इस लेख में ममता सुब्रमण्यम वैश्विक दुख के इस समय में लोगों के उपचारउनके मज़बूत बने रहने और उनकी देखभाल करने में खुशी की भूमिका पर प्रकाश डालती हैं।

 

मेरे सबसे पसंदीदा लेखक और गीतकारों ने अक्सर एक ही भावना को अलग-अलग शब्दों में व्यक्त किया है - उनके सबसे बेहतरीन काम अत्यधिक दुख के क्षणों की उत्पत्ति थे। उनके दिल टूटने की पीड़ा, क्रोध या उदासी भरे पलों ने ही उन्हें कुछ महानतम गीतों के बोल या उपन्यास के गहनतम दृश्यों को लिखने की प्रेरणा दी। यही वे पल हैं जिन्हें इतिहास या इंटरनेट बार-बार याद करता है, उनका विश्लेषण करता है या फिर लोग इंस्टाग्राम पर उदासी भरे बहु-चित्रों पर कोई शीर्षक डालकर पोस्ट कर देते हैं (अब मान भी लीजिए कि आपने अपने जीवन में कम से कम एक बार तो ऐसा किया ही होगा)।

यद्यपि खुशी भी बहुत सारे खूबसूरत गीतों और उपन्यासों का विषय रही है, फिर भी हम दर्द की संवेदनशीलता के साथ बेहतर जुड़ पाते हैं।

मैं ऐसा कोई दावा नहीं करती हूँ कि जो भी मैं लिखती हूँ, वह बहुत गहरी या यादगार बात होती है। लेकिन कठिन अनुभवों से प्रेरित होकर लिखने का भाव मेरे दिल को छूता है।

 

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पीछे मुड़कर देखूँ तो मैंने अब तक जो भी लिखा है, दुख से ही प्रेरित हुआ है। बचपन में अपनी कॉपी में जो भी कहानियाँ मैंने लिखीं, सभी नाटकीय थीं जिनमें कथा नायक कहानी शुरू होने से पहले ही किसी गहन व्यक्तिगत परेशानी में फँसा होता था। कॉलेज के दिनों के मेरे लगभग सभी लेख असुरक्षा की स्थिति में लिखे जाते थे। अपने सबसे मुश्किल समय में मैंने आईफ़ोन पर सैकड़ों ऐसे नोट लिखे जिनमें क्रोध और कड़वाहट से भरी कविताएँ और छोटे निबंध थे। ये मेरे गहरे अवसाद, गलत समझे जाने की निराशा और अवसाद से उबर न पाने के कारण खुद पर मेरी खीझ को दर्शाते थे। मेरा दर्द बहुत ज़्यादा था, फिर भी ये लेख मेरी सबसे पसंदीदा कृतियाँ हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मेरा अधिकतर समय अपना उपचार करने में गुज़रा जिसमें मेरी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को हल करने की कोशिश की गई ताकि तकलीफ़ उतनी ज़्यादा महसूस न हो जितनी पहले होती थी। मैं अब उस लड़की से बहुत अलग हूँ जो अपनी नाकारात्मक भावनाओं को इतनी गहराई से महसूस करती थी। लेकिन मैं अब भी उसके बहुत करीब हूँ यानी मैं अभी भी उन पीड़ादायक भावनाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हुई हूँ पर अब मैं आलोचना के बजाय खुद को कोमलता व चिंतनशील दृष्टि से देखती हूँ।

और इन्हीं अवलोकन के पलों में मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा उठता है - मैं खुशी क्यों नहीं महसूस कर पाई?

हमारे समाज में दुख और दर्द तो बड़ी ही सहजता से खैरात में मिलता है, मगर इसी समाज में खुशी और आनंद के लिए ऐसा स्तर बन गया है जिसे अर्जित करना पड़ता है।

मुझे नंबर तो अच्छे मिले हैं लेकिन जब तक मैं अपने क्लास में अव्वल न आऊँ मुझे चैन नहीं मिलेगा।”

मेरी पदोन्नति हुई है और मेरी पगार भी बढ़ गई है लेकिन यह काफ़ी नहीं है। मुझे और कमाना है।”

मैं रोज़ व्यायाम करता हूँ लेकिन फिर भी उतना अच्छा नहीं दिखता।”

मैंने इस व्यक्ति को खुश कर दिया है तो अब मैं भी खुश हो सकता हूँ।”

खुश होने की मेरी क्षमता ढकी हुई है। उसे अब मैं समझती हूँ और वह है मेरा अपराधबोध - पर्याप्त योग्य न होने, पर्याप्त न करने और ‘पर्याप्त’ का मतलब न समझ पाने का अपराधबोध। अब सवाल यह उठता है कि मैं कैसे मान सकती हूँ कि खुशी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु नहीं है बल्कि खुशी अपने अनुसार जीवित रहने की स्वतंत्रता की अनुभूति है?

अपने मानसिक उपचार के पिछले कुछ वर्षों में मैं अक्सर उस समय के बारे में सोचती हूँ जब मेरी खुशी उन्मुक्त थी - मेरा बचपन। मैं अपने पाँच, छह और सात वर्ष की आयु के समय को याद करती हूँ जब मैं घर के पास की खाली ज़मीन में, सिंहपर्णी खरपतवार के बीच बैठकर नरम-गरम धूप में ताज़ी व खुली हवा में साँस लेती थी। मैं उस समय को याद करती हूँ जब मैं देर रात तक, बिस्तर पर बिछाई चादर का टेंट बनाकर, उसके भीतर छुपकर, टॉर्च की रोशनी में अपनी पसंदीदा किताब पढ़ा करती थी - यह सोचते हुए कि बस एक और पन्ना, बस एक और अध्याय पढ़ लेती हूँ। मैं याद करती हूँ वह दिन जब मैंने पीले रंग के चूड़ीदार पहने, एक टैलेंट शो (कला प्रदर्शन प्रतियोगिता) में, मंच पर निर्भीक खड़ी होकर शानिया ट्वैन का गाना गाया था। मुझे आज भी वह हँसी सुनाई देती है जब मैं अपने बचपन के सबसे प्यारे दोस्तों के साथ ठहाके लगाती थी जिसमें किसी भी तरह के शिष्टाचार को निभाने की ज़रूरत नहीं थी।


अब सवाल यह उठता है कि मैं कैसे मान सकती हूँ कि खुशी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु नहीं है बल्कि खुशी अपने अनुसार जीवित रहने की स्वतंत्रता की अनुभूति है?


सोचती हूँ कि उन दिनों ज़िंदगी कितनी सरल, कितनी सहज थी और आज मेरी ज़िंदगी कितनी ज़्यादा जटिल बन गई है। आज मैं अपनी मानसिक अवस्था की गाठों को खोलकर अपने जीवन को बचपन के उन रंग-बिरंगे धागों से फिर सीने की कोशिश कर रही हूँ जिन्हें मैं नज़रंदाज़ करती रही हूँ। अब मैं वह सब कर रही हूँ जो मैं बचपन में किया करती थी - बाहर निकलना, खुली व ताज़ी हवा में साँस लेना, सुबह उठते ही हड़बड़ी में अपना आईफ़ोन उठाने या काम शुरू करने की जल्दबाज़ी करने के बजाय आराम से सुबह का मज़ा लेते हुए दिन की शुरुआत करना और बिना किसी भय के ज़ोर-ज़ोर से गाने गाना।

आजकल मैं इस बारे में लिखना चाहती हूँ कि किस तरह मैं धीरे-धीरे खुशी की पुनः खोज कर रही हूँ। लेकिन जब मैं अपने लैपटॉप में एक नया वर्ड डॉक्यूमेंट खोलती हूँ तब एक नए तरह का अपराधबोध महसूस करने लगती हूँ जिसका कारण है विश्व भर के लोगों का सामूहिक दुख, अनिश्चितता और निराशा। मैं जो भी कुछ कहना चाहती हूँ, उसे टाइप करना शुरू तो कर देती हूँ लेकिन फिर यह सोचकर रुक जाती हूँ कि जब हमारे आसपास की प्रकृति चीख-चीख कर हमसे यह कह रही है, “देखो! तुम सब मिलकर मुझे कितनी तकलीफ़ दे रहे हो,” तब मैं सुबह के एक स्वास्थ्यप्रद नित्य कर्म के बारे में कैसे लिखूँ?

हर तरफ़ जंग छिड़ी हुई है। जलवायु बिगड़ती जा रही है। इंटरनेट हमें गुमराह कर रहा है। हमारे कई मित्र अपने परिवारों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में कोई भी किसी और चीज़ के बारे में क्यों सोचे? हम क्या करेंगे? ऐसे में किसी और बात पर ध्यान देना मुझे गलत लगता है। हालाँकि मैं जानती हूँ कि भले ही संसार पर कितने भी संकट आ जाएँ, जीवन फिर भी चलता रहता है, फिर भी मैं सोचती हूँ कि जब इतना कुछ जटिल हो रहा है तो कोई भी आगे कैसे बढ़ सकता है?

आज जब दुनिया भर में मेरे बहुत सारे भाई-बहन असीमित पीड़ा सह रहे हैं तो क्या सचमुच मुझे किसी भी तरह की खुशी महसूस करने का अधिकार है? इस तरह की सोच भी क्या स्वार्थी नहीं है? हाँ, शायद! मुझे नहीं लगता कि मैं स्वार्थी बनने की कोशिश कर रही हूँ, लेकिन मुझे नहीं पता, मुझे नहीं पता।

हाल ही के एक पॉडकास्ट में एक जानी-मानी हस्ती से पूछा गया, “आप इस समय कैसी हैं?” वे थोड़ी रुकीं और फिर उन्होंने कुछ इस तरह का जवाब दिया, “अपने निजी जीवन में मैं अच्छी हूँ। और दुनिया की मौजूदा स्थिति से मैं परेशान हूँ।”

उनके इस जवाब में मुझे अपना उत्तर भी मिल गया। ज़िंदगी द्वंद्वों से भरी है; और जब इन द्वंद्वों में से अधिक नकारात्मक द्वंद्व हावी होने लगता है तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम उसके विपरीत भाव से संतुलन को बनाए रखें। खुशी - खासकर अभी - बेहद ज़रूरी है। यदि मैं अपने जीवन में ही सक्रियता से खुशी पैदा करने की कोशिश नहीं करूँगी तो फिर मैं उन लोगों को खुशी ढूँढने में कैसे मदद कर सकती हूँ जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है? हम जितनी खुशी पैदा करके उसे बनाए रख पाएँगे, उतना ही हम निराशा को दूर कर पाएँगे। हम जितना ज़्यादा खुशी के साथ आगे बढ़ेंगे, उतना ही ज़्यादा उपचार कर पाएँगे। और जितनी खुशी हम बाँटेंगे, उतना ही हमें यह याद रहेगा कि खुशी कोई अर्जित करने वाली वस्तु नहीं है अपितु खुशी जीने के लिए है।

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हम जितनी खुशी पैदा करके उसे बनाए रख पाएँगेउतना ही हम निराशा को दूर कर पाएँगे। हम जितना ज़्यादा खुशी के साथ आगे बढ़ेंगेउतना ही ज़्यादा उपचार कर पाएँगे। और जितनी खुशी हम बाँटेंगेउतना ही हमें यह याद रहेगा कि खुशी कोई अर्जित करने वाली वस्तु नहीं है अपितु खुशी जीने के लिए है।


 


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ममता सुब्रमण्यम

ममता सुब्रमण्यम

ममता मानसिक स्वास्थ्य एवं ध्यान को अपनी कहानियाँ सुनाने के शौक के साथ जोड़ती हैं और वे इंस्टाग्राम को एक ऐसे मंच की तरह इस्तेमाल करती हैं जिसमें सभी जुड़ सकें। वर्ष 2016 की उनकी टेड प... और पढ़ें

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