अनीश दवे बच्चों की परवरिश पर विचार करते हुए बताते हैं कि कैसे माता-पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों की नींव सुदृढ़ बनाएँ ताकि वे खुद अपनी नियति का निर्माण कर सकें।

सा कहा गया है कि आत्माएँ ही अपने लिए परिवार को, जिसमें वे पैदा होती हैं, चुनती हैं ताकि वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ सकें। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कोई अनियोजित गर्भधारण नहीं होते लेकिन शायद अनियोजित परवरिश होती है। गर्भधारण चाहे नियोजित हो या अनियोजित, लेकिन जब एक बच्चे का जन्म होता है तो यह माता-पिता के लिए एक आशीर्वाद होता है जो उस आत्मा के संरक्षक बन जाते हैं। यह आवश्यक है कि वह आशीर्वाद बच्चों की अच्छी परवरिश करने में तबदील किया जाए जिसका आधार विश्वास और प्रेम हो। 

माता-पिता बनना सामान्य बात प्रतीत हो सकती है लेकिन यह सौभाग्य कई लोगों को नहीं मिलता। हमारे दैनिक जीवन में तनाव बढ़ जाने के कारण अधिकाधिक दंपतियों को गर्भधारण करने में कठनाई हो रही है। इसके अलावा, उनके ऊपर परिवार की ओर से अपने कुलनाम को जारी रखने का, परंपराओं, धार्मिक शिक्षाओं और अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने का दबाव भी रहता है। पहले, सौभाग्य से माँ पूरा समय घर पर रहती थी, बच्चे की हर उपलब्धि पर ध्यान देती थी और पिता कमाने वाला होता था। आज बढ़ती आर्थिक मांगों को पूरा करने के लिए माता-पिता दोनों को काम करना पड़ता है। इससे बच्चों के जीवन में एक ऐसी रिक्तता आ जाती है जिसे देखभाल करने वालों या शिक्षकों द्वारा आसानी से नहीं भरा जा सकता।


यदि मेरा हृदय अंदर से समायोजित और जुड़ा हुआ है तो जीवन में आने वाली चुनौतियाँ भी

आशीर्वाद में बदल जाती हैं। हमारे हृदय विश्वास से समर्थित प्रेम द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं।


परवारिश के लिए कोई नियम पुस्तिका नहीं होती, इसीलिए यह एक बड़ी चुनौती बन जाती है। कुछ बच्चे अपना प्रारंभिक जीवन बिना किसी बाधा के जीते हैं जिससे उनकी परवरिश करना कुछ हद तक आसान हो जाता है। लेकिन आधुनिक दुनिया में ऐसा बहुत कम होता है। माता-पिता चाहे एकल हों या संयुक्त, बच्चों की परवारिश और पोषण को लेकर उनके अलग-अलग अनुभव होंगे। यदि बच्चों को छोटी उम्र से ही प्रेम, निर्मलता, विश्वास, सच्चाई, नम्रता, स्वाभाविकता, आत्म-सम्मान, दूसरों के प्रति सम्मान और गलत व सही का विवेक जैसे सिद्धांत सिखा दिए जाएँ तो बच्चे इन पर कायम रहेंगे और आगे चलकर ज़िम्मेदार वयस्क और स्वयं ज़िम्मेदार माता-पिता बनेंगे। कई माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज़िंदगी के सबक सीखने के उनके अनुभवों, जैसे युवावस्था, बदमाशी, सामाजिक समायोजन, यौन अन्वेषण, आदि के बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन कुछ माता-पिता को ऐसे मुद्दों को संभालना बिलकुल नहीं आता।

हार्टफुलनेस अभ्यास मुझे अपने हृदय की बात सुनने योग्य बनाते हैं। और यह मेरी परवरिश की यात्रा का एक प्रमुख घटक रहा है। यदि मेरा हृदय अंदर से समायोजित और जुड़ा हुआ है तो जीवन में आने वाली चुनौतियाँ भी आशीर्वाद में बदल जाती हैं। हमारे हृदय विश्वास से समर्थित प्रेम द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं।

कई माता-पिता को अपने शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से विकलांग बच्चों, खराब स्वास्थ्य वाले बच्चों, आदि की परवरिश करने में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये माता-पिता शायद इस बात को न समझ पाएँ लेकिन वास्तव में उन्हें इस विशेष क्षमता का उपहार दिया गया है - इन विशेष आत्माओं का पालन-पोषण करने और उनकी ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता का। प्रेम और विश्वास द्वारा निश्चित रूप से वे उन चुनौतियों को स्वीकार कर पाएँगे और उनका ज़्यादा आसानी से सामना कर पाएँगे। 

एक अभिभावक के रूप में मैंने जो सबसे कठिन सबक सीखा, वह है कि मुझे अपने बच्चों के लिए कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। वे संसार में जन्म लेने के फलस्वरूप मिलने वाली परिस्थितियों से गुज़रते हुए अपना जीवन जिएँगे और ऐसा उन्हें करना ही होगा। जब हमारे बच्चे पैदा होते हैं तब हम यह भूल जाते हैं कि हम केवल कुछ समय के लिए ही उनके संरक्षक हैं। परिणामस्वरूप अहंकार हम पर हावी हो जाता है और हम उनके लिए सपने और उम्मीदें बनाना शुरू कर देते हैं। इससे निराशा ही हाथ लगती है।

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हमें समझना चाहिए कि हमारे बच्चे अपने सपने, अपनी पसंद, अपनी राह खुद चुनकर बड़े होंगे। जब हम अपने सपनों और अपेक्षाओं को उन पर थोपने लगते हैं तब विरोध पैदा होता है और हमारे सामने उन्हें खोने का जोखिम खड़ा हो जाता है। हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों की नींव मज़बूत बनाएँ और उन्हें मानसिक, आध्यात्मिक व भावनात्मक रूप से सहारा देते रहें। हम उन्हें अपने रास्ते पर चलने दे सकते हैं और उन्हें यह आश्वासन दे सकते हैं कि जब भी उन्हें हमारी ज़रूरत होगी, हम उनके लिए मौजूद होंगे।

अपने बच्चों के साथ बातचीत करें। ऐसा व्यक्ति बनें जो न सिर्फ़ उनकी सुनता है बल्कि उनकी बात पर ध्यान भी देता है। हाँ, इसमें चुनौतियाँ तो होंगी लेकिन जब हम उनसे पार पा लेंगे तब खुशियाँ भी मिलेंगी। हाँ, दुख के आँसू तो होंगे लेकिन खुशी के आँसू भी होंगे। हम उनके साथ होने वाली हर चीज़ को नियंत्रित नहीं कर सकते।

एक बार जब हम बच्चों पर नियंत्रण और उनके लिए अपेक्षा करना छोड़ देते हैं तथा विश्वास व प्रेम के साथ उनकी परवरिश करते हैं तब उनके मार्ग दिव्यता से भर जाएँगे।


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अनीश दवे

अनीश दक्षिण अफ़्रीका के एक अति आकर्षक प्रदेश से हैं। उन्हें पारिवारिक जीवन की समृद्ध पृष्ठभूमि में बहुत आनंद मिलता है। वे अपने परिवार के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और कॉर्पोरेट क्षेत्र क... और पढ़ें

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