एलिज़ाबेथ डेनली मानवीय जीवन के आधार के रूप में प्रेम के बारे में अपने विचार व्यक्त करती हैं और बताती हैं कि यह कैसे हमारे दैनिक रिश्तों में अभिव्यक्त होता है।

 

अंग्रेज़ी भाषा प्रेम के बारे में कहावतों से भरी पड़ी है जिनका हिंदी में अनुवाद इस प्रकार है - प्रेम से दुनिया चलती है, प्रेम सभी बाधाओं को पार कर लेता है, प्रेम से ही प्रेम मिलता है, प्रेम की कोई सीमा नहीं होती, प्रेम अंधा होता है और प्रेम धैर्यशील व दयालु होता है आदि। कई लोगों ने प्रेम को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटकर समझने की कोशिश की है - जैसे सी.एस. लुईस ने ‘द फ़ोर लव्स’ में, गैरी चैपमैन ने ‘द फ़ाइव लव लैंग्वेजेज़’ में, जॉन ग्रे ने ‘मेन आर फ़्रॉम मार्स, विमेन आर फ़्रॉम वीनस’ में और एलिफ़ शफ़ाक ने ‘द फ़ोर्टी रूल्स ऑफ़ लव’ में किया। हालाँकि इन बौद्धिक अभिव्यक्तियों से कुछ समझ आता है, लेकिन यह तरीका मुझे कभी पसंद नहीं आया। मेरे लिए अनुभव हमेशा से ही सबसे प्रमुख कारक रहा है। सांसारिक जीवन में हमारे ज़्यादातर सुख-दुख के पीछे प्रेम ही होता है। प्रेम अपनापन और सामुदायिक भावना जगाता है। हालाँकि हमारे जीवन में प्रेम का अत्यधिक महत्व एक सर्वमान्य सत्य है, लेकिन फिर भी हम प्रेम को कैसे अनुभव करते हैं, यह सबके लिए अलग-अलग हो सकता है। कोई भी दो लोग इसे एक ही तरह से महसूस नहीं करते और हममें से कोई भी अपनी ज़िंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर इसे एक ही तरह से महसूस नहीं करता।

अपनी किशोरावस्था के अंतिम वर्षों तक मेरा मानना था कि प्रेम करना ही हमारे जन्म लेने का मुख्य कारण है और हम इसके अनेक रूपों से जुड़कर ही बड़े होते हैं। हेनरी हैंडल रिचर्डसन के शब्दों में, यह “ज्ञान प्राप्त करना” था। बाद के वर्षों में, ध्यान के अनुभवों की वजह से मेरा यह विश्वास और बढ़ा, जो मुझे प्रेम के हर सांसारिक अनुभव से परे ले गया।

और फिर एक दिन, मैंने बाबूजी द्वारा लिखा हुआ कुछ पढ़ा जो मेरे दिल को छू गया। उनके अनुसार प्रेम न तो भावना है और न ही एहसास, बल्कि स्वयं अस्तित्व की मूलभूत शक्ति है जो गुरुत्वाकर्षण से भी ज़्यादा ज़रूरी है -

भगवान ने असंख्य लोक बनाए हैं और उन्हें एक-दूसरे से उस शक्ति द्वारा जोड़ रखा है जिसे पश्चिमी सभ्यता के लोग गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। वह संबंध या जुड़ाव, जो सबमें समान है, स्वयं किसी और आधार पर टिका हुआ है। अर्थात् सभी का आपसी जुड़ाव उस परम तत्व से है, जो सभी के अस्तित्व का कारण है और जो स्वयं भी अपने भौतिक कारण से जुड़ा हुआ है। यही इस विराट ब्रह्मांड की मूल अवस्था है जिसमें सभी वस्तुएँ प्रकट होती हैं, अपने मूल से अपना संबंध बनाए रखती हैं और एक-दूसरे के साथ भी जुड़ी रहती हैं।

सभी तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी) का मूल एक ही है और मनुष्य का मूल भी वही है। लेकिन ईश्वर ने उसे ऐसे मिश्रण में बनाया है कि ये सभी तत्व उसमें मौजूद हैं। अर्थात् जिन तत्वों से ये लोक बने हैं, उन्हीं से मनुष्य की रचना हुई है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य में ये सभी तत्व विद्यमान हैं और उसे ऐसी शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपनी दृष्टि से किसी भी लोक को खंडित कर सकता है और जिसे चाहे उसे यह शक्ति संप्रेषित कर सकता है। यह उसकी शक्तियों के बारे में है।

अब ध्यान से सुनो - मनुष्य के हर कण में एक लोक विद्यमान है, जो मनुष्य के निचले चक्रों से जुड़ा हुआ है और विशेष रूप से उन्हीं के लिए नियत है। यह कण उन्हें शक्ति प्रदान करता है। जब यह शक्ति का स्रोत सक्रिय होता है तब वही उस लोक को शक्ति देता है, जिसका मिश्रण मनुष्य में भी मौजूद है।

चक्रों का संबंध कई छोटे-छोटे लोकों से है और ये लोक हमारी आगे की यात्रा में बाधा बन जाते हैं। जब कोई मनुष्य इन बाधाओं को पार कर आगे पहुँच जाता है तो इसका मतलब है कि उसने उन स्थानों को यानी उन लोकों को पार कर लिया है जो दो चक्रों के बीच होते हैं। अब, प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य इन बीच के लोकों को कब पार कर सकता है? यह तभी संभव है जब वह अनुभव से गुज़रकर उस लोक का भोग पूरा कर ले। इसी तरह, उससे आगे के क्षेत्र भी मनुष्य तभी पार कर पाता है जब उन क्षेत्रों से संबंधित उसका भोग पूरा हो जाता है। इसमें युग लग जाते हैं।

 

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जब मनुष्य को किसी विशेष शक्ति से मदद मिलती है तब इन जगहों पर दरारें पड़ जाती हैं और आकर्षण की शक्ति को (जिससे सब कुछ बंधा हुआ है और जिसका सत्व मनुष्य में है) दूसरी दिशा में मोड़ दिया जाता है। यह विशेष शक्ति सिर्फ़ उसी इंसान में होती है जिसने उच्चतम अवस्था प्राप्त कर ली है। इस आकर्षण [गुरुत्वाकर्षण] की शक्ति में भौतिकता होती है, यानी यह भौतिक जगत से जुड़ी है और वस्तुओं को एक-दूसरे से बाँधती है। लेकिन जिस आकर्षण की शक्ति से ये चीज़ें भंग होती हैं, उसमें कोई भौतिकता नहीं होती। वह मनुष्य बहुत सफल होता है जो भौतिकता से मुक्त है।

अब सवाल यह है कि उस आकर्षण या लगाव की शक्ति से कैसे मदद ली जाए जो भौतिकता से मुक्त है। इसका जवाब है कि उस व्यक्ति के साथ संबंध विकसित किया जाए जिसके पास ऐसी शक्ति है। उस संबंध को लगाव भी कहते हैं। प्रेम इसका अच्छा अनुवाद है।”

बाबूजी के शब्दों ने इस बात की पुष्टि की कि प्रेम की स्वाभाविक प्रकृति ही अस्तित्व का सार है और इसने मनुष्य के हृदय में उस समय की सुप्त आत्मिक स्मृतियों को जागृत किया जब आत्मा संस्कारों के बोझ से मुक्त थी। उन्होंने प्रेम को उस शक्ति के बराबर बताया जो संपूर्ण अस्तित्व को एक साथ जोड़े रखती है और इस सार्वभौमिक दृष्टिकोण ने उस बात की पुष्टि की जिसे मैंने हमेशा महसूस किया - हम सभी इस सांसारिक अस्तित्व से परे प्रेम का अनुभव करते हैं और हमेशा करते रहे हैं। फिर भी, सांसारिक जीवन हमारे विस्तार का क्षेत्र है; आत्मा का मनुष्य के रूप में जन्म, प्रेम को व्यक्त करने का एक तरीका है।

प्रेम सुख और दुख, अर्थात् अस्तित्व के द्वंद्वों को शामिल करके हमारा विकास तेज़ करता है। इस विकास-यात्रा में सब कुछ सुंदर नहीं होता। हमारे सबसे गहरे मर्मभेदी दुख का कारण हमारा सबसे गहन प्रेम ही होता है और उसी से धीरे-धीरे स्वीकार्यता विकसित होती है। यही शुरुआत है। अपनी आंतरिक स्थिति के प्रति संवेदनशील होना यानी उसे स्वीकार करना इस बात का संकेत है कि सब ठीक है। अपनी भावनाओं को दबाना और दर्द को अनदेखा करना समाधान नहीं है। बल्कि, जीवन में जो कुछ भी होता है उसे किसी निराशावादी तरीके से नहीं, बल्कि जैसा है वैसा ही स्वीकार करना आगे बढ़ने का रास्ता दिखाता है।

 

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बाबूजी के शब्दों ने इस बात की पुष्टि की कि प्रेम की स्वाभाविक प्रकृति ही अस्तित्व का सार है और इसने मनुष्य के हृदय में उस समय की सुप्त आत्मिक स्मृतियों को जागृत किया जब आत्मा संस्कारों के बोझ से मुक्त थी। उन्होंने प्रेम को उस शक्ति के बराबर बताया जो संपूर्ण अस्तित्व को एक साथ जोड़े रखती है और इस सार्वभौमिक दृष्टिकोण ने उस बात की पुष्टि की जिसे मैंने हमेशा महसूस किया - हम सभी इस सांसारिक अस्तित्व से परे प्रेम का अनुभव करते हैं और हमेशा करते रहे हैं। फिर भीसांसारिक जीवन हमारे विस्तार का क्षेत्र हैआत्मा का मनुष्य के रूप में जन्मप्रेम को व्यक्त करने का एक तरीका है।


इसका यह अर्थ नहीं है कि मैंने दर्द को कम करने की कोशिश नहीं की है। कई बार ऐसा हुआ है जब मुझे थोड़ा रुकना पड़ा और दिल के दर्द को ठीक होने के लिए समय देना पड़ा। लेकिन हर गुज़रते साल के साथ यह आसान होता गया है और दृष्टिकोण में अधिक हल्कापन और बेफ़िक्री आई है।

साथ ही, समय के चलते और नियमित ध्यान-अभ्यास करने से, प्रेम के आनंद और दर्द, दोनों की तीव्रता धीरे-धीरे कम हो गई है, जैसे पेंडुलम के दोलन का चाप धीरे-धीरे कम होता जाता है। कभी-कभी, जीवन में ऐसी अप्रत्याशित चुनौती सामने आ जाती है जो दिल को झकझोर देती है, लेकिन इसके बाद हमेशा आगे विस्तार होता है। इस समझ ने चुनौती झेलने का साहस दिया है और इस प्रक्रिया में विश्वास जगाया है।

दाजी ने एक बार जो कहा था, उसने इस आंतरिक खोज को एक अलग दिशा दी - “यह कहना कि करुणा सक्रिय रूप में व्यक्त की गई समानुभूति है, ऐसा कहने जैसा है कि उदारता और स्वीकार्यता, सक्रिय रूप में व्यक्त किया गया प्रेम है।” प्रेम कभी तो संसार में बाहरी क्रिया के रूप में व्यक्त होता है और कभी यह आंतरिक एहसास होता है - भीतर एक असीम आनंद की अनुभूति या एक बहुत ही सूक्ष्म उपस्थिति के रूप में होता है, जिसे महसूस करने के लिए किसी बाहरी क्रिया की आवश्यकता नहीं होती। जर्मनी की एक प्यारी दोस्त से एक संकेत मिला। उसने 1970 के दशक में एक बार बाबूजी को पत्र लिखा था जिसमें उनसे पूछा था कि जब उसने किसी व्यक्ति को दुख पहुँचाया हो तो उसे क्या करना चाहिए और उनका जवाब था, “अपने हृदय में देखो।” किसी बाहरी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ सबसे सूक्ष्म तरह की आंतरिक कार्रवाई की ज़रूरत है।

क्या इसका अर्थ यह है कि दया के लिए धन्यवाद कहने की ज़रूरत नहीं है या जब हम अनजाने में भी किसी अपने को दुख पहुँचाते हैं तो माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं है? मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि दूसरों के प्रति संवेदनशील होना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना अक्सर मददगार होता है। इससे लोग आप पर भरोसा करते हैं और आपका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। लेकिन यहाँ एक प्रश्न उठता है - क्या यह दिल से है और सच्चा है या यह सिर्फ़ शिष्टाचार के लिए या सामाजिक परंपरा के कारण है? और क्या इसे ज़ाहिर करना आवश्यक है? हृदय हमेशा जानता है कि प्रेम में क्या आवश्यक है।

क्या हम रिश्तों में दूसरों से संवेदनशीलता की उम्मीद करते हैं? मैंने जाना है कि यह कुछ हद तक सांस्कृतिक है - कुछ संस्कृतियों में भावनाओं को ज़्यादा बाहरी रूप से व्यक्त किया जाता है, लेकिन क्या बाहरी अभिव्यक्ति का मतलब है कि वे ज़्यादा प्रेम करने वाली हैं? प्रेम की भाषा अनेक रंगों से सजी है।

अपनी पुस्तक, ‘सत्य का उदय’, में बाबूजी ने सोचने से महसूस करने, फिर बनने से अस्तित्व में होने और आगे अनस्तित्व की अवस्था की ओर बढ़ने का वर्णन किया है। मैं सोचने लगी - यदि हम उस क्रम को प्रेम पर लागू करें तो क्या होगा? कभी-कभी हम सोचने के स्तर पर होते हैं। हम प्रेम को समझना चाहते हैं और हम प्रेम करते हैं। हम पुस्तकें पढ़ते हैं, कविताएँ पढ़ते हैं, संगीत सुनते हैं या फ़िल्में देखते हैं और अंदर कुछ जागता है। आध्यात्मिक संदर्भ में, हम सतत स्मरण, ज़िक्र 1 या मेत्ता 2 (मैत्री) का अभ्यास कर सकते हैं। हम प्रेम के बारे में सीख रहे हैं। यह एक सीढ़ी है। लेकिन क्या यह काफ़ी है?


अपने अनुभव से मैं कहूँगी कि हृदय की शुद्धि और उससे मिलने वाली विस्तृत चेतना के साथ स्वीकार्यता और उदारता आती है।


वास्तव में, मुझे लगता है कि इन सबसे पहले, गर्भधारण के समय और बच्चे के रूप में हमारे पहले कुछ महीनों में, हम प्रेम का उसी रूप में अनुभव करते हैं जैसा बाबूजी ने वर्णन किया है - उसके मूल, अस्तित्वहीन के परम सत्व के रूप में। फिर जीवन के अनुभव हमें दुनिया में खींच लेते हैं तथा होने, बनने, महसूस करने और अंततः सोचने के चक्र में ले जाते हैं जिसमें मानसिक अभ्यास की ज़रूरत पड़ती है। विकास सीधी रेखा की तरह नहीं होता। समय-समय पर, हम खुद को इस क्रम में अलग-अलग स्तरों पर पाते हैं। हम वापस महसूस करने या सोचने के स्तर पर आ सकते हैं या प्रेम से निपटने के प्रतिक्रियात्मक स्तर पर भी आ सकते हैं।

बचपन में जब हम प्रेम को जीवन के गुणों और मानवीय व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तब ऐसा लगता है कि हम इसे बहुत गलत रूप में समझ लेते हैं। प्रेम का लेन-देन और अपेक्षाओं, पसंद और नापसंद, सुख और दुख से कोई लेना-देना नहीं है। यह शर्तों से परे है - इसका स्वरूप निस्स्वार्थ और आवश्यक है। लेकिन यही यात्रा भी है, जिसे बाबूजी ने कभी “दिव्य लीला” कहा था। हम चक्र पूरा करते हैं और एक बार फिर शुद्ध अस्तित्व के सत्व की ओर बढ़ते हैं।

अपने अनुभव से मैं कहूँगी कि हृदय की शुद्धि और उससे मिलने वाली विस्तृत चेतना के साथ स्वीकार्यता और उदारता आती है। दाजी का एक पसंदीदा वाक्यांश, “पवित्रता से प्रारब्ध,” यहाँ बिलकुल सही बैठता है। पवित्रता के साथ विचारों, भावनाओं, कर्मों, दूसरों के साथ रिश्तों और आंतरिक अवस्थाओं में प्रेम की खुशबू घुल जाती है। प्रेम पूरे अस्तित्व में व्याप्त हो जाता है और अंततः इतना सर्वव्यापी हो जाता है कि वह शून्यता में विलीन हो जाता है। और हर पड़ाव पर प्रेम के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है। यह मनुष्य जीवन कितना सुंदर वरदान है!


पवित्रता के साथ विचारोंभावनाओंकर्मोंदूसरों के साथ रिश्तों और आंतरिक अवस्थाओं में प्रेम की खुशबू घुल जाती है। प्रेम पूरे अस्तित्व में व्याप्त हो जाता है और अंततः इतना सर्वव्यापी हो जाता है कि वह शून्यता में विलीन हो जाता है। और हर पड़ाव पर प्रेम के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है। यह मनुष्य जीवन कितना सुंदर वरदान है!


संदर्भ -

¹ ज़िक्र (धिक्र) - एक सूफ़ी भक्ति संबंधी अभ्यास है जिसमें ईश्वर के नामों, उससे संबंधित वाक्यांशों या प्रार्थनाओं का जाप करके ईश्वर का स्मरण किया जाता है।

² मेत्ता - एक पाली शब्द जिसका अर्थ है प्रेममय दयालुता या उदारता।


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