लिया कुमार एक गिलहरीबार्नाबीकी कहानी प्रस्तुत कर रही हैं जो ठंड से बचने के लिए बड़ी बेचैनी से एक घर की तलाश में भटक रहा था। अंत में एक जगह खोज लेने पर उसे बहुत सुकून महसूस होता है।

 

ह दिन बार्नाबी गिलहरी के लिए मुश्किल भरा था। सर्दियों के शुरू होने में बस एक सप्ताह बचा था और उसे अभी तक सर्दी से बचने के लिए कोई आरामदायक घर नहीं मिला था। जंगल के बाकी सभी जानवर अपने-अपने गर्म बिलों और घरों में जा चुके थे। बार्नाबी को जल्द से जल्द कोई ठिकाना ढूँढना था, लेकिन उस घने जंगल में एक गिलहरी को सर्दियों के लिए बिस्तर कहाँ मिल सकता था? उसे कुछ नया सोचने की ज़रूरत थी।

वह जंगल में इधर-उधर दौड़ ही रहा था कि उसकी नज़र एक बिल पर पड़ी। उसने अंदर झाँका तो देखा कि खरगोश के तीन नन्हे बच्चे बड़े आराम से सो रहे थे। बार्नाबी ने सोचा, “वाह! यह जगह तो बड़ी गर्म और अच्छी लग रही है। मैं भी अपने लिए ऐसा ही एक बिल खोद लेता हूँ!” बार्नाबी ने पास ही में एक साफ़ जगह चुनी और खोदना शुरू कर दिया। वह खोदता गया, खोदता गया और फिर नरम मिट्टी की जगह नीचे से सख्त ज़मीन, जड़ें और पत्थर निकल आए। लेकिन तब भी वह बिल उसके रहने के लिए पर्याप्त बड़ा नहीं था। उसके नन्हे पंजे भी थकान के मारे दुखने लगे थे। बार्नाबी ने हाँफते हुए अपने माथे का पसीना पोंछा और सोचा, “उफ़! इसमें तो बहुत समय लग जाएगा। शायद बिल में रहना मेरे लिए सही नहीं है।”

 

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वह पानी पीने के लिए तेज़ी से भागकर नदी के किनारे पहुँचा। वहाँ उसने ऊदबिलावों के एक परिवार को देखा जो सर्दियों में अपनी सुरक्षा के लिए बाँध (पानी रोककर रहने के लिए बनाई गई सुरक्षित जगह) बना रहा था। उसकी मोटी दीवारों को देखकर लगता था कि वे ऊदबिलावों को गर्म रख पाएँगी। वह घर काफ़ी बड़ा और शानदार था, खरगोशों के बिल से कहीं ज़्यादा बड़ा।

बार्नाबी ने मन ही मन तय किया, “बस, यही ठीक है! मैं भी अपने लिए ऐसा ही घर बनाऊँगा।”

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वह फ़ौरन यहाँ-वहाँ दौड़कर लकड़ियाँ, टहनियाँ और सूखे पत्ते इकट्ठा करने लगा और नदी किनारे लाकर उनका ढेर लगाने लगा। उसने उन सबको जोड़कर ठीक वैसा ही घर बनाने की कोशिश की जैसा नदी की दूसरी तरफ़ ऊदबिलावों ने बनाया था। लेकिन वह जैसे ही ढाँचा खड़ा करता, हवा का एक झोंका आता और सब कुछ गिरा देता।

बार्नाबी इधर-उधर भाग-दौड़ करता रहा और बार-बार कोशिश करता रहा लेकिन वह घर को सीधा खड़ा नहीं कर पा रहा था। आखिरकार वह हतोत्साहित हो गया।

ओह, अब मैं क्या करूँ!” उसने टहनियाँ ज़मीन पर पटकते हुए कहा और मायूस होकर वहीं बैठ गया। वह सोचने लगा, “ऐसे ही चलता रहा तो मुझे सर्दियों के लिए कभी घर नहीं मिलने वाला।”

 

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तभी दूसरी ओर से एक ऊदबिलाव धीरे-धीरे नदी पार करके वहाँ आया। वह रेंगता हुआ किनारे पर बाहर निकला और बार्नाबी के बनाए उस अधूरे ढाँचे को गौर से देखने लगा।

ऊदबिलाव ने बात शुरू करते हुए कहा, “बेटे, मैं बड़ी देर से तुम्हें देख रहा हूँ। तुम इस ‘ढाँचे’ को बनाने में बड़ी मेहनत कर रहे हो। क्या मैं पूछ सकता हूँ कि यह क्या है जो तुम बनाने की कोशिश कर रहे हो?”

बार्नाबी ने एक ठंडी आह भरकर कहा, “दरअसल, मैं सर्दियों के लिए अपना घर बना रहा था। मैंने बिलकुल आपके घर जैसा बनाने की कोशिश की, पर बात बन नहीं रही।”

हम्म” ऊदबिलाव ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखो, जहाँ तक मेरा अनुभव है, एक साथ सब कुछ करने की कोशिश अक्सर हमें कहीं नहीं पहुँचाती। और तुम जैसे गिलहरी को सर्दियों के लिए इतने बड़े बाँध की कोई ज़रूरत भी नहीं है। शायद थोड़ा सब्र रखने से तुम्हें समझ आ जाएगा कि असल में तुम्हारी ज़रूरत क्या है।”

बार्नाबी ने इस बात पर विचार किया और वापस जंगल की ओर चल दिया। बार्नाबी वास्तव में कहाँ रहना चाहता था? जंगल में ऊँचे-ऊँचे पेड़ों को देखते ही उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और उसने कहा, “अरे हाँ, मैं तो पेड़ पर रहना चाहता हूँ।”

तभी उसकी नज़र एक बहुत पुराने और विशाल शाहबलूत के पेड़ पर पड़ी, जिसके बीचों-बीच एक गहरा और मज़बूत कोटर था। बार्नाबी उसे देखने के लिए उत्सुक था और इसलिए झटपट तने पर चढ़ गया। वह मन ही मन दुआ कर रहा था, “काश! उसके अंदर पहले से कोई न हो।”

उसने सावधानी से उस गर्माहट भरे लकड़ी के बने कोटर के अंदर झाँका। उसे देखते ही खुशी के मारे उसकी पूँछ फड़कने लगी। वह सोचने लगा, “यह तो एकदम सही है! मुझे बस इसमें थोडा सा सुधार करना है।”

 

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बार्नाबी एक आखिरी बार जंगल में घूम-घूम कर अपने नए घर के लिए सबसे अच्छी टहनियाँ और नरम घास चुनकर लाया। उसने बड़े सब्र और सलीके से हर चीज़ को सही जगह पर सजाया, जब तक कि वह कोटर अंदर से मखमली और बेहद आरामदायक नहीं बन गया।

उसने कहा, “यह इतना भी मुश्किल नहीं था! मुझे बस थोड़ा समय चाहिए था यह समझने के लिए कि मुझे असल में किस चीज़ की ज़रूरत थी।”


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लिया कुमार

लिया यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास में इकोनॉमिक्स और कंप्यूटर साइंस की छात्रा हैं। उन्हें दौड़ना, ... और पढ़ें

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