अशरफ़़ नेहाल धार्मिक आस्थाओं एवं जलवायु के बीच के सदियों पुराने संबंध की बात करते हैं। वे कहते हैं कि इस समय चल रहे जलवायु संकट को ठीक करने के लिए यह अत्यंत ज़रूरी है कि हम हार्टफुलनेस और माइंडफुलनेस जैसी आध्यात्मिक पद्धतियों द्वारा पृथ्वी से पुनः जुड़ें।
इस समय पृथ्वी जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही है। इसकी सतह पर से जंगल खत्म हो रहे हैं, नदियाँ सिकुड़ रही हैं और हिमालय के हिमनद कमज़ोर पड़ती यादों की तरह पिघलकर पीछे खिसक रहे हैं। उत्तराखंड में अचानक आने वाली बाढ़ से लेकर सुंदरबन में बढ़ते समुद्र स्तर से यह स्पष्ट हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई सुदूर भविष्य का खतरा नहीं रह गया है बल्कि आज सच में इससे लोग जूझ रहे हैं। इस जलवायु संकट को लेकर सरकारें बातचीत करती हैं, वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं और इंजीनियर नई तकनीकें लाते हैं। फिर भी, इन प्रयासों के पीछे एक गहरा भाव छिपा है - आंतरिक परिवर्तन लाने की ज़रूरत।
यदि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है तो यह केवल जीवाश्म ईंधन की वजह से नहीं है, बल्कि यह अश्मीकृत (पुरानी कट्टर) सोच की वजह से भी है। प्रकृति से अलगाव, बिना सोचे-विचारे वस्तुओं का उपभोग और मनुष्यों एवं पारिस्थितिक तंत्रों की दुखद स्थिति के प्रति नैतिक संवेदनशून्यता ने हमें इस खतरनाक स्थिति में पहुँचा दिया है। जैसे हम नीति समाधानों के लिए बाहर देखते हैं वैसे ही हमें नैतिक स्पष्टता, भावनात्मक दृढ़ता और आध्यात्मिक पुनरुज्जीवन के लिए अपने अंदर भी झाँकना चाहिए। आस्था, हृदय केंद्रित ध्यान (heartfulness) और मानसिक जागरूकता (mindfulness) - जो प्राचीन काल से ही भारतीय सभ्यता के ज्ञान में अंतर्निहित हैं और अब विश्वभर में अपनाए जा रहे हैं - हमें प्रगति का मार्ग प्रदान करते हैं।
पर्यावरण मनोवैज्ञानिक, पीटर एच. कान, ने ‘जेनरेशनल एनवायर्नमेंटल अम्नेशिया’ यानी पीढ़ीगत पर्यावरणीय विस्मरण नामक तथ्य का वर्णन किया है, जिसमें प्रत्येक पीढ़ी साल दर साल बिगड़ते पर्यावरण को नई सामान्य स्थिति के रूप में स्वीकार कर लेती है (कान, 2011)। यमुना और गंगा जैसी एक समय की पवित्र नदियाँ अब सबसे प्रदूषित नदियों में मानी जाती हैं; दिल्ली की विषाक्त हवा अब एक सामान्य बात है; और ऋतुओं की लय भी अस्थिर लगती है। यह भूलना पर्यावरणीय सीमाओं से भी परे जाकर आत्मिक संकट बन जाता है। जैसे मिट्टी का क्षरण होता है, वैसे ही आत्मा के भीतर भी कुछ घटता जाता है।
जब आत्मा मिट्टी को भूल जाती है - आस्था याद कराती है
‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल - IPCC, 2023) चेतावनी देता है कि यदि वैश्विक तापमान 1.5°C से अधिक बढ़ जाता है तो इसके अपरिवर्तनीय प्रभाव होंगे। विज्ञान की स्पष्टता और इसकी अत्यावश्यकता के बावजूद, ऐसी भविष्यवाणियाँ अक्सर गहरे, स्थायी परिवर्तन को प्रेरित करने में असफल रहती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जलवायु संकट में गहरे अस्तित्व संबंधी पहलू होते हैं, जिन्हें केवल तकनीकी उपायों से हल नहीं किया जा सकता। जलवायु संकट बहुत अधिक अलगाव से उत्पन्न होता है - पृथ्वी से, एक-दूसरे से और अपने अंतर्निहित नैतिक मूल्यों से। इसे संबोधित करने के लिए, विशेषकर भारत जैसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध समाजों में, नीति परिवर्तनों से अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। इसके लिए चेतना में बदलाव की आवश्यकता है।
चेतना का यह बदलाव हमारे लिए कोई नया नहीं है। यह दुनिया की आस्थापूर्ण परंपराओं में गहराई से निहित है। आध्यात्मिक शिक्षाएँ प्राचीन काल से पारिस्थितिकीय ज्ञान प्रदान करती रही हैं। वैदिक स्तोत्रों से लेकर इस्लामी नैतिकता तक, सिखों के हुकम (ईश्वरीय आदेश) के प्रति श्रद्धा से लेकर ईसाई धर्म के आह्वान तक, सभी में प्रकृति को हमेशा पवित्र माना गया है, जो केवल प्रशंसा के ही नहीं बल्कि संरक्षण के भी योग्य है।

आध्यात्मिक आस्था, जिसे पहले पर्यावरणीय संवाद में नकारा गया था, अब एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रही है। पोप फ़्रांसिस का परिपत्र ‘लाउडातो सी’ एकीकृत पारिस्थितिकी का समर्थन करता है, जिसके अनुसार पृथ्वी की देखभाल और कमज़ोरों की देखभाल अभिन्न हैं। आध्यात्मिक आस्था न केवल पारिस्थितिकी संबंधी अंतर्दृष्टि प्रदान करती है बल्कि नैतिक स्पष्टता और इसकी अत्यावश्यकता की समझ भी देती है (फ्रांसिस, 2015)।
इस्लामिक शिक्षाएँ खलीफ़ा यानी संरक्षकों के रूप में मानव जाति की भूमिका और मिज़ान यानी सृष्टि में अंतर्निहित संतुलन पर ज़ोर देती हैं। वर्ष 2015 की वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर इस्लामिक घोषणा ने वैश्विक मुस्लिम समुदाय पर संयम और ज़िम्मेदारी के साथ कार्य करने के लिए दबाव डाला (IFEES, 2015)। हिंदू ब्रह्मांडीय विज्ञान सभी तत्वों - अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी - में दिव्यता देखता है। अहिंसा की नैतिकता, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया था, अब लाखों लोगों को पर्यावरण व प्रकृति पर कम प्रभाव डालने वाली जीवनशैली और शाकाहार अपनाने के लिए मार्गदर्शित कर रही है (कावर्ड 2003)। सिख धर्म भी प्रकृति के प्रति विनम्रता का भाव रखना सिखाता है और उस लोभ की निंदा करता है जो पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये धार्मिक शिक्षाएँ केवल पवित्र ग्रंथों तक सीमित नहीं हैं। उन्हें जीवन में अपनाया जा रहा है। भारत में कई धार्मिक संगठन अपनी आस्था को सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों में बदल रहे हैं। ‘ग्रीनफ़ेथ’, एक वैश्विक अंतरधार्मिक पर्यावरणीय संगठन है जो 40 से भी अधिक देशों में कार्यरत है। इसके भागीदार मंदिरों और मस्जिदों की सौर ऊर्जा का उपयोग करने में मदद कर रहे हैं। अंतरधार्मिक समूह मेघालय में पवित्र वन क्षेत्रों की रक्षा कर रहे हैं और महाराष्ट्र में जल संरक्षण अभियानों का आयोजन कर रहे हैं। वर्ष 2023 में ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ (प्रकृति जलवायु परिवर्तन) अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि धार्मिक दृष्टिकोण के होने से लोग जलवायु संबंधी प्रयासों में अधिक शामिल होते हैं, विशेषकर उन समाजों में जहाँ आध्यात्मिकता को बहुत महत्व दिया जाता है।
आज संसार पर्यावरणीय चिंता, निराशा और मायूसी से जूझ रहा है। ऐसे में आध्यात्मिकता हमें सुकून देती है। आध्यात्मिकता लोगों को यह समझने में मदद करती है कि वे एक व्यापक नैतिक और ब्रह्मांडीय क्रम का हिस्सा हैं, जहाँ परिवर्तन भले ही कठिन हो लेकिन वह संभव है और अनिवार्य भी। मिट्टी को याद रखना एक प्रकार से आत्मा को याद रखना है। इस पुनः जुड़ाव में ही बदलाव की संभावना को लेकर हमारी सबसे बड़ी आशा निहित है।
हार्टफुलनेस का मार्ग - करुणापूर्ण जलवायु कार्रवाई
धार्मिक मान्यताओं से परे करुणापूर्ण इरादे और वर्तमान क्षण में जागरूकता के साथ जीवन जीना, अब जलवायु संकट के प्रति एक शक्तिशाली प्रतिक्रिया के रूप में उभर रहा है। भारतीय ध्यान परंपराओं पर आधारित होते हुए भी हार्टफुलनेस ध्यान पद्धति का प्रभाव विश्वव्यापी है। यह हृदय से जीने, समानुभूति विकसित करने, भावनात्मक संतुलन बनाने और पृथ्वी के कल्याण के लिए सचेत रूप से किए गए चयन पर ज़ोर देती है। इसके साथ-साथ माइंडफुलनेस - जिसे जॉन कैबट-ज़िन ने बिना कोई राय बनाए वर्तमान क्षण की जागरूकता के रूप में परिभाषित किया है - एक पूरक शक्ति के रूप में कार्य करता है तथा हमें देखने, धीमा होने और कार्रवाई करने से पहले विचार करने की शिक्षा देता है।

आध्यात्मिकता लोगों को यह समझने में मदद करती है कि वे एक व्यापक नैतिक और ब्रह्मांडीय क्रम का हिस्सा हैं, जहाँ परिवर्तन भले कठिन हो लेकिन वह संभव है और अनिवार्य भी। मिट्टी को याद रखना एक प्रकार से आत्मा को याद रखना है। इस पुनः जुड़ाव में ही बदलाव की संभावना को लेकर हमारी सबसे बड़ी आशा निहित है।
हैदराबाद में स्थित हार्टफुलनेस संस्थान दुनियाभर के लाखों लोगों को मार्गदर्शित ध्यान, रिलैक्सेशन और प्रार्थना के अभ्यासों जैसे सुलभ साधन प्रदान करता है। वैज्ञानिक अध्ययन उनके प्रभाव का समर्थन करते हैं। वर्ष 2022 के इकोसाइकोलॉजी (पारिस्थितिक मनोविज्ञान) अध्ययन में पाया गया कि हृदय-आधारित ध्यान लोगों में पारिस्थितिक बहाली में भाग लेने की इच्छा बढ़ाता है। इसी तरह, कृतज्ञता का भाव प्रकृति के साथ पारस्परिकता की भावना को बढ़ाता है। इससे लोग अधिक ज़िम्मेदार तरीके से संसाधनों का उपयोग करने लगते हैं (एमन्स और मैककुलो, 2003)।
‘चेंजमेकर्स फ़ॉर क्लाइमेट एक्शन’ जैसे युवा-केंद्रित उपक्रम - जिसे इटली के दूतावास और टी.इ.आर.आई. ने सहयोग दिया है - भारतीय छात्रों को हृदय-केंद्रित नेतृत्व में प्रशिक्षित करते हैं। ये कार्यक्रम भय या बाध्यता से नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्रति प्रेम भावना से कार्य करने पर ज़ोर देते हैं। नेतृत्व का यह प्रतिरूप भावनात्मक रूप से दृढ़, नैतिक मूल्यों में स्थापित और समावेशी है तथा आज के ध्रुवीकृत जलवायु संवाद में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हृदयपूर्ण नेता ऐसे संगठन बनाने में विशेष रूप से सक्षम होते हैं जो न केवल प्रभावी होते हैं बल्कि दया-आधारित भी होते हैं और निरंतर अथक प्रयास करते रहते हैं।
जहाँ हार्टफुलनेस हमें गहराई से महसूस करना सिखाता है, वहीं माइंडफुलनेस हमें सचेत होकर ध्यान केंद्रित करने में और उन अवहनीय आदतों को रोकने में, जो स्वचालित रूप से होती हैं, मदद करता है। भारत में माइंडफुलनेस का अभ्यास स्कूलों, थेरेपी कक्षों और तकनीकी कार्यस्थलों में नई प्रासंगिकता प्राप्त कर रहा है। यह रोज़मर्रा के निर्णयों पर विचार करने की योग्यता देता है - चाहे टैक्सी लेना हो या चलना, माँस खाना हो या शाकाहारी भोजन ग्रहण करना हो अथवा तेज़ी से बदलने वाले फैशन के वस्त्र खरीदना हो या पुनः इस्तेमाल के लिए बने वस्त्र खरीदना हो। वर्ष 2019 में ग्लोबल एनवायरनमेंटल चेंज में प्रकाशित एक अध्ययन ने खुलासा किया कि माइंडफुलनेस का संबंध भौतिकवाद में कमी और पर्यावरण-हितैषी व्यवहार से है (वाम्सलर, 2019)।
इसके अलावा, माइंडफुलनेस मानसिक दृढ़ता विकसित करता है। जैसे-जैसे जलवायु चिंता अधिक व्यापक होती जा रही है, विशेष रूप से युवा कार्यकर्ताओं में, ध्यान के अभ्यास बहुत मदद कर रहे हैं। अमेरिकन सायकोलॉजिकल एसोसिएशन (2022) पर्यावरण चिंता से निपटने के लिए माइंडफुलनेस को एक प्रमुख उपाय के रूप में मानता है। वैश्विक स्तर पर, ‘गैरीसन इंस्टिट्यूट’ जैसे संस्थान ‘क्लाइमेट, माइंड एंड बिहेवियर’ (जलवायु, मन और व्यवहार) कार्यक्रम के माध्यम से कॉर्पोरेट और नीति निर्धारकों को शामिल करके आंतरिक जागरूकता को बाहरी प्रभाव के साथ एकीकृत करते हैं। भूटान का ‘ग्रॉस नेशनल हैपिनेस मॉडल’, जो पर्यावरणीय और शैक्षिक नीतियों में माइंडफुलनेस को शामिल करता है, ग्लोबल साउथ (कम विकसित देश) के अन्य राष्ट्रों के लिए एक प्रभावशाली नमूने के रूप में खड़ा है।
हार्टफुलनेस और माइंडफुलनेस मिलकर एक शक्तिशाली आंतरिक पर्यावरण बनाते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि जलवायु संबंधी कार्रवाई केवल संकट, अपराधबोध या भय से ही प्रेरित नहीं होती, बल्कि यह शांति, देखभाल और करुणा की भावना से भी उत्पन्न हो सकती है। बढ़ती हुई पर्यावरणीय और भावनात्मक हलचल के समय में हृदय एवं मन को विकसित करना हमारे सबसे सुधारवादी और पुनर्स्थापक कार्यों में से एक हो सकता है।
आंतरिक एवं बाहरी प्रयासों से पृथ्वी का सुधार
जब विश्वास, हार्टफुलनेस और माइंडफुलनेस एक साथ मिलते हैं तब जो सामने आता है वह केवल विज्ञान के ठोस तथ्यों का पूरक नहीं है, बल्कि वह एक आवश्यक बुनियादी बदलाव है। इस समन्वय से एक नई प्रकार की स्थिरता आती है - प्रणालियों में भी और विचारधाराओं में भी। यह एक ऐसी स्थिरता है जो भय-आधारित संदेशों से परे आशा-भरी क्रियाओं की ओर ले जाती है; जहाँ थकावट की जगह अपनापन ले लेता है; जहाँ पृथ्वी को समस्या न मानकर एक ऐसे रिश्ते के रूप में देखा जाता है जिसे ठीक करने की ज़रूरत है।
जलवायु संकट केवल कार्बन उत्सर्जन का संकट नहीं है, यह एक गहरे अलगाव का संकेत है। पृथ्वी पर प्रभुत्व पाने की कोशिश में हम भूल गए हैं कि हम पृथ्वी का ही हिस्सा हैं। इस विस्मरण से अब जीवन, आजीविका और भविष्य को नुकसान हो रहा है। धार्मिक परंपराएँ हमें पवित्र कर्तव्य की याद दिलाती हैं। हार्टफुलनेस हमें करुणा के साथ कार्य करने में मदद करता है और माइंडफुलनेस हमें जागरूक रहकर जीना सिखाता है। साथ मिलकर ये हमारे लिए आगे बढ़ने का मार्ग प्रस्तुत करते हैं - मज़बूती से खड़े रहना, दृढ़ता और पूरी तरह से आशावादी बने रहना।
दुनिया के लिए यह एकीकरण आगे बढ़ने का एक शक्तिशाली रास्ता प्रदान करता है, जिसमें नवाचार के साथ आत्मनिरीक्षण भी जुड़ा होता है। हरित दुनिया की ओर यात्रा लोगों की साँसों, प्रार्थनाओं और प्रेम से शुरू होती है जो नीतियों और कार्यों के रूप में बाहर की ओर बढ़ती है।


अशरफ़़ नेहाल
अशरफ़़ नेहाल संयुक्त राष्ट्र के बाल एवं युवा प्रमुख समूह के लिए इको-फेथ फोकल प्वाइंट और राष्ट्रमंडल युवा जलवायु नेटवर्... और पढ़ें
