दाजी पाँचवे सार्वभौमिक नियम को प्रस्तुत कर रहे हैं जो सच्चाई के बारे में और हमारे मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयों को स्वीकार करने के बारे में है। एक शुरुआत के रूप में यह पाँचवाँ नियम हमें स्वीकार्यता एवं करुणा से युक्त एक संतुष्ट व शांतिपूर्ण जीवन जीने में सहायता करता है। फिर जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, यह सत्य एवं वास्तविकता के परम स्वरूप की ओर हमारा पथ-प्रदर्शन करता है।
नियम 5
सदा सच बोलें। कष्टों को ईश्वर की ओर से अपनी भलाई के लिए समझें और उनका धन्यवाद करें।
सच का स्वरूप
यह एक व्यापक विषय है। अतः हम दैनिक व्यवहार के स्तर से शुरू करके अस्तित्व के परम सच की ओर बढ़ेंगे।
आप में से कुछ लोगों को शेक्सपियर के नाटक ‘हैमलेट’ में पोलोनियस का वह कथन शायद पता हो, “यह सर्वोपरि है कि तुम अपने आप से सच्चे बने रहो। और ऐसा करने का परिणाम वैसे ही निश्चित है जैसे दिन के बाद रात होती है, तुम किसी दूसरे से झूठ नहीं बोल पाओगे।” यह एक सार्वभौमिक सिद्धांत है जिसको सभी संस्कृतियाँ महत्व देती हैं - सच्चे, मौलिक और वास्तविक बनना; वही कहना जो आपका अभिप्राय है और आपकी बात का वही अभिप्राय होना जो आप कह रहे हैं - न कोई छिपा उद्देश्य, न कोई मुखौटा, न गलतियाँ छुपाना और न कोई छल करना। इसके बजाय केवल बच्चों जैसी मासूमियत, शुद्धता और सादगी होना। सच्चाई का अर्थ है ईमानदारी, जहाँ विचार शब्दों के अनुरूप हों और शब्द कर्मों के अनुरूप हों; जहाँ हम जैसा कहें, वैसा ही करें।
जब हम जैसा कहते हैं वैसा नहीं करते तब एक तरह से अपने आप से संबंध टूट जाता है और कपट का भाव उत्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप हमारे चेतन एवं अवचेतन मन में एक प्रकार का प्रदूषण व भ्रष्टता आ जाती है। हम अपने ही अंदर बेचैनी महसूस करते हैं और हमारे स्पंदनों का स्तर कम हो जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि हम अपने हृदय की वास्तविक आवाज़ को नहीं सुन रहे होते।
सत्य अष्टांग योग के सबसे पहले अंग यम का एक भाग है। दूसरे शब्दों में, यह मूलभूत व बुनयादी सिद्धांत है। फिर भी बाबूजी को हमें सदा सच्चे बने रहने की याद दिलानी पड़ रही है। इसका अर्थ केवल यही हो सकता है कि सच्चे बने रहना सामान्य बात नहीं है, अन्यथा हमें याद दिलाए जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। छोटे बच्चों को सच्चा बनने के लिए बताना नहीं पड़ता क्योंकि वे कुछ और जानते ही नहीं। जब शुद्धता और सच्चाई की मासूमियत मौजूद है तो हमें उसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
लेकिन सच्चाई के मार्ग पर चलना इतना आसान नहीं है। हमारे विभिन्न व्यक्तित्व हमारे अवचेतन मन से संचालित होते हैं जो हमारी वर्षों की आदतों के परिणामस्वरूप हमारे तंत्रिका मार्गों में पूरी तरह से जम चुके हैं। अक्सर हम उनके प्रति न तो जागरूक होते हैं और न ही वे हमारे नियंत्रण में होते हैं। मनुष्य के रूप में हम इसी असमंजस का सामना करते हैं - हम सच्चाई एवं स्पष्टता का महत्व तो जानते हैं लेकिन हम यह नहीं जानते कि उन्हें अपने जीवन में कैसे लागू करें। हमारी अतीत की जटिलताओं, अवचेतन स्वरूपों एवं प्रवृत्तियों के कारण वास्तविकता को देखने की हमारी दृष्टि धूमिल हो गई है।
सच्चाई चेतना के पूरे वर्णक्रम - अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन - को शुद्ध करने पर निर्भर करती है। ऐसा करने के लिए हमें एक ऐसी पद्धति की आवश्यकता है जो मात्र चेतन मन पर ही काम न करे।
और यह सब संचित होता चला जाता है - जटिलता की जितनी अधिक परतें हम डालते जाते हैं, हृदय की आवाज़ को सुनकर उसका पालन करना उतना ही कठिन होता जाता है। अतः गलत मार्गदर्शन का पालन हम ज़्यादा आसानी से करते हैं। जब हम एक असत्यपूर्ण हृदय और उसके परिणामस्वरूप होने वाले दबाव के साथ जीते हैं तब इससे हमारी सच्चाई में और भी अधिक कमी आ जाती है। इससे हमारा आंतरिक वातावरण बिगड़ जाता है और गलत आदतें स्थायी हो जाती हैं।
और जब हम चेतना की शुद्धता के बिना सच्चा बनने की कोशिश करते हैं तब अक्सर इस प्रक्रिया में दूसरों को आहत कर बैठते हैं। हालाँकि सच्चा होना अच्छा है लेकिन जब तक हम अंदर से शुद्ध न हों, संभवतः हम दूसरों को आहत किए बिना सच्चाई को प्रकट न कर पाएँ। जब भी हम दूसरों को आहत करते हैं, भले ही अनजाने में किया हो, अक्सर हमारे अंदर अपराध-बोध विकसित हो जाता है और अपराध-बोध को हटाना बहुत कठिन है। यह केवल सच्चे प्रार्थनापूर्ण पश्चाताप से ही संभव है। इससे हम सच्चे होने के एक और पहलू पर आते हैं - विनम्रता से अपनी कमियों को स्वीकार करना और एक प्रार्थनापूर्ण अवस्था में उन्हें सच्चाई से प्रस्तुत करना। इससे हमारे तंत्र से अपराध-बोध की भावना साफ़ हो जाती है। ये ऐसे संस्कार हैं जिन्हें हटाना सबसे कठिन होता है।
इससे संबंधित एक और चुनौती है जिसका हम सामना करते हैं - क्या हम जानते-बूझते सच्चाई विकसित कर सकते हैं? वास्तव में नहीं। इसका परिणाम सतही होगा क्योंकि सच्चाई चेतना के पूरे वर्णक्रम - अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन - को शुद्ध करने पर निर्भर करती है। ऐसा करने के लिए हमें एक ऐसी पद्धति की आवश्यकता है जो मात्र चेतन मन पर ही काम न करे। कुछ लोग सम्मोहन द्वारा ऐसा करने का प्रयास करते हैं लेकिन हार्टफुलनेस सफ़ाई की तुलना में सम्मोहन एक अति प्राचीन और दुष्कर पद्धति है। जब तक हम अवचेतन मन से जटिलताओं की सभी परतों को हटा न दें, सच्चाई संभव नहीं है।
एक बार जब हम अंदर दबी हुई सभी जटिलताओं को हटा देते हैं तब सच्चाई अंदर से उभर आती है। सच्चाई हमारा मूलभूत स्वभाव है। वास्तव में, यदि हम इसे सही करने का प्रयास भी करते हैं तो इसका मतलब हुआ कि हमसे कहीं न कहीं आंतरिक संपर्क छूट गया है। सजगता से सच्चाई का अभ्यास करना करुणा या आत्म-स्वीकार्यता का अभ्यास करने जैसा है। अच्छा है कि हम इन सिद्धांतों को जानते हैं लेकिन हमें एक व्यावहारिक तरीका अपनाने की आवश्यकता है। इस मामले में वह तरीका है, आंतरिक सत्य से रूबरू होना, उससे एक हो जाना और उस आंतरिक अवस्था में विलय हो जाना। जब हम उस आंतरिक अवस्था से जुड़ जाते हैं, सच स्वाभाविक रूप से, बिना किसी बनावटी प्रयासों के प्रकट होता है। नियम 5 इसी के बारे में है।
सच्चाई का प्रसार करने के लिए हमें बाहरी ताकत या प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसे कि किसी को प्रेम करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। किसी को नफ़रत करना अलग बात है - हमें इसके बारे में सोचना पड़ता है। सही काम करने के लिए हमें प्रयास नहीं करना पड़ता। गलत काम करने के लिए प्रयास करना पड़ता है। झूठ बोलने के लिए हमारी बहुत सारी ऊर्जा की खपत हो जाती है और झूठ की राह चलते रहने के लिए और भी अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होता।
जब हमारी चेतना शुद्ध हो जाती है केवल तभी मन के अन्य कार्य (जैसे चिंतन, सोचना, महसूस करना, बुद्धिमत्ता, निर्णय लेना, अहम् एवं इच्छा-शक्ति) निष्पक्ष होते हैं। केवल तभी वास्तविक सच का बोध होता है।

मैं आपको एक मज़ेदार कहानी बताऊँगा जो एक चोर के बारे में है। उसने एक धनी व्यक्ति के घर से धन चुराया था। बाद में वह बाज़ार जाकर उस धन को खर्च करने लगा और पकड़ा गया क्योंकि वह नकली नोट इस्तेमाल कर रहा था।
उसे न्यायलय में बुलाया गया। वह न्यायाधीश से बहस करने लगा, “श्रीमान, यदि मुझे पता होता कि ये नकली नोट हैं तो क्या आपको लगता है कि मैं उन्हें चुराता?
अच्छा तर्क है। है न?
न्यायाधीश ने कहा, “मैं तुमसे सहमत हूँ। अगर तुम्हें पता होता तो तुम उन्हें नहीं चुराते।”
“तो आप मुझ पर नकली नोट चुराने का इल्ज़ाम कैसे लगा सकते हैं?”
न्यायाधीश ने उत्तर दिया, “ठीक है, मैं तुम पर नकली नोट चुराने का इल्ज़ाम नहीं लगाऊँगा लेकिन चोरी करने का इल्ज़ाम लगाऊँगा।”
दो दिन बाद, उस चोर को न्यायाधीश के सामने सज़ा सुनाने के लिए बुलाया गया तो वह फिर से बहस करने लगा, “नहीं श्रीमान, आप मुझे दंड नहीं दे सकते, क्योंकि नोट तो नकली थे। आप मुझ पर उन नोटों को चुराने का इल्ज़ाम कैसे लगा सकते हैं जिनका कोई मूल्य ही नहीं है?”
उसकी मनःस्थिति पर गौर करें! ऐसे लोग झूठे तर्कों को सिद्ध करके मन को कुटिल बनाए रखते हैं।
यह एक बहुत ही मामूली संसारी उदाहरण है, लेकिन यह अच्छे से दिखा रहा है कि अपने आप को सही साबित करने के लिए किस प्रकार हम जटिलताओं के जाल में फँस जाते हैं। इसकी तुलना सच बोलने से करें जो अत्यंत सरल, प्रयासरहित होता है और जिससे तंत्र में कोई भारीपन पैदा नहीं होता। इसमें केवल मासूमियत होती है। इन दस नियमों के लेखक, बाबूजी, नियम 5 पर अपनी व्याख्या में लिखते हैं, “सच बोलने का सही अर्थ यही है कि स्वयं को वैसे ही प्रस्तुत करें जैसे आप हैं। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति स्वतः ही कहता है, ‘जो है सो है’।”
सही सोच एवं सही समझ द्वारा ही सच्चाई के लिए एक अटूट प्रतिबद्धता प्रदर्शित होती है और दोनों में ही मन की स्पष्टता और सूझ-बूझ की आवश्यकता होती है जिसे योग में विवेक कहा जाता है। इसमें हृदय के सभी गुणों की भी आवश्यकता होती है जिसमें साहस भी शामिल है, ताकि उस सोच व समझ के अनुरूप ही कार्य किए जा सकें।
सत्य का विज्ञान
आज के समय में, अधिकांश लोग विज्ञान को ही सच्चे ज्ञान का स्रोत मानते हैं क्योंकि विज्ञान में तर्क एवं परीक्षण का उपयोग किया जाता है - इसे मापा जा सकता है। और अधिकांश लोग सोचते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं। क्या वास्तव में ऐसा है? बाबूजी अध्यात्म को ‘सत्य का विज्ञान’ या सच्चाई के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हैं।
जब हमारी चेतना शुद्ध हो जाती है केवल तभी मन के अन्य कार्य (जैसे चिंतन, सोचना, महसूस करना, बुद्धिमत्ता, निर्णय लेना, अहम् एवं इच्छा-शक्ति) निष्पक्ष होते हैं। केवल तभी वास्तविक सच का बोध होता है।
अपने जीवनकाल में बाबूजी ने सत्य की खोज की, शोध किया, उसको वर्णित किया और सत्य का विस्तृत मानचित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने एक पद्धति बनाई जिससे विभिन्न चरणों से गुज़रते हुए चेतना का विकास हो सके। अपनी पुस्तक, ‘अनंत की ओर’ में उन्होंने इस चरणबद्ध प्रक्रिया का वर्णन मानव तंत्र के चक्रों से गुज़रते हुए की जाने वाली विकासमूलक यात्रा के रूप में किया है। उनका शोध वैज्ञानिक खोज के सभी मानदंडों पर खरा उतरता है - यह प्रेक्षणीय है, सटीक है, इसे मापा जा सकता है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में लगातार दोहराया जा सकता है।
बाबूजी ने हमारे अस्तित्व के कारण अर्थात् कारण शरीर या आत्मा से शुरू करते हुए सत्य की खोज की है। इसी आधार से चेतना, फिर ऊर्जा के सभी रूपों और अंततः पदार्थ की रचना हुई। अधिकांश वैज्ञानिकों द्वारा अवलोकन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पाँचों इंद्रियों के अलावा आध्यात्मिक वैज्ञानिक प्रत्यक्ष बोध का भी उपयोग कर पाते हैं। वास्तव में, ‘ऋषि’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘ऋष’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है दर्शन-शक्ति। एक ऋषि वह व्यक्ति है जिसकी दर्शन-शक्ति शुद्ध है क्योंकि उसकी चेतना का क्षेत्र शुद्ध एवं निष्पक्ष होता है। एक ऋषि सत्य को प्रत्यक्ष देख सकता है जिसमें मन का कोई प्रभाव या हस्तक्षेप नहीं होता।
एक आध्यात्मिक वैज्ञानिक आपको बताएगा कि जितने मन हैं उतने ही ब्रह्मांड हैं। हम जो भी अनुभव करते हैं, वह मन की ही कल्पना होती है। और जब हमारी चेतना शुद्ध हो जाती है केवल तभी मन के अन्य कार्य (जैसे चिंतन, सोचना, महसूस करना, बुद्धिमत्ता, निर्णय लेना, अहम् एवं इच्छा-शक्ति) निष्पक्ष होते हैं। केवल तभी वास्तविक सच का बोध होता है। अधिकांश लोगों की चेतना उनके द्वारा एकत्रित जटिलताओं एवं अशुद्धियों से प्रभावित रहती है। इसलिए उनकी वास्तविक दर्शन करने की दृष्टि साफ़ नहीं होती है। वे अपनी मान्यताओं के सिद्धांतों के अनुसार ही प्राप्त जानकारी का अर्थ समझते हैं। उनका दृष्टिकोण उनकी व्यक्तिगत वास्तविकता है,
न कि सार्वभौमिक सत्य।
हम सच्चाई तक कैसे पहुँचें?
यदि सत्य ऐसी अवस्था है जिसे परिभाषित करना मुश्किल है और जिसे ‘जो है, सो है’ द्वारा वर्णित किया जाता है, तो हम उसे कैसे प्राप्त करें? यह केवल तभी हो सकता है जब हम अपनी चेतना के क्षेत्र से जटिलताओं एवं अशुद्धियों को हटाकर स्वयं को सभी धारणाओं से मुक्त कर लें। और इसके लिए ध्यान-पद्धति, सही सोच, सही समझ, उचित कार्यवाही और सही व्यवहार की आवश्यकता है। केवल तभी हम सत्य की चेतना तक पहुँचते हैं और जब चेतना की उस अवस्था का भी अंत हो जाता है तब हम उसकी अगली अवस्था पर पहुँचते हैं जो सत्य के समान है।
चलिए, सच्चाई को बिलकुल व्यावहारिक अर्थ में जानने का प्रयास करते हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, सत्य पतंजलि के अष्टांग योग के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है और हर परंपरा में यह मौजूद है। उदाहरण के लिए, ईसा मसीह ने इसे यह कहकर व्यक्त किया कि वे ही सत्य हैं। इस गहराई से देखें तो सत्य का अर्थ है परम अपरिवर्तनीय सत्य या वास्तविकता को जानने की इच्छा और उसके लिए प्रतिबद्धता।
जब हम उस आंतरिक अवस्था से जुड़ जाते हैं, सच स्वाभाविक रूप से, बिना किसी बनावटी प्रयासों के प्रकट होता है।
हम जो कुछ भी करते हैं उसमें सच्चे बनने की कोशिश करते हैं ताकि हमारे कर्म एवं आचरण उस अंतिम अवस्था के साथ सामंजस्य में हों। व्यावहारिक रूप में इसका मतलब है कि किसी भी समय जिस भी सर्वोच्च सच को हम अनुभव कर सकते हैं, उसके लिए हम प्रतिबद्ध हैं। यह किसी राय या अनुमान की तरह क्षणिक नहीं होता है। किसी भी परिस्थिति में सच्चे बनने का अर्थ है सबसे स्थिर दृष्टिकोण को मानना।
कष्टों के पीछे की सच्चाई
इस पाँचवे नियम का दूसरा अंश हमें कष्टों को स्वीकार करते हुए धन्यवाद देने को कहता है क्योंकि वे हमारी ही भलाई के लिए ईश्वर की ओर से आ रहे हैं। सच्चे बनने से इसका क्या लेना-देना है?
सतही तौर पर यह बहुत ही विवादास्पद व मिथ्याभासी लगता है या कहें कि बेतुका लगता है। कल्पना करें कि आपका बच्चा गंभीर रूप से बीमार है जिसके कारण आप अत्यंत दुखी हैं और ऐसे में कोई आपको कहता है कि ईश्वर को धन्यवाद दें। आपको कैसा लगेगा? इससे प्रभावित न होना अमानवीय होगा। फिर भी यदि आप अपने बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करना चाहते हैं तो कुछ हद तक संतुलन और स्वीकार्यता का होना आवश्यक है। किसी न किसी तरह से आपको अपनी दुःख की भावना से ऊपर उठना होगा ताकि आप अपने बच्चे की सहायता कर पाएँ।

अब एक और परिस्थिति की कल्पना करें जहाँ आप ऐसे कष्ट भोग रहे हैं जिन्हें आप जानते हैं कि वे आपके विकास के लिए या प्रेम के लिए ही हैं - क्या आप उन्हें कष्ट मानेंगे? बिलकुल नहीं। जैसे कि लैला के साथ मजनू। कठिन समय में भी आपको दर्द का एहसास नहीं होगा। आपको पता भी नहीं लगेगा कि आपके नीचे आग जला दी गई है। आप पूर्ण स्वीकार्यता में बस चलते चले जाएँगे।
इस बात पर ध्यान दें कि जब आपको स्वयं को बार-बार याद दिलाना पड़े, “कष्ट को उपहार स्वरूप समझो, ईश्वर से मिले उपहार के रूप में इसका आनंद लो,” तब यह फिर उपहार नहीं रह जाता। एक बार आप दर्द को जान लेते हैं और उसे किसी न किसी तरह से उपहार में बदलने का प्रयास करते हैं तो एक साधारण मानव मन के लिए यह एक चुनौती बन जाती है। और हम सब साधारण लोग ही हैं।
सामान्यतः हम आनंददायक चीज़ों को पाने का प्रयास करते हैं और दर्दभरी चीज़ों से दूर भागने का प्रयास करते हैं। जब इंद्रियों से प्राप्त जानकारी को हमारी बुद्धि संसाधित करती है, यह उनको दो वर्गों में वर्गीकृत करती है - पसंद और नापसंद। योग में इन्हें राग (आकर्षण, आसक्ति) और द्वेष (विकर्षण) कहा गया है। जब हमें वह नहीं मिलता जो हमें चाहिए तब हम परेशान हो जाते हैं। और जब हमें वह मिलता है जिसे हम नहीं चाहते, तब भी हम परेशान हो जाते हैं। इस प्रकार यह लगातार होने वाली खींचातानी ही उन सभी दु:खों का मूल कारण है जिनका हम अनुभव करते हैं।
सच तो यह है कि प्रकृति हमें वही देती है जो हमारी प्रगति व विकास के लिए आवश्यक है। जब हम उन पर पसंद-नापसंद, अच्छा-बुरा का ठप्पा लगा देते हैं तब वे आकर्षण और विकर्षण बन जाते हैं। हमारा मस्तिष्क अक्सर स्वतः ही विरोध करने लगता है और जब हम विरोध करते हैं तब क्या होता है? हम अपने प्राकृतिक विकास का विरोध करते हैं और दु:खी हो जाते हैं। जब हम कष्टों के पीछे की इस सच्चाई को समझ लेते हैं कि ये हमें उन जटिलताओं को हटाने के लिए ही मिले हैं जो सत्य के मार्ग में बाधाएँ हैं, तब वे ईश्वर से मिले उपहार बन जाते हैं। फिर हम अनुभव से गुज़रते हैं, जो महसूस करना चाहिए, महसूस करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
यह कर्म में कौशल है। यह एक ऐसा कौशल है जो प्रतिदिन ध्यान-अभ्यास करने से विकसित होता है। इससे हम किसी भी परिस्थिति में निष्पक्षता व स्थिरता की अवस्था में बने रहते हैं जिससे हम उस परिस्थिति को पूर्णतः स्वीकार कर पाते हैं। जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है तब कुछ भी हो जाए, हम हर परिस्थिति का सामना करने में अधिक सक्षम होंगे। हम कष्टों के पीछे की सच्चाई को भी देख पाएँगे और दुःखों को सहजता से स्वीकार भी कर पाएँगे।
यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें हम ईश्वर के प्रेम में इतना डूब जाते हैं कि हमें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमारे दैनिक जीवन में क्या हो रहा है। न किसी विश्लेषण की आवश्यकता है, न यह सोचने की आवश्यकता है कि यह ऊपर से मिलने वाला आशीर्वाद है या दिव्य उपहार है क्योंकि जब प्रेम होता है तब अंतरावलोकन की आवश्यकता ही कहाँ होती है? दूसरी ओर, इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम परिस्थिति को बदलने के लिए कुछ भी न करें। जहाँ भी ध्यान देने की आवश्यकता हो, हम जल्दी से तटस्थ रहकर कार्यवाही कर सकते हैं।
लेकिन हम में से अधिकांश अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचे हैं। जब हम प्रभावित हुए बिना परिस्थितियों से नहीं गुज़र पाते हैं तब प्रतिकूल परिस्थिति में हम क्या कर सकते हैं? हम पहले ही प्रभावित हो चुके हैं तो हमारे सामने केवल दो ही संभावनाएँ होती हैं - या तो स्वीकार करें या विरोध करें। मान लीजिए कि हम विरोध करते हैं, तो क्या कष्ट चला जाएगा? नहीं। केवल इसकी जाने की इच्छा करने मात्र से यह नहीं जाने वाला। इसके बजाय जैसे ही हम स्वीकार कर लेते हैं, अंदर से कुछ नया उभरकर आता है।
पहली बात जो उभर कर आती है, वह यह कि हम इस पर काबू पाने की तैयारी करना शुरू कर देते हैं। इस प्रक्रिया में हम अधिक सुदृढ़ बन जाते हैं। दूसरी बात यह है कि हम सतत सुधार के मार्ग पर अग्रसर होते हैं - “मैं कष्ट भोग रही हूँ क्योंकि .....” और “इसके बजाय मुझे वह करना चाहिए था।” हम अधिक समझदार व बेहतर बन जाते हैं और परिस्थिति से बाहर आना सीख जाते हैं। जैसे ही हम परिस्थितियों को स्वीकार कर लेते हैं, यह संभव हो जाता है। यदि हम परिस्थितियों को स्वीकार नहीं करते, तब भी हम कष्ट तो भोगेंगे ही लेकिन कुछ नहीं सीख पाएँगे, समझदार नहीं बन पाएँगे और कुछ नहीं बदलेगा।
बाबूजी कुछ इस तरह से उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो कष्टों को स्वीकार करना सीख गया है – “पर्याप्त अभ्यास के बाद यह उसका स्वभाव बन जाता है और इसकी चेतना भी समाप्त हो जाती है। चमक-दमक भी चली जाती है। जब इसकी प्राप्ति हो जाती है तब सत्य के क्षेत्र में तैरने के सिवा और कुछ नहीं रह जाता। आगे बढ़ने पर तैरने का भाव भी विलुप्त हो जाता है। सहिष्णुता की आदत से उत्पन्न शक्ति उसके प्रयास में उसकी सहायता करती है और वह ऊपर वर्णित क्षेत्र में प्रवेश पा जाता है।”
हार्टफुलनेस के अभ्यासी अक्सर इस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। स्वीकार्यता से ऐसा मुक्तिदायक मनोभाव आ जाता है जो सत्य की ओर हमारी यात्रा को जारी रखने में सहायता करता है। वहाँ हमें मन की शांति का अनुभव होता है। हमें एहसास हो जाता है कि वे सभी परिस्थितियाँ जो दुःखदायक प्रतीत होती हैं, वास्तव में अमूल्य उपहार हैं। इस आनंद की भावना के कारण स्वाभाविक रूप से हमारे अंदर कृतज्ञता का भाव आ जाता है।
सच्चाई के सिद्धांत को लागू करना
अब चलिए, यह जानने का प्रयास करते हैं कि जो कुछ भी हम करते हैं उसमें इस सिद्धांत को कैसे लागू करें। शायद हम अब तक परम सत्य की अवस्था तक न पहुँचे हों लेकिन क्या हम कम से कम सच्चे तो हैं?
गहराई से देखा जाए तो सच्चाई उसके प्रति प्रतिबद्धता है जो सत्य है एवं अपरिवर्तनीय है। दैनिक जीवन में इसका मतलब ईमानदारी और विचारों, वचनों व कर्मों के बीच तालमेल होता है। उस अवस्था का वर्णन करने के अन्य तरीके हैं - प्रामाणिकता, सत्यनिष्ठा एवं वास्तविकता।
एक क्षण के लिए सच के विलोम यानी झूठ के बारे में सोचें। जब कोई चीज़ ‘जैसी वह है, उसी रूप में’ प्रस्तुत नहीं होती है, हम उसे झूठ कहते हैं। यदि हम अपने जीवन को परखें तो हम देखेंगे कि झूठ हमारे आस-पास हर जगह और हमारे अंदर भी मौजूद है। जब भी हम वह बनने का दिखावा करते हैं जो हम नहीं हैं, यह झूठ की श्रेणी में आता है। जैसे कि हमने पहले चर्चा की थी, हम जानते हैं कि आमतौर पर ऐसा जान बूझकर नहीं होता है। हम यह भी जानते हैं कि हमारे विभिन्न व्यक्तित्वों में से अधिकांश अवचेतन में होते हैं और हम उनके बारे में नहीं जानते हैं। इसी कारण से, आत्म-अध्ययन करने का अभ्यास, जिसे स्वाध्याय कहते हैं, योग में इतना महत्वपूर्ण है। इससे हम अपने संस्कारों के प्रति सचेत हो जाते हैं और स्वयं में बदलाव लाते हैं। सच के जागृत होने के लिए इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है हार्टफुलनेस सफ़ाई। यह बाबूजी द्वारा विकसित एक ऐसा अभ्यास है जिसमें हमारे अवचेतन स्वरूपों एवं प्रवृत्तियों के मूल कारण अर्थात् संस्कारों को हटाया जाता है।
जब हम अपने अहम्, अपने अस्तित्व के भाव का, सत्य के अतिरिक्त किसी अन्य चीज़ से तादात्म्य स्थापित करते हैं तब क्या होता है? तब अहम् हमारी झूठी पहचान बन जाता है। पहचान तब मौलिक नहीं रहती बल्कि वह मौलिक पहचान का स्व-संशोधित स्वरूप बन जाती है। यह स्वरूप हमारे बचपन के अनुभवों द्वारा नियोजित एवं प्रभावित होता है। साथ ही यह हमारे वातावरण के साथ हमारी अंतःक्रियाओं से निर्धारित होता है। यह सामना करने की एक प्रक्रिया है जिसमें दिन-प्रतिदिन का जीवन जीने के लिए हम विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व व पहचान अपनाते हैं अर्थात् विभिन्न मुखौटे पहनते हैं। यह हमारे तंत्रिका तंत्र में दृढ़ता से स्थापित हो जाता है। फिर हम यह सोचते हैं कि हम यही हैं। अवचेतन स्तर पर हम मानते हैं कि यह अहम् ही है जो हम हैं क्योंकि यह हमारी पहचान को परिभाषित करता है और यही हमारे अतीत के मानवीय अनुभवों की विभिन्न परतों द्वारा प्रभावित रहा है।
जब हम बाहर की तरफ़ देखते हैं तो सच्चाई इन मुखौटों से प्रभावित होती है। आमतौर पर, इसे अपने में देखने से ज़्यादा आसान दूसरों में देखना होता है। फिर, इस स्थिति को और खराब करने के लिए, ऐसी कंपनियाँ हैं जो हमें प्रभावित करने का प्रयास करती हैं ताकि हम उनका उत्पाद खरीदें। ऐसे कई राजनेता हैं जो हमारा प्रतिनिधित्व करने का दिखावा करते हैं। मीडिया लगातार हमें झूठे समाचार देती रहती है और सोशल मीडिया हमें कई दिशाओं में खींचता है।

इन सब के बीच हम सच्चाई से कैसे जीएँ?
अपने हृदय में अनुभव होने वाले सर्वोच्च सत्य के साथ अपने विचारों, वचनों एवं कर्मों का तालमेल बैठाकर हम सच्चाई से जी सकते हैं। हृदय का विवेक हमें झूठ से सच को अलग करने में सहायता करता है, विशेषकर जब हम ध्यान करते हैं और उस विवेक को विकसित करते हैं।
यह केवल तभी हो सकता है जब हम अपनी चेतना के क्षेत्र से जटिलताओं एवं अशुद्धियों को हटाकर स्वयं को सभी धारणाओं से मुक्त कर लें।
मैंने तूफ़ानों और बवंडरों से कुछ सीखा है। बवंडर में सबसे सुरक्षित स्थान उसका केंद्र अर्थात् उसका मध्य-बिंदु होता है। उसकी परिधि पर तबाही होती है लेकिन उसके केंद्र में अत्यधिक स्थिरता होती है। हमारे जीवन में भी सभी समस्याएँ शारीरिक स्तर, मानसिक स्तर, अहम् के स्तर और सूक्ष्म शरीर के स्तर पर ही होती हैं। जब हम अपने हृदय की अंतरतम गहराई में अपने केंद्र की ओर जाते हैं तब क्या होता है? हम सभी ऐसा करना सीख सकते हैं। थोड़े अभ्यास से यह संभव है; थोड़ी सी रुचि हमें वहाँ तक ले जाती है।
यहीं पर हार्टफुलनेस के अभ्यास हमारी सहायता करते हैं। जैसे-जैसे इस यात्रा में हम अंदर की ओर आगे बढ़ते हैं, हर चरण पर हम चेतना के विकास के क्रमिक स्तरों का अनुभव करते हैं और उनके साथ एक होते जाते हैं। इससे लगातार हमारी जागरूकता एवं विवेक का स्तर बढ़ता जाता है जिससे हर चरण पर हमें उच्चतर दृष्टिकोण से सत्य का बोध होता है। दूसरे शब्दों में, जैसे-जैसे हम उच्चतर से उच्चतर चरणों तक विकसित होते जाते हैं, हमारे विचार, वचन और कर्म हमारे केंद्र के साथ असलियत में अधिक से अधिक तालमेल में रहने लगते हैं। यह प्रक्रिया हृदय द्वारा संपन्न होती है।
जब हम सच्चे होते हैं तब हम हल्के, वास्तविक एवं ईमानदार होते हैं। हमारा आत्म-विश्वास बढ़ जाता है। नैतिक रूप से हम अधिक सुदृढ़ हो जाते हैं।
जब हम सच्चाई की दृष्टि से सत्य को समझते हैं तब हमें एहसास होता है कि आनंद व पीड़ा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है। हम एक को चुनकर दूसरे से बच नहीं सकते। जब हम इसे पूरी तरह समझकर स्वीकार कर लेते हैं, हम हर वस्तु को ब्रह्मांड से मिलने वाले उपहार के रूप में स्वीकार करते हैं।
सरलता (नियम 4) और सच्चाई (नियम 5) के दोनों नियम एक रस्सी के दो तंतुओं की तरह आपस में गुथे हुए हैं और दोनों का एकसाथ पालन करने से हम अस्तित्व की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ सरलता हमें अपने वैयक्तिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में सक्षम बनाती है, वहीं सच्चाई हमें अपने मायाजाल से हटकर सत्य को उस तरह समझने में सक्षम बनाती है जैसा यह है। दोनों ही हमें शुद्धता की उस परम अवस्था तक ले जाते हैं जिस पर हम अंतिम गंतव्य पर पहुँचने से पहले पहुँचते हैं।
कुछ महीने पहले जब मैं बाबूजी को याद कर रहा था तब उनका वर्णन करने के लिए ये शब्द मेरे मन में उभर आए - “हर अर्थ में सरल, हर अर्थ में शुद्ध, हर भाव में निस्स्वार्थ, हर कर्म में परवाह करने वाले, हमेशा मुस्कुराने वाले और आनंदपूर्ण, फिर भी मेरे प्रियतम, मेरे सर्वस्व, मेरे सब कुछ हमेशा कष्ट भोगते रहे।” आशीर्वादों व कष्टों का कितना अद्भुत विरोधाभास है!
जब हम हृदय में रहते हैं, हम दिन-प्रतिदिन के जीवन के साथ भी सत्य से हमेशा जुड़े रहते हैं और इसके परिणामस्वरूप अस्तित्व की संपन्न एवं पूर्ण अवस्था प्राप्त होती है। इसके बारे में हम अगले तीन नियमों में जानने का प्रयास करेंगे। ये नियम भी मानवीय व्यवहार से संबंधित हैं।
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