डॉ. इचक अडीज़ेस अपना अवलोकन साझा करते हैं कि खुशी सोचने से नहीं बल्कि महसूस करने से मिलती है। वे पाठकों को सलाह देते हैं कि जीवन के निर्णय लेते समय वे अपने विश्लेषणात्मक मन को शांत करें और हृदय पर भरोसा करें।

 

मैं वर्षों से लोगों पर गौर करता रहा हूँ और इससे मैंने यह समझा है कि जब मन चुनाव करता है तब व्यक्ति के दुखी होने की संभावना अधिक होती है।

ऐसा क्यों है? क्योंकि मन या तो भविष्य में रहता है या अतीत में। दोनों ही हमें दुखी कर सकते हैं। अतीत को फिर से नहीं जिया जा सकता तथा उसमें की गई गलतियाँ या त्रासदियाँ पीछे जाकर न रोकी जा सकती हैं और न ही सुधारी जा सकती हैं। और भविष्य को लेकर इतनी अनिश्चितता रहती है कि वह डर पैदा कर सकती है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति दुखी हो जाता है।

जितना अधिक कोई व्यक्ति दिमागी होता है उतना ही वह दुखी हो सकता है। जो लोग कम दिमागी होते हैं और वर्तमान में जीते हैं, वे अधिक खुश नज़र आते हैं। वे मन को शांत रखते हैं और हृदय पर केंद्रित रहते हैं। वे कम सोचते हैं और ज़्यादा महसूस करते हैं।

सोचने से व्यक्ति विश्लेषण और तर्क-वितर्क करता रहता है। दोनों ही व्यक्ति में नकारात्मक मानसिकता पैदा कर सकते हैं। लेकिन महसूस करना अलग बात है। आप जब पेड़ों के पास से गुज़रते हैं तो उन्हें महसूस करते हैं; आप अपने सिर के ऊपर तैरते बादलों को महसूस करते हैं। आप यह नहीं सोचते कि बादल कैसे बने या उनका आकार ऐसा क्यों है। आप कुछ नहीं सोचते, आप बस महसूस करते हैं - बादलों को, पहाड़ों को, पेड़ों को, फूलों को, लोगों को -
सबको बिना किसी धारणा के।

मेरा मानना है कि हमें महसूस करने में ही खुशी मिलती है, लेकिन केवल तभी जब हम जो महसूस करते हैं उसका विरोध नहीं करते हैं। हम बस उसे स्वीकार करते हैं और दुनिया के चमत्कारों का आनंद लेते हैं। प्रेम को महसूस करने की शुरुआत क्या है? बस महसूस करें। जो महसूस करते हैं, उसका अंतर्विरोध न करें। मन को स्वतंत्र छोड़ दें। जब आप महसूस करते हैं तब आप उसी के साथ एकाकार हो जाते हैं जिसे आप महसूस कर रहे होते हैं। और उस एकीकरण में आपको खुशी मिलती है और उसी खुशी के माध्यम से प्रेम मिलता है।

हम मन से तर्क करते हैं। हम दिल से महसूस करते हैं। मन विचार उत्पन्न करता है और उन्हें शब्दों के ज़रिए व्यक्त करता है। दिल भावनाओं के ज़रिए अपनी बात कहता है।

हम अपने मन से सही और गलत में अंतर करते हैं। हम कई परस्पर विरोधी संदेशों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं। ये परस्पर विरोधी संदेश हमें विभिन्न स्रोतों से मिलते हैं जैसे दोस्त, परिवार, शिक्षक, किताबें और अनुभव। अक्सर हम अपने हृदय की बात को और जो स्वाभाविक लगता है, उसे दबा देते हैं। हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ दबा देते हैं और सिर्फ़ दिमाग का उपयोग करके अपने कर्मों को सही ठहराते हैं।

इस प्रवृत्ति को तोड़ने की कुंजी है अपने मन से अलग होना और इच्छित भावनाओं को विकसित करना। एक पल के लिए दिमाग को रोककर पूछें कि जिस राय का मैं समर्थन कर रहा हूँ, जो निर्णय हम लेने वाले हैं आदि – यह सही लगता है या गलत?

सही और गलत का केवल आकलन ही नहीं होना चाहिए, उसे महसूस भी किया जाना चाहिए।

अपनी अनुभूति का अनुसरण करें। वह हृदय से आती है और हृदय सबसे बेहतर जानता है। हृदय को यह देखना चाहिए कि हम क्या सोचते हैं – सिर्फ़ ध्यान में ही नहीं, बल्कि हर समय।

अपने जीवन को अकेले मन से संचालित न होने दें।

और यदि मन और हृदय के बीच ऐसा संघर्ष हो जिसे आप सुलझा न सकें तो हृदय को जीतने दें।


अपनी अनुभूति का अनुसरण करें। वह हृदय से आती है और हृदय सबसे बेहतर जानता है। हृदय को यह देखना चाहिए कि हम क्या सोचते हैं – सिर्फ़ ध्यान में ही नहींबल्कि हर समय।


 


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