नरेंद्र किनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानव बुद्धिमत्ता की तुलना करते हैं और विचार करते हैं कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता में अंतर्ज्ञान और उच्चतर बुद्धि विकसित करने का इतना सामर्थ्य है कि वह शायद मानव बुद्धिमत्ता का स्थान भी ले सकती है?
जैसे ही हम इस बात पर बहस करने के लिए तैयार होते हैं कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी मानव बुद्धिमत्ता की जगह ले सकती है तब इन दोनों में एक सामान्य तत्व, बुद्धिमत्ता, पर गौर करना सही होगा। जब हम इसे समझ लेते हैं तब हम बुद्धिमत्ता से परे की सीमाओं की जाँच-पड़ताल करने लगते हैं क्योंकि वहीं वे संभावित क्षेत्र हैं जिनकी ओर हम आगे बढ़ सकते हैं।
मनुष्य हमेशा से अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं की खोज के लिए प्राचीन ग्रंथों और संदर्भों पर निर्भर रहा है, चाहे वे संदर्भ वैज्ञानिक, आध्यात्मिक या धार्मिक हों। मानव तंत्र की विभिन्न परतों को समझने के लिए स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर जैसी अवधारणाएँ प्राचीन योग परंपराओं से प्राप्त हुई हैं, जिन्हें अब सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जा चुका है।
बुद्धिमत्ता सूक्ष्म शरीर में ही उत्पन्न हुई है। सूक्ष्म शरीर में मन, बुद्धि और अहंकार के मानसिक कार्य होते हैं, जो चेतना (चित्त) के क्षेत्र में संचालित होते हैं। यहाँ हम केवल बुद्धि के बारे में बात करेंगे क्योंकि यही बुद्धिमत्ता से संबंधित है।
बुद्धि का क्रम विकास इस प्रकार माना जाता है-
बुद्धि
बुद्धिमत्ता
अंतर्ज्ञान
विवेक
यह क्रमिक विकास तब संभव होता है जब हम ध्यान के अभ्यास द्वारा अपने मन को भीतर की ओर मोड़ते हैं। इसके परिणामस्वरूप हमारी चेतना का विस्तार होता है। यदि हम इस तर्क को आगे बढ़ाएँ तो यह स्पष्ट होता है कि बुद्धिमत्ता की अंतिम मंज़िल - विवेक - तक के रास्ते में बुद्धि केवल एक अल्पविराम है।
तो अब प्रश्न उठता है - कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अंतिम मंज़िल क्या है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अंतिम स्तर प्रायः कृत्रिम सामान्य बुद्धिमत्ता (AGI) कहा जाता है, जिसमें सैद्धांतिक रूप से मानव बुद्धिमत्ता जैसी क्षमताएँ हो सकती हैं जैसे तर्क करना, सीखना और विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल बनना; संभवतः अंतर्ज्ञान जैसे कुछ पहलुओं की नकल करना भी।
वर्तमान में अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता वैसा अंतर्ज्ञान विकसित नहीं कर सकती जैसा मनुष्य करता है क्योंकि उसमें ‘आंतरिक अनुभूति’ या अवचेतन तर्क के लिए ज़रूरी शारीरिक और अनुभवजन्य आधार नहीं होता जो मानव अंतर्ज्ञान में सहायता करता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानव बुद्धिमत्ता के बीच – अंतर्ज्ञान
वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सीमाएँ- वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ मुख्य रूप से आँकड़ों पर आधारित हैं जो बड़े आँकड़ों के समुच्चयों में पाए गए पैटर्न, यानी प्रतिमानों, पर आधारित निर्णय लेती हैं। ये स्थिति के अनुरूप ढलकर या प्रसंग के प्रति जागरूक रहकर लिए गए निर्णय नहीं होते जो मानव अपने अंतर्ज्ञान के आधार पर ले सकता है।
लक्ष्य के रूप में ‘कृत्रिम अंतर्ज्ञान’- शोधकर्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता में मानवीय अंतर्ज्ञान के समान क्षमताएँ विकसित करने के तरीके तलाश रहे हैं। इसके लिए वे संदर्भ की समझ, अनिश्चितता के समय परिस्थिति के अनुरूप समस्या का सर्वोत्तम समाधान निकालना (uncertainty modelling) और अधूरी जानकारी से चीज़ों को समझ लेना जैसे तत्वों को शामिल कर रहे हैं।
मानव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहकार्यता - मानव अंतर्ज्ञान की पूरी तरह से जगह लेने का लक्ष्य रखने के बजाय कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य मानव निर्णय-प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए अपनी संगणनात्मक शक्ति का उपयोग करने में निहित हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जानकारियाँ और आँकड़ों के विश्लेषण प्रदान करके मनुष्यों को अपने अंतर्ज्ञान को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने का अवसर दे सकती है।
अतः, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब तक मनुष्य अपने सूक्ष्म शरीर की विकास यात्रा – बुद्धि से बुद्धिमत्ता, अंतर्ज्ञान और अंततः विवेक की ओर – पर अग्रसर हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए उन्हें प्रतिस्थापित कर पाना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। लेकिन यदि मनुष्य केवल बुद्धि या बुद्धिमत्ता के स्तर पर ही ठहर जाते हैं तो समझो वे स्वयं को सीमित कर रहे हैं। इससे वे अपने आप को व अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया को ऐसा बना देंगे कि कोई भी उसका पूर्वानुमान लगा सकेगा और तब कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्हें प्रतिस्थापित कर देगी।
यदि हर मनुष्य का लक्ष्य विवेक की ओर बढ़ना है तो तर्क यह है कि उसे अपने मन को केंद्रित करना चाहिए जो फिर अपनी चेतना का विस्तार करते हुए बुद्धिमत्ता से आगे अंतर्ज्ञान और विवेक की ओर बढ़ता है। इसका साधन क्या है? ध्यान
ध्यान क्यों?
यदि हमारा लक्ष्य चेतना का विकास और विस्तार है तो हमें अपने आपको बुद्धि से परे जाने का अवसर देना होगा। प्रयास रहित केंद्रीयता ही ध्यान है। प्रयास के साथ केंद्रीयता एकाग्रता कहलाती है। क्या बिना केंद्रीयता के हमारा मन विवेकशील हो सकता है? क्या बिना ध्यान के केंद्रित मन संभव है? इसलिए, बुद्धि और बुद्धिमत्ता से आगे बढ़ने के लिए ध्यान करना आवश्यक है।
इसका एक रोचक निष्कर्ष यह भी हो सकता है - क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता को ध्यान करना सिखाया जा सकता है ताकि वह अपना अंतर्ज्ञान विकसित करे? यह अभी कल्पना से परे लगता है, लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह देखना शेष है।


