तब हमारी जीवन शैली के कारण हम में या दूसरों में कोई संज्ञानात्मक या भावनात्मक झुकाव नहीं रह जाते। केवल तभी हमारे साथियों और प्रियजनों को कुछ शांति मिलेगी। केवल तभी उनका हमारे साथ एक ऐसा रिश्ता बन पाएगा जिसमें उन्हें किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं करना पड़ेगा। केवल तभी कोई माँगें नहीं होंगी। वह शुद्धता व सरलता पर आधारित एक प्रेममय रिश्ता होगा।

सच्चाई एवं अंतःकरण

इसीलिए बाबूजी बार-बार व्यवहार, कर्तव्य के बारे में कहते रहे हैं। इस पल में आपका क्या कर्तव्य है? केवल आपके रिश्तों के प्रति ही नहीं, बल्कि उस वातावरण के प्रति भी जिसमें आप चलते-फिरते हैं, चाहे वह जगह आपके मित्र अथवा रिश्तेदार की हो या आपकी, चाहे वह कोई उद्योग, कोई कार्यालय या कोई खेत हो। आपकी उपस्थिति उसमें किस प्रकार से योगदान देती है?

आप दशाओं को अपने अंदर छल से रच नहीं सकते, आप अपने पवित्र होने का दिखावा नहीं कर सकते और आप अपने शुद्ध होने का दिखावा नहीं कर सकते। यह तभी होगा जब आप अपने अंतःकरण के साथ एक सच्चा रिश्ता बनाएँगे। क्या आप अपने अंतःकरण से खुश हैं, चाहे आप कुछ भी करें? अपना आँकलन स्वयं करें। यदि आप सड़क पर या नदी में कचरा फेंकते हैं तो इससे आपको कैसा महसूस होता है? हम में से बहुतों के पास अंतःकरण है लेकिन क्या यह इतना जागृत है कि हमारे कार्यों में प्रकट हो सके? संवेदनशीलता केवल तभी विकसित होती है। और हम सूक्ष्मतर व उच्चतर चीज़ों के प्रति केवल तभी संवेदनशील बन सकते हैं जब हम वास्तव में अपने ज़मीर को अपने व्यवहार में उतार कर इन सांसारिक चीज़ों के प्रति संवेदनशील होते हैं। जब भी हमारी अंदर की धीमी आवाज़ हमें कोई सही कार्य करने के लिए कहती है, हमें उसे अवश्य सुनना चाहिए। अन्यथा इस कला को हम खो देंगे।

अपनी इंद्रियों के परे जाने और संवेदनशील बनने के लिए दिन-प्रतिदिन की सांसारिक चीज़ों के बारे में अपने अंतःकरण को सुनने के प्रति कुछ प्रतिबद्धता तो आवश्यक है। जब हमें अपने कर्तव्यों की बार-बार याद दिलाने की आवश्यकता पड़े तो हमारी चेतना का विस्तार नहीं हो सकता। बार-बार याद दिलाने की आवश्यकता तब पड़ती है जब हम सुनते नहीं हैं। जब हमारा अंतःकरण कचोटने लगता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। हमें इसलिए याद दिलाया जाता है क्योंकि हमारा कर्तव्य पूरा नहीं हुआ होता है।

नेकखयाली हमारे हृदय में ही उत्पन्न होती है। जब हम स्वयं को खाली कर देते हैं, जब हम प्रार्थनामयी स्थिति में बने रहते हैं, जब हम ग्रहणशील बने रहते हैं तब यह नेकखयाली परलोक से प्राप्त होती है। नेकखयाली हम में एक स्थायी गुण बन सकती है लेकिन इसका अभ्यास नहीं किया जा सकता। शुद्धता का अभ्यास नहीं किया जा सकता। दिव्यता का अभ्यास नहीं किया जा सकता।

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तो हम किसका अभ्यास कर सकते हैं? हम हार्टफुलनेस के ध्यान, सफ़ाई और प्रार्थना के दैनिक अभ्यास कर सकते हैं। इन अभ्यासों के माध्यम से जो चेतना का विस्तार होता है, वह फिर हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाता है और हमारा संपूर्ण अस्तित्व रूपांतरित हो जाता है। विचार, भावना, वाणी और व्यवहार परस्पर जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक में बदलाव आने से अन्य में बदलाव आ जाता है। इससे हमारे जीवन के सभी पहलुओं का रूपांतरण होता है जिससे फिर समग्र रूपांतरण हो जाता है।

जब हम इस नियम पर महारत हासिल कर लेते हैं तब इस व्यवहार को अपने जीवन में लागू करना स्वाभाविक हो जाता है। किसी ज़रूरतमंद की मदद, चाहे वह इंसान हो या कुछ और, अपने आप और बिना दिखावे के होती है। ऐसा नहीं है कि हम परोपकार, अच्छे कामों, दयालुता के कार्यों, करुणापूर्ण कार्यों या वातावरण की सुरक्षा के बारे में सोचते हैं - दूसरों की सहायता करना, उनकी देखभाल करना और उनकी आवश्यकता के अनुसार काम करना तो हमारा मौलिक कर्तव्य है। यह तो स्वाभाविक अवस्था है - तो फिर इसे कर्तव्य भी क्यों माना जाए? इसलिए इसमें किसी पुरस्कार या सराहना की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसमें अहंकार सम्मिलित नहीं होता। यह ऐसा ही है जैसे कि कोई माँ अपने बच्चे का ध्यान रखने के लिए रात में जागती है। क्या वह इसे किसी कर्तव्य या त्याग के रूप में देखती है? बिलकुल नहीं - यह केवल वही है जो उसे करना है। उसके लिए यह स्वाभाविक है।

प्रकृति के साथ एकरूपता

इस रूपांतरण का यह परिणाम होता है कि हम प्रकृति के साथ एकरूप हो जाते हैं। जब सभी अशुद्धियाँ मिट जाती हैं तब हमें मौलिक अवस्था प्राप्त होती है। तभी हमारा व्यवहार प्रकृति के साथ तालमेल में होता है। तो, प्रकृति के वे कौन से पहलू हैं जिन्हें यह नियम 9 हमें अपनाने को कहता है?

पहला है, समरूपता। उदाहरण के लिए सूर्य के समान बनें जो बिना किसी भेदभाव के सभी जगह चमकता है और वायु के समान बनें जो सभी के साँस लेने के लिए उपलब्ध है। पेड़ पापियों और संत दोनों को छाँव देते हैं और एक गुलाब अमीर और गरीब दोनों को खुशबू देता है। प्रकृति भेदभाव नहीं करती। हम अस्तित्व के एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं। इसे एक अलग तरह से कहें तो हम एक ही ऊर्जा या एकत्व का स्वरूप हैं।


अपनी इंद्रियों के परे जाने और संवेदनशील बनने के लिए
दिन-प्रतिदिन की सांसारिक चीज़ों के बारे में अपने अंतःकरण को सुनने के प्रति कुछ प्रतिबद्धता तो आवश्यक है। जब हमें अपने कर्तव्यों की बार-बार याद दिलाने की आवश्यकता पड़े तो हमारी चेतना का विस्तार नहीं हो सकता।


दूसरा है, विविधता। प्रकृति विविधता को अपनाती है और उसका सम्मान करती है। क्या आप किसी ऐसे सुंदर वन की कल्पना कर सकते हैं जिसमें केवल एक ही प्रकार का पौधा हो? यह रंगों, बनावट, ऊँचाइयों, पत्तियों के आकारों और फूलों की विविधता ही है जो किसी वन को सुंदर बनाती है। प्रकृति विविधता में ही स्वयं को अभिव्यक्त करती है और हर अभिव्यक्ति को अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार ही अपना हिस्सा मिलता है।

जब हम समरूपता और विविधता के इन दोनों पहलुओं को जोड़ते हैं तब हम ‘विविधता में एकता’ के विचार पर पहुँचते हैं जो ऐसा सर्वश्रेष्ठ तरीका है जिससे हम एक-दूसरे को महत्व दे पाते हैं, अपनी विभिन्न शक्तियों व कमज़ोरियों को स्वीकार कर पाते हैं, अपने परिवार में, समाज में एक खुशनुमा जीवन जी पाते हैं और यह स्वीकार कर पाते हैं कि दूसरों को उदात्त बनाकर ही हम विकसित होते हैं।

तीसरा पहलू है, विकास व प्रगति। प्रकृति निरंतर विकसित होती है। आदिकाल के तात्विक मिश्रण से जीवन की चिंगारी तब प्रज्ज्वलित हुई थी जब पहला एक-कोशिकीय जीव उत्पन्न हुआ था। प्रजातियों की विविधता को, जिसे हम आज देखते हैं, विकसित होने में करोड़ों वर्ष लगे। विकास व प्रगति प्रकृति में प्रमुख संवेग हैं। यहाँ पृथ्वी पर, इस समय मनुष्य को विकास का शिखर माना जाता है। जहाँ पेड़-पौधे और पशु प्रकृति की योजना के अनुसार अपने आप विकसित होते हैं, वहीं हमें सचेत रूप से विकसित होने की संभावना का सौभाग्य प्राप्त है। हमें चेतना का एक ऐसा स्तर प्राप्त है जिससे हम आत्म-जागरूक हो सकते हैं और उस चेतना का विस्तार व रूपांतरण कर सकते हैं। ध्यान वह प्रक्रिया है जिससे हम यह करते हैं।

ध्यान हमें धीरे-धीरे ज़्यादा से ज़्यादा प्रकृति जैसा बनने में मदद करता है, लेकिन यह रूपांतरण स्थायी तभी होता है जब हम इसे अपने दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में अपनाते हैं। जब हम अपना व्यवहार बदलते हैं तो हमारी सोच भी बदलती है। जब हमारी सोच बदलती है तो हमारी मान्यताएँ बदल जाती हैं। यह प्रक्रिया अपने आप को दोहराने वाली और केंद्र की ओर उन्मुख रहती है और यह बदलाव बढ़ता जाता है। जैसे-जैसे हम इसे जारी रखते हैं, धीरे-धीरे हमारा प्रकृति के साथ तालमेल बैठने लगता है।

अपने रहन-सहन को ढालने का विज्ञान

अपने व्यवहार और जीने की शैली को ढालने का क्या अर्थ है? एक धातु से बनी वस्तु का उदाहरण लें जो खराब या अनुपयुक्त है। इसे ढालने के लिए हमें पहले इसे पिघलाना पड़ेगा। यह पिघलाना, मौजूदा आदतों को हटाने, मानसिक व भावनात्मक स्वरूपों को तोड़ने और अपनी मान्यताओं को बदलने के लिए एक रूपक है। जब हम अपनी बनाई चीज़ों को तोड़ देते हैं तब प्रकृति के साँचे में पुनः ढाले जा सकते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका अर्थ है, अपने अवचेतन में स्थापित तंत्रिका-स्वरूपों के नियोजन को हटाना ताकि तंत्रिकाओं की ढलनशीलता (न्यूरोप्लास्टिसिटी) और अनुकूलनशीलता प्रकृति के नियमों के अनुरूप विकसित हों। यह दोहराई जाने वाली प्रवृत्तियों, व्यवहारों और आदतों को हटाने से होता है। मान लें कि हमारे बोलने का तरीका अशिष्ट है। पहला कदम है कि हम इसे पहचानें और इसे बदलने की इच्छा रखें। जैसे-जैसे हमारी वाणी अधिकाधिक शिष्ट बनती जाएगी, दूसरे लोग इस पर ध्यान देने लगेंगे और वे हमारी ओर अपना व्यवहार बदल लेंगे। इससे हमें शिष्ट बनने के लिए और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक यह हमारे स्वभाव का अंश न बन जाए। इससे हमारी सोच भी बदलती है। इसके परिणामस्वरूप, अशिष्टता से संबंधित तंत्रिकाओं के स्वरूप मिट जाते हैं। लेकिन यह सब स्थायी तभी बनता है जब हम सफ़ाई के अभ्यास द्वारा सूक्ष्म शरीर के स्तर पर इन स्वरूपों के मूल कारण को मिटा देते हैं।

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जीवन शैली में ऐसे बदलावों में पहले के सभी आठ नियम शामिल होते हैं - ध्यान का दैनिक अभ्यास, हृदय में रिक्तता लाने के लिए प्रार्थना का अभ्यास, उच्चतम लक्ष्य पर केंद्रित रहना, सरलता, सच्चाई एवं भाईचारे के सार्वभौमिक नियमों को अपनाना, कष्टों को स्वीकार करना और द्वेष व बदले की भावना को त्यागना, ईमानदारी व पवित्र कमाई को ध्यान में रखते हुए खाने को जो भी मिले उससे संतुष्ट रहना। ये नियम वो साधन हैं जो हमारे रूपांतरण को निर्धारित करते हैं।

दिव्य दृष्टि को आकर्षित करना

अभी सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है। जब हम इस तरह से अपने रहन-सहन को ढालते हैं तो हम न केवल अपने साथियों में प्रेम व नेकखयाली जगाते हैं बल्कि दिव्यता को भी आकर्षित करने लगते हैं। बाबूजी के शब्दों में हम ‘उनकी आँखों का तारा’ बन जाते हैं। यदि हम इस यात्रा में आगे बढ़ना चाहते हैं तो यह एक बहुत आवश्यक चरण है। जैसा कि बाबूजी समझाते हैं, “बेशक, दिव्य सहायता मिलती है लेकिन केवल तभी जब लक्ष्य के प्रति भक्त की निष्ठा पर परमात्मा को पक्का विश्वास हो जाए।” परमात्मा को भी हम पर भरोसा होना चाहिए। क्या हम निष्ठापूर्ण, ईमानदार, वास्तविक जिज्ञासु और सच्चे हैं? अन्यथा वे हम पर समय बर्बाद क्यों करेंगे? बाबूजी के गुरु, लालाजी अपनी पुस्तक ‘अक्षर सत्य’ में बताते हैं - “जब हमारे अंदर से अपने आप को महत्व देने की भावना पूरी तरह से चली जाती है और प्रत्यक्ष या परोक्ष, हर प्रकार की अहम्-चेतना समाप्त हो जाती है तब हम केवल वही करेंगे जो हमें करना चाहिए। यह दशा यदि ईश्वर दे दे तो यह सर्वोत्तम दशा है।” तब दिव्यता उसकी जगह ले लेती है।

स्वयं और दूसरों को प्रेरित करना

अनुभव से हम जानते हैं कि हम तब तक किसी को प्रेरित नहीं कर सकते जब तक हम स्वयं प्रेरित न हों। कई लोग संपत्ति, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के प्रति प्रेरित रहते हैं। यद्यपि इनमें से किसी में कुछ गलत नहीं है लेकिन सच्चे जिज्ञासु इनसे प्रेरित नहीं होते हैं बल्कि उन्हें जब ये मिलती हैं तो कृतज्ञता से उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। इन्हें प्राप्त करना हमारा लक्ष्य नहीं हैं। हम कभी भविष्य में यात्रा पूरी करने पर किसी बड़े पुरस्कार या ज्ञानोदय का भी इंतज़ार नहीं कर रहे हैं। हम वर्तमान में, तुरंत मिलने वाली किसी चीज़ से प्रेरित होते हैं और शायद आप उत्तर से आश्चर्यचकित हो जाएँ। यह वो दशा है जो ध्यान में मिलती है - समाधि का उपहार, ईश्वर के साथ एकात्मकता - यही प्रेरणास्रोत है। हर बार जब हम ध्यान करते हैं, उसमें दिव्यता का आभास होता है। यही हमें अभ्यास करने के लिए, एक सरल व सच्चा जीवन जीने के लिए और सभी को अपना भाई मानने के लिए प्रेरित करता है। यही हमें हर दिन, अपने हर काम में अपना सर्वोत्तम स्वरूप बनने के लिए प्रेरित करता है ताकि अंततः यह स्वरूप स्थायी बन जाए।

जो प्रेम और सम्मान हमें दूसरों से मिलता है, वह केवल हमारी प्रगति का संकेत है, इस बात की पुष्टि है कि हमारा व्यवहार प्रकृति के साथ अधिकाधिक तालमेल में है, लेकिन यह हमारे बदलने का कारण नहीं है। दिलों में उत्पन्न प्रेम और नेकखयाली के कारण शायद अन्य लोग हमारी ओर आकर्षित हो जाएँ लेकिन यदि हम ऐसी अपेक्षा करते हैं तो यह केवल हमारे अहम् की अभिव्यक्ति होगी।

सचेत नेतृत्व

नेताओं के जिन गुणों को आज के दौर में महत्व दिया जाता है, वे उन गुणों से बहुत अलग हैं जिन्हें तीस वर्ष पहले महत्व दिया जाता था। प्रभुत्व, शक्ति और नियंत्रण से अब ये गुण बदलकर समानुभूति, भावनात्मक बुद्धिमत्ता एवं दया भाव हो गए हैं। कम से कम गैर-सरकारी क्षेत्र में तो ऐसा ही है। इस बदलाव का संबंध हमारी सामूहिक चेतना के बदलाव से है। तंत्रिका विज्ञान एवं क्वांटम भौतिकी के क्षेत्रों में हुए शोध में भी यही पाया गया है। यह शोध हमें बताता है कि हम चेतना द्वारा ब्रह्मांड की हर चीज़ से जुड़े हुए हैं। प्रकृति स्वाभाविक रूप से बुद्धिमान है और यही बुद्धिमत्ता मनुष्यों में चेतना के रूप में प्रकट होती है। अतः प्रकृति की देखभाल करना हमारी अतिरिक्त जिम्मेदारी है। हमारे पास अपनी आंतरिक प्रकृति को सचेत रूप से बदलकर बाहरी स्थितियों को बदलने के साधन हैं।

नियम 9 पर गहराई से चिंतन करने पर हमें एहसास होता है कि सचेत नेतृत्व अंदर से ही प्रकट होता है - अपने आप को परिष्कृत करके, अपने संवेगों में संतुलन लाकर और अपने व्यवहार को रूपांतरित करके। केवल तभी हम दूसरों को प्रेरित और उनके दिलों में प्रेम की भावना जगा सकते हैं। हम सभी में नेतृत्व करने का सामर्थ्य है चाहे हम किसी भी स्तर या स्थिति में हों। नेतृत्व करने का अर्थ है ऐसा जीवन जीना जो दूसरों को प्रेरित करे, चाहे परिवार में, स्कूल में, समाज में, कार्यक्षेत्र में या पूरे संसार में लोगों को प्रेरित करे।

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तो, नियम 9 को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक रूप से कैसे अपनाएँ? इसे हर पल में अपनाएँ। इसमें हमारा पूरा अस्तित्व शामिल होता है। यह हमारे अस्तित्व के छोटे से छोटे पहलू में लागू होता है। और छोटे-छोटे कदमों से बड़े-बड़े बदलाव आते हैं। शुरू करने के लिए, आप इसे आज़मा सकते हैं - अपनी वाणी पर ध्यान दें कि आप क्या कहते हैं और कैसे कहते हैं। बोलने से पहले अपने हृदय पर अपना ध्यान लाकर अपने हृदय को अपने पूरे अस्तित्व के साथ सामंजस्य में लाएँ। ज़रूरत पड़ने पर आप अपने हृदय से पाँच बार साँस लें और साँस छोड़ें। जब आप बोलते हैं तो दिल से मुस्कुराएँ। अपने शब्दों को ठीक से चुनें। अपना लहज़ा बिना अधिक उतार-चढ़ाव का, शांत, आरामदेह और करुणामय बनाए रखें। बिना किसी को आहत किए सच बोलें। उन्हें सुखद महसूस करने में मदद करें। जब आपकी बोली शांतिपूर्ण होगी तब आपकी भावनाएँ शांतिपूर्ण होंगी, आपका शरीर शांतिपूर्ण होगा और आपके विचार शांतिपूर्ण होंगे। आप शांतिपूर्वक सत्य से जुड़े होंगे। जब आप जागरूक होकर इसका निरंतर अभ्यास करेंगे तब यह आपके जीवन को रूपांतरित कर देगा।

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दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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