अनन्या पटेल द्वारा लिए गए साक्षात्कार में सारा बब्बर पेड़-पौधों और पशुओं के साथ संवाद करने के अपने अनुभवों के बारे में बता रही हैं कि कैसे इन अनुभवों ने उनके जीवन और उनकी हास्य-विनोद की प्रवृत्ति को समृद्ध बनाया।

 

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प्र. - नमस्ते, सारा। आप अभी मनोविज्ञान में डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रही हैं लेकिन आज मैं आपसे आपकी एक अन्य रुचि के बारे में बात करना चाह रही हूँ। क्या यह कहना सही होगा कि आप पेड़-पौधों और पशुओं से बात करती हैं? इस विशिष्ट गुण को आप अपने शब्दों में किस तरह से व्यक्त करेंगी?

मैं इसे ‘पौधे एवं पशु संवादक’ कहूँगी।

प्र. - क्या आप इसे समझाएँगी? और आपको इनसे क्या लगाव है?

हमारा एक बड़ा बगीचा है और मैं पेड़-पौधों व जानवरों के साथ ही बड़ी हुई हूँ। मेरे पास हमेशा कुत्ते रहे हैं, इसलिए बचपन से ही प्रकृति के साथ मेरी निकटता रही है। मैं रोज़ बगीचे में जाया करती थी लेकिन मैंने इस बारे में कभी कुछ और नहीं सोचा था। फिर कुछ वर्ष पहले मेरी एक कुतिया को व्यवहार संबंधी समस्याएँ होने लगीं। हम चिंतित थे कि हमें उसे छोड़ना पड़ेगा। तभी मुझे जानवरों से संवाद करने का तरीका पता चला।

मैंने इस बारे में खोज करनी शुरू की और इससे संबंधित कुछ ऑनलाइन कोर्स भी किए। मैंने पाया कि इस क्षमता को विकसित किया जा सकता है। बचपन में सहज रूप से मुझमें यह क्षमता नहीं थी क्योंकि तब मैं अपने आसपास के परिवेश पर ज़्यादा गौर नहीं करती थी। मैंने यह क्षमता कई सालों में विकसित की है। उस समय हमने एक पशु संवादकर्ता को हमारी कुतिया से संवाद करने के लिए कहा था और तब हमें उसकी समस्याओं के बारे में पता चला था। इस संवाद में कुतिया ने अपने बारे में जो ज़ाहिर किया उससे हम चकित रह गए थे। उसी समय मैंने तय किया कि मैं इस विषय की गहराई में जाऊँगी। मैंने कुछ कोर्स किए जो पशुओं के साथ-साथ पौधों से संवाद करने के बारे में भी सिखाते थे। इस तरह मैं नवंबर 2021 से पौधों और पशुओं से बात कर रही हूँ।

अभी मैं इस कार्य के लिए पैसे नहीं लेती हूँ। लेकिन हम अपने घर के कुत्तों और पौधों से बात करते हैं और देखते हैं कि उनकी क्या ज़रूरतें हैं और हम उनकी बेहतर देखभाल के लिए क्या कर सकते हैं।

प्र. - यह खूबी किस तरह विकसित हुई?

मैंने इस कार्य को कुछ महीनों तक व्यावसायिक रूप से किया और उस समय मैंने महसूस किया कि किस तरह मुझ तक आने वाली जानकारी गहन होती जा रही थी और कैसे पौधे और पशु अपने जीवन की गंभीर घटनाओं, जैसे आघात, के बारे में बता रहे थे। इसलिए मुझे लगा कि मैं इसे व्यावसायिक तौर पर नहीं करूँगी क्योंकि पौधे और पशु अपनी जानकारी को लेकर आप पर विश्वास करते हैं और गहन रहस्य आपको बताते हैं जिन्हें दूसरों को नहीं बताया जाना चाहिए। एक बार आपको कोई जानकारी मिल जाती है, आप उसे अपने तक नहीं रख सकते। अगर आप इसे व्यवसाय के रूप में करते हैं तो आपको वह जानकारी उस पशु के मालिक को बतानी पड़ती है। मैं इस बात को लेकर सहज नहीं थी क्योंकि कभी-कभी वह उनकी अंतरंग जानकारी होती थी। हालाँकि उनके साथ संवाद में गहनता बढ़ती गई लेकिन मैंने इस काम को व्यवसाय के रूप में न करने का फैसला किया।

 

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जिस तरह की बातें पौधे और पशु मुझसे करते हैं वह बहुत आश्चर्यजनक है। चूँकि मैं इसे व्यवसाय के रूप में नहीं कर रही हूँ और सारी बातचीत मुझ तक ही रहती है, इसलिए मैं उनसे क्या पूछ सकती हूँ और वे मुझे क्या बताते हैं, उस पर कोई सीमाएँ नहीं रह गई हैं। कई बार हमारे बीच बहुत गहरी बातचीत हुई है।

निम्नलिखित घटनाएँ मैं जीवों की स्वीकृति से आपको बता रही हूँ। हमारे घर के पास एक नीम का पेड़ था। एक दिन सड़क निर्माण कार्यक्रम के तहत उसे काट दिया गया। क्योंकि पेड़ बहुत पुराना था, उसका बड़ा सा ठूँठ बाकी रह गया था। हम दोनों इस बात से बहुत परेशान थे कि किसी ने आकर पेड़ को काट दिया। हमने उससे बात करना शुरू किया। पेड़ ने कहा, “मुझे तो जाना ही था क्योंकि यहाँ बहुत अधिक विकास और शहरीकरण हुआ है। मेरी जड़ों के माध्यम से मेरे जो संपर्क थे वे टूट चुके हैं। अब मेरे यहाँ बने रहने में कोई मतलब नहीं रह गया है।” उसने एक बहुत गहन बात कही, “एक समय था जब यहाँ कुछ नहीं था लेकिन फिर भी सब कुछ था। अब यहाँ सब कुछ है लेकिन फिर भी कुछ नहीं है।”

मैं विज्ञान की विद्यार्थी नहीं हूँ लेकिन मुझे यह वैज्ञानिक ज्ञान मालूम है कि पेड़ कैसे संवाद करते हैं, पशु पेड़ों की ओर कैसे आकर्षित होते हैं और संवाद के माध्यम से पेड़ क्या करते हैं। ‘द वुड वाइड वेब’और ‘द सीक्रेट लाइव्स ऑफ़ ट्रीज़’जैसी पुस्तकों में वही जानकारी दी गई है जो पेड़ों ने मुझे पहले ही दे दी थी। अगर आप प्रकृति से बात करते हैं और अगर आप अपने आसपास के पेड़-पौधों और पशुओं से संवाद करते हैं तो आपको करुणा, दया और ब्रह्मांड के कार्य के बारे में बहुत सारा ज्ञान और अंतर्दृष्टि प्राप्त होगी।

आप इनसे कई स्तरों पर बात कर सकते हैं। कभी-कभी मैं सिर्फ़ यह पूछती हूँ, “तुम्हें किस जगह पर पानी की ज़रूरत है? किस जगह पर तुम्हें खाद की ज़रूरत है?” यह इस तरह की साधारण-सी बात हो सकती है या फिर यह कोई गहरी ज्ञान की बात भी हो सकती है।


मैं विज्ञान की विद्यार्थी नहीं हूँ लेकिन मुझे यह वैज्ञानिक ज्ञान मालूम है कि पेड़ कैसे संवाद करते हैंपशु पेड़ों की ओर कैसे आकर्षित होते हैं और संवाद के माध्यम से पेड़ क्या करते हैं।


प्र. - वाह! इसका मतलब है कि पौधों और पशुओं के साथ संवाद करने से बहुत ज्ञान प्राप्त होता है। जब आप इन प्राणियों के साथ बातचीत करते हैं तो यह एक तरह से उनके साथ रिश्ता बनाने जैसा होता है, है न? उनसे हमेशा एकबारगी बातचीत नहीं होती। तो क्या भावनात्मक जुड़ाव शुरू से ही बन जाता है?

हाँ। अगर आप भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं तो आप उनके लिए एक मित्र की तरह होते हैं। अगर आप उनसे एकबारगी बात कर रहे हैं तो वे आपको बातें तो बताएँगे लेकिन शायद वे अपने जीवन के अंतरंग पक्षों के बारे में नहीं बताएँगे। उदाहरण के लिए, अपने व्यावसायिक संवाद के दिनों में मैं अपने ग्राहक को लगभग 48 घंटे देती थी और पशुओं को खुलकर संवाद करने में कुछ घंटे लग जाते थे। अगर आप उन्हें ज़्यादा समय देते हैं तो वे और खुलकर बात करते हैं।

अपने पशुओं के साथ बातचीत में मुझे उनके अतीत के बारे में बहुत कुछ पता चला क्योंकि मेरे पास जो कुत्ते हैं वे बचाकर लाए गए हैं। लेकिन उन्हें भी मुझे यह बताने में छ: माह लग गए कि मेरे पास आने से पहले उनके साथ क्या हुआ था जबकि वे मेरे साथ चार साल से थे। चार साल बाद मैंने उनके साथ उनके स्तर पर बातचीत शुरू की।

शुरू में यह संवाद एकतरफ़ा होता था - मैं उनसे कुछ कहती थी लेकिन वे उसके जवाब में कुछ नहीं कहते थे। थोड़े समय बाद मुझे उनसे जवाब मिलने लगे। उन्हें मुझ पर भरोसा बनाने में और यह बताने में थोड़ा समय लगा कि उनके साथ क्या हुआ था, उन्हें क्या महसूस हुआ और हम कैसे उनकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए उनके साथ जुड़ाव बनाना पड़ता है। अब, जब भी मैं उनसे बात करती हूँ तो यह जल्दी हो जाता है क्योंकि हमने ऐसा बार-बार किया है और वे मुझे जानते हैं।

अन्य पालतू पशुओं के मामले में सामान्य प्रक्रिया होगी, उनके साथ जुड़ना और उनकी ऊर्जा को महसूस करने की कोशिश करना। आपको शारीरिक रूप से उनके आसपास रहने की ज़रूरत नहीं है। आपको उनकी ऊर्जा से जुड़ने में, उन्हें सहलाने में, उनका स्वागत करने में और उनके साथ ऐसे बातचीत शुरू करने में जैसे कि आप किसी मित्र से पहली बार मिल रहे हों, समय लगता है। आप पूछ सकते हैं, “तुम कैसे हो? मुझे अपने बारे में कुछ बताओ।” एक बार जब संपर्क बन जाता है तब कभी-कभी मुझे संकेत मिलते हैं कि अमुक पशु या अमुक पेड़ मुझसे बात कर रहा है। यह एक मित्र से बात करने की तरह होता है। जैसे आपका मित्र कभी आपको रात के 2 बजे फ़ोन करके कहता है, “मुझे अमुक चीज़ की ज़रूरत है,” ऐसे ही मेरा कुत्ता या मेरा पेड़ करता है।

यह अनुभूति दिल को छू लेती है क्योंकि प्रकृति बहुत विशाल है। आपको अनुभूति होती है कि यह एक विस्तार है। जब कोई 4,050 साल पुराना पेड़ आपसे बात करता है तो उसमें बहुत-सी ज्ञान की बातें होती हैं। ऐसा नहीं है कि वे आपसे केवल किसी अलग नज़रिए से बात करते हैं।

प्र. - यह मनुष्यों के साथ संवाद करने से किस तरह भिन्न है?

हमारे आध्यात्मिक गुरुओं ने कहा है कि हर प्राणी में तीन शरीर होते हैं। पौधों और पशुओं में सूक्ष्म शरीर उतना विकसित नहीं होता जितना मनुष्यों में होता है। इसी से अंतर पैदा होता है - मनुष्य बहुत सी चीज़ों को छिपा सकते हैं। मनुष्य आपको वही बताते हैं जो वे आपको बताना चाहते हैं। वे जो भी करते हैं, उसमें से बहुत-सी बातें आपसे छुपा सकते हैं। मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं। मैं आपसे उस तरह बात नहीं करूँगी जिस तरह मैं दूसरों से करूँगी। पौधे और पशु ऐसे नहीं होते। वे खुलकर बात करते हैं और जब तक उन्हें कोई खतरा महसूस न हो, वे झूठ नहीं बोलते। वे जानकारी को अपने अंदर रोक कर नहीं रखते। वे बड़ी स्पष्टता और सहजता से साझा करते हैं। वे निश्चित रूप से मनुष्यों की तुलना में खुलकर संवाद करते हैं क्योंकि मनुष्य खुद को बदल सकते हैं। यह क्रम-विकास का एक परिणाम है। इस वजह से पौधों और पशुओं से बात करना बहुत रोचक होता है।

प्र. - आप बातचीत कैसे शुरू करती हैं? क्या आपको एहसास होता है कि वे आपसे कुछ कहना चाहते हैं? यह संकेत आप तक कैसे पहुँचता है?

यह अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरीके से काम करता है। ज़्यादातर मौकों पर मैं पशु को पहले बताती हूँ कि मैं संवाद के लिए उपलब्ध हूँ। आप शुरुआत में संवाद के लिए दरवाज़े खोलते हैं और अंत में संवाद के दरवाज़े बंद कर देते हैं। आप बस कुछ कहकर शुरू करते हैं। कभी-कभी अगर कोई पशु होता है तो, मुझे सचमुच महसूस होता है, मेरे दिमाग में यह बात उभर आती है, “सुनो, मैं कुछ कहना चाहता हूँ।” तब मुझे पता चल जाता है कि वे बात करने के लिए तैयार हैं। मैं उन्हें पूरा समय लेने देती हूँ। कभी-कभी वे आते हैं, बात करते हैं, चले जाते हैं और बाद में वापस आते हैं। उस समय में मैं उनके लिए मौजूद होती हूँ और वे मुझसे संवाद कर पाते हैं।

 

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अपने पौधों और पशुओं के साथ मेरा संवाद हर समय हो सकता है। अगर उनमें से कोई कुछ कहना चाहता है तो वह किसी भी समय ऐसा कर सकता है। अगर उनकी तरफ़ से कुछ कहना बहुत ज़रूरी होता है तो मैं पूछती हूँ, “अच्छा, तुम्हें क्या महसूस हो रहा है? तुम्हें कैसा लग रहा है?” और आमतौर पर वे मुझे तुरंत बता देते हैं या वे कहते हैं, “बाद में बात करेंगे, अभी नहीं।” मुझसे जो कहा जा रहा है वह मुझे एहसास के रूप में पता चलता है। इस तरह हम संवाद शुरू और खत्म करते हैं। एकबारगी संवाद के अंत में मैं संवाद के द्वार बंद कर देती हूँ, जबकि मेरे पालतू पशुओं के साथ यह द्वार आमतौर पर खुला रहता है।

प्र. - और यह संवाद टेलीपैथी के माध्यम से होता है या आप ऊँची आवाज़ में बोलती हैं?

यह टेलीपैथी से होता है। मैं पशु की ऊर्जा से खुद को जोड़ लेती हूँ। यह तब भी हो सकता है जब पशु की मृत्यु हो चुकी होती है और उसका मालिक उसके बारे में कुछ जानना चाहता है। बहुत सारे गली के कुत्ते अचानक मर जाते हैं और हम उनके बारे में कुछ जानना चाहते हैं क्योंकि हम गली के कुत्तों को खाना खिलाते हैं। तो हम उनसे पूछते हैं, “क्या हुआ था? क्या तुम्हें अंत में कुछ दर्द हुआ था?” चाहे पशु का पुनर्जन्म हो चुका हो तब भी हम उसकी ऊर्जा के साथ संवाद कर सकते हैं और हम उसके साथ जुड़ सकते हैं। हम उस पालतू पशु से उत्तर पाने में सफल रहते हैं।

इसका अनुभव बहुत अच्छी तरह से किया जा सकता है। कई लोगों ने, जिनके पालतू पशु मर चुके हैं, मुझसे पूछा है, “आप उनको कोई संदेश क्यों नहीं देतीं?” या “आप उनसे कोई संदेश क्यों नहीं लेतीं?” मेरे एक संवाद में एक महिला अपने पालतू पशु की मृत्यु से इतनी दुखी थी कि वह कई महीनों तक मुझे उसके साथ संवाद करने के लिए कहती रही। हर महीने उसके मरने की तारीख पर वह मुझे लिखती थी, “कृपया, कोई संदेश लें।” और उसके पालतू पशु ने दुख से बाहर निकलने में उसकी मदद की। टेलीपैथी द्वारा संवाद ऊर्जा के स्वरूप के बदल जाने के बाद भी जारी रहा।

मेरी कुतिया और मैं भी उसकी मृत्यु के बाद संवाद करते रहे। हम उसके गुज़रने की प्रक्रिया के दौरान भी बात करते थे। उसकी मृत्यु के दो या तीन दिनों के पहले से ही मैं उसके गुज़रने के हर पल को समझ रही थी। मेरे पास इसके लिए शब्द नहीं हैं लेकिन यह बहुत अलग अनुभव था। हम वास्तव में ऊर्जा को महसूस कर सके। हम यह महसूस कर सके कि हम ऊर्जा के माध्यम से संवाद कर रहे थे।

प्र. - इन आत्माओं से जो संबंध आपने विकसित किए उसका आपकी अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर क्या प्रभाव पड़ा?

सबसे पहले तो उनसे मिलने वाला ज्ञान बहुत आध्यात्मिक होता है। जब पालतू पशु मर रहे होते हैं तब हमें उनमें बहुत दर्द दिखाई देता है। वे कष्ट में होते हैं, वे मरने वाले होते हैं और हम उनके शरीर को पीड़ा भोगते हुए देखते हैं। लेकिन वे कहते हैं, “जिसे आप पीड़ा के अंतिम क्षण समझकर देख रहे हैं, हम खुद को अपने उस दर्द से अलग कर चुके हैं। हमारी आत्मा पहले से ही शरीर छोड़ चुकी है। वह आसपास मंडरा रही है लेकिन शरीर छोड़ चुकी है। इसलिए जैसा आपको दिखाई दे रहा है हम वैसा बिलकुल भी महसूस नहीं कर रहे हैं और आप केवल यही देख पा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि आपको इस तरह का अलगाव और विवेक कहीं और देखने को मिल सकता है।

हमारा एक सड़क का कुत्ता कार दुर्घटना में मर गया और हमने उसकी पीड़ा के अंतिम दस मिनट देखे। उसने कहा, “आपको पता है? मैं वहाँ था ही नहीं। आपने पीड़ा देखी क्योंकि आप शरीर को देख रहे थे लेकिन मैंने उसका अनुभव नहीं किया।” अधिकांश पालतू पशुओं के साथ यही होता है।

दूसरी बात, “आपकी पसंद और नापसंद क्या है?” यह दूसरा प्रश्न आप पशुओं और पेड़ों से पूछ सकते हैं। एक पेड़ ने बहुत गहन उत्तर दिया - “प्रकृति किसी चीज़ से नफ़रत नहीं करती। हम हर चीज़ को क्षमा कर देते हैं।” यह सीख जो पेड़ों और पालतू पशुओं से हमें मिलती है वह इंसानों से नहीं मिलती। ये गहन आध्यात्मिक अनुभव हैं।

तीसरी बात, आप चेतना के स्तरों के बारे में भी सीखते हैं क्योंकि यह सतही अनुभव से गहन होता है लेकिन ध्यान से कम गहन होता है। संवाद करने के लिए आपको इन दोनों स्थितियों के मध्य में होना पड़ता है। अगर आप पर्याप्त रूप से विचारों से मुक्त नहीं हैं और पर्याप्त रूप से साफ़ नहीं हैं तो आप जान ही नहीं पाएँगे कि आप क्या अनुभव कर रहे हैं - आपके विचार क्या हैं और पशु के विचार क्या हैं? आपको एक संतुलन की स्थिति में आना होगा ताकि आप उसके साथ संवाद कर सकें।

अत: यह आध्यात्मिकता से काफ़ी संबंधित है। आप मनुष्यों से अलग अन्य प्राणियों से संवाद करते हैं। इसके कई पहलू आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं और आध्यात्मिक अभ्यास के साथ सुसंगत भी हैं।


वे खुलकर बात करते हैं और जब तक उन्हें कोई खतरा महसूस न हो वे झूठ नहीं बोलते। वे जानकारी को अपने अंदर रोक कर नहीं रखते। वे बड़ी स्पष्टता और सहजता से साझा करते हैं। वे निश्चित रूप से मनुष्यों की तुलना में खुलकर संवाद करते हैं क्योंकि मनुष्य खुद को बदल सकते हैं। यह क्रम-विकास का एक परिणाम है। इस वजह से पौधों और पशुओं से बात करना बहुत रोचक होता है।


प्र. - क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है जब किसी मनुष्य की पशु से संवाद करने की इच्छा हुई हो या किसी पशु की मनुष्य से संवाद की इच्छा हुई हो और आपको सीमा तय करने की ज़रूरत पड़ी हो?

हाँ, सामान्यत: पशुओं के साथ ऐसा नहीं होता। लेकिन कुछ मामलों में मैंने देखा है कि पालतू पशुओं के मालिक बहुत ज़्यादा दबाव डालते हैं। तब पशु की और खुद की रक्षा करने के लिए मैं सीमाएँ तय करती हूँ। एक आदमी था जो मुझे कहता रहता था, “मेरे कुत्ते से कहो कि वह मेरे पालतू पशु के रूप में फिर से जन्म ले।” एक पालतू पशु के मालिक के रूप में मैं इसे पूरी तरह समझ सकती हूँ लेकिन पशु यह नहीं चाहता था। उस कुत्ते से बार-बार संवाद करने पर भी उसका स्पष्ट उत्तर था, “नहीं।” फिर भी उसका मालिक मुझसे कहता रहा कि मैं उसे आदेश दूँ कि वह उसके पास आए। यह करना संभव नहीं था। ऐसे मामलों में आपको सीमा तय करनी पड़ती है।

कभी-कभी मुझे अपने स्वयं के पालतू पशुओं के साथ भी एक हास्यप्रद तरीके से रोक लगानी पड़ती है क्योंकि वे हर बात सुनते हैं और स्पंज की तरह उसे अवशोषित कर लेते हैं। इसलिए अगर कुछ ऐसा है जो मैं नहीं चाहती कि वे जानें तो मैं उस समय के लिए उनके साथ अपना संवाद बंद कर देती हूँ। एक बार कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं कुछ महीनों के लिए अपने घर पर थी। मेरा कुत्ता चौबीसों घंटे मुझसे बात करता था। यह कष्टप्रद था क्योंकि आप किसी से चौबीसों घंटे बात नहीं कर सकते। मुझे उसे कहना पड़ा, “मुझे थोड़ा आराम चाहिए। तुम बैठ जाओ। हम बाद में बात करेंगे। जब हमारा बात करने का समय होगा तब हम बात करेंगे।”

 

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मैं पशु की ऊर्जा से खुद को जोड़ लेती हूँ। यह तब भी हो सकता है जब पशु की मृत्यु हो चुकी होती है और उसका मालिक उसके बारे में कुछ जानना चाहता है। बहुत सारे गली के कुत्ते अचानक मर जाते हैं और हम उनके बारे में कुछ जानना चाहते हैं क्योंकि हम गली के कुत्तों को खाना खिलाते हैं। तो हम उनसे पूछते हैं, ““क्या हुआ थाक्या तुम्हें अंत में कुछ दर्द हुआ था?” चाहे पशु का पुनर्जन्म हो चुका हो तब भी हम उसकी ऊर्जा के साथ संवाद कर सकते हैं और हम उसके साथ जुड़ सकते हैं। हम उस पालतू पशु से उत्तर पाने में सफल रहते हैं।


प्र. - मुझे लगता है कि यह किसी भी रिश्ते की तरह है। आपको इसी में अपनी सुविधा खोजनी होगी।

आपने पेड़ की जड़ों का उदाहरण दिया। क्या आपने संसार के पर्यावरण और सह-अस्तित्व के बारे में अपनी समझ पर संवाद के इस गुण के और कोई प्रभाव देखे हैं?

यह बहुत गहन प्रश्न है। मैं आपको अपने बगीचे में लगे आम के पेड़ का उदाहरण देती हूँ। वह मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था कि प्रकृति कैसे काम करती है। अगर पेड़ से कोई आम गिर जाता है और कोई बंदर उसका एक भाग खा लेता है तो उस आधे खाए आम से इस बात का पता चल जाएगा कि पेड़ पर बंदर रहता है क्योंकि उसका DNA आधे खाए फल पर छप जाएगा। मान लीजिए कि एक गिलहरी उसी आम को खाती है और उस पर अपनी छाप छोड़ देती है। इसी तरह पक्षी आते हैं और अपने निशान छोड़ जाते हैं। वे सभी एक ही आम के टुकड़े खाते हैं। इस तरह, प्रत्येक पशु जानता है कि उस विशेष पेड़ पर कौन-कौन से जीव रहते हैं और वहाँ आते हैं। इस तरह वे उस पारिस्थितिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और सहजीवन को दर्शाते हैं। उन्हें पता चल जाता है कि कौन से पशु उनका शिकार करते हैं, कौन से पशु उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और कौन से पशुओं के बारे में उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ़ एक फल के टुकड़े से वे बहुत कुछ समझ सकते हैं। वे आमतौर पर इसी तरह संवाद करते हैं।

 

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इसके अलावा, हमें वर्तमान समय में सह-अस्तित्व में रहना सीखना होगा क्योंकि संसार में जनसंख्या बहुत ज़्यादा बढ़ती जा रही है। यहाँ बहुत सारे लोग, पशु और पेड़ हैं जिनमें एक ही संसाधन के लिए होड़ लगी है। कुछ निश्चित रूप से पीड़ित भी होंगे। हमारे सामने लावारिस कुत्तों और सड़कों पर पेड़ों को लेकर बहुत सारी समस्याएँ हैं और ये वैश्विक समस्याएँ हैं। इसलिए इन पशुओं और पेड़ों के साथ संवाद करने से हमें आशा और नए विचार मिलते हैं कि हम कैसे एक साथ रह सकते हैं।

कुत्ते बताते हैं, “हमें ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए। अगर आप दे सकें तो हमें बस थोड़े से भोजन की ज़रूरत है। हम आपको परेशान नहीं करेंगे क्योंकि अगर हमारा पेट भरा हुआ है तो हमें आक्रामक होने की ज़रूरत नहीं है।” मुझे यकीन है कि ज़्यादातर लोगों के पास इन पशुओं को देने के लिए अतिरिक्त खाना रहता है। मैंने सड़कों पर देखा है कि जिन लोगों के पास खाने के लिए बहुत अधिक नहीं होता, वास्तव में वे ही कुत्तों और अन्य पशुओं को खाना खिलाते हैं और वे पेड़ों को भी परेशान नहीं करते। इसके विपरीत जो लोग ऊँचे बहुमंज़िला भवनों में और गेटेड समुदायों में रहते हैं उन्हें पशुओं से समस्या होती है क्योंकि वे अंदर आ जाते हैं और उन जगहों को गंदा कर देते हैं। मैंने उनके चौकीदारों को लावारिस कुत्तों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते देखा है।

अब जब मैंने प्रकृति का अवलोकन करना शुरू कर दिया है तो यह सिर्फ़ टेलीपैथी के स्तर पर ही नहीं बल्कि समग्र स्तर पर भी है। इससे मैंने सहजीवन के बारे में बहुत सी चीज़ें सीखी हैं। पशु और पेड़-पौधे हमारे समाज का हिस्सा हैं। बेहतर होगा कि हम एक-दूसरे के साथ संघर्ष करने के बजाय शांतिपूर्ण ढंग से एकसाथ रहें।

पशुओं के साथ संवाद किए बिना भी हम भौतिक स्तर पर उनकी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए कई काम कर सकते हैं। जो भी जीव आपके पास आए उसे भोजन दें। घर के बाहर थोड़ा पानी रखें। ये जीव न्यूनतम में जी लेते हैं और इन्हें हमारी देखभाल की बहुत ज़्यादा ज़रूरत नहीं होती। हर समाज में बहुत से लोग होते हैं। अगर उनमें से एक या दो भी कुछ कर सकें तो उस क्षेत्र के सभी लावारिस पशुओं और पेड़-पौधों की अच्छी तरह से देखभाल हो सकती है।


वे सभी एक ही आम के टुकड़े खाते हैं। इस तरहप्रत्येक पशु जानता है कि उस विशेष पेड़ पर कौन-कौन से जीव रहते हैं और वहाँ आते हैं। इस तरह वे उस पारिस्थितिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और सहजीवन को दर्शाते हैं। उन्हें पता चल जाता है कि कौन से पशु उनका शिकार करते हैंकौन से पशु उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और कौन से पशुओं के बारे में उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ़ एक फल के टुकड़े से वे बहुत कुछ समझ सकते हैं। वे आमतौर पर इसी तरह संवाद करते हैं।


 

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प्र. - क्या कुछ और भी बातें हैं जो आप हमें बताना चाहेंगी?

मेरा मानना है कि जानवरों और पेड़ों से संवाद करना एक अद्भुत चीज़ है। जब आप उनके साथ होते हैं तब आप कभी अकेलापन महसूस नहीं करते। अगर आपके घर में कोई घर के अंदर रखने वाला पौधा है तो उसके साथ भी संवाद करना बहुत बढ़िया है। इसे सीखा जा सकता है और निखारा जा सकता है। सिर्फ़ अवलोकन करने से भी आपको बहुत-सी जानकारी मिल जाती है। मेरा सुझाव है कि अवलोकन करें और आप देखेंगे कि संसार में आपके बहुत सारे मित्र हैं। तब आप वास्तव में सह-अस्तित्व, आशा और एक सुखी भविष्य की दिशा में बढ़ सकते हैं।

पेड़ और जानवर बच्चों की तरह बहुत मासूम होते हैं। जब आप उनके साथ हँसते हैं तो चारों ओर खुशी फैल जाती है। और जब वातावरण में बहुत सारी हँसी होती है तो बहुत सारा आनंद भी होता है। तब आप अपने चारों ओर आनंद प्रसारित करते हैं। वास्तव में मेरी कुतिया ने अपनी मौत को भी मज़ाकिया बना दिया था। वह अत्यंत दुखद घटना थी लेकिन पूरा समय वह खुश थी। अपने अंतिम समय में उसने कितनी ही चीज़ें कीं। उसने उसे बहुत सहजता से लिया। उसने हमें इस तरह के निर्देश दिए, जैसे “जब मैं मर जाऊँ तब मैं यह चाहती हूँ ...” अंतत: जब वह गुज़र गई तब हम पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उसने उस स्थिति को बहुत अच्छी तरह संभाला था। यह याद हमेशा मेरे साथ बनी रही।

उनके साथ बात करना भी आनंददायक होता है। आप जीवन के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं। आपको बहुत सारी खूबियों के बारे में पता चलता है। आप आनंद लेना सीख जाते हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद, सारा।

 

 


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सारा बब्बर

सारा एक कहानीकार, मोंटेसरी सलाहकार और बच्चों की एक पुस्तक की लेखिका हैं। वे एक प्रकृतिवादी भी हैं और बाल्यावस्था में पारिस्थितिकी चेतना के विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं। वे आठ वर्षों... और पढ़ें

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