नीलम शिवहरे ने मातृत्व पर लिखे भारत के प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन किया। जब उन्होंने कैकेई और यशोदा के व्यवहार की तुलना की तब उन्हें एहसास हुआ कि अपने बच्चों की सही परवरिश हेतु एक माँ के लिए अपने हृदय से भय को दूर करना कितना ज़रूरी है।
रामायण भारत देश का एक बेहतरीन महाकाव्य है जिसमें हम सबके सीखने के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षाएँ हैं। यह कहना गलत होगा कि रामायण के हर एक पात्र को, उसके कथानक को और उसके मूल संदेश को समझने के लिए एक जीवन काफ़ी है। उसके बावजूद, संदर्भ को समझाने के लिए कुछ वाक्य लिखना चाहूँगी।
रामायण एक प्राचीन साम्राज्य की उस समय की कहानी है जब राजा दशरथ अपने बड़े बेटे राम को अपना राजपाट सौंपने वाले थे। इस राज्य की खास बात यह थी कि अगर कोई व्यक्ति किसी को वचन देता था तो उसे सर्वोच्च माना जाता था और उस वचन का पालन करने के लिए वह अपने प्राणों का भी त्याग कर सकता था।
चूँकि राम बड़े बेटे थे, उनके राज्याभिषेक की खबर पर किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस समय की परंपरा भी यही थी। लेकिन राजा दशरथ की तीसरी पत्नी कैकेई को यह मंज़ूर नहीं था। उसकी दासी मंथरा ने उसके मन में यह बात बैठा दी थी कि राज्य उसके बेटे भरत को ही मिलना चाहिए। एक युद्ध में कैकेई ने राजा दशरथ की मदद की थी जिसके बाद उन्होंने उसे दो वरदान माँगने के लिए कहा था। कैकेई ने उस वक्त कुछ न माँगकर कहा कि वक्त आने पर माँग लेगी।
जब राम के राज्याभिषेक की घोषणा हुई तब कैकेई ने राजा दशरथ से अपने वर माँगे जिन्हें पूरा करने का उन्होंने वचन दिया था। उसने कहा कि राम के बजाय उसके बेटे भरत का राज्याभिषेक होना चाहिए और साथ ही राम को चौदह साल के लिए वनवास भेज दिया जाए।
जब आप कैकेई के इस कृत्य के बारे में सुनते हैं तब आपके अंदर कौन से भाव उमड़ते हैं? आप शायद सोचें - वह ऐसी क्यों बनी? क्या मंथरा के शब्दों ने उसे ऐसा बनाया? मेरी जो फ़िलहाल समझ है, उसके मुताबिक न वे मंथरा के सिखाए हुए शब्द थे और न ही वे कैकेई के निर्णय थे। वह कैकेई के दिल में बसा हुआ डर था जिसके कारण वह सच्चाई को देख नहीं पा रही थी।
मन में यह विचार उठता है कि कोई माँ दो भाइयों को कैसे अलग कर सकती है? ऐसा लगता है कि संवेदनशीलता ऐसा सुख है जिसकी कदर बहुत कम लोगों को है। प्रकृति माताओं को यह भावना देती है परंतु अगर वे अपनी ज़िंदगी के सफ़र में इसका इस्तेमाल नहीं करतीं तो उनसे वापस भी ले लेती है।
कैकेई अपने बेटे के प्रेम में अंधी हो गई थी। वह जानती थी कि प्रथम जन्मा न होने के कारण वह राजा नहीं बन सकता। फिर भी वह एक ऐसे भविष्य के प्रति आसक्त हो गई जो उसे आकर्षित कर रहा था। ऊपर से सोने पर सुहागा थी उसकी संगत। क्या वह अपनी दिल की सुन रही थी? इसमें संशय है। क्या उसकी सोच पूरी तरह से गलत थी? बिलकुल नहीं।
उसकी गलती उसके चयन में थी जो भय से प्रेरित थी। डर हमारे व्यवहार पर हावी हो जाता है। वह हमें अपना गुलाम बनाकर अपने अनुकूल काम करवाता है और समझदार लोगों को भी सही काम नहीं करने देता।
अब इसकी तुलना हम महाकाव्य महाभारत में वर्णित माता यशोदा, जिसने भगवान कृष्ण को गोद लिया था, से करें। कैकेई और यशोदा दोनों ही माँ थीं जिन्हें अपने बेटों से अत्यधिक लगाव था। फिर उन दोनों में क्या फ़र्क था?
हम रचनात्मक हैं। दिए हुए उपहारों, जैसे प्रेम, कोमलता, स्वाभाविक वृत्तियाँ और सही राह पहचानने की अंतर्दृष्टि, को हम कभी नहीं भूलतीं। यह सब हमारे दिल के रहस्यमय टेढ़े- मेढ़े रास्तों में निहित है।
श्री कृष्ण यशोदा के पास शैशवावस्था में लाए गए थे और यशोदा ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। उनका हृदय इतना उन्मुक्त था कि उन्होंने अपने मन का इस्तेमाल किया ही नहीं। जिस तरह से कृष्ण ने उनके दिल में अपने लिए जगह बनाई, वह कोई संयोग नहीं था। आखिर यशोदा ऐसे कैसे कर पाईं? इसलिए कि उनके अंदर डर नहीं था।
जब डर नहीं रहता तो फिर क्या रहता है? क्या ऐसा दिल ईश्वर के समान नहीं है जो इतना प्रेममय है कि उसे खुद के और किसी और के बच्चे में कोई फ़र्क ही नज़र नहीं आता?
इन शिक्षाओं को अमल में लाकर मैंने जाना कि कैसे अलग-अलग नियतियों का निर्माण हो सकता है? इसके लिए क्या चाहिए? जागरूकता यानी व्यवहार, पाप और पुण्य के प्रति सजगता।
मुझ जैसी युवा स्त्रियों के लिए, जो भविष्य में माताएँ बनेंगी, मुझे यकीन है कि हम आत्म-जागरूक और अपने आप से पूरी तरह ईमानदार बनने के मार्ग पर चल रही हैं। हम रचनात्मक हैं। दिए हुए उपहारों, जैसे प्रेम, कोमलता, स्वाभाविक वृत्तियाँ और सही राह पहचानने की अंतर्दृष्टि, को हम कभी नहीं भूलतीं। यह सब हमारे दिल के रहस्यमय टेढ़े-मेढ़े रास्तों में निहित है। क्या हम सचमुच अपने दिल की सुन रही हैं या फिर सोशल मीडिया द्वारा होने वाली खबरों की बौछार को ही सच मानकर भ्रमित हो रही हैं?
वास्तव में, हम अपने आप को कैसे तैयार कर सकती हैं?
खुद पर काम करें - सबसे पहले खुद के प्रति ईमानदार बनें। अपने दिल के साथ, अकेले, सिर्फ़ खाना-पूर्ति के लिए ध्यान करते वक्त नहीं, अपने आप से पूछें, “क्या मुझे अपना वर्तमान स्वरूप पसंद है? मुझे इस क्षण परिपूर्ण बनने से क्या रोक रहा है? क्या मैं रोज़ाना विकसित हो रही हूँ?”
कोशिश करें। पूरे उत्साह से ध्यान करें। हर हफ़्ते एक बार ज़रूर विचार करें, “आज मुझे जैसा महसूस हो रहा है उसकी तुलना में पिछले हफ़्ते मेरा व्यवहार कैसा था?”
स्पष्टता - सवाल एक बच्चे की अच्छी परवरिश का नहीं है अपितु सवाल यह है, “क्या यह करने के लिए मैं शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तौर पर सक्षम हूँ?” मुझे यह कहते हुए कोई झिझक नहीं होती कि यह निर्णय पूरी तरह से स्त्री का है। याद रहे कि हम रचनात्मक हैं, इसलिए इस गुण को व्यक्त करने का कोई न कोई तरीका तो होता ही है। और यह तो सबसे खूबसूरत काम है, हमारे रचयिता की तरह, लेकिन इसे अक्सर आदर से नहीं देखा जाता।
कार्यवाही - इससे पहले कि यह सब कुछ शुरू हो और आप एक नए जीव को इस दुनिया में लाएँ, अच्छा होगा अगर आप यह तय कर लें कि आप किस तरह की माँ बनना चाहती हैं। एक मस्त माँ, एक परवरिश करने वाली माँ या कुछ और? हाँ, इस तरह योजना बनाई जा सकती है और क्यों नहीं बनाई जाए? यह आपकी प्रयोगशाला है और इसमें आप वह सारी सामग्री डाल सकती हैं जो आप अपने भीतर देखना चाहती हैं।
इसमें लालाजी महाराज के “वार्तालाप के सिद्धांत” हमारी बहुत ज़्यादा मदद करते हैं। उनकी सरल सी विधि है - प्रेम से बात करो, जैसे ईश्वरीय धारा सीधे दिल में उतर रही हो। कल्पना करें कि अगर कोई आपसे इतनी सादगी से, इतनी मिठास से बात कर रहा हो तो आपको कितना अच्छा लगेगा?
इस योजना को लागू करते हुए हम अपने आप को भी इस तरह तैयार कर सकती हैं कि हम अपने कुछ अनुवांशिक आघातों पर विजय पा सकें, अपने पश्चातापों को और अधूरी इच्छाओं को छोड़कर अपना उपचार इस तरह कर सकें कि भविष्य में आने वाले हमारे नन्हे-मुन्नों की हम बेहतरीन देखभाल कर सकें - यशोदा मैय्या के बेपनाह प्यार की तरह। आखिरकार बच्चे जीवन की अभिव्यक्त होने की इच्छा हैं और हम सौभाग्यशाली हैं कि भविष्य की खातिर हम उनको अपने शरीर में धारण कर रही हैं।
अंततः, कैकेई और यशोदा सिर्फ़ किसी कहानी की पात्र नहीं थीं; अगर हम ध्यान से देखें तो वे दोनों भी साक्षात विवेक का प्रतिरूप थीं।
मुझ जैसी युवा स्त्रियों के लिए, जो भविष्य में माताएँ बनेंगी, मुझे यकीन है कि हम आत्म-जागरूक और अपने आप से पूरी तरह ईमानदार बनने के मार्ग पर चल रही हैं।


नीलम शिवहरे
नीलम एक एयरोस्पेस इंजीनियर हैं जिन्होंने तीन महाद्वीपों पर अध्ययन और काम किया है। वर्तमान में वे जर्मनी... और पढ़ें
