इस लेख में नेगिन खुरासानी आपसी संबंधों में प्रेम के विषय में अपने विचारों को प्रकट कर रही हैं। वे अपेक्षाओंआसक्तियों और अधिकार की भावना को छोड़ने के महत्व को बता रही हैं ताकि अपने प्रियजनों को बिना नियंत्रित किए अपने करीब रखा जा सके।

 

क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि कैसे हमारे सबसे प्रेममय संबंध भी कभी-कभी हमें भारी लग सकते हैं? यद्यपि ये संबंध हमें पोषित करते हैं, लेकिन फिर भी उनकी उग्रता से उबरने के लिए कुछ समय और दूरी की ज़रूरत महसूस होती है। भले ही हम उन प्रियजनों से कितनी भी गहराई से जुड़े हुए क्यों न हो - हमारे माता-पिता, भाई-बहन, करीबी दोस्त – कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि उनकी अपेक्षाएँ खत्म ही नहीं हो रहीं। हम जितना अधिक देते हैं उतनी ही उनकी अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं।

मेरी समझ में, शायद यह इसलिए है क्योंकि हर अच्छे संबंध में हमारी और अधिक पाने की चाह बढ़ती जाती है। प्रेम की धारा के निर्विरोध बहने के बजाय यह एक आसक्ति, एक ऐसा बंधन बन जाती है जो हमें उन्नत करने के बजाय हमारी ऊर्जा कम करती है।

आसक्ति का अनदेखा दबाव

आसक्ति एक अदृश्य डोर की तरह है जो हमें औरों से बाँध कर रखती है और उन्हें हमारे मनस-पटल पर सजीव रखती है, चाहे वे हमारे पास रहें या हमसे दूर। यदि हमारा कोई प्रियजन तकलीफ़ों से गुज़र रहा होता है तो हम भी उसकी तकलीफ़ को महसूस करते हैं। यदि हमारे प्रियजन बीमार होते हैं तो हम उनकी बीमारी को अपने दिल में महसूस करते हैं। भले ही हमारा अपना जीवन संतुलित हो, फिर भी हम पूरी तरह से शांति का अनुभव नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनकी तकलीफ़ों का असर हम पर पड़ता है।

 

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हम अक्सर माताओं को कहते सुनते हैं, “मुझे अपने बच्चे की चिंता है क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूँ।” लेकिन क्या यह सचमुच प्यार है या आसक्ति? सच्चा प्यार बोझ नहीं बनता है - वह हमें मुक्त कर देता है।

प्रेम बनाम आसक्ति - उनके बीच के अंतर को समझें

प्रेम की बुनियाद है आपसी समझ और परवाह। जब हम लोगों से सचमुच प्रेम करते हैं तब हमारे लिए उनकी परवाह करना स्वाभाविक और अनायास होता है। यदि उन्हें भोजन की आवश्यकता होती है तो हम उन्हें भोजन देते हैं। यदि उन्हें सहारे की आवश्यकता होती है तो हम बिना उसकी कीमत की चिंता किए उन्हें सहारा देते हैं। प्रेम बदले में कुछ नहीं माँगता। यह निस्स्वार्थ होता है जो एक नदी की तरह बहता रहता है और बिना किसी शर्त के पोषित करता है।

आपसी समझ प्रेम का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। माता-पिता अपने बच्चों की गलतियों को कभी भी व्यक्तिगत रूप से नहीं लेते क्योंकि उन्हें पता है कि बच्चा अभी बढ़ रहा है, नासमझ है। एक समझदार बूढ़ी माँ जब अपने बच्चों को अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने में व्यस्त देखती है तब खुश होती है, भले ही वे उसके पास मिलने के लिए उतनी बार न आ पाएँ जितना वह चाहती है। यह सच्चा प्रेम है - दयालु, क्षमाशील और आसानी से मानने वाला।

आसक्ति का जाल

दूसरी ओर, आसक्ति प्रतिबंधात्मक होती है। हम देते तो हैं लेकिन बदले में कुछ चाहते भी हैं। हम मदद तो करते हैं लेकिन बदले में प्रशंसा भी चाहते हैं। हम प्रेम तो करते हैं लेकिन उसकी मान्यता भी पाना चाहते हैं। इस तरह की अपेक्षा से अक्सर निराशा होती है क्योंकि तब हमारी खुशी किसी और के कर्म की मोहताज होती है - जो हमारे वश में नहीं होता।

यहाँ तक कि जब हम किसी पर कोई बड़ा एहसान करते हैं, यदि उसमें कुछ अनकही अपेक्षाएँ होती हैं तो वे अदृश्य ज़ंजीरों की तरह लग सकती हैं। प्रेम स्वतंत्रता है तो आसक्ति अधिकार जमाना है।

असीमित प्रेम का रहस्य

जब हम किसी को भी बिना आसक्ति के प्रेम करते हैं तब हम उस पल में पूरे दिल से देते हैं - चाहे वह हमारा वक्त हो, उसकी परवाह करना हो या हमारा प्रयास हो - और तब हम चीज़ों पर अपना नियंत्रण छोड़ देते हैं। हम पूरी सजगता से और पूरी तरह ध्यान देकर वह सब करते हैं जो ज़रूरी होता है। लेकिन जैसे ही वह पल बीत जाता है, हम उसे अपने दिलो-दिमाग से निकाल देते हैं। हम अपने कर्मों के भावनात्मक अवशेषों को साथ लिए नहीं फिरते और न ही यह सोचते रहते हैं कि हमारे प्रेम को सामने वाले ने स्वीकृत भी किया है या नहीं या उसका कुछ प्रतिफल हमें प्राप्त होगा या नहीं।

इस खुलेपन से हम हर उस व्यक्ति या परिस्थिति को समझ पाते हैं जिसे हमारी देखभाल की ज़रूरत हो सकती है। जब हमारा मनस-पटल साफ़ होता है तब हम दुनिया की ज़रूरतों को महसूस कर पाते हैं और बार-बार उसका प्रत्युत्तर प्रेम से दे पाते हैं। इसीलिए एक संत सारे देश का बोझ अपने कंधों पर उठा पाता है - क्योंकि वह कुछ भी पकड़ कर नहीं रखता। ऐसे संत देते हैं, आगे बढ़ जाते हैं तथा हर समय औरों के लिए उपलब्ध रहते हैं। उनका प्रेम असीमित होता है क्योंकि वह आसक्ति से बोझिल नहीं होता।

कुछ से प्रेम बनाम सबसे प्रेम

जब हम आसक्ति के वशीभूत होकर प्रेम करते हैं तब हम बस कुछ ही लोगों से प्रेम कर पाते हैं। हमारी ऊर्जा सीमित होती है क्योंकि हम अपेक्षाओं, भावनाओं के बोझ और प्रतिफल पाने की चाह के जाल में फंसे होते हैं। पर जब हम बिना आसक्ति के प्रेम करते हैं तब हम सबसे प्रेम करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।

 

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जो इंसान प्रेमपूर्ण रहते हुए अनासक्त रहता है, उसका प्रेम कभी भी खत्म नहीं होता क्योंकि वह किसी एक बंधन से जुड़ा नहीं रहता। ऐसे लोगों का प्रेम अपरिमित रूप से बहता रहता है जिसका विस्तार परिवारजनों, दोस्तों, अजनबियों और उन सब तक होता है जो शायद उनके प्रेम के बदले में कुछ भी न दे पाएँ। वे बिना थके कई लोगों की देखभाल कर पाते हैं क्योंकि वे अपने प्रेम को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करते बल्कि खुद प्रेम बन जाते हैं।

पूरी तरह और खुलकर प्रेम करने के लिए हमें प्रेमपूर्ण अनासक्ति अपनानी होगी जिसमें हम दूसरों की बहुत परवाह करने के साथ-साथ उन्हें अपनी मर्ज़ी के के अनुसार जीने भी दें। इसका अर्थ हुआ बिना नियंत्रित किए, बिना अपेक्षाओं के सहायता करना तथा बिना अधिकार जमाए करीब रखना।

जब हम प्रेम करते हुए अनासक्त रह पाते हैं तब हम न केवल खुद स्वतंत्र हो जाते हैं बल्कि उन्हें भी स्वतंत्र कर देते हैं जिनकी हम परवाह करते हैं। और उस स्वतंत्रता में प्रेम फलता-फूलता है - न सिर्फ़ कुछ लोगों के लिए, बल्कि सबके लिए।


जब हम प्रेम करते हुए अनासक्त रह पाते हैं तब हम न केवल खुद स्वतंत्र हो जाते हैं बल्कि उन्हें भी स्वतंत्र कर देते हैं जिनकी हम परवाह करते हैं। और उस स्वतंत्रता में प्रेम फलता-फूलता है - न सिर्फ़ कुछ लोगों के लिएबल्कि सबके लिए।


 

 


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नेगिन खुरासानी

नेगिन खुरासानी

नेगिन एक सामाजिक उद्यमी एवं सक्रिय कार्यकर्ता हैं जो आंतरिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्ध हैं। वे एक लेखिकाऔर पढ़ें

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