उदय कुमार बताते हैं कि कैसे एक साधारण-सा सम्मानसूचक शब्द आध्यात्मिक सत्ता और विनम्रता के गहरे रहस्यों को उजागर करता है।

ज सुबह दाजी के ऑनलाइन सत्र, ‘दिल से’, के दौरान एक सरल-सी लगने वाली बातचीत में कुछ बहुत गहन प्रकट हुआ। राजस्थान के एक विधायक ने दाजी को ‘हुकुम’ कहकर संबोधित किया। दाजी ने भी अपनी सहज विनम्रता में उन्हें उसी शब्द से संबोधित किया। यह संवाद बहुत संक्षिप्त था परंतु उसके शब्द मन में देर तक गूँजते रहे। वे शब्द इतनी कोमलता से बोले गए जैसे किसी घंटी की ध्वनि सुनने के बाद भी उसके स्पंदन लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं। ‘हुकुम’ शब्द में एक ऐसा श्रद्धा भाव था, ऐसा अनुनाद था जो भाषा से परे था।

इस अनुभूति ने मुझे प्रेरित किया कि मैं ‘हुकुम’ शब्द का असली अर्थ खोजूँ। मैंने देखा कि राजस्थान में ‘थारो हुकुम’ कहना केवल आज्ञापालन नहीं बल्कि गहरे सम्मान का प्रतीक है। इसका अर्थ है, “आपकी इच्छा मेरे लिए शिरोधार्य है क्योंकि मैं आपका सम्मान करता हूँ।” मैंने यह भी जाना कि समय के साथ यह शब्द अनेक स्थानों व संस्कृतियों में भी अपनाया गया है जिसमें अधिकार की सुगंध के साथ आशीर्वाद की मिठास भी घुली हुई है।

कुछ सप्ताह पहले अपने लेख ‘पवित्रता के संरक्षक’ में दाजी ने हमें याद दिलाया था कि ईश्वरीय पथ पर चलने के लिए सच्चाई और शिष्टाचार दोनों आवश्यक हैं। हमारे छोटे-छोटे सम्मानपूर्ण हाव-भाव भी हृदय को तैयार करते हैं। बैठने का तरीका, अभिवादन का तरीका, बोलने का ढंग  सब हमारे दृष्टिकोण की सच्चाई को प्रकट करते हैं। यह परिष्कृत आचरण या हमारा अखलाक केवल औपचारिकता नहीं है। यह प्रेम की भाषा है, वह तरीका है जिससे हम भीतर और बाहर दोनों में पवित्रता के लिए स्थान बनाते हैं। बिना अखलाक के ‘हुकुम’ एक थोपे गए आदेश जैसा प्रतीत हो सकता है। लेकिन अखलाक के साथ यह एक कृपापूर्ण आशीर्वाद बन जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से भी ‘हुकुम’ शब्द के अर्थ में सदैव गहनता रही है। सूफ़ी परंपराओं में ‘हुक्म-ए-इलाही’ ईश्वर की आज्ञा, दैवीय इच्छा है जो सृष्टि का संचालन करती है। हार्टफुलनेस परंपरा में आज्ञा चक्र शक्ति वितरण का केंद्र माना गया है और उसके ऊपर विशाल परब्रह्मांड क्षेत्र आरंभ होता है जहाँ दिव्यता की पहली झलक मिलती है। उन उच्चतर क्षेत्रों में ‘आदेश’ कोई बाहरी निर्देश नहीं होता। वह एक आंतरिक प्रकाश होता है जो आत्मा को उच्चतर क्षेत्रों की ओर मार्गदर्शित करता है, जैसे भीतर से आने वाला प्रभामंडल जो हमें मार्ग दिखाता है।

दाजी को जब ‘हुकुम’ कहकर संबोधित किया गया और उन्होंने भी उसी शब्द से उत्तर दिया तब मुझे ऐसा लगा जैसे कुछ महान या दिव्य उजागर हुआ। वह न तो किसी को दिया आदेश था और न किसी के द्वारा किया गया आज्ञापालन। वह सम्मान का एक वृत्त, एक ऐसा आदान-प्रदान था, जिसमें विनम्रता और गरिमापूर्ण संतुलन था। सच्चा अधिकार हमेशा विनम्रता में निहित होता है और सच्ची विनम्रता में ऐसा अधिकार होता है जिसे जताने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 

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पवित्रता के संरक्षक’ हमें यह याद दिलाता है कि गुरु की उपस्थिति में हमारा हर हाव-भाव, हर संयमित व्यवहार व शिष्टाचार, हमारे भीतर के मंदिर को शुद्ध बनाए रखता है। पवित्र स्थल में शिष्टाचार कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं बल्कि हृदय के वातावरण की रक्षा करने का एक तरीका है, जहाँ असली गुरु का निवास होता है। इस प्रकार ‘हुकुम’ अंध आज्ञापालन से नहीं बल्कि उस आचरण से पूरा होता है जो अंदर और बाहर के पवित्र वातावरण का सम्मान करता है।

यह एक ऐसा शब्द है जिसमें आदेश भी है और आशीर्वाद भी, अधिकार भी है और समर्पण भी। यह हमें याद दिलाता है कि जब ज्ञान बोलता है तब हृदय सुनता है और जब हृदय सुनता है तब जीवन सही मार्ग पर चलता है। इस शब्द को सुनने में हमें न केवल ईश्वर की आज्ञा का पता चलता है बल्कि गहरा आश्वासन भी मिलता है कि हम उसी के हैं।

अंततः ‘हुकुम’ किसी आदेश से अधिक स्मरण से संबंधित है। यह हमें याद दिलाता है कि हृदय तब सबसे अधिक खुलता है जब वह परम ज्ञान के आगे झुकता है और प्रेम से जुड़ता है। और जब वह झुकना अखलाक के साथ होता है तब यह हमारी पवित्रता की रक्षा करने का तरीका बन जाता है। इससे हृदय पवित्र बनता है जिसमें प्रियतम (ईश्वर) सहजता से निवास कर सकें।


हृदय तब सबसे अधिक खुलता है जब वह परम ज्ञान के आगे झुकता है और प्रेम से जुड़ता है।


 


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