हर वर्ष 23 अप्रैल को हम विश्व पुस्तक दिवस मनाते हैं। अब तक ज्ञात सबसे पुरानी पुस्तकें मेसोपोटामियाई और भारतीय समाजों में लिखी गई थीं। प्राचीन भारतीय समाजों ने अपनी कहानियों और महाकाव्यों को चट्टानों, गुफाओं की दीवारों और पेड़ों की छालों पर लिखा था। फिर वे पत्तों का उपयोग पांडुलिपियों के रूप में करने लगे। वहीं, मेसोपोटामिया (वर्तमान में इराक) में सबसे पुराना साहित्य मिट्टी की पट्टियों पर स्फानलिपि में लिखा गया था। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण गिलगमेश महाकाव्य है, जिसे काल्पनिक साहित्य की पहली ज्ञात कृति माना जाता है और इसने कई अन्य पुस्तकों के लेखन को प्रेरित किया है।
इस विश्व पुस्तक दिवस पर, सारा बब्बर एक छोटी सी मौलिक कहानी लेकर आई हैं। यह कहानी एक लड़की, साशा और पुस्तकों के प्रति उसके प्रेम के बारे में है। पढ़ने की कला ने साशा को जीवन की कठिनाइयों में सफलता पाने में मदद की।
बहुत समय पहले एक लड़की रहती थी जिसका नाम साशा था। साशा को पढ़ना बेहद पसंद था। उसके माता-पिता ज़्यादा पुस्तकें खरीदने का खर्च नहीं उठा सकते थे, इसलिए साशा बार-बार अपनी पाठ्य-पुस्तकों को ही पढ़ती थी। उसे अपनी सभी कक्षाओं में आनंद आता था और शिक्षक उससे खुश थे।
लेकिन उसके जीवन में एक कमी थी। साशा की कोई सहेली नहीं थी। उसकी सहपाठी लड़कियाँ उसका मज़ाक़ उड़ाती थीं और उसे ‘किताबी कीड़ा’ कहकर चिढ़ाती थीं। वे जानती थीं कि साशा स्कूल के पुस्तकालय से पुस्तकें उधार लेती है क्योंकि वह पुस्तकें खरीद नहीं सकती। वे साशा को ‘गरीब पुस्तकालयाध्यक्ष’ कहकर बुलाती थीं। वे जानती थीं कि साशा शिक्षकों के बच्चों के पुराने हो चुके कपड़े पहनती थी और इसलिए वे उसे ‘पुरानी वस्तुओं की दुनिया की सचिव’ कहती थीं। वे यह भी जानती थीं कि साशा का खान-पान भी साधारण था। इसलिए उसे ‘उग्र रेस्तरां मालिक’ कहकर चिढ़ाती थीं।
स्कूल की प्रधानाचार्या ने देखा कि साशा को लड़कियाँ चिढ़ाती थीं और वह उदास रहती थी। तो उन्होंने बड़ी कड़ाई से साशा को अपने कार्यालय में बुलाया। सबको लगा कि उसे पुस्तकालय में ज़्यादा समय बिताने के लिए डांटा जाएगा। साशा प्रधानाचार्या के कमरे में धीरे-धीरे और घबराते हुए गई।
“मैम, आपने मुझे बुलाया?”
प्रधानाचार्या ने कहा, “हाँ, साशा। आओ बैठो।” साशा को प्रधानाचार्या के उदार लहज़े से आश्चर्य हुआ। “क्या बात है, बेटा? तुम ठीक नहीं हो क्या?” प्रधानाचार्या ने पूछा।
साशा ने जवाब दिया, “मैम, मुझे स्कूल बहुत पसंद है और मैं सीखना चाहती हूँ, लेकिन लड़कियाँ मेरा मज़ाक उड़ाती हैं। मेरे परिवार के पास उनकी तरह रहने का सामर्थ्य नहीं है। हमारे पास उनके जैसे संसाधन नहीं हैं, इसलिए मैं उनकी तरह चीज़ें नहीं खरीद सकती। काश, मेरी भी कोई मित्र होती।”
प्रधानाचार्या ने साशा की ओर देखकर कहा, “मेरे बच्चे, तुम्हारे पास मित्र तो हैं।”
साशा ने हैरानी से पूछा, “मेरे पास मित्र हैं? कहाँ?”
प्रधानाचार्या ने कहा, “जो पुस्तकें तुम पढ़ती हो। तुम्हारे पढ़े हुए पात्र तुम्हारे मन में रहते हैं, वे इस तरह से कल्पना रचते हैं जैसा कोई और नहीं कर सकता। जब तुम अकेली होती हो, ये पुस्तकें तुम्हारे साथ होती हैं। ये तुम्हें खुश कर देती हैं। मित्र यही सब तो करते हैं।”
साशा का चेहरा चमक उठा, “ओह।”
जब साशा को एहसास हुआ कि पुस्तकें ही उसकी मित्र हैं तब प्रधानाचार्या के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वे बोलीं, “मेरी बात सुनो। पुस्तकों का साथ कभी मत छोड़ना, वे भी तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ेंगी। जो तुम्हारा मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें उड़ाने दो। तुम्हारे पास पुस्तकें हैं जो तुम्हारी मित्र हैं।”
साशा ने स्कूल नहीं छोड़ा। साशा ने उन सब को अनदेखा किया जो उसका मज़ाक़ उड़ाती थीं और दृढ़ता के साथ अपना काम करती रही। स्कूल के बाद वह विश्वविद्यालय में गई और फिर काम करने लगी। एक दिन उसे स्कूल के रीयूनियन यानी छात्रों के पुनर्मिलन समारोह का आमंत्रण मिला। वह अपने स्कूल के शिक्षकों और खासकर अपनी प्रधानाचार्या से मिलना चाहती थी, जिन्होंने उसके सपनों को पंख दिए थे।
वह स्कूल पहुँची और सीधे पुस्तकालय में गई। वह पुस्तकालय बिलकुल बदल चुका था। उसका ध्यान नई पुस्तकों, डिजिटल संस्करण और पढ़ने के लिए पुस्तकें लेने की आधुनिक प्रणाली पर गया।
तभी उसने सुना, “देखो, देखो, गरीब पुस्तकालयाध्यक्ष आ गई।” उसकी सहपाठियों ने उसे देखकर एक बार फिर उसका मज़ाक उड़ाया - “यह तो किसी सार्वजानिक पुस्तकालय में पुस्तकालयाध्यक्ष होगी। यह पुस्तकालय भी इसके लिए बहुत शानदार होगा।”
तभी प्रधानाचार्या ने अंदर आकर कहा, “अच्छा, तो तुम लोग एक-दूसरे से मिल चुकी हो? यह साशा है, स्टैनडॉर्फ़ यूनिवर्सिटी, जो अपनी उत्कृष्टा के लिए जानी जाती है, के शिक्षा विभाग की सबसे युवा निदेशक। साशा ने शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टरेट की है और वह अपने विश्वविद्यालय में बुलिंग यानी दादागिरी के खिलाफ़ नीतियाँ बना रही है। इसने ऐसे ऐप्स भी तैयार किए हैं जिनके ज़रिये बुलिंग की शिकायत दर्ज की जा सकती है और पीड़ित बच्चों की मदद की जा सकती है। साशा वाकई बहुत प्रतिभावान है जिसे उसके सारे छात्र प्यार करते हैं।”
यह सुनकर साशा की सहपाठी लड़कियाँ बहुत शर्मिंदा हुईं और उन्होंने फ़ौरन साशा से अपने रूखे और धृष्ट व्यवहार के लिए माफ़ी माँगी। साशा हमेशा अपनी पुस्तकों के साथ रही और उसने धीरे-धीरे अपनी जैसी सोच वाले लोगों को दोस्त बनाया, जिन्होंने उसे आगे बढ़ने और सफलता की ऊँचाइयों को छूने के लिए प्रेरित किया।


सारा बब्बर
सारा एक कहानीकार, मोंटेसरी सलाहकार और बच्चों की एक पुस्तक की लेखिका हैं। वे एक प्रकृतिवादी भी हैं और बाल्यावस्था में पारिस्थितिकी चेतना के विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं। वे आठ वर्षों... और पढ़ें
